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''समस्या के मूल स्वरूप में लौटना ही उपचार है''


-सीताराम गुप्ता

कहते हैं कि बच्चे के जन्म के समय असावधानीवश यदि माँ को कोई बीमारी हो जाए तो अगले बच्चे के जन्म के समय थोड़ी सावधानी बरती जाए तो वह बीमारी स्वत: ठीक हो जाती है। इसका तात्पर्य है कि जापे की बीमारी जापे में ही ठीक होती है। शादी-ब्याह अथवा अन्य अवसरों पर हुए झगड़े अथवा मनोमालिन्य अगले किसी ऐसे ही अवसर पर सुलझाना सरल होता है। कई बार न्यायालयों में भी इसी प्रकार की मॉक एक्सर्साइज की जाती है जिसमें पूरे केस को करके दिखाया जाता है या उसका अभिनय किया जाता है जिससे घटनाक्रम पूरी तरह समझ में आ जाए और अपराध की असली स्थिति स्पष्ट हो सके। एक बार किसी युवती की कई मंजिला इमारत के ऊपर से गिरने से मृत्यु हो गई। ऐसा कोई सबूत नहीं मिला जिससे पता चल सके कि युवती ने आत्महत्या की है या दुर्घटनावश वह गिर गई अथवा उसकी हत्या करने के इरादे से उसे धक्का दिया गया। मृत्यु का वास्तविक कारण पता लगाना मुश्किल हो रहा था। अत: इसी आकार और वजन की 'डमी' को उतनी ही ऊँचाई से विभिन्न कोणों से नीचे डालकर वास्तविकता का पता लगाने का प्रयास किया गया। इसे घटना या वारदात का रीकंस्ट्रक्शन कहा जाता है जो फॉरेंसिक थैनेटोलॉजी में अपराध या घटना का मूल कारण जानने की प्रक्रिया है। अर्थात् समस्या कोई भी हो उसको सुलझाने के लिए घटना के मूल स्वरूप या स्थिति में लौटना पड़ता है।

शारीरिक व्याधियों को दूर करने के लिए भी यही सब करना अनिवार्य है। व्याधियाँ, रोग एक ग़लत विचार मात्र है और कुछ नहीं अत: जिस मन:स्थिति में ग़लत विचार ने जन्म लिया था उसी मन:स्थिति में पहुँचकर ग़लत विचार रूपी पौधे को जड़ से उखाड़ना पड़ता है। जैसे किसी पौधे को रोपने या बीज बोने के लिए मिट्टी की एक विशेष अवस्था ; नमी और पोलापन की जरूरत होती है उसी तरह पौधे को समूल नष्ट करने या उखाड़ने के लिए भी बिल्कुल उसी अवस्था की जरूरत होती है। जमीन ज्यादा सख्त और सूखी होने पर यदि पौधे को जड़ सहित उखाड़ना चाहेंगे तो पौधे का ऊपरी भाग तो टूटकर हाथ में आ जाएगा लेकिन जड़ वहीं रह जाएगी। और यही जड़ बार-बार पल्लवित होकर वृक्ष बनती रहेगी। तेज आँधी आने पर भी पेड़ टूट कर गिर जाते है लेकिन जड़ सहित नहीं उखड़ते। हाँ बरसात के दिनों में जब लगातार बारिश और नमी के कारण जमीन नरम और पोली हो जाती है तब बड़े-बड़े वृक्ष भी हल्के से हवा के झोंके से समूल नष्ट हो जाते हैं। यही तथ्य व्याधियों के उन्मूलन में लागू होता है।

बीमारियों को जड़ से समाप्त करना है या समस्याओं को समूल नष्ट करना है तो उसके लिए तह तक पहुँचना होगा और मन रूपी धरती को उसी अवस्था में लाना होगा जिस अवस्था में नकारात्मक या ग़लत विचार स्थापित होकर शारीरिक व्याधि के रूप में प्रकट हो गया था।

ग़लत विचार या मन की ग़लत कंडीशनिंग के कारण:

प्राय: जब हम खाली बैठे होते हैं तभी ज्यादा सोचते हैं और सोचते-सोचते एकदम शांत अवस्था में चले जाते हैं, किसी एक विचार पर केन्द्रित हो जाते हैं। मन की ऐसी शांत-स्थिर अवस्था में जो चिंतन होता है वह बहुत महत्वपूर्ण होता है क्योंकि मन की इस अवस्था में जो विचार प्रभावी हो जाता है वही भौतिक जगत में वास्तविकता का रूप ले लेता है। ऐसी अवस्था में यदि हमारा चिंतन नकारात्मक है तो वह घातक है क्योंकि उसी के कारण सारे विकार उत्पन्न होते हैं और इन्हीं मनोविकारों के लगातार प्रभाव से शरीर पर रोग उत्पन्न हो जाते हैं। इसीलिए कहा जाता है कि नकारात्मक भावों या नकारात्मक दृष्टिकोण से बचो। सदैव सकारात्मक दृष्टिकोण रखो। हमारा दृष्टिकोण ही हमारे चिंतन का आधार बनता है। जैसा दृष्टिकोण वैसा चिंतन और जैसा चिंतन या भाव वैसा शरीर या व्यक्तित्व। हमारे स्वास्थ्य और समृद्धि का स्वरूप सीधा हमारे मन के अनुरूप होता है। सुख-दुख, समृद्धि, अभाव, लाभ-हानि अथवा आरोग्य या बीमारी का सीधा संबंध हमारे मन से है। मन की कंडीशनिंग द्वारा ही इनका स्वरूप निर्धारित होता है तथा साथ ही मन की शक्ति द्वारा इनका सृजन भी।

ग़लत कंडीशनिंग से कैसे बचें?

कहावत है खाली मन शैतान का घर। यदि मन में कोई अच्छी कल्पना, विचार, भाव या इच्छा नहीं है तो कोई न कोई ग़लत विचार, भाव, इच्छा या कल्पना कहीं न कहीं से मन में घर कर जाएगी अत: मन को सदैव सकारात्मक विचारों से ओत-प्रोत रखो। लेकिन यदि किसी वजह से नकारात्मक चिंतन हावी हो गया है तो रोगमुक्त होने के लिए सबसे पहले इस नकारात्मकता अथवा रोग के भय को मन से निकालना होगा क्योंकि भय की समाप्ति ही वास्तविक उपचार है। इसके लिए मन की उसी शांत-स्थिर अवस्था में जाना होगा और विवेकपूर्वक अपने विचारों को ध्यानपूर्वक देखना, समझना और नियंत्रित करना होगा। जो ग़लत विचार हैं उनको हटाकर उचित विचार को स्थापित करना होगा। शांत-स्थिर अवस्था में जिसे ध्यानावस्था कहा जाता है पहुँचकर सही भाव को स्थायित्व देने का प्रयास करेंगे तो नकारात्मक या अनचाहे विचार स्वयं लुप्त हो जाएँगे। ये सकारात्मक ब्रेनवॉशिंग है।
ब्रेनवॉशिंग क्या है? किसी विशिष्ट अतिवादी विचारधारा से प्रभावित करना। इसके लिए भी मन की कंडीशनिंग की जाती है। वर्तमान विचारों को क्षीण करके या हटाकर विशेष विचारों से युक्त कर दिया जाता है। उग्रवादी भी इसी सिद्धांत को प्रयोग में लाते हैं। किसी संतुलित-सकारात्मक विचारधारा वाले व्यक्ति को शांत-स्थिर अवस्था में ले जाकर अपेक्षित ग़लत या अतिवादी विचार की कंडीशनिंग कर देते हैं। एक हानिकारक विचार को स्थायी कर देते हैं। यह ध्यानावस्था का दुरुपयोग है। हमें ध्यानावस्था का अपने लाभ के लिए सदुपयोग करना है। ध्यानावस्था में सही विचारों की कंडीशनिंग ही रूपांतरण है। स्थायी सकारात्मक आंतरिक परिवर्तन।

ध्यानावस्था और उपचार:

वैसे भी ध्यानावस्था में शरीर में अनेक लाभदायक हार्मोंस उत्सर्जित होते हैं जो हमारी स्वाभाविक रोगोपचारक शक्ति का विकास करते हैं। जो लोग नियमित रूप से ध्यान करते हैं उन्हें न तो व्याधियाँ घेरती हैं और रोग होने की अवस्था में वे अपेक्षाकृत शीघ्र स्वस्थ हो जाते हैं। ध्यान ही समस्या या रोग के मूल स्वरूप में लौटना है। ध्यानावस्था में मन को प्रभावित कर जो उपचार किया जाता है वही वास्तविक उपचार है और इसे आत्मपरक उपचार या सब्जैक्टिव हीलिंग कहा गया है। जब रोग का उपचार दवाओं से किया जाता है तो वह बाह्य उपचार कहलाता है और इसे वस्तुपरक उपचार या ऑब्जैक्टिव हीलिंग कहते हैं। वस्तुपरक उपचार में रोग के लक्षण दब तो जाते हैं लेकिन अनुकूल परिस्थितियाँ पाते ही फिर उभर आते हैं। अत: आत्मपरक उपचार पर बल दिया गया है यही वास्तविक उपचार है।

इसी प्रकार ऐतिहासिक भूलों को सुधारने के लिए भी इस विधि का सहारा लिया जाता है। अभी हाल ही में यूरोप में वाटरलू की लड़ाई की 190 वीं सालगिरह की जीवंत पुनरावृत्ति की गई जिसमें नेपोलियन को करारी हार का सामना करना पड़ा था। वस्तुत: इस पुनरावृत्ति का उद्देश्य हार-जीत का विश्लेषण करना नहीं अपितु युद्ध की निरर्थकता पर सार्थक संवाद प्रस्तुत कर विश्व को भविष्य में युद्ध से दूर रखना हो सकता है। बापू द्वारा 12 मार्च 1930 से लेकर 6 अप्रैल 1930 तक की ऐतिहासिक डांडी यात्रा की 75वीं सालगिरह की पुनरावृत्ति भी मार्च-अप्रैल 2005 की गई जिसमें देश के शीर्ष नेताओं ने भाग लिया। इससे पहले भी पचासवीं और साठवीं सालगिरहों पर डांडी मार्च का जीवंत आयोजन किया जा चुका है। ऐसी सभी घटनाओं की पुनरावृत्ति वास्तव में समस्याओं के मूल स्वरूप में पहुँचकर उसे समझने और ग़लतियों को फिर न दोहराने अथवा ग़लत नीतियों के विरूद्ध निरंतर संघर्षरत रहने का संकल्प ही होता है।

किसी भी व्यक्ति के जन्मदिवस पर उसकी वर्षगाँठ मनाना हो अथवा किसी घटना की वर्षगाँठ मनाना हो उद्देश्य वही है। जन्मदिवस मनाने का अर्थ है हम उस व्यक्ति के सिद्धांतों को समझकर स्वीकार कर रहे हैं। गाँधी जी का जन्मदिवस मनाने का अर्थ है हम सत्य और अहिंसा का समर्थन करते हैं और इन्हें अपने जीवन में लागू करने के लिए कृतसंकल्प हैं अन्यथा 'रघुपति राघव राजा राम' या 'वैष्णव जन तो तेने कहिये' का आँख मूँद कर जाप करना मात्र आत्म-प्रवंचना है। जयंती मनाने का अर्थ है कि यदि घटना सकारात्मक है तो उससे पुन: प्रेरणा लेना और यदि घटना नकारात्मक है तो उससे बचने तथा ऐसी व्यवस्था करने का प्रयास करना है जिससे ऐसी परिस्थितियाँ पुन: उत्पन्न न हों। और इस सब के लिए अनिवार्य है घटना के मूल स्वरूप में लौटना। इसके बिना पूर्ण उपचार संभव ही नहीं।

कई तरह का लेखन भी इसी श्रेणी में आता है। ऐतिहासिक घटनाओं की जीवंत पुनरावृत्ति अथवा जयंती मनाने की तरह घटनाओं का लेखन भी भूल सुधार या प्रेरणा ग्रहण करने के उद्देश्य से ही किया जाता है। व्यक्तिगत रूप से भी व्यक्ति जब अपने विषय में लिखता है तो उसका उद्देश्य जीवन की वास्तविक स्थितियों का विश्लेषण कर सही को स्वीकार करना तथा ग़लत को अस्वीकार कर प्रायश्चित करना और इस तरह मन में जमा विकारों से मुक्त होना ही होता है। और विकारों से मुक्ति के लिए घटना के मूल स्वरूप तक पहुँचने के लिए मन की गहरी परतों में झाँकना अनिवार्य है।

चर्च में जाने वाले लोग वहाँ अपने गुनाहों की स्वीकृति या कन्फेशन करते हैं। यह एक प्रकार से प्रायश्चित द्वारा विकारों से मुक्त होने का तरीका ही है। काउंसलिंग में भी पीड़ित व्यक्ति अपने परामर्शदाता को अपने मन की हर एक बात बता देता है। इससे परामर्शदाता को समस्या के मूल तक पहुँचने में तो सहायता मिलती ही है साथ ही पीड़ित द्वारा अपने मन में दबे विचार या विकार उगल देने से बहुत राहत मिलती है। आधा उपचार तो यही हो जाता है। कहने का तात्पर्य ये है कि माध्यम या तरीका कोई भी हो समस्या के मूल में पहुँचना अनिवार्य है।

किसी समस्या का मूल प्रसव में होता है तो किसी समस्या का मूल युवावस्था या किशोरावस्था में। अधिकांश समस्याओं का मूल भूतकाल में ही होता है अत: उसी कालखण्ड में पहुँचकर ही समस्या को समझा और सुलझाया जा सकता हैं। भौतिक रूप से बीते कालखण्ड में पहुँचना असंभव है अत: उस कालखण्ड की मानसिक यात्रा की जाती है। इसके लिए ''एज रिग्रेशन तकनीक'' का सहारा लिया जाता है। 'रीबर्थिंग प्रोसेस' हो या 'पास्ट लाइफ रिग्रेशन' अथवा 'प्रीवियस लाइफ रिग्रेशन' सबका उद्देश्य है पीछे लौटकर समस्या के मूल को खोजना और उसे ठीक करना। रोग की जड़ पर प्रहार कर उसे समूल नष्ट करना है, मूल स्वरूप में लौटना है। यही रूपांतरण है। निर्द्वन्द्व होकर जीवन जीने की कला है ये सारी प्रक्रिया।
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संपर्क:
सीताराम गुप्ता,
ए.डी. 106-सी, पीतमपुरा,
दिल्ली-110088
फोन नं. 011-27313954

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