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एक कला ही तो है व्यक्तित्व का सर्वांगीण विकास



- सीताराम गुप्ता

जिस प्रकार पत्थर, धातु या मिट्टी से मूर्ति बनाना एक कला है उसी प्रकार व्यक्तित्व का विकास भी एक कला है। पत्थर की मूर्ति को ही लीजिए। एक कलाकार अथवा शिल्पी पत्थर के टेढ़े-मेढ़े टुकड़े या शिलाखण्ड से एक सुंदर प्रतिमा का निर्माण करता है। इस प्रक्रिया में वह क्या करता है? पत्थर में मूर्ति के अतिरिक्त जो फ़ालतू पत्थर है उसको काटकर अलग कर देता है। थोड़े अभ्यास की जरूरत है बस और मूर्ति तैयार। जिसने पत्थर में छिपी मूर्ति को खोजने का गुण सीख लिया वह एक बड़ा कलाकार बन गया। हर पत्थर में छिपी सुंदर प्रतिमा की तरह ही हर व्यक्ति में भी एक प्रभावशाली व्यक्तित्व उपस्थित है। आवश्यकता है तो बस उसे देखकर काटने-छाँटने की, उसे उभारने की तथा प्रकट करने की।
हर व्यक्ति में कुछ अच्छाइयाँ हैं तो कुछ बुराईयाँ भी। मनुष्य की अच्छाइयाँ ही उसके प्रभावशाली व्यक्तित्व का निर्माण करती हैं लेकिन साथ ही उसकी बुराइयों की वजह से उसके व्यक्तित्व का वास्तविक स्वरूप उभरकर सामने नहीं आ पाता। यदि इन बुराइयों की पहचान कर मूर्ति-निर्माण प्रक्रिया में फ़ालतू पत्थर काटकर अलग कर देने की तरह बुराइयों को भी हटा दिया जाए जो एक अत्यंत प्रभावशाली व्यक्तित्व उभर कर सामने आ जाएगा। हम दिनभर अनेकानेक कार्य करते हैं। हमारे कार्यों की सूची बहुत लंबी होती है। सारे दिन व्यस्त रहते हैं फिर भी कार्य पूरे नहीं होते। कुछ कार्य ऐसे होते हैं जो हमारे स्वयं के लिए तथा समाज और राष्ट्र के लिए उपयोगी होते हैं जबकि अनेकानेक कार्य ऐसे भी होते हैं जिनके करने से न तो हम स्वयं लाभान्वित होते हैं और न समाज और राष्ट्र ही। ऐसे निरर्थक कार्यों की पहचान कर यदि हम उनसे छुटकारा पाने का प्रयास करें तो हमारे पास समय की कमी नहीं रहेगी और सभी जरूरी कार्य समय पर पूरे हो सकेंगे।
रोजमर्रा की जिंदगी में घंटों टीवी के सामने बैठे रहना, टेलिफोन पर बेकार की लंबी बातचीत करना, समाचार-पत्र को शुरू से लेकर आख़िर तक पूरा पढ़ना या जो भी पुस्तक हाथ आए उसे पढ़ना शुरू कर देना ऐसे ही कार्य हैं जो अनुपयोगी और निरर्थक हैं। इन सभी कार्यों के लिए आवश्यकता से अधिक समय नष्ट न करें तथा जो स्वयं से संबंधित है उसी समाचार या पत्र-पत्रिका को पढ़ें । पुस्तकों पत्र-पत्रिकाओं तथा रेडियो-टीवी के कार्यक्रमों का उचित चुनाव करें। यदि सारे दिन टीवी के सामने बैठे रहेंगे तो जरूरी काम कैसे पूरे होंगे? इनसे संबंधित फ़ालतू चीजों को हटा देने से हमारे समय की बचत ही होगी। बचे हुए समय को उपयोगी कामों में लगाकर व्यक्तित्व का पूर्ण विकास करना सभंव है।
वास्तुशास्त्र इसी सिद्धांत पर आधारित है कि घर या कार्यालय में बेकार चीजों के लिए कोई स्थान नहीं होना चाहिए। हमारे कार्य करने के स्थान पर, हमारी आँखों के सामने केवल उपयोगी वस्तुएँ ही होनी चाहिएँ। ढेर सारी अव्यवस्थित चीजें काम में रूकावट पैदा करती हैं। उनके हटा देने से कार्य करने में आसानी होती है तथा कार्य अच्छी प्रकार होता है। बेकार चीजों की तरह बेकार काम भी हमारी कार्यकुशलता को बाधित करते हैं और हमारी कार्यकुशलता हमारे व्यक्तित्व को प्रभावित किये बिना नहीं रह सकती। प्रभावशाली व्यक्तित्व के निर्माण के लिए बेकार की चीजों से छुटकारा पाना अनिवार्य है चाहे वे वस्तुएँ हों, कार्य हों अथवा मनोभाव।
बेकार के कामों के साथ-साथ बेकार के मनोभावों से मुक्ति पाना भी जरूरी है। हमारे व्यक्तित्व के विकास में सबसे बड़ी बाधा हमारे नकारात्मक भाव ही होते हैं। हमारे मन के भाव ही अंततोगत्वा हमारे कर्म में परिणत हो जाते हैं। इसके लिए भावशुद्धि या विचारों का परिष्कार अनिवार्य है। भावशुद्धि के लिए भी कलाकारी की जरूरत है। धातु की मूर्तियाँ बनाने के लिए एक कलाकार पहले धातु को गरम करके पिघलाता है और फिर उसे मनचाहे आकार के साँचे में ढालकर अपेक्षित आकार की प्रतिमा प्राप्त कर लेता है। विचारों को सही आकार देने का भी यही तरीका है। हमारा मन एक साँचा ही तो है जहाँ विचार आकार पाते हैं अत: शांत-स्थिर होकर मन में केवल सकारात्मक उपयोगी विचार लाएँ। बार-बार ऐसा करने से वे दृढ़ हो जाएँगे और आपकी आदत बन कर आपके व्यक्तित्व को नया रूप दे सकेंगे।
कल्पना या चाक्षुषीकरण द्वारा किसी भी विचार को स्थायित्व प्रदान कर उसे भौतिक स्वरूप दिया जा सकता है। एक चित्रकार कैनवस पर रेखाओं और रंगों की सहायता से चित्र बनाता है। हमारा मन भी एक कैनवस की तरह ही है। उसको भी कल्पना के रंगों से सजाना अनिवार्य है। रंग जितने गहरे और चटख होंगे चित्र उतना ही आकर्षक होगा। हल्के और अस्पष्ट रंगों का प्रयोग तो दु:ख, विषाद, पीड़ा, खिन्नता, शोषण आदि नकारात्मक भावों और विषयों की अभिव्यक्ति के लिए किया जाता है। इसी प्रकार कल्पना जितनी अस्पष्ट होगी उसके परिणाम भी उसी तरह के होंगे अस्पष्ट, संदिग्ध् अथवा नकारात्मक। कल्पना-चित्र अथवा चाक्षुषीकरण जितना अधिक स्पष्ट और रंगीन होगा वह उतना ही प्रभावशाली होगा तथा शीघ्र ही वास्तविकता में परिणत हो सकेगा। जब भी मन में विचार उठे केवल सकारात्मक विचार ही उत्पन्न हो और उसे मन की आँखों से जितना अधिक स्पष्ट और रंगीन हो सके बार-बार देखें। पहले चित्र की तरह, फिर चलचित्र की तरह, एक सवाक फिल्म की तरह। उसी का एक हिस्सा बन जाएँ। उसी में खो जाएँ। यह प्रक्रिया आपके सपनों को साकार कर देगी, उन्हें वास्तविकता में बदल देगी।
व्यक्तित्व विकास से तात्पर्य है पूर्ण और संतुलित विकास। जीवन के हर क्षेत्र में संतुलन होना अनिवार्य है। व्यक्ति के शारीरिक विकास के साथ-साथ उसका मानसिक तथा बौ(कि विकास होना भी जरूरी है। केवल शारीरिक या मानसिक अथवा बौद्धिक विकास होना संपूर्ण व्यक्तित्व का विकास नहीं माना जा सकता। उसके बाह्य और आंतरिक व्यक्तित्व का समान रूप से विकास होना अनिवार्य है अन्यथा जीवन में संतुलन नहीं पैदा किया जा सकेगा। जीवन में संतुलन पैदा करने के लिए भी कलाकार बनने की आवश्यकता है। मिट्टी की मूर्ति बनाने के लिए कुछ ज्यादा नहीं करना पड़ता। सामग्री बेकार नहीं जाती। हमारे पास जितनी मिट्टी है सारी की सारी काम में आ जाती है। करना ये है कि मूर्ति के अंगों के अनुपात में मिट्टी का प्रयोग करना है। जीवन में भी यही किया जाना चाहिए।
जीवन में संतुलन होना चाहिए। पहला कार्य है बेकार के कार्यों तथा नकारा वस्तुओं से मुक्ति, दूसरा कार्य है उपयोगी भावों तथा वस्तुओं का सृजन तथा तीसरा कार्य है उपलब्ध साधनों का सही कार्यों के लिए विवेकपूर्ण उपयोग। यही आत्म-प्रबंधन है, यही समय-प्रबंधन है तथा यही व्यक्तित्व का संपूर्ण विकास तथा पुनर्निर्माण है।
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संपर्क:

सीताराम गुप्ता
ए.डी.-106-सी, पीतमपुरा,
दिल्ली-110034
फोन नं. 011-27313954

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