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छायावाद की एक प्रमुख रचनाः आँसू

Intezaar15 (WinCE)

- डॉ.उत्तम पटेल

श्री जयशंकर प्रसाद हिंदी के भावुक कवि और कुशल कलाकार हैं। इसे कोई यदि उनकी एक ही रचना में देखना चाहें तो उसे आँसू की ओर ही इंगित किया जा सकता है। आँसू में प्रेम की स्मृति इतनी सत्यता के साथ अभिव्यक्त हुई है कि हमारा कवि के साथ अविलम्ब साधारणीकरण हो जाता है। आँसू कवि के जीवन की वास्तविक प्रयोगशाला को आविष्कार है।

जीवन में प्रत्येक अभिलाषा को पूरी करने के लिए संघर्ष करना पड़ता है और उसमें असफल होने पर व्यक्ति चिंता, दुःख, असंतोष और कुण्ठा से पीड़ित होता है। आँसू इस प्रकार की प्रेमभावनाओं की चरम परिणति है। आँसू का संपूर्ण महत्व कवि के करुणाकलित हृदय से मुखरित विफल रागिनी में देखा जा सकता है। आँसू में कवि ने लौकिक-प्रेम की व्यक्तिगत विरहानुभूति को अभिव्यक्त किया है।

आँसू का मुख्य भाव विरह-श्रृंगार है। आँसू का आधार असीम व्यक्ति है, जिसके मिलन सुख की स्मृति ने कवि के हृदय में वेदना-लोक की सृष्टि की है। कवि के हृदय में प्रिय की स्मृतियों की एक बस्ती ही बस गई है। उनके ह्रृदय में विरह की आग जल रही है-

शीतल ज्वाला जलती है, इँधन होता दृग जल का,

यह व्यर्थ साँस चल-चल कर करती है काम अनिल का।

कवि अपने प्रेम को याद कर कह रहा है कि जिस प्रकार समुद्र के मध्य बडवाग्नि सुप्त रहती है उसी प्रकार उसके प्रणय-सिंधु के तल में भी विरह की अग्नि छिपी हुई थी। उसे अपनी प्रेयसी की निष्ठुरता याद आती है। कवि अपने बीते हुए प्रेम-प्रसंगों को स्मृत कर रहा है-

मादक थी मोहमयी थी, मन बहलाने की क्रीड़ा,

अब हृदय हिला देती है वह मधुर प्रेम की पीड़ा।

कवि के मन में प्रिय-मिलन की अभिलाषाएँ रह-रहकर चेतन हो उठती हैं। किन्तु उसी क्षण सोयी हुई व्यथा जाग पड़ती है। जिस प्रकार आकाश घनीभूत होकर दुर्दिन में जल-बिंदुओं की वर्षा करता है। उसी प्रकार कवि की चेतना के आकाश पर अपने विगत जीवन की स्मृतियाँ आ-आकर धिर जाती हैं। घनीभूत पीड़ा कवि के मन को व्यथित कर देती है और जीवन की विषम परिस्थितियों में उसकी वेदना का यह मेघ आँसुओं की धारा के रूप में बरस पड़ता है-

जो घनीभूत पीड़ा थी, मस्तक में स्मृति-सी छायी,

दुर्दिन में आँसू बनकर वह आज बरसने आई।

कवि को अपनी प्रिया की लज्जा की याद आती है। कवि के मन के निर्मल आकाश में प्रियतम की मधुर स्मृतियों का झंझावात आकर चलने लगता है। प्रियतम की मधुर स्मृतियों ने आकर कवि के हृदय में एक वेदना विह्वल कोलाहल भर दिया है।

आँसू के नायक को दुर्दिन में अपने गत वैभव-विलास पूर्ण जीवन का स्मरण हो आता है, उसकी प्रेयसी की मदमाती छवि उसकी आँखों में बस जाती है। उसे याद आता है, मानो हाफिज़ के शब्दों में माशूकों के जमाव में सम्राट एक ही था। गिनती में वे हजारों थे, मगर उसके दिल को चुरानेवाला एक ही था। स्मृति के जागृत होते ही वह उदास हो जाता है। अपने प्रिय के प्रथम आगमन-प्रथम परिचय की अवस्था को रह-रहकर बिसूरने लगता है। कभी वह सोचता है, वह इस पृथ्वी की न थी, स्वर्गीय आभा थी, जो उससे मिलने को नीचे आई थी। वह प्रियतम का मधुर, लजानेवाला मुख देखते ही उसकी ओर खींच गया था। प्रिय का सौंदर्य उसके शून्य-हृदय को आत्म-विभोर कर देता है तभी वह एकदम उसके साथ एक होकर कहने लगा था-

परिचित से जाने कब के, तुम लगे उसी क्षण हमको।

उसमें वह अपना अस्तित्व ही भूल जाता है। प्रिय ने उस पर पूर्ण अधिकार जमा लिया था। जब मनुष्य के मन में किसी की स्मृति तीव्रतम हो उठती है, तो वह स्मृति के आधार की आकृति, उसकी बातों, उसके व्यापारों-कार्य-कलाप का बहुत विस्तार के साथ मनन करने लगता है। हम आँसू के नायक को अपने प्रिय के शारीरिक सौंदर्य-वर्णन, उसके साथ मिलन-क्रीड़ाओं का उल्लेख करने में भी हर्ष विकंपित पाते हैं। चाँदनी की चाँदी भरी रातें सुख के सपनों की अधिक समय तक उसके कुंज में वर्षा नहीं करने पाई। वह तो कवि के निराशा पूर्ण पतझर के समान जीवन में प्रेम के पुष्प बिछाकर आया था। उसके प्रियतम का प्रवेश जीवन में एक विशेष उल्लास लेकर हुआ था। कवि के जीवन में निराशा के क्षण का तिमिर फैला हुआ था तब आशा ता उज्ज्वल दीप जलाकर उसने कवि के मन को प्रकाशित किया था। प्रियतम के सौंदर्य की स्मृति कवि को आ रही है। ये स्मृतियाँ कहीं असीम वेदना से भरे हुए कवि के हृदय को आकार प्रदान करती हैं तो कहीं प्रेमास्पद की निर्ममता का उद्घाटन करती हैं।

संक्षेप में, आँसू हिंदी का एक श्रेष्ठ विरह काव्य है। इसमें हलचल और उन्माद तथा अतृप्ति और पिपासा है। इसमें प्रेयसी की निष्ठुरता और ह्रृदय की गहरी टीस है। आँसू में स्निग्ध आर्द्रता और हृदय की आहें हैं। जिस रूप-सी रमणी के संपर्क से कवि के दिल में एक अजीब मस्ती, प्रेमोन्माद, विलासितापूर्ण सरसता और यौवन-विलास का उद्वेग होता हुआ था, वह उसके विछोह से क्षण भर में विलुप्त हो गया। वह तो अपनी झलक दिखाकर शून्य में समा गई, किन्तु उसकी स्मृति न मिटी। जो तड़पन, जो आकुलता, जो व्यथा वह छोड़ गई वह बल खाता हुआ आँसू में बह आया। आँसू में प्रशांत भाव-धारा अश्रु-कणों में बिखर फूट पड़ी है।

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संपर्कः 14-बी, अवधूतनगर, नगारिया, धरमपुर, जि.वलसाड-396 050 (गुजरात)

3 टिप्पणियाँ

  1. प्रसाद जी की रचना की इतनी सुन्दर व्याख्या पढ़कर पुराने दिन याद आ गए ..
    हिन्दी मे एम ए करते हुए कवि जयशंकर मेरा विशेष विषय था. महाकवि को अपनी कविताओं मे ज़िन्दा रखना है तो भाषा भी वैसी ही समृद्ध होनी चाहिए...

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  2. जयशंकर की अनूठी रचना।।

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  3. बहुत सटीक और सुंदर

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