रचनाकार.ऑर्ग की विशाल लाइब्रेरी में मनपसंद रचनाकार अथवा रचनाएँ खोजें -
 नाका में प्रकाशनार्थ  रचनाएं इस पते पर ईमेल करें : rachanakar@gmail.com अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें.

मैं निराश हूं



-अवनीश तिवारी


आज फिर वही रातें हैं
जब अंधेरा घना हैं
भय है अविश्वास है
दुखी वातावरण बना है
एक चंचल मन है
जो स्वंय को छल रहा है
इरादों का पर्वत आज हिम बन कर पिघल रहा है .

पवन बहता है
दिल को दुखाता है
उठी उम्मीदों को नीचे झुकाता है
दिल बैठा है
आखें झुकी हैं
समय बट रहा है
राहें रुकी हैं
भ्रम है अशान्ति है
इनमें मैं खोया हूं
आज प्रगति का दिवस है
तो मैं निष्क्रिय सोया हूं
मैं परेशान हूं निराश हूं
पराजय का स्वाद चख रहा हूं
कल नव प्रभात आयेगा
उसी की राह तक रहा हूं .

2 टिप्पणियाँ

  1. ठीक-ठाक है. (तीन तारे.)

    जवाब देंहटाएं
  2. आज प्रगति का दिवस है
    तो मैं निष्क्रिय सोया हूं
    मैं परेशान हूं निराश हूं
    पराजय का स्वाद चख रहा हूं
    कल नव प्रभात आयेगा
    उसी की राह तक रहा हूं .
    अच्छा लिखा है अवनीश भाई

    जवाब देंहटाएं

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.