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पंकज त्रिवेदी की कविताएँ

कविताएँ

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-पंकज त्रिवेदी    

एकाग्रता       

अर्जुन ने
बींध दी मेरी ऑंख !

ऐसी एकाग्रता
उसे भला कौन
दे सके...?

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जाल 

पापा को मिलने आई
बेटी,
वेकेशन में बुनती है प्रश्नों का जाल...

पापा,
उलझते हैं उन में
यत्न करते हैं छूटने का,
फ़ंसते रहते सतत...

पापा, बेचैन यहाँं
मम्मी, वहॉं
बेटी, यहाँ-वहॉं

मम्मी पढ़ाती, सख़्त स्वभाव से
कहानी सुनाएं पापा,
फिल्म, फ़न वर्ल्ड और लुत्फ़
हील स्टेशन का
सिर्फ अठ्ठाईस दिनों का फ़रमान

बेटी प्रश्न करती, मौन पापा
वहॉं गुस्सा मम्मी का
एक्वेरियम में तैरती वह
पहुंच जाती है एक कोने में
अकेली, तनहा,
सजल...!!!

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निःशब्द.... !!!     

ज़िन्दगी की तेज़तर्रार रफ्‌तार में
लोगों की भीड़ में दौड़ता रहता हूं हरदम
शानों-शौक़त है,
भीड़ रहती है ऑंगन में
तुलसी का पौधा है और ऑंगन में ही गुलाब...

लोग आते हैं
ठहाके लगाते हैं, कुछ है आस लिए
पता नहीं, घर है या मयख़ाना मेरा
नशे में धुत्त रहता हूं, किसी विचार पे

शब्द है और निःशब्द कुछ पल मेरे
बे़फिक्र हूं, बदनाम भी -
धुऑं उठता है, वक्त ठहरता है
कुछ लम्हें ऐसे भी है, जो देता है सुक़ून उन ज़ख़्मों को
जो भरकर भी
उमड़ते हैं बारबार सैलाब बनकर

नींद उड़ जाती है
ओस बन जातें है अश्क...

कुछ लोग हैं
मेरे बेचैन दिल को,
ज़ख़्मों को,
ज़हन में भरे उस बारुद को

ज़हन- मस्तिष्क/मानसिक
भॉंपने का करते हैं दावा
मगर, उन्हें भी डर है
चले जाते हैं वो भी
इसी ऑंगन से शब्द लेकर,
निःशब्द होकर
जहॉं तुलसी का पौधा है और गुलाब का फूल भी...!!!

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नसीहत

आज की हवा सर्द है
जवॉं भी है दिल की धड़कनें
ख़िडकी से झॉंकती है ये धूप
किसी की अंगडाई में मचल रही है
जैसे,
किसी तोख़ार की दौड़
नशे में रहता है पूरा देश
नज़रें टिकी हैं उन पर
जो नस्ल है सुबह की किरणें
अब -
उन्हें ही सॅंभालनी होगी
इस मिट्टी की सुगंध
सरज़मीं की फसलें,
युवाओं की बागडोर
उन्हीं के विचार में, खो गई है
इस ज़मीं की हर शाम
जो ढ़ल रही है -
होले होले
उस शाम में -
अब भी तपिश है, मायूसी है थोड़ी सी
मगर,
आस नहीं छूटी अब भी -
यारों
आज है वेलेन्टाईन डे
सॅंभालो अपने आप को
सुनहरी शाम कह रही है
आनेवाली हर एक
रुपहली सुबह को...!!!

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चारा       

एडमिशन,
पढ़ाई,
नौकरी...
सब जगह डालना पड़ता है चारा

सुबह से
छोटी सी मछली को कांटे में चारा
बनाकर बैठा
इंसान
इंतज़ार करता है बड़ी मछली के शिकार का...

शाम ढली
निराश होकर देखा लौटते हुए
एक मछुआरा जाल पूरी भर
मछलियॉं लेकर निकला

तब
एक जेंटलमेन अफसर की
गिरफ़्‌तारी होती है बिनअधिकृत
मिलकियत के लिए...
फ़ज़ीहत के बाद निर्दोष बरी हुए
अफसर के
छोटे से कारकुन, बुज़दिल परिवार और
प्रतिष्ठा को दॉंव पर रख़कर
चार दीवारों के एक्वेरियम में
तड़फड़ाता है...

व्हेल मछली सागर की विशाल
गहराई को नज़रअंदाज करके
तैरती है
मौज से...!
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संपर्क:
हर्ष, गोकुलपार्क सोसायटी, ८० फुट का रास्ता, सुरेन्द्रनगर-३६३००२
मोबाईल : ९८७९५ १८८११

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