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असग़र वजाहत का यात्रा संस्मरण : चलते तो अच्छा था


चलते तो अच्छा था

ईरान और आज़रबाईजान के यात्रा संस्मरण

-असग़र वजाहत

अनुक्रम

1. मिट्टी का प्याला

2. शबे शीराज़

3. जाना-पहचाना अजनबी

4. सड़क पर तेहरान

5. समझदार को इशारा

6. भारतीय होने का अर्थ

7. तेहरान में पहला जुमा

8. दोस्त अकेला दुश्मन ज़माना

9. खुरचन

10. बुद्धिजीवियों की सड़क

11. सीमा की सीमाएं

12. मुसद्दिक़ की दुकान

13. हवा के शहर में

14. हवा का रुख़

15. परियों की तलाश में

16. तेल के खेल

17. अग्नि मंदिर

18. फिर वही रास्ता

19. स्वर्ग के द्वार की ओर

20. धर्म के गढ़ में

21. आधी दुनिया

22. रेत पर शहर

23. फिर धर्म और कविता की ओर

24. कवि का कर्ज़ा

25. हुक्मे नादिरशाही

26. ख़ाफ़ में तोते

27. ईरान के गिरफ़्तार

पहली किश्त - ‘मिट्टी का प्याला' पढ़ें रचनाकार के अगले अंक में

सभी चित्र - @ असग़र वजाहत . ऊपर का चित्र - गांजा, आज़रबाईजान

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1 टिप्पणियाँ

  1. असग़र वज़ाहत जी का यह संस्मरण पढ़कर ऐसा लगा कि हिन्दी में अब भी लोग लिखते हैं । पिछले कई सालों से हिन्दी की एकरसता और शून्यता को देखकर बहुत चिंता होती थी, वजाहत साहब ने शायद घाव को भरने की कोशिश की है । उनका बहुत-बहुत धन्यवाद । ईरान जैसे देशों से हमारा टूट चुका सम्पर्क हमें एक भुला दिए गए अतीत की जानिब ले जाता है । असगर वज़ाहत का इस ओर इशारा करना एक बोधाभास के जैसा है । उम्मीद है कि भविष्य में उनसे और भी ऐसी ही उच्च स्तरीय रचनाएँ पढ़ने को मिलेंगी ।

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