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देवी नागरानी की चंद ग़ज़लें

ग़ज़लें

-देवी नागरानी

devi nagrani

गज़ल 1


कलियों के होंट छूकर वो मुस्करा रहा है
झोंका हवा का देखो क्या गुल खिला रहा है.

पागल है सोच मेरी, पागल है मन भी मेरा
बेपर वो शोख़ियों में उड़ता ही जा रहा है.

अपनी नज़र से ख़ुद को देखूं तो मान भी लूं
आईना अक्स मुझको तेरा दिखा रहा है.

हर चाल में है सौदा, हर चीज़ की है क़ीमत
रिश्वत का दौर अब भी उनको चला रहा है.

बुझता चिराग़ दिल में,  किसने ये जान डाली
फिर से हवा के रुख़ पे ये झिलमिला रहा है.

पहचान आज पूरी होकर भी है अधूरी
कुछ नाम देके आदम उलझन बढ़ा रहा है.

बरसों की वो इमारत, अब हो गयी पुरानी
कुछ रंग-रौगनों से उसको सज़ा रहा है. २०८
**
गज़ल 2
सहरा भी गुलज़ार भी तो हैं
साथ गुलों के ख़ार भी तो हैं.

मन को मोहे मस्ती, रौनक
संग उनके आज़ार भी तो हैं.

क्यों लगती है दुनिया दुशमन
दोस्त कई दिलदार भी तो हैं.

कश्ती साहिल पर आ ठहरी
तूफ़ाँ के आसार भी तो हैं.

ख़ुशियों की न कमी है देवी
चिंता के अंबार भी तो हैं.
॰॰
गज़ल 3
दिल ना माने कभी तो क्या कीजे
दिल करे दिल्लगी तो क्या कीजे.

सारे ग़म  मेरे आस पास रहे
रश्क़ करती ख़ुशी तो क्या कीजे.

अपनी परछाई से वो खाइफ़ था
ना समझ हो कोई तो क्या कीजे.

इन्तहा दर्द की न रास आई
करले वो ख़ुदकुशी तो क्या कीजे.

ख़ाक ही वो जिया है दुनियां में
जिसने जी भर न पी तो क्या कीजे.

फूल करते निबाह खारों से
मुस्कराये कली तो क्या कीजे.

ख़ुश बयान किस कदर हूँ मैं देवी
ख़ुश हो किस्मत मेरी तो क्या कीजे.
**
गज़ल 4
हमने पाया तो बहुत कम है बहुत खोया है
दिल हमारा लबे-दरिया पे बहुत रोया है.

कुछ न कुछ टूटके जुड़ता है यहाँ तो यारो
हमने टूटे हुए सपनों को बहुत ढोया है

अरसा लगता है जो पाने में, वो पल में खोया
बीज अफ़सोस का सहरा में बहुत बोया है.

तेरी यादों के मिले साए बहुत शीतल से
उनके अहसास से तन-मन को बहुत धोया है

होके बेदार वो देखे तो सवेरे का समाँ
जागने का है ये मौसम, वो बहुत सोया है.

बेकरारी को लिये शब से सहर तक, दिल ये
आतिशे-वस्ल में तड़पा है, बहुत रोया है.

इम्तिहाँ ज़ीस्त ने कितने ही लिए हैं देवी
उन सलीबों को जवानी ने बहुत ढोया है.
**
गज़ल 5 
ये है पहचान एक औरत की
माँ बाहन, बीवी, बेटी या देवी.

अपने आँचल की छाँव में सबको
दे रही है पनाह औरत ही.

दरिया अश्कों का पार करती वो
ज़िंदगी की भंवर में जो रहती.

दुनियाँ वाले बदल गये, लेकिन
एक मैं ही हूँ जो नहीं बदली.

जितनी ऊँची इमारतें हैं ये
मैं तो लगती हूँ उतनी ही छोटी.

बेनकाबों की भीड़ में खोकर
ख़ुद वो पर्दा नशीं नहीं होती.
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देवी नागरानी की अन्य रचनाएँ पढ़ें उनके ब्लॉग चराग़े दिल पर-

http://charagedil.wordpress.com/

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