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बाजारवाद और कहानी


- आनंदकृष्ण


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कहानी मानव सभ्यता की पहली बौद्धिक अभिव्यक्ति है । जिस क्षण आदिमानव ने अपनी अनुभूतियां अपने साथी को किसी भी तरीके से संप्रेषित की होंगी उस क्षण वह विश्व की पहली कहानी सुना रहा होगा । इस दृष्टि से कहानी मनुष्य के आदिकाल से ही उसकी सामयिक व सर्वकालिक अनुभूतियों की अभिव्यक्ति रही है । कहानी ने शाश्वत और समकालीन सरोकारों पर अपनी पैनी नजर हमेशा रखी है और उनसे संबंधित प्रश्नों के सार्थक समाधान भी सफलतापूर्वक तलाशे हैं । कहानी प्रारंभ से ही समकालीन समाज की बौद्धिकता, समझ और तेवरों का दर्पण रही है । युग विशेष की कहानी पढ़ कर युगीन विशेषताओं का आकलन आसानी से किया जा सकता है ।

वर्तमान युग बाजार और उससे उत्पन्न सांस्कृतिक-सामाजिक परिवर्तनों व चिंताओं का है । साहित्य में भी बाजार को लेकर जितनी ऊहापोह वर्तमान में है वह पहले कभी नहीं देखी गई जबकि बाजार पहले भी थे- समाज में भी और साहित्य में भी । बाजारवाद पर चर्चा करने के पूर्व बाजार के स्वरूप और उसके विकास का जायजा लेने की आवश्यकता है ।

बाजार मानव सभ्यता में समाज की अवधारणा के स्थापित होने की प्रक्रिया के साथ ही आकार लेता गया है । बाजार वस्तुओं के क्रय-विक्रय के केन्द्र मात्र नहीं थे बल्कि मिलने-जुलने के, सांस्कृतिक व वैचारिक विनिमय के स्थान भी थे । अभी भी ग्रामीण क्षेत्रों में यदि कोई ग्रामीण किसी सामग्री को बेचने के लिए हाट-बाजार जाता है तो वह बीच राह में अपनी वस्तु नहीं बेचता है, भले ही उसका दाम ज्यादा मिल रहा हो । वह वस्तु को बाजार जाकर ही बेचता है भले ही इसके लिए उसे चार-छह किलोमीटर दूर पैदल जाना पड़े और वस्तु की कीमत भी कम मिले । तो इस प्रकार बाजार की अवधारणा वस्तुत: सामाजिक अवधारणा रही है इसमें वस्तु और उसके मूल्य का विनिमय गौण होता है । हमारे पारंपरिक ग्रामीण हाट-बाजारों ने सामाजिकता व जनसंगठन की भावनाओं को पुष्ट करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है । ऐसे पारंपरिक व आदर्श बाजार कहानियों में भी यत्र-तत्र नजर आते हैं । ऐसी कहानियों में प्रेमचंद की कहानी ''ईदगाह'' का सम्मानजनक स्थान है जिसमें बाजार के आदर्श व मानवीय स्वरूप का चित्रण किया गया है । कहानी में छोटा सा बालक हामिद बाजार की तड़क-भड़क और प्रलोभनों पर भूखा-प्यासा रहते हुए विजय पाता है और अपनी वृद्ध दादी के लिए चिमटा खरीदता है जिससे रोटियाँ सेंकते समय उसके हाथ न जलें । इस कहानी में स्पष्ट दिखाई दिया कि बाजार मनुष्य पर और मानव मूल्यों पर हावी नहीं हो सका । यह कहानी बाजार पर मानवीयता की जीत का जीवंत दस्तावेज है ।
किन्तु इसके विपरीत प्रेमचंद की ही एक अन्य कहानी ''कफन'' का जिक्र करना भी मैं जरूरी समझता हूं जिसमें मानव और उसके शाश्वत मूल्यों पर बाजार का हावी होना चित्रित किया गया है और इस तरह बाजार की प्रधानता होने से उत्पन्न होने वाली विकृतियों की ओर संकेत किया गया है । यह कहानी कथ्य, शिल्प और संदेश की दृष्टि से विलक्षण रचना है । प्रसंगत: मैं यहां यह भी कहना चाहता हूँ कि पिछले दिनों प्रेमचंद की इस रचना को लेकर सुनियोजित रूप से विवाद उत्पन्न करके रचनाकार के प्रति आक्रोश व्यक्त किया गया किन्तु कहानी के मूल में जाने की कोशिश नहीं की गई । यह घटना भी नव-बाजारवाद से उत्पन्न प्रभावों के परिणामस्वरूप हुई । इस घटना के प्रति व्यक्त की गई अपनी टिप्पणी को मैं पुन: दोहराना चाहता हूँ कि प्रेमचंद की समस्त रचनाओं का पुनर्पाठ और पुनरध्ययन किया जाना चाहिए तथा समीक्षा; विशेष रूप से कहानी-समीक्षा के स्वरूप और मानदंडों का पुनर्निर्धारण किया जाना चाहिए । यह बात विशेष रूप से टीस उत्पन्न करती है कि कहानी की समीक्षा-आलोचना पर सार्थक व रचनात्मक कार्य अत्यंत नगण्य है । कहानी सर्वाधिक सशक्त विद्या है जिसने हर युग में समाज को अनुप्राणित किया है । उसके नवस्वरूप व भविष्य की दिशा का सम्यक अध्ययन अत्यंत आवश्यक है ।

''ईदगाह'' और ''कफन'' कहानियों ने भविष्य के दो रूपों का पूर्वानुमान प्रस्तुत किया था । उस समय का भविष्य अर्थात आज का वर्तमान ''ईदगाह'' के बजाए ''कफन'' की दृष्टि का अनुगामी बना । आदर्शों का अवमूल्यन और निर्मम व्यावसायिकता का प्रतिष्ठापन क्यों और कैसे हुआ और इसके क्या परिणाम होंगे, इन प्रश्नों पर भी वर्तमान समीक्षा साहित्य में विचार होना चाहिए ।

मानव निर्मित बाजार मानव पर ही हावी क्यों हो गया-? इसके कारणों पर चिंतन करने पर हम पाते हैं कि तकनीकी विकास के साथ जैसे-जैसे सपने यथार्थ से दूर होते गए हैं वैसे-वैसे बाजार हमारे मनो-मस्तिष्क पर हावी होता गया है । पारंपरिक बाजार जरूरतों का सौदागर था, आधुनिक बाजार सपनों का सौदागर है । आलीशान बंगला, गाड़ी, दुनिया की सैर, विश्व सुंदरी के साथ एक हसीन शाम, क्रिकेट खिलाड़ी के साथ खेलने का लुत्फ, देह-विमर्श; ऐसा कौन सा सपना है जो आधुनिक बाजार के पास नहीं हैं और जिसे आम आदमी को मुहैया कराने के लिए उसके पास योजनाएं व विकल्प नहीं है । आज चर्चा के लिए शेविंग ब्लेड से ले कर यौन शक्ति वर्धक दवाओं तक हर चीज सहज सुलभ है । बच्चों की सहज बालोचित क्रीड़ाओं और अदाओं को निर्देशकीय पटुता से आकर्षक बना कर प्रस्तुत किया जा रहा है । इस चक्कर में शैषव गुम होता जा रहा है । नारी शरीर की बारीकी से पड़ताल की जा रही है । व्यवस्थित तरीके से ''ढांकने की असफल कोशिश'' आज आदमी के दिमाग में अलभ्य सपने पैदा कर रही है, जो अनेक वैयक्तिक व सामाजिक विकृतियों के रूप में सामने आ रहे हैं । स्थिति यहाँ तक हो गई है कि व्यक्ति स्वयं भी जिन्सों में तब्दील हो कर बाजार में पहुंच चुका है । यह बाजारवाद की सबसे दुखद व त्रासद परिणति है जो भविष्य के लिए नई चिन्ताएं गढ़ती है ।

अपने दायित्व को समझते हुए बाजारवाद के विभिन्न पहलुओं को कहानी ने अपना कथ्य तो बनाया है किन्तु यह भी सही है कि कहानी में बाजार सतही विवरण के रूप में ही अधिक आया हे । कई बार तो कहानी स्वयं भी बाजार के हाथों कठपुतली बनी बेबस नजर आती है । कहीं कहीं तो कहानी स्वयं बाजार के विद्रूपों का समर्थन करती प्रतीत होती है । वर्जनाएं तोड़ने की अतिवादी वृत्तियां कहानी की समग्र चेतना व सृजनधर्मिता पर हावी होती जा रही हैं । पूर्व में मैंने जिन प्रेमचंद का उल्लेख किया हैं उन्हीं के द्वारा स्थापित और काला चश्माधारी संपादक द्वारा पुन: प्रारंभ की गई पत्रिका में विगत कई वर्षों से लगातार ऐसी रचनाएं प्रकाशित हो रही हैं जिनमें काम और यौन संबंधों का खुला चित्रण किया जा रहा है यही नहीं, इस पत्रिका में दुस्साहसिक रूप से ऐसे भी स्तंभ प्रारंभ किए गए जिनके लेखकों ने अपनी कुंठाओं को चमकीले शब्दों का रूप दे कर 'वीर बालक' का खिताब भी पाया । इन समस्त रचनाओं की गुणवत्ता, शास्त्रीयता और उपादेयता पर फिलहाल चर्चा न करते हुए मैं केवल यह कहना चाहता हूँ कि उक्त संपादक ने भी बाजार की कमजोर नस पकड़ी । सेक्स हमेशा बिकाऊ होता है । इस सिद्धान्त का पालन करते हुए संपादक और उनके वफादार चेले पत्रिका के माध्यम से पाठकों के सामने नए नए तरीकों से सेक्स परोस रहे हैं और साहित्यिक पत्रिकाओं की श्रेणी में इस पत्रिका का सर्कुलेशन आज सर्वाधिक है ।

बाजार हमेशा था और हमेशा रहेगा किन्तु मानव निर्मित हो कर भी यदि वह मानव पर हावी हो जाए तो समाज के प्रमुख सचेतक साहित्य की महती भूमिका हो जाती है कि वह बाजार के खतरों के प्रति भी आगाह करे ।

समकालीन कहानी बाजारवाद का सामना पूरी शक्ति से करती हुई नहीं नजर आती । इस विषय पर रचनाकारों, पाठकों व बुद्धिजीवियों के गहन चिंतन की आवश्यकता है ।

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(कहानी मंच जबलपुर में ''बाजारवाद और कहानी'' विषय पर दिए गए व्याख्यान के अंश)
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संपर्क:
© आनंदकृष्ण
3/29, टी.टी.सी. कालोनी
रिज रोड, जबलपुर (म.प्र.)
मोबाइल : 09425 800 818

1 टिप्पणियाँ

  1. बहुत ही hi-Quality का लिखते हैं आप! हमें तो समझने में वक्त लगता है,लेकिन जब समझ आ जाती है तो बस यही कहते हैं- वाह ! ऐसे ही लिखते रहिये और हम सबका मार्ग दर्शन करते रहिये ! Keep it up! Very well written.

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