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मृत्यु स्मृति स्तम्भ

-डॉ. रेखा श्रीवास्तव

clip_image002 मानव मन की सहज अभिव्यक्ति ही कला कहलाती है। जो मानव जीवन की समृद्धि के साथ साथ विकसित होती चली गई है। जिस प्रकार आदि काल से अब तक मानव जीवन का इतिहास क्रमबद्ध नहीं मिलता उसी प्रकार कला का भी इतिहास क्रमबद्ध नहीं मिलता। परन्तु यह तथ्य सत्य है कि कला मानवजीवन की सहचरी के रूप सदा विद्यमान रही है। लोककला के रूप में तो यह मानवों की भावनाओं, परम्पराओं और संस्कृति की अभिव्यक्ति बन गई। यह वर्तमान शास्त्रीय और व्यावसायिक कला की पृष्ठभूमि भी है, ऐसा विद्वानों का मत है। कला की उन्नति में लोक कला का भी बहुत महत्व रहा है। कला का विकास तो राजाश्रयों में पेशेवर कलाकारों द्वारा हुआ है परन्तु लोक कला का विकास घरों के आंगनों में, ग्रामों में, अशिक्षित जातियों में, बिना कोई प्रसिद्धि के शांत व अबोध रूप से धार्मिक, सांस्कृतिक व पारिवारिक परम्पराओं के साथ बिना बौद्धिक पुट के होता जा रहा है। लोक कला को किसी आश्रय, प्रलोभन या प्रोत्साहन की आवश्यकता नहीं होती है वह तो स्वच्छन्दता तथा मौलिकता के साथ सदा प्रगति करती है, क्योंकि उसका सम्बंध तो प्राणीमात्र से है।१ स्टीवैंस के अनुसार आदिमानव के साथ लोककला का गहरा संबंध है।२ आदिमानव भी प्रकृति से प्रेरित होकर सहज भाव से दैविक शक्तियों का सहारा लेकर आराधना, मांगल्य, जादू टोना इत्यादि के लिए कला की शुरूवात की होगी । प्रागैतिहासिक काल की चित्रकला इसके उदाहरण है। आज हम देखते है कि हर प्रांत हर सम्प्रदाय में बच्चे के जन्म से लेकर मृत्यु तक अनेक रीति रिवाजों, परम्पराओं, धार्मिक कार्यों इत्यादि अवसरों पर आज भी कलात्मक कार्य किये जा रहें है,जैसे सम्पूर्ण उत्तर भारत, में गोवर्धन पूजा, गणगौर और तीज की राजस्थानी मूर्तियां, बंगाल की दुर्गा, शुभ अवसरों में बनाई जाने वाली अल्पना, बिहार की मधुबनी, मालवा की सांझी इत्यादि। लोक कला लोक मानस से प्रेरणा और पोषण पाती है। एवं उसी को प्रतिबिम्बित करती है। लोक कलाकार किसी कला स्कूल में जाकर शिक्षा नहीं प्राप्त करता, किसी दुरूह सिद्धांत व शैली की जटिलता में नहीं पड़ता और न ही उसे नये सृजन की अति महत्वाकांक्षा होती है। जन्मजात कौशल ही उसका सर्वस्व है। उसके आंगन में ही उसे उपयुक्त कला सामग्री मिल जाती है। घर की सुख समृद्धि ही उसकी कला का पुरस्कार है।

clip_image004 छत्तीसगढ़ अंचल के बस्तर प्रांत में ऐसी ही एक परम्परा है मृत्यु स्तम्भ की। जिसे मृतक की कब्र पर स्मृति स्वरूप लगाया जाता है। इस स्तम्भ पर मृत्यु प्राप्त व्यक्ति की पसंद के अनुरूप जीवन में उपयोग की गई वस्तुओं इत्यादि का चित्रांकन किया जाता है। इस तरह की परम्पराओं के इतिहास में भी उदाहरण मिलते है। दक्षिण भारत के अनेक स्थानों से ईसा पूर्व पांचवी सदी की लोहे की वस्तुएं मिली है। उस जमाने में लोग शवों को मिट्टी के बड़े शवाधानों में रखकर लम्बे चौड़े गड्ढों में रख देते थे और उपर बडे बड़े पाषाण खड़े कर देते थे ,इसलिए उनकी संस्कृति को महापाषाण संस्कृति का नाम दिया गया । ३ मिश्रवासियों ने भी पूर्व में पिरामिडों का निर्माण कर उसमें शवों को सुरक्षित रख उसके जीवन से संबंधित वस्तुओं को उसके समीप रख दिया जाता था । इसी तरह बस्तर में शुभ अवसरों पर भी कलात्मक स्तम्भ निर्माण किया जाता है जिसमें विवाह स्तम्भ प्रचलन में हैं। किसी भी स्थानीय व्यक्ति के धर के आंगन में खड़े स्तम्भ और उस पर अंकित आकृतियों चाहे रिलीफ द्वारा निर्मित हो या चित्रांकन हो, उस घर में आयोजित विवाहों का अंदाजा लगाया जा सकता है। क्योंकि प्रत्येक विवाह का एक स्तम्भ आंगन में विवाह की परम्परा के अनुसार लगाया जाता है।

छत्तीसगढ़ अंचल में सम्पूर्ण बस्तर काष्ठकला के लिये न केवल भारत में बल्कि अब विदेशों में प्रसिद्ध हो रहा है। जिनमें काष्ठ शिल्पी राधेश्याम ,सुकपाल धुर्वा, पदुमदास पंत, बेनिस ने बस्तर का नाम रोशन किया है। औंधी क्षेत्र में डोमीकला, गहनकट्टा गढ़डोमी, आमाकोड़ो और कोरछा में काष्ट कला के आकर्षक उदाहरण मिलते हैं। जहां कि मूर्तियों का स्वतन्त्र अंकन नहीं होता बल्कि स्मृति स्तम्भों में आकारों का उद्रेखन किया जाता है। औरधी क्षेत्र के विवाह स्मृति स्तंभों पर और बस्तर क्षेत्र के जगदलपुर दंतेवाड़ा मार्ग पर स्थित मृत्यु स्मृति स्तंभों पर उद्रेखन कर कृति निर्माण किया जाता है। यह आदिवासियों के भावाभिव्यक्ति की अनोखी परम्परा है।

clip_image006 बस्तर क्षेत्र में निर्मित काष्ठकला में मृतक स्मृति स्तंभ भी अपना विशिष्ठ स्थान रखते हैं। ग्राम इरपा, बड़े सुरोखी,

 

गमावाड़ा, ग्राम किलापारा, गलबा, से प्राप्त मृतक स्मृति स्तंभ उत्कृष्ट है। ये वास्तानार दंतेवाड़ा मार्ग के किनारे स्थित है। इन स्तंभो पर मृतक की जीवन प्रसंगों का अंकन विभिन्न आकारों द्वारा किया जाता है। इन स्मृति स्तंभो में आधुनिकता का समावेश स्पष्ट दिखाई देता है। प्रारंभिक समय पर आदिवासियों के अनुसार इन मृतक स्तंभो में परम्परागत रूप से काष्ठ का प्रयोग किया जाता था, समय के परिवर्तन को स्वीकार करते हुए शिलास्तभों का प्रयोग किंचित काष्ठ का समावेश करके किया जाने लगा। चित्र क्रमांक ३ ।

 

 

अब सीमेन्ट कांक्रीट से बने चबूतरों ने स्थान ले लिया । काष्ठ स्तंभों को चौकोर स्तभंनुमा बनाकर उस पर मृतक से

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संबंधित घटनाओं, रहन सहन से संबंधित, उसकी पसंद, इत्यादि को उकेरा जाता था । चित्र क्रं. १। हम यह भी कह सकते है कि उस पर उकेरित आकृतियों से मृतक की जीवन शैली का अंदाजा लगाया जा सकता है। उस स्तभ पर मृतक के कपड़े भी लटका दिया जाता है। अब काष्ठ स्तंभों के स्थान पर पत्थर अथवा कांक्रीट के स्तंभों का प्रयोग किया जाने लगा। इन स्तंभों के शीर्ष पर काष्ठ का आयताकार अथवा पशु की आकृति का आकार लगा होता है। जिस पर लोहे की सलाखों पर लकड़ी से बने तीन से पांच अथवा छः पक्षियों की आकृति लगी होती है तथा मृतक के कपड़े उस लटका दिये जाते है। चित्र क्र. २।

आदिवासियों की इस मौलिक कल्पना से सुखद आश्चर्य होता है। इन चित्रित गाथाओं में उत्कीर्ण आकृतियां हो या चित्रित आकृतियां हो आदिम शैली की कल्पनाशीलता और आदिवासियों की सहजता सरलता clip_image010का अद्भुत संगम लगता हैं । बिना शिक्षा दीक्षा के अपनी परम्पराओं का निर्वाह करने की क्षमता इन सरल आदिवासियों में अब भी विद्यमान है। इन स्तंभों में अंकित आकृतियों में मानवाकृतियां, पशु-पक्षियों की आकृति और कही कहीं ज्यामितीय आकृतियां, उपयोग में आने वाले औजार अस्त्र शस्त्र होते है। आजकल कही कही सायकिल भी अंकित की गई है। इन स्तम्भों पर अंकन विभिन्न खण्डों में किया जाता है जिसमें चार से छः खण्ड होते हैं। प्रत्येक खण्ड में अलग अलग दृश्य अंकित किये जाते हैं। काष्ठ स्तंभों का शीर्ष गुम्बदनुमा आकार में बना होता है। या कभी कभी उस पर आकृतियां उकेर दी जाती हैं। जैसा चित्र क्र.५। काष्ठ स्तंभों पर उकेरित आकृतियां अपेक्षाकृत अधिक आनुपातिक है। हाथ पैर को हल्की गोलाई लिये हुए अंकित किया गया है। जिसमें आकृतियों को सम्मुख मुद्रा में या एकचश्म अंकित किया गया। मानवों की कतारबद्ध श्रृंखला अंकित की गई है। हाथों में वाद्ययंत्र अथवा औजार पकड़े हुए बनाया गया है। कभी कभी सर्प अथवा गाय के मुख के स्थान पर मानव मुखाकृति बना दी जाती है। वस्त्र स्थानीय पारम्परिक अथवा आधुनिक बनाये जाने लगे है। काष्ठ में उकेरी गई आकृतियों में रंग नहीं भरे जाते । उन्हें प्राकृतिक रूप में ही रहने दिया जाता है।

इन स्तम्भों पर मानवाकृतियों के साथ साथ पशु पक्षियों जैसे हिरण गाय हाथी शेर केकड़ा सांप बिच्छू मोर बत्तख उल्लू इत्यादि का अंकन भी बहुतायात से मिलता है। इन आकृतियों का प्रतीकात्मक अंकन किया गया है। यह आश्चर्य की बात है कि प्रकृति के मध्य रहनेवाले ये आदिवासी ने भी प्रागैतिहासिक मानवों की तरह प्रकृति का अंकन नहीं किया । यदा कदा कमल के फूल या धान की बालियों का अंकन मिला है। कुछ उदाहरण ऐसे भी मिले हैं। जिनमें आदिवासियों का शहरों के प्रति रूझान दिखाई देता है। जिनमें सायकिल स्कूटर कार का चित्रण मिलता है। पत्थरों या कांक्रीट के स्तम्भों पर तैल रंग अथवा स्थानीय रंगों से चित्रण किया गया है। इन स्तम्भों पर आदिवासियों की परम्पराओं की मौलिक अभिव्यक्ति होती है। ये इनकी कल्पनाशीलता का परिचायक भी है। इन कलात्मक उदाहरणों से यह स्पष्ट हो जाता है कि ये स्मृति स्तम्भ अपनी मौलिकता, उत्कृष्ट संयोजनों, सरल सुबोध आकार, एवं कल्पना की बेजोड़ कृतियां हैं। जिन्होंने छत्तीसगढ़ की कला संस्कृति को समृद्ध बनाने में अपना अमूल्य सहयोग दिया है।

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संदर्भ सूची

१,२- भारत की चित्रकला का संक्षिप्त इतिहास-डॉ. लोकेश चन्द्र अग्रवाल, पृ.१७९-लोककला

३- भारतीय विज्ञान की कहानी-गुणाकर मूले, पृ. १०७ प्राचीन भारत में धातुकर्म

४- कलाविलास -आर ए अग्रवाल , लोककला

५-शोध प्रबंधः छत्तीसगढ़ की रूपंकर लोक कलाएं -डॉ. राजेश सिंह

५ चौमासा अंक वर्ष

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सम्पर्क:

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डॉ. रेखा श्रीवास्तव

सहा प्राध्यापक चित्रकला

घर का पता-१००,सुकृति, राजीव नगर, (कस्तूरबा)

रतलाम म.प्र.

1 टिप्पणियाँ

  1. बेनामी11:10 am

    डा. रेखा जी, सुन्दर और गहन लेखन के लिये। ऎसे ही शोध विषयॊं पर लिखती रहिये। क्या लोक गीतॊं मे इस प्रकार के विषय हैं?
    महेंद्र सिन्ह

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