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मैं और मेरा अष्टावक्र

kavita sangrah mai mera astavakra harish bhadani

- हरीश भादानी

मैं

---.

मेरे भेजे में

न तेरा ई-उ पार आवे

और ना ही यह जौल-टौल

तू तो वो बता

कहा था न तूने....

मन का बीमार-

वह कैसा होता है,

कहाँ रहता है,

तूने देखा है कभी उसे?

 

मेरा अष्टावक्र

---.

यह भी तूने भली कही

मैं तो रोज ही देखूं ऐसों-ऐसों को

अभी भी मेरे सामने ही है

पर इस पल मैंने तुझे

एक क्लास का

अपना उस्ताद मान ही लिया

अरे! वह भी कोई बीमार

जिसे अपनी बीमारी याद रहे,

समझ का एकाध कणूका तो

बच ही गया है तुझमें

कोई बात नहीं, सींच ही दूंगा

तेरी फोफस जमीन,

रिसे ही है मोहताजी के कूए में पानी

दो-चार बाजरी के सिट्टे

तो लहलहा ही लेंगे...

यह मैंने तुझ से नहीं

अपने आप से कहा है रे

कभी-कभार मैं भी

बोल लिया करूं अपने-आप से

तेरी छाया जो पड़ती रहे मुझ पर;

....

कविता संग्रह – मैं - मेरा अष्टावक्र से साभार

कवि- हरीश भादानी

प्रकाशक – कलासन प्रकाशन, कल्याणी भवन, बीकानेर (राज.)

पृ. 152, मूल्य 200/-, आईएसबीएन नं. 81-86842-21-2

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