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हरिहर झा की कविता : बोर

कविता

बोर

BORE

-हरिहर झा

 

उबकाई सी आती है

सुस्त समय की सड़क से गुजरते खड्डों में

जैसे चंचल बहता पानी ठहर जाय

गन्दे कीचड़-युक्त गड्ढों में .

बरसों एक जगह खड़े खड़े

कोई वृक्ष सुखा नहीं

चांद तारे पशु-पक्षी

 

कोई मनोरंजन का भूखा नहीं

फिर मैं एक बुद्धिजीवी -

अपनी वृत्तियों पर गहरा अंकुश रख कर

जिजीविषा को बहने के लिये

सुन्दर किनारे देने वाला -

क्यों इन मुर्दा क्षणों मे सुनता हूं

मेरे ही मन की प्रेत छायाओं का शोर .

मन का चांद-तारों तक पहुंचना

पर शरीर में सिर्फ

एक सांस का आना जाना

जेट-इंजिन हुआ कैद

खटारा-गाड़ी में जिसका चरमराता पहिया

घसीटता हुआ मन को छिलता हुआ .

 

ध्यान में बाधक

घुमड़ती अन्तस् की दौड़ क़े अवरोधक

घाव से रिसते पशुता भरे ये विचार

छुपे क्योंकर इस पवित्र हृदय में

जो मुझे ही डराते तंग करते

स्वयं से मुंह छुपाता मैं चोर

 

कहां व्यस्त होकर भूल जाऊं

अपने आप को

बस वही, वही विकार

विचार के ताने बाने में

दिवास्वप्न के वस्त्र पहन कर भी

नग्न के नग्न .

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(कलाकृति - रेखा श्रीवास्तव)

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