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सत्यप्रसन्न की कविता : फूलबाई

कविता

FULBAI

-सत्यप्रसन्न

आज फिर नहीं आई,

फूलबाई।

अमूमन,

इसी तरह

नहीं आती

फूलबाई।

 

कैसे होंगे बरतन साफ,

कैसे धुलेंगे कपड़े,

कौन लगायेगा झाड़ू,

कैसे होगा साफ

गर्द-ओ गुबार

घर का।

 

मेरी पत्नी का

चेहरे पर प्रश्न चिन्ह;

और झुंझलाहट चिपकाए

बाल्कनी से झाँकना,

बार-बार,

इंगित कर देता है

उसका अंतर्द्वंद।

 

कि,

फूलबाई के

बिलकुल ही न आने पर,

कितना करने से चल जायेगा

आज का काम।

 

कितना छोड़ा जा सकता है शेष,

कल के लिये।

उठा ही लेती है झाड़ू ;पत्नी।

तभी बज उटती है

घंटी, दरवाजे की।

 

पौन इंची मूस्कान,

और बित्ता भर निर्लिप्तता

लपेटे चेहरे पर,

खड़ी है दरवाजे पर,

फूलबाई।

 

पत्नी के चेहरे का प्रश्न चिन्ह,

बिना मांगे ही,

विवश कर देता है

देने उसे कैफ़ियत।

आज फिर वह

किसी बाबा के पास

चली गई थी।

 

अपने उस

कलेजे के टुकड़े का;

जानने अता-पता,

जो चला गया था

छोड़कर, घर

और छाँव उसकी ममता की,

दस वर्ष पूर्व,

दस वर्ष की उम्र में।

 

और,

जिसके कभी न कभी,

लौट आने की,

आशा को जिलाये रखते हैं

ये बाबा,

लेकर उससे,

उसकी गाढ़े पसीने की कमाई।

 

कैसे बुझा दे

वह, अपनी आशा का चिराग।

आख़िर वो भी तो

एक माँ है।

सच, एक माँ ही तो है

फूलबाई।

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संपर्क:

सत्यप्रसन्न

एम आई जी- क्ष/23

जमनीपाली, कोरबा (छ. ग.), भारत

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