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असग़र वजाहत का उपन्यास - गरजत बरसत (1)

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(रचनाकार के पाठकों के लिए प्रस्तुत है असग़र वजाहत के तीन खण्डों में प्रकाशित उपन्यास गरजत बरसत का दूसरा भाग. इस उपन्यास की सामग्री को पुराने...

(रचनाकार के पाठकों के लिए प्रस्तुत है असग़र वजाहत के तीन खण्डों में प्रकाशित उपन्यास गरजत बरसत का दूसरा भाग. इस उपन्यास की सामग्री को पुराने फ़ॉन्ट से यूनिकोड में परिवर्तित किया गया है और जिसकी वजह से अशुद्धियाँ बनी रह सकती हैं, जिसके लिए रचनाकार क्षमाप्रार्थी है.)

उपन्यास

गरजत बरसत

----उपन्यास त्रयी का दूसरा भाग----

-असग़र वजाहत

| किश्त 2 |किश्त 3 | किश्त 4 |किश्त 5 |किश्त 6 |किश्त 7 |किश्त 8 |किश्त 9 | अंतिम किश्त |

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पहला खण्ड

----१----

मेरे रंग-ढंग से सबको यह अंदाज़ा लग चुका था कि दिल्ली ने मेरी कमर पर लात मारी है और साल-डेढ़ साल नौकरी की तलाश में मारा-मारा फिरने के बाद मैं घर लौटा हूं। अपमानित होने का भाव कम करने के लिए मैं लगातार ऊपर वाले कमरे में पड़ा सोचा करता था या 'जासूसी दुनिया` पढ़ा करता था। दो-तीन दिन बाद अतहर को पता चला कि मैं आया हूं तो वह आ धमका और उसके साथ मैं शाम को पहली बार निकला था।

छोटा-सा शहर, छोटी-छोटी दुकानें, पतली सड़कें, रिक्शे और साइकिलें, सब कुछ मैं दिल्ली की आंख से देख रहा था और मुझे काफी अच्छी लग रही थीं। अतहर के साथ मामू के होटल में गया। वहां मुख्त़ार आ गया। कुछ देर बाद हम तीनों उमाशंकर के पास गये। रेलवे प्लेटफार्म की एक बेंच पर कुल्लड़ों में चाय लेकर हम बैठ गये और इन लोगों ने मेरे ऊपर सवालों की बौछार कर दी। मैं सोचने लगा कि इन सबको मैं क्या बताऊं? ये सब मेरे दोस्त हैं। अतहर मेरे साथ स्कूल में था अब तक बारहवीं पास करने के लिए साल दो साल बाद इम्तिहान में बैठ जाता है। उमाशंकर ने इंटर पास करने का मोह भी त्याग दिया है और कपड़े की दुकान खोल ली है। मुख्त़ार सिलाई का काम करता है और उर्दू अखबारों का बड़ा घनघोर पाठक है। इनमें शायद कोई कभी दिल्ली गया भी नहीं है। मैं इन्हें क्या बताऊं कि मरे साथ क्या हुआ? क्या इसके पीछे यह अहंकार तो नहीं है कि मैं एम.ए. हूं और ये लोग पढ़े-लिखे नहीं हैं। मेरी बात समझ नहीं पायेंगे? हां शायद यही है। इसलिए मुझे बताना चाहिए कि मेरे साथ क्या हुआ था हुआ था ये चाहे समझें चाहे न समझें लेकिन मेरे मन के ऊपर से तो बोझ हट जायेगा।

“बताओ यार साजिद. . .तुम तो चुप हो गये. . . लेव बीड़ी पियो।” अतहर ने एक सुलगती बीड़ी मेरी तरफ बढ़ा दी।

“कहीं कोई प्रेम-व्रेम का चक्कर तो नहीं हो गया।” उमाशंकर ने हंसकर कहा। मेरे चेहरे पर बड़ी फीकी मुस्कुराहट आ गयी। दूर से आती खाली माल गाड़ी करीब आ गयी थी और कुछ मिनट उसकी आवाज़ की वजह से हमारी बातचीत बंद रही।

“बस ये समझ लो नौकरी नहीं मिली।” मैं बोला।

“अरे तो नौकरी साली मिलती कहां है। मुझी को देखो चार शहरों के बेरोज़गारी दफ़्तरों में नाम लिखा हुआ है।” अतहर ने कहा।

“तुम्हें नौकरी क्या मिलेगी?” उमाशंकर ने उदासीनता से कहा।

“क्यों? अबे साले आई..टी.आई. का कोर्स किया है।”

“तो अब क्या सोचा है?” मुख्त़ार ने मुझसे पूछा।

“सोचा है नौकरी न करूंगा।”

“वाह यार वाह ये बात हुई. . .मैं तो तुमसे पहले से ही कह रहा था कि तुम्हारे लिए नौकरी चुतियापा है। यार जिसके पास इतनी ज़मीन हो, आम, अमरूद के बाग हों वह हज़ार बारह सौ की नौकरी क्यों करे?” अतहर ने जोश में कहा।

मुझे याद आया वह मेरे दिल्ली जाने से पहले भी यह सलाह दे चुका था। उस वक़्त यह मेरी समझ में नहीं आया था। दिल्ली में बाबा ने समझा दिया। या हालात ने मजबूर कर दिया या और कोई रास्ता ही नहीं बचा और बचा है पूरा जीवन।

“पर यार खेती करना है तो केसरियापुर में ही रहना पड़ेगा।” अतहर ने कहा।

“मैं जानता हूं यार।” मेरे ये कहते ही उन तीनों के चेहरे दमक गये और मुझे यहां उनके साथ बिताये पुराने दिन याद आ गये। जब हम पुलिया पर बैठकर पार्टी करते थे। जब पुलिस की ज्यादतियों के खिलाफ़ एस.पी. से मिलने गये थे। रात में मुख्त़ार की दुकान के अंदर लालटेन की रोशनी में गर्मागर्म बहसे किया करते थे। मामू के होटल में चाय के दौर चला करते थे। मैं बिल्कुल उनका एक हिस्सा बन गया था। मुख्त़ार कहता भी था, तुम तो एम.ए. पास नहीं लगते। अरे लौण्डे इंटर कर लेते हैं तो हम लोगों से सीधे मुंह बात नहीं करते।

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अब्बा से जब मैंने कहा कि मैं नौकरी नहीं बल्कि खेती करना चाहता हूं और केसरियापुर में रहना चाहता हूं तो कुछ क्षण के लिए उनकी कुछ समझ में आया नहीं। एम.ए. पास करने के बाद गांव में रहना और खेती करना? हालत ये है कि लड़का हाई स्कूल कर लेता है तो गांव का मुंह नहीं देखता। इंटर कर लेता है तो खेती करने से चिढ़ने लगता है लेकिन यह भी है कि आज खेती में पैसा है। कुर्मियों ने अच्छा पैसा कमाया है। केसरियापुर में बिजली आ गयी है। दो-चार ट्यूबवेल भी लग गये हैं।

अब्बा कुछ देर सोचते रहे और अम्मां ने कहा “तुम वहां रहोगे कैसे?”

मैं उन्हें क्या बताता कि दिल्ली के मुकाबले वहां रहना स्वर्ग में रहने जैसा होगा।

“देखो रहने की तो कोई मुश्किल नहीं है। ख़ुदा के फ़ज़ल से इतना बड़ा चौरा है। हां खाने की दिक्कत हो सकती है. . .वैसे रहमत के यहां तुम्हारा खाना पक सकता है. . .ये बात ज़रूर है भई कि गांव वाला होगा।”

इस बार केसरियापुर जाना बहुत अलग था। दिल में तरह-तरह के ख्य़ाल आ रहे थे। सैकड़ों डर थे और उनके साथ यह यकीन कि मैं कामयाब हूंगा। कामयाबी से मतलब यही कि अच्छी तरह खेती करूंगा। अच्छी फसल होगी। अच्छा पैसा मिलेगा और फिर जैसे बावा ने दिल्ली में कहा था “तुम जाड़ों में मुंबई जाया करना। गर्मियों में नैनीताल और दो-तीन साल में एक चक्कर योरोप का लगा सकते हो। यार पैसा हो तो आदमी सब कुछ कर सकता है और बिना पैसे के जिंद़गी गुज़ारना, भुखमरी में रहना भी कोई जीवन है।” खेती कैसे होती है, मेरे ख्याल से मुझे मालूम था। अब अगर करना था तो उसका इंतिज़ाम, पूरी व्यवस्था और देखभाल।

इससे पहले हम जब भी केसरियापुर आते थे सीधे चौरे तक पहुंचते थे और बाकी गांव कैसा है, क्या है, कौन रहता है, कैसे रहता है। इसकी कोई जानकारी न थी। लेकिन अब दो पीढ़ियों बाद केसरियापुर फिर घर बन रहा है। मैंने सोचा सबसे पहले तो गांव ही देखा जाये। रहमत खुशी-खुशी इस पर तैयार हो गया। रहमत की बूढ़ी और कादार आंखों में चमक आ गयी और मैं उसके साथ गांव देखने निकल पड़ा। चौरा तो गांव के कोने पर है जहां से हम लोगों की जमीनें और बाग शुरु होते हैं। गांव के अंदर की दुनिया देखने के ख्याल से मैं पहली बार निकला। रहमत के सिर पर अंगौछा और हाथ में लाठी थी। वह मेरे पीछे-पीछे चल रहा था। गांव के अंदर टोलों के बारे में वह बता रहा था पंडितों का टोला, ठाकुरों का टोला, अहीर टोला, कुर्मियाना, मियां टोला, चमार टोला, इतने हज़ार या सौ साल बाद भी हमारा समाज टोलों का समाज है। मिट्टी के घरों का आकार और रूपरेखा टोलों के हिसाब से बदल जाती है लेकिन हर घर के सामने छप्पर और उसके पीछे बड़ा दरवाज़ा। कच्ची गलियां, रंभाते हुए जानवर, कच्चे-पक्के कुओं पर औरतों की भीड़, गलियों में दौड़ते नंग-धड़ंग बच्चे, बैलगाड़ियों की आवाजाही, कच्चे घरों के अंदर से निकलता धुएं का तूफान और कच्ची गलियों में गोबर के छोत। गांव का हर आदमी मुझे हैरत से देख रहा था। रहमत सबको बता रहा था। 'डिप्टी साहब के लड़कवा अहैं। अब हीन रहके खेती करिवहिये` दो-एक लोग पास आकर मिल रहे थे। इनमें ज्य़ादातर बूढ़े़ थे। सब कह रहे थे कि मैंने बड़ी अच्छा किया जो पुरखों का चौरा बसा दिया। इतनी ज़मीन गांव में किसी के पास नहीं है। ढंग से खेती करायी जाये तो सोना उगल देगी। घूमते हुए हम कंजरों के टोले में पहुंच गये। अब्बा के ज्यादातर बटाईदार कंजड़, चमार और लोध हैं। कंजरों ने एक घर के सामने खटिया बिछा दी और रहमत ने कहा कि मैं बैठ जाऊं। मैं बैठ गया और कंजड़ सामने ज़मीन पर बैठ गये। चर्चा होने लगी कि अगर पानी की व्यवस्था हो जाये तो धन के बाद गेहूं भी होने लगे।

असली आमदनी तो गेहूं में है। कंजड़ों ने कहा कि वे अच्छा गेहूं पैदा कर सकते हैं। उन्हें शायद यह पता नहीं था कि मैं तो खुद खेती कराना चाहता हूं यानी बटाईदारी ख़त्म करना चाहता हूं। हो सकता है ये डर उनके दिलों में हों और इसीलिए वे अपनी भूमिका को बढ़ा-चढ़ाकर पेश कर रहे हों। चिराग जलने से पहले मैं लौट आया।

टीन के बड़े से शेड, जिसे यहां सब सायबान कहते हैं, के नीचे चारपाई पर लेटा मैं सोच रहा था कि गांव में रात कितनी जल्दी होती है। लगता है एक बड़ा-सा समुद्री जहाज़ अंधेरे और कोहरे में गायब हो गया हो। लाइट नहीं आ रही थी। सायबान के नीचे खूंटी पर लालटेन जल रही थी। सामने अहाता है और बीचोंबीच टीन का फाटक। दाहिनी तरह कुआं है और उससे कुछ हटकर नीम का पेड़। सायबानों के बीच में मकान के अंदर जाने का पुराना पहाड़ जैसा दरवाज़ा है। सायबानों के पीछे लंबे-लंबे कमरे हैं। किनारे पर कोठरियां हैं और लंबे कमरे के पीछे लंबे बरामदे हैं। लंबा चौड़ा आंगन है। जिसके दाहिनी तरफ छोटी-छोटी कोठरियां बनी हैं। इनमें से दो-तीन की छतें गिर चुकी हैं। मैंने यह सोचा है कि एक लंबे कमरे में रहूंगा और पिछले दरवाज़ों से घर के अंदर वाला हिस्सा इस्तेमाल नहीं करूंगा। बरामदे के तौर पर सायबान ही काम आयेगा। कहा जाता है पिछली कोठरियों में जिन्न रहते हैं। उन्हें आराम से रहने दिया जाये।

अहाते का टीन वाला फाटक खुलने की आवाज़ आई तो सन्नाटे में अच्छी खासी डरावनी लगी। टार्च की रौशनी में रहमत आता दिखाई पड़ा। उसके साथ उसका लड़का गुलशन भी था। गुलशन के हाथ में खाना था। अपने बाप से बित्ताभर ऊंचा गुलशन कड़ियल जवान है।

यहां मेज़ नहीं है। कुर्सी नहीं है। सिर्फ चारपाइयां हैं या एक छोटा-सा तख्त़ है। तख्त़ पर मेरे आने के बाद दरी बिछा दी गयी है। ये मैंने सोचा भी कि अगर कभी कुछ लिखने का जी चाहे तो मेज़ के बगै़र कैसे काम चलेगा? फिर ये सोचा कि शायद ही कभी यहां लिखने की ज़रूरत पड़े। बहुत से बहुत डायरी में खर्च और आमदनी का हिसाब। उसके लिए मेज़ कुर्सी की क्या ज़रूरत है।

गुलशन ने तख्त़ पर खाना लगा दिया। अरहर की दाल जिसमें असली घी खूब तैर रहा है। आलू की सब्ज़ी, सिरके में रखी गयी प्याज़, गुड़ की आधी भेली, मोटी, गेहूं की लाल रोटियां। पता नहीं क्यों होराइज़नग्रुप के नीचे सरदार के ढाबे में खाये राजमा चावल की बात सोचने लगा। फिर सरयू का ख्य़ाल आया। बेचारा वहीं होगा। कनाट प्लेस वाले टी-हाउस के सामने फटी चप्पल घसीटता। मैं खाने लगा। रहमत बताने लगा कि गोश्त और हरी सब्जी तो कम ही मिलती है यहां। वह कल खुरजी जायेगा तो गोश्त लायेगा।

रात में देर तक नींद नहीं आई। दूसरे तरफ के सायबान में गुलशन लेटते ही सो गया था। लालटेन की रौशनी में काला सायबान कोई जीती-जागती चीज़ लग रहा था। सामने अंधेरे का महासागर। घर के अंदर जिन्नातों का मस्कन। सोचा कहीं तिलावते-क़ुरान की आवाजें न आने लगें। कोई बात नहीं है, आयें। लेटे-लेटे पता नहीं कैसे अहमद का ख्य़ाल आया। कहां होगा? कलकत्ता में अपनी सुंदर पत्नी इंदरानी के साथ या लंदन में लिप्टन की नौकरी में? या टाटा टी गार्डेन्स में. . . .और मैं? चलो अपने ऊपर हंसा जाये। ऊंह क्या बेवकूफी है. . .अहमद की सोच कितनी साफ है। कोई लाग-लपेट नहीं पालता। किस्मत भी है। ख़ै़र किस्मत क्या है वह जिस क्लास में पैदा हुआ उसके फायदे हैं। वैसे शकील को नहीं हैं। वह तो बस्ती में अपने भाइयों और अय्याश अब्बाजान के षड्यंत्रों का शिकार हो रहा होगा। सीध है बेचारा। और अलीगढ़ में सब कैसे होंगे? जावेद कमाल? के.पी.? कामरेड लाल सिंह? एक फिल्म की तरह लेकिन कुछ सेकेण्ड में पिछले दस साल आंखों के सामने से निकल गये। अब मैं कहां हूं? उनसे कितना दूर? इस उजाड़ वीरान गांव में संघर्ष करता कि कुछ पाऊं. . कुछ कर सकूं. . .कुछ तो करना ही था यार। छब्बीस- सत्ताइस साल की उम्र में ये तो नहीं हो सकता कि मैं कुछ न करूं?

----२----

धान कट चुका था और अब गेहूं बोना था। दो महीने खुरजी के बिजली ऑफिस में जूते घिसने के बाद कनेक्शन भी मिल गया था। बोरिंग होना थी मोटर बैठाना था। सो उम्मीद थी कि एक महीने में हो जायेगा। मतलब गेहूं को पहला पानी देने के वक्त़ ट्यूबवेल तैयार होगा। सोचना यह था कि क्या पूरी चालीस बीघा खेती बटाईदारों से ले ली जाये और खुद खेती करायी जाये? अगर खुद खेती करायी जाये तो हल बैल और उसे ज्यादा मसला था हलवाहों का? वे कहां से आयेंगे? चालीस बीघा खेती कराने के लिए कम से कम तीन जोड़ी बैल और तीन हलवाहे चाहिए थे। अब मुश्किल यह थी कि हलवाहों को बड़े किसानों ने पहले ही फंसा रखा था। रहमत ने बताया था कि ज्यादातर हलवाहे ठाकुरों के बंधुआ हैं। कुछ तो कई-कई पीढ़ियों से हैं। बाकी लोग हलवाहों को उधर कर्जा देकर उलझाये रखते हैं ताकि उन्हीं का काम करते रहें। ये सोचकर भी अजीब लगा कि ऐसे हलवाहे ही नहीं हैं जो पैसा लें और काम करें। मतलब आपको एक 'सर्विस` चाहिए। आप पैसा दें और सर्विस लें। लेकिन यहां तो हाल ही अजीब है। सर्विस आपको मिल ही नहीं सकती क्योंकि उस पर कुछ लोगों ने एकाधिकार बना रखा है। आप उसे कैसे तोड़ सकते हैं? पैसा देकर? मान लीजिए ठाकुर रणवीर सिंह ने पांच सौ के कर्ज में हलवाये को बंधुआ बनाया हुआ है और आप हलवाहे को पांच सौ दें और कहें कि तुम रणवीर सिंह के यहां से मुक्त होकर हमारे यहां आ जाओ? रहमत ने बताया कि पहले तो हलवाहा न तैयार होगा। इतना डर और आतंक है रणवीर सिंह का। दूसरा हलवाहे मान भी जाये तो रणवीर सिंह से हमेशा की अदावत हो जायेगी

. . . समझ लो भइया पक्की दुश्मनी और भइया ठाकुरों से दुश्मनी लेना ठीक नहीं है। बड़े ही साले उद्दण्डी हैं। अहीरों से भी बच के रहना ही ठीक है।”

“इसका मतलब है हलवाहे ही नहीं मिलेंगे और खेती ही नहीं हो पायेगी।” मैंने चिढ़कर कहा।

“नहीं खेती क्यों न हो पायेगी. . .अब खोजना पड़ेगा।” रहमत ने कहा।

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“आपसे ग्राम सेवक मिलने आये हैं?” मैं सुबह के वक्त़ सायबान में बैठा फाटक खोलकर अंदर आते आदमी को देखकर रहमत ने बताया।

“ये क्या होता है?”

“अरे यही खेती ऊती के बारे में बताते हैं। खुद कुछ नहीं जानते। दुनियाभर को बताते फिरते हैं. . . गांव में तो इन्हें कोई फटकने नहीं देता . . .ब्लाक ऑफिस से हैं।”

“नमस्कार जी. . . र, उस आदमी ने इस गांव में पहली बार मुझे नमस्कार किया।

“नमस्कार. . .आइये।”

“मैं इस क्षेत्र का वी.एल.डब्ल्यू. हूं. . . 'विलिज लेविल वर्कर` मतलब ग्राम सेवक. . .मेरा नाम हरिपाल त्यागी है।”

वह बैठ गया। उसने अपना झोला रखा।

“पानी पिलवाया जाय आपको त्यागीजी?” रहमत ने पूछा। मुझे आश्चर्य हुआ कि यह पूछा क्यों जा रहा है। फिर ध्यान आया, हां जातिवाद. . .हो सकता है त्यागी जी मुसलमानों के यहां का पानी न पियें।

“हां पिलवाओ रहमत भाई।” मतलब त्यागी रहमत को पहले से जानते हैं।

“हमें तो श्रीमान बड़ी प्रसन्नता हुई जब पता चला कि एक एम.ए. पास व्यक्ति गांव में खेती कराने आ गये हैं।” त्यागी जी ने कहा .

“आप जैसे लोग तो गांव की तरफ देखते नहीं. . .यही हमारा और देश का दुर्भाग्य है. . .जब तक पढ़े लिखे लोग गांव में नहीं आयेंगे तब तक. . .”

उनकी बात काटकर रहमत बोला “य लेव त्यागी जी पानी पियो।” तश्तरी में पानी का गिलास के साथ बढ़िया गुड़ की आधी भेली भी थी। त्यागी जी ने मजे से पूरा गुड़ खाया और पानी पिया और पानी लाने को कहा।

“मैं तो जी पश्चिमी उत्तर प्रदेश का हूं. . .मुज़फ्ऱनगर. . .आप जानते ही हैं विकसित क्षेत्रों में माना जाता है। किसान प्रगतिशील हैं. . .यूरिया वग़ैरा का प्रयोग करते हैं. . .इस क्षेत्र के किसानों की तो समझ में ही नहीं आता. . .वे तो इस पर तैयार नहीं है कि उनकी पैदावार चार गुना हो जाये. . .अरे पांच मन का बीघा पैदा करते हैं. . .मैं बीस मन के बीघा की तो गारंटी देता हूं।”

ग्राम सेवक त्यागी से मिलकर मेरा उत्साह चौगुना हो गया। वाह क्या आदमी है, खाद बीज पानी और खरीद सबके बारे में 'डिटेल्स` हैं इसके पास। यह भी बता रहा है कि रासायनिक खाद पर सब्सिडी है। अगर चाहूं तो सरकारी बैंक 'लोन` भी दे सकता हैं यह भी कहता है कि वह तो रोज़ आकर मेरी फसल देख सकता है। यह ध्यान रखेगा कि कोई कीड़ा-वीड़ा न लगने पाये। मैंने पक्का निश्चय कर लिया कि उसकी सलाह पर चलूंगा।

---

रहमत ने बड़ी मुश्किलों से एक हलवाहे का इंतिज़ाम किया। तन्ख्वाह ठहरी दो सौ रुपये महीने। जो यह सुनता था दांतों तले उंगली दबा लेता था। गांव में हलवाहों को पच्चीस पचास महीना और दो बीघा खेत से ज्य़ादा न मिलता था क्योंकि वे बंधुआ या कर्जदार हुआ करते थे। अब मैं कहां से लाता ऐसे हलवाहे। ग्राम सेवक ने खाद की बात पक्की कर दी। यह कहा कि नया बीज आर.आर. इक्कीस आया है, इसे ही आप बुआवें क्योंकि इसका पौध गिरता नहीं, छोटा होता है और बालियों में दाने भी ज्यादा लगते हैं। यह पंतनगर का बीज है।

यहां इतना काम था कि अपने ऊपर यह सोचकर हंसने का समय भी नहीं मिलता था कि तीन महीने पहले मैं पत्रकारिता की दुनिया में राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय समाचारों के साथ उठता बैठता था और अब . . .मैंने कई सप्ताह से अखबार नहीं पढ़ा है। मुझे इस पर खेद या पछतावा भी न था। मैं यह मान चुका था कि वह दुनिया 'फ्राड` और धोखा है। मेरा वहां कोई गुज़र नहीं है और अगर मैं अपनी जगह बना सकता हूं तो यहीं और सिर्फ यहीं क्योंकि पैसा मैं यहीं कमा सकता हूं। बिन पैसा सब सून। बड़े-सा बड़ा दर्शन, संगठन, समाज, देश और पता नहीं क्या-क्या सब बेकार है बिना पैसे के। कोई दूसरी समानान्तर व्यवस्था मनुष्य नहीं बना सका है जहां पैसे की केन्द्रीय भूमिका न हो। लेकिन इतना तय है कि मानवता के लिए ऐसी व्यवस्था स्थापित करना एक अद्वितीय उपलब्धि होगी जो पूंजी के बजाय श्रम, बुद्धि----और ज्ञान से संचालित हो।

अब सवाल यह था कि हलवाहे से तो चालीस बीघा की खेती नहीं हो सकती। मैंने रहमत से कहा कि दूसरे हल से मैं जोत लूंगा। वह मेरी तरफ अविश्वास से देखता रहा और फिर हंसने लगा।

“क्यों क्या बात है? मुझमें क्या कमी है?”

“भइया हल चलाना सीखना पड़ेगा. . .कहीं जानवर के पैर में लग गया तो हज़ार डेढ़ हज़ार की जोड़ी बेकार हो जायेगी।”

मजबूरी में तय पाया कि सिर्फ दस बीघा में गेहूं बोया जाये. . .फिर आगे देखा जायेगा। कुछ गांव के बूढ़े आकर कहते थे ये जमीन धनई है। इसमें गेहूं न होगा। ग्राम-सेवक कहता था कि ये लोग पागल हैं, जाहिल हैं। ये दोमट माटी है इसमें तो गेहूं ऐसा लहलहायेगा कि लोग देखते रह जायेंगे। मैं ग्राम सेवक के तर्कों से संतुष्ट हो जाता था जबकि गांव के दूसरे लोग उन तर्कों के साथ अनुभव भी जोड़ लेते थे और उसमें संदेह, शक और 'पता नहीं क्या हो` वाला भाव जुड़ जाता था। काफी समय बाद मैं समझ पाया कि यही शायद इन लोगों की शक्ति है। संदेह करना, फूंक-फूंककर कदम रखना, जहां सब कुछ अच्छा ही अच्छा दिखाई दे रहा हो वहां कुछ थोड़े अनिष्ट की कल्पना कर लेना ताकि अपनी तैयारी पूरी रहे।

काम कोई एक न था और काम इस तरह निकल आते थे जैसे जादू के पिटारे से रूमाल निकलने लगते हैं। ब्लाक का चक्कर, तहसील का दौरा, सहकारी बैंक में काम-काज, बिजली दफ्त़र, कुंजड़े से पैसा वसूल करना, डांगर की जोड़ी खरीदना, बीज गोदाम में अपनी मांग दर्ज कराना, खेतों की पैमाइश के लिए पटवारी के घर के चक्कर, बिजली का मोटर लेने के लिए कानपुर का दौरा. . .इन सब कामों में दिन पूरी तरह गुजरता था। रात में खाना खाने के बाद चौपाल जम जाती थी। बटाईदार जानते थे कि मुझे खुश न रखा गया तो जोतने को ज़मीन न मिल पायेगी। मेरे लिए बड़ी मुश्किल थी कि किसे मना करूं। ये सब पिछले बीस-बीस साल से बटाई पर यह ज़मीन जोत रहे थे और कायदे से उनका 'शिकमी हक` बन गया था । लेकिन अब्बा यानी डिप्टी साहब के कारण कागज़ों पर कभी उनका नाम न आ पाया था। तो क्या करूं? यूनिवर्सिटी में पढ़ा लिखा, मार्क्सवाद के सिद्धांत, हक की लड़ाई, सर्वराहारा के प्रति सहानुभूति या पैसा? अब्बा की मऱ्जी के बगै़र मैं कोई बड़ा फैसला तो ले भी न सकता था। सोचा जैसे चल रहा है वैसा ही चलने दूं और कोई बीच का रास्ता निकालूं। जो बटाईदार ठीक से काम नहीं करते उन्हें हटा दूं फिर देखा जायेगा।

रात के खाने के बाद रामसेवक कंजड़, किशना चमार, यादव पहलवान और नंबरी आ जाते थे। रामसेवक बटाईदार है। दस बीघा जोतता है। नौजवान आदमी है। खेती से छुट्टी मिलती है तो जंगली जानवरों के शिकार पर चला जाता है। किशना पक्का खेतिहर है। भूमिहीन है और बटाई की खेती करता है। यादव पहलवान के पास अपनी स्वयं की ज़मीन है। उनके पिता जी और अब्बा में कुछ सहयोग और भाईचारे के संबंध रहे हैं, इसलिए वो आ जाते हैं। नंबरी कुर्मी हैं। ज़मीन कम है उनके पास इसलिए हमारे बटाईदार हैं। जैसे गांव के हंसोड़, मज़ाक़िया लोग होते हैं वैसे ही नंबरी हैं। बीड़ी पीने के शौकीन हैं और रोज़ रात में दो-चार बीड़ी पी जाते हैं। किशना और रामसेवक नीचे ज़मीन पर बैठते हैं। नंबरी और यादव पहलवान तख्त़ पर बैठते हैं। यह भी नियम या इस तरह के नियम कितने पक्के हैं इसका अंदाज़ा मुझे पहले न था। खेती किसानों की बातें, इधर उधर की बातें, गांव के नये हालात, तहसील, थाने की बातें, ग्राम सेवक के किस्से और न जाने क्या-क्या छिड़ जाते हैं। मैं ख़ामोश ही रहता हूं क्योंकि उसमें जोड़ने के लिए मेरे पास कुछ नहीं होता। इन महफ़िलों में रहमत भी रहता है। वह भी नीचे लेकिन सायबान के मोटे लोहेवाले खंभे से टिककर बैठता है। बटाईदार उसे बहुत मानते हैं क्योंकि उसी से डिप्टी साहब की आंखें और कान माना जाता है।

----३----

दो महीने बाद गेहूं लगवाकर मैं शहर आया तो शहर इतना बड़ा लगा कि जिंद़गी में कभी न लगा था। यह सोचकर हंसी आ गयी कि कुछ बड़ा या छोटा नहीं होता। यह सब हमारा आपका नजरिया है जो विभिन्न संगतियों से बनता है। बस अड्डे में अपनी दुकान पर ताहिर मिल गया। वह खुश हो गया और बोला- “अरे यार पूरे दो महीने लगा दिए. . .कहो क्या-क्या करा आये?” मैंने उसे बताया। दुकान पर बैठकर हम चाय पीने लगे। हाजी जी नमाज़ पढ़ने गये थे।

“यार झुलस गये तुम।” वह मेरी तरफ देखकर बोला। मुझे खुशी हुई। काम में झुलसना तो बड़ी बात है। लेकिन प्राब्लम यह थी कि मैं दो महीने से अखबार न देख सका था। खुरजी में इधर-उधर कभी पढ़ने को मिल जाया करता था लेकिन अखबार से जो सिलसिला बनता है वह टूट चुका था।

घर आया तो अम्मां देखकर खुश हो गयी। खाला ने मेरे पसंद के खाने चढ़वा दिए। अब्बा हैरत से सुनते रहे कि इन दो महीनों में मैंने क्या-क्या कर डाला था। वे हिसाब लगाने लगे कि दस बीघा में जैसा कि ग्राम सेवक कहता है, बीस मन का बीघा न सही अगर अट्ठारह मन का बीघा भी हुआ तो कोई साढ़े तेरह हज़ार का गेहूं हो जायेगा। अगली फसल पर अगर बीस बीघे में बोआई करायी गयी तो. . .बहरहाल मैं भी खुश था कि चलो कुछ तो बात बन रही है। बाग उठाने से जो पैसा मिला था वह खेती में लगा दिया था।

घर पर मुझे तीन ख़त मिले। एक अहमद का ख़त था। पढ़कर मैं हैरान हो गया। उसने लिखा था कि इण्डियन हाई कमीशन, लंदन में

उसकी इन्फ़ारमेशन ऑफीसर के ओहदे पर पोस्टिंग हो गयी है। यह पोस्टिंग मंत्री ने दी है। जाहिर है उसके पीछे हाथ इंदरानी के अंकिल का हाथ ही था। मैं सोचने लगा यार थर्ड क्लास बी.एस-सी. फारेन सर्विस में आ गया और अब मज़े करेगा। यही फायदा है 'कान्टेक्ट्स` का। उसने जोश में आकर मुझे लंदन आने की दावत भी दे डाली थी। ठीक है अब मैं जा सकता हूं, मेरे पास पैसा होगा। पैसा जिंद़गी को चलाने वाली गाड़ी का पहिया। दूसरा ख़त शकील का था। उसने लिखा था कि यार भाइयों के तंग करने, कारोबार में हिस्सा न देने और वालिद साहब की लापरवाही का शिकार होने से बचने का एक ही रास्ता मुझे नज़र आया। मैं पॉलीटिक्स में आ गया हूं। मैंने कांग्रेस ज्वाइन कर ली है। अब साले मुझसे घबराते हैं। यहां कांग्रेस के अध्यक्ष आर.के. तिवारी हैं। तुम दिल्ली से उन पर कोई दबाव डलवाकर मुझे युवा कांग्रेस का ज़िला अध्यक्ष बनवा दो तो मज़ा आ जाये। मैं एक-एक को सीध कर दूं। दो अच्छी खबरों के बाद तीसरे खत़ में एक बुरी ख़बर थी। अलीगढ़ से के.पी. ने लिखा था, 'जावेद भाई की कैंटीन बंद हो गयी। नये वाइस चांसलर ने कैंटीन का ठेका अपनी पत्नी की सहेली को दे दिया है। कुछ लोग कहते हैं ये तो सिर्फ नाम के लिए है। ठेका वी.सी. की पत्नी को ही मिला है। चार-पांच हज़ार लड़के रोज़ कैंटीन में आते हैं। तुम समझ सकते हो क्या आमदनी होती होगी। जावेद भाई ने बड़े हाथ पैर मारे लेकिन वाइस चांसलर ही नहीं चाहते तो कोई क्या कर सकता है। जावेद भाई का परिवार बड़ा है, दो निठल्ले भाई और उनका परिवार भी जावेद भाई के साथ ही हैं। इसके अलावा उनका अपना परिवार। सौ रुपये रोज़ विल्स सिगरेट और पान का खर्च. . .और जाने क्या-क्या. . .बहरहाल बहुत परेशान है. .यूनिवर्सिटी का घर एलाट कराया हुआ है। आज तक अपना घर नहीं बना सके हैं जबकि पिछले पन्द्रह साल से कैंटीन चला रहे थे।”

मैं सोचने लगा, यार अच्छे आदमी इतने अच्छे क्यों होते हैं कि अपने साथ दुश्मनी करने लगते हैं? जावेद कमाल अपनी तमाम कमियों के बावजूद हीरा आदमी है. . .हर ज़रूरतमंद की मदद के लिए तैयार।

यारों पर जान छिड़कने वाले, धर्म, जाति, राष्ट्र, रंग, नस्ल की सीमाओं से ऊपर. . .अच्छे शायर. . . लेकिन ये अपने आपसे दुश्मनी क्यों करते रहे? हो सकता है यह जानबूझ न की गयी हो अनजाने में हो गयी हो, लेकिन है तो दुश्मनी। जब अच्छे दिन तो रोज़ की कमाई रोज़ उड़ा दी जाती थी। जाड़ों में पाए खिलाने की दावत में पच्चीस-तीस लोगों से कम नहीं होते थे। गाजर का हलुए की दावत अलग होती थी। पान सिगरेट दोस्तों के लिए मुफ्त था। फिल्म दिखाने ले जाते थे तो रिक्शे के किराये से लेकर इंटरवल की चाय तक के पैसे कोई ओर नहीं दे सकता था. . . ये सब क्यों और इसका क्या मतलब था? पैसा खर्च करना खुशी देता है तो गम़ भी देता है। लेकिन शायद उनके संस्कार ऐसे थे, परवरिश ऐसे माहौल में हुई थी, खानदान ऐसा था जहां पैसे का कोई महत्व न था। जमींदार, जागीरदार पैसे के महत्व को नहीं जानते। अरे क्या जागीर चले जायेगी? ज़मींदारी की आमदनी तो ऐसी धरती है जो कभी बंजर नहीं पड़ती।

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पुलिया पर फिर महफ़िलें जमने लगीं। उमाशंकर अपने घर से गोश्त पकवाकर ले आते थे। मुख्त़ार पैजामे में घुसेड़कर अंग्रेजी की बोतल लाता था। पुलिया जो किसी पंचवर्षीय योजना में ऐसे नाले पर बनी थी जो था ही नहीं, बैठने की एक आदर्श जगह थी। न तो इस पुलिया पर से कोई सड़क गुजरती थी और कोई चलता हुआ रास्ता था। दूर-दूर तक फैले खेत थे और उनके पीछे कुछ पुरवे थे। पुलिया पर दरी बिछाकर सब पसर जाते थे। ऊपर खुला आसमान और नीचे खिलता हुआ अंधेरा. . .निपट अंधेरा। इन महफिलों में कलूट भी आने लगा था जो इस बात पर आज तक गर्व करता था कि कलकत्ता में ज्योति बसु के साथ जेल गया था। कलूट का अण्डे मुर्गी का कारोबार ठप्प हो गया था और खर्चा जानवरों की बाज़ार में दलाली से ही चलता था। कलूट के साथ शमीम साइकिल वाला भी आ जाता था। वह पीता न था। उसे मज़ा आता था हम लोगों के लिए छोटे मोटे काम करने में। 'लाला दौड़ के एक बीड़ी का बण्डल लै आओ।` वगैरा. . .इन्हीं महफिलों में दुनिया जहान की बातें होती थीं। राजनीति, मुसलमानों की स्थिति, सोवियत यूनियन, चीन और अमेरिका बहस के मुद्दे बना करते थे।

केसरियापुर में दो महीने तक मुझे लगा था कि मैं बोला ही नहीं हूं। क्या बोल सकता था? बीज, खाद, पानी, पैसा, निराई, गुड़ाई. . .ये क्या कोई 'बात` है? न तो वहां मैं किसी से अपने राजनैतिक विचारों की चर्चा कर सकता था और न अपने साहित्यिक कामों पर बात कर सकता था। इसलिए लगता था कि दो महीने खा़मोश रहा हूं। इन महफ़िलों में वह कमी पूरा होने लगी। एक दिन बातचीत में उमाशंकर ने कहा “यार साजिद तुम अपनी पार्टी की इतनी तारीफ करते हो. . .तुम्हारी पार्टी का यहां कोई आदमी नहीं है क्या. . .हम लोग भी मिलें. . .देखें।” ये सुनकर मुझे खुशी हुई। उमाशंकर अपने को पक्का कांग्रेसी कहा करता था लेकिन इन महफिलों में हुई बहसों ने उसे विचलित कर दिया है। मुख्त़ार तो मुस्लिम लीग से उखड़ ही चुका था। ताहिर को राजनीति में रुचि नहीं है। शाहिद मियां की दोस्ती की वजह से इलेक्शन में कांग्रेस का काम कर देता है और एक 'प्रोटेक्शन` भी मिला हुआ है। ख़ै़र पता-वता लगाया गया तो आर.के. मिश्र एडवोकेट का पता चला कि वो सी.पी.एम. के जिला सचिव हैं।

दो दिन बाद हम सब एक साथ उनके घर पहुंच गये। बाद में उन्होंने बताया था कि इतने लोग, इस शहर में, पार्टी के नाम पर उनसे मिलने कभी नहीं आये थे। खूब बातचीत हुई। कामरेड मिश्रा ने साहित्य दिया। 'स्वाधीनता` लेने की बातें भी तय हुई। काम क्या हो रहा है यह पूछने पर कामरेड थोड़ा कन्नी काट गये बोले कुछ कामरेड किसान सभा का काम देख रहे हैं। एक दो तहसीलों में अच्छा काम है. . .वगैऱा वगै़रा. . .तो ये समझते देर नहीं लगी कि शहर में पार्टी का काम है नहीं।

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केसरियापुर जाने से पहले एक दिन अचानक बावरचीखाने में सल्लो को बैठा और ऐसा लगा जैसे पूरा वजूद बज उठा हो। सल्लो ने मुझे देखा और मुस्कुरा दी. . .पुराने पन्नों को खोलती और रिश्तों को आधार देती मुस्कुराहट। उसके साथ बिताई रातें उंगलियों के पोरों पर नाचने लगीं। फिर घर में पता चला कि उसके अब्बा को किसी नयी मिल में नौकरी मिल गयी जो यहां से दूर है। इसलिए सल्लो और उसकी मां को बुआ के यहां छोड़ा गया है।

सल्लो इस पूरे संसार में अकेली है जिससे मेरे संबंध बने थे। सल्लो को मैंने कहां-कहां याद नहीं किया है। सल्लो मेरे दिलो-दिमाग पर छायी रही है। यह दुबली-पतली औसत कद और सामान्य नाक-नक्शे वाली लड़की चांदनी रात में जब 'बेहिजाब` हुआ करती थी तो सुख के सागर खुल जाते थे। मुझे उससे तन्हाई में इतना कहने का मौका मिल गया कि वह रात में ऊपर आ जाये। वह हंस दी और बोली- “देखेंगे . . . अभी से क्या कह दें।” चेहरे पर तो उसके भी खुशी झलक रही थी।

कोठे वाले कमरे के सामने वाली छत पर मच्छरदानी से घिरा मैं घर के अंदर से आने वाली आवाज़ों पर कान लगाये था। धीरे-धीरे घर का काम करने की आवाजें मद्धिम पड़ती गयीं। धीरे-धीरे अंधेरे के जुगनू जगमगाने लगे और मुझे लगा अब इंतिज़ार की घड़ियां खत्म हुआ ही चाहती है। बगै़र किसी आहट के एक परछाईं चलती हुई मेरे पलंग तक आई और मैंने उठकर उसे बिस्तर पर खींच लिया। वह बात करना चाहती थी लेकिन मेरे पास कोई शब्द नहीं था सिर्फ शरीर था, हाथ था, आंखें थी, वह तकिये पर सिर रखकर लेट गयी और एक गहरी सांस ली। उसकी गहरी सांस ने मुझे पलट दिया। मेरी जुबान खुल गयी।

“कैसे रहीं तुम?”

“आपको क्या. . .आपने तो पलटकर पूछा तक नहीं।”

“ये मत कहो. . .मैं तुम्हें याद करता रहा।”

“याद करने से क्या होता है. . .अब्बा का रिक्शा ट्रक के नीचे आ गया था। वो तो जान बच गयी. . .यही अच्छा हुआ। चोट भी खा गये थे. . .डिप्टी साहब ने ही इलाज कराया था।”

“तुम गांव चली गयी थीं?”

“हां, जब तक कटाई चलती रही. . .वही अम्मां के साथ जाती थी. . .फिर वहां क्या था. . .वापस आ गये। आप तो साल डेढ़ साल बाद आये।”

“हां मैं जंगल में फंस गया था।”

वह हंसने लगी। देख तो नहीं पाया लेकिन अनुमान लगा लेना आसान था कि उसके दाहिने गाल में हल्का-सा गड्ढा पड़ा होगा। वह जब हंसती है तो यही होता है।

दिल्ली में क्या जंगल हैं।”

“हां बड़ा भयानक जंगल है।” मैं उसे धीरे-धीरे आप बीती सुनाने लगा जो किसी को नहीं सुनाई है। उसके हाथ की उंगलियां मेरे सीने के बालों को सीध करती रहीं। मैं सोचने लगा औरत से बड़ा हमराज़ कोई नहीं हो सकता। अपने बारे में, वह चाहे जीत हो या हार हो, प्रेमिका को बताने और इस तरह बताने कि बातचीत का कोई गवाह न हो सच्चाई का अनोखा मज़ा है। वह सुनती रही और खुलती रही। हम धीरे-धीरे एक दूसरे को महसूस करने लगे। मुझे लगा कि यह संबंध कोई सतही हल्का या केवल सेक्स संबंध नहीं हो सकता। इसमें और भी बहुत कुछ है, क्या है? मैं यह सोचकर डर गया। वह पता नहीं क्या सोच रही थी। हाथों के स्पर्श ने डर को पीछे ढकेल दिया। चारों तरफ अंधेरी रात की चादर तनी थी और वह कह रही थी कि तुम दोनों को कोई नहीं देख रहा है। ये चक्कर क्या है जो बात हमें मान लेनी चाहिए हम नहीं मानते? जो बातें तय हो जानी चाहिए हम क्यों नहीं करते? पहली बार उसके साथ लगा कि यह ठीक नहीं है लेकिन इस बीच उसकी सांसें तेज़ हो गयी थीं। मैं अपने को रोकना चाहता भी तो नहीं रोक सकता था।

रातभर हम एक सागर में उतरते तैरते और किनारे पर आते रहे। किनारे पर हमारे लिए सवाल थे। इसलिए फिर लहरों के बीच चले जाते थे और आदिम इच्छाओं के संसार में हमें शरण मिल जाती थी। वह साधारण नहीं है। तट पर आकर जो बातें करती है वे अंदर तक उतर जाती हैं। मैं तय नहीं कर पा रहा था कि उससे चलते समय क्या कहूंगा। कचहरी के घड़ियाल ने चार का घण्टा बजाया। वह धीरे-धीरे कपड़े पहनने लगी। अच्छा है कि जाने से पहले उसने कुछ नहीं पूछा। शायद उसे मालूम था कि वह जो कुछ पूछेगी उसका जवाब मेरे पास नहीं है। वह मुझे शर्मिन्दा नहीं करना चाहती थी।

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हालांकि शहर में मैं नहीं रहता था लेकिन आना-जाना लगा रहता था। जब भी आता तो पार्टी सेक्रेटरी आर.के. मिश्रा से मुलाकात हो जाती । उन्नाव निवासी मिश्रा जी देखने-सुनने और व्यवहार में खासे पंडित हैं। मस्त हैं, बातूनी है, खाने-पीने के शौकीन हैं, आनंद लेने के पक्षधर हैं काम को बहुत सहजता से करते हैं। गांव में घर ज़मीन है जहां से साल भर खाने लायक अनाज आ जाता है। दस-बीस रुपये रोज़ वकालत में भी पीट लेते हैं। मिश्रा जी कई-कई दिन शेव नहीं कराते। हफ्त़े दो हफ्त़े में नाई की दुकान जाकर जब शेव बनवा लेते हैं तो उनकी शक्ल बिगड़ जाती है। चेहरे पर जब तक बालों की खूंटियां नहीं निकल आतीं तब तक उनका व्यक्तित्व मुखरित नहीं हो पाता।

मिश्रा जी के माध्यम से दूसरे पार्टी सदस्यों से भी परिचय होने लगा। पंडित दीनानाथ से मिला। पंडित जी स्थानीय पार्टी के प्रवक्ता हैं। पूरे शहर में मार्क्सवाद की 'सुरक्षा` करने की ज़िम्मेदारी उन्हीं पर रहती है। जब कोई किसी पान की दुकान पर मार्क्सवाद पर प्रहार करता है तो बचावपक्ष अंत में यही कहता है कि पंडित जी से बात करो। पंडित जी द्वंद्वात्मक भौतिकवाद पर हिंदी में एक किताब लिखने की भी सोच रहे हैं। सूरज चौहान पार्टी में हैं, वकालत करते हैं और किसान मोर्चे पर सक्रिय हैं। बलीसिंह लकड़ी का काम करते हैं। पार्टी सदस्य हैं। आक्रामक किस्म का व्यक्तित्व है। पैसे वाले हैं। पार्टी मीटिंगों में चाय-पानी के खर्च का ज़िम्मेदार बनते हैं। 'आबरु` रायबरेलवी भी पार्टी के सदस्य हैं। शहरी मुद्दों और भ्रष्ट अधिकारियों पर शायरी करते हैं। शहर के मुशायरों में स्थानीय शायरों और कवियों में सबसे वरिष्ठ माने जाते हैं। इसके अलावा कुछ ग्रामीण किस्म के सदस्य भी हैं जो किसी गिनती में नहीं आते। उन्हें मिश्रा जी काम बांटा करते हैं।

धीरे-धीरे मैं इन सबके सम्पर्क में आया और मैंने अपनी टीम को मिश्रा जी के हवाले कर दिया। मेरी समझ में नहीं आता था कि पार्टी का काम यहां कैसे आगे बढ़ सकता है? मज़दूर हैं नहीं इसलिए ट्रेड यूनियन का सवाल ही नहीं पैदा होता। किसान सभा बनी हुई हैं पर उसके पास क्या मुद्दे हैं? मज़दूरी का मुद्दा बड़ा संवेदनशील है क्योंकि छोटे किसान तक जो किसान सभा के सदस्य हैं इस मुद्दे पर चुप ही रहते हैं। यह डर रहता है कि इससे बड़ा बवाल खड़ा हो जायेगा। पुलिस उत्पीड़न के मुद्दे ज़रूर हैं पर वे कितने हैं? और व्यापक जन समर्थन का आधार बन सकते हैं या नहीं? मिश्रा जी से इन बातों पर चर्चा होती थी। उनके पास लखनऊ से जो लाइन आती थी, जो शायद दिल्ली से चली होती थी, उसकी बातें करते थे। बहरहाल आंदोलन कैसे शुरू किया या बढ़ाया जाये इसके बारे में हमारे पास कोई जानकारी नहीं थी। सदस्यता बढ़ाने का अभियान ज़रूर चलाते रहते थे।

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दूसरा पानी लगने के बाद गेहूं ऐसा फनफना के निकला कि गांव वाले हैरान रह गये। इस ज़मीन में कभी गेहूं तो हुआ ही नहीं था। ग्राम सेवक इसे अपनी सफलता मानते थे। एक दिन कहने लगे साजिद जी आप देखते जाओ एक दिन मैं आपको उत्तर प्रदेश के आदर्श किसान का पुरस्कार दिलवा दूंगा। यहां मुख्यमंत्री आयेंगे।

गांव के बूढ़े किसान फसल देखने आते। कुछ मेरी किस्मत को सराहते और कुछ रासायनिक खाद की तारीफ करते। बटाईदारों में एक बीघा गेहूं किशना और दो बीघा रामसेवक ने लगाया था। उनकी भी फसल अच्छी थी। मुझे लग रहा था कि बस पाला मार लिया। अब अगले साल पूरे चालीस बीघा में गेहूं लगवाऊंगा। लोग ये भी कहते थे कि पैसा गेहूं धन में नहीं है, पैसा तो आलू और घुइयां में है। खड़ा खेत बिक जाता है। कुंजड़े खरीद लेते हैं। आलू अच्छा हो तो पांच छ: हज़ार का बीघा जाता है। ये सब सुनते-सुनते मैं इतना भर गया कि सोचा चलो आलू लगवा कर देखते हैं। खेत की खूब तैयारी होने लगी। ग्राम सेवक आ गये। उन्होंने खाद की ज़िम्मेदारी ले ली। एक 'प्रगतिशील किसान` से बीज खरीदा गया और आलू लग गया।

हर चीज़ या हर काम यहां 'अधिया` पर हो जाता है। खेत ही अधिया पर नहीं जाते जानवरों की देखरेख भी अधिया पर होती है। तलाब में सिंघाड़ा भी अधिया पर लगता है। गोबर से कंडे पाथने का काम भी अधिया पर होता है। नंबरी ने मुझसे कहा था कि मैं अपने जानवरों के गोबर के कंडे पाथने का काम उसके साथ अधिया में करा लिया करूं। मैं तैयार हो गया था। अच्छा है चार पैसे की आमदनी हो जायेगी और पथे पथाये सूखे कंडे जलाने के काम भी आयेंगे।

अगले दिन से अधमैली साड़ियों में परछाइयां शाम ढले आने लगीं और कंडे पाथने का काम शुरू हो गया। अहाते में दूसरी तरह कंडे पाथ कर लगाये जाने लगे और सूखे कंडे दूसरे सायबान में जमा होने लगे। अधमैली, मलगिजी साड़ियों में दो परछाइयां जो आती हैं उनमें एक नंबरी की औरत है और दूसरी नंबरी की लड़की है। नंबरी की लड़की का विवाह हो चुका है। वह अपनी आठ-दस महीने की लड़की को लेकर आती है। लड़की को वह दूसरे सायबान में लिटाया करती थी। एक दिन मैंने कहा कि इसे दूसरे सायबान में मत लिटाया करो। कोई कीड़ा-वीड़ा न काट ले। इस सायबान में जहां मैं बैठता हूं वहां लिटाया करो। अगले दिन से यही होने लगा। नंबरी की लड़की जब अपनी बच्ची को तख्त़ पर लिटाने आती तो मैं उसे ध्यान से देखता। शारीरिक श्रम की वजह से उसका जिस्म हर तरह से सुंदर है। छोटी-सी नाक, छोटी सी आंखें, गोल चेहरा, कुछ ऊपर को उठे हुए गाल इतना आकर्षित नहीं करते जितना शरीर करता है। नपा-तुला, सीधा, मज़बूत, कर्मठ जीता जागता गेहुंए रंग का शरीर जिसकी सच्चाई अधमैली धोती के नीचे से विद्रोह करती रहती है।

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रहमत शहर से लौटा तो उसके पास दीगर चीजें तो थीं ही यानी खाला ने चले का हलुवा भेजा था, अम्मां ने नये कुर्ते पजामे भेजे थे लेकिन इनसे कीमती चीज़ यानी एक ख़त था। जहां मैं बात करने को तरस जाता हूं वहां ख़त से लगता था नयी ज़िंदगी आ गयी है। जिस दुनिया को छोड़कर, जिसकी रंगीनी से, जिसके अभावों और मज़ों से मैं वंचित हो गया हूं वे सामने आ गये हैं। लिफाफे पर भेजने वाले का नाम और पता छपा था। पढ़ कर मज़ा आया। मुहम्मद शकील अंसारी, मंत्री युवा कांग्रेस. . .। वाह बेटा वाह, मार लिया हाथ। जल्दी-जल्दी ख़त खोला। ख़त क्या था पूरी दास्तान थी। शकील ने बड़े विस्तार से लिखा था कि उसने यह पद कैसे प्राप्त किया यार मैंने क्या नहीं, सबसे पहले तो शहर काज़ी को पटाया। उनको मस्जिदों के लिए और मदरसों के लिए चंदा दिलाया। उसके बाद अपने पंडित जी से उसकी मीटिंग करायी। काज़ीजी कभी किसी राजनीतिज्ञ से नहीं मिलते हैं लेकिन मेरा दबाव काम कर गया। एक यहां मेरा पुराना स्कूल का दोस्त है जो नेपाल के जंगलों से लकड़ी लाता है। काफी पैसा कमा लिया है उसने। उससे बात करके मैंने पंडित जी के बेटे को एक सेकेण्ड हैंड मोटर साइकिल सस्ते में दिला दी। पंडिताइन को सालभर के लिए गेहूं लगभग आधे दामों में दिला दिया। ये सब पापड़ बेलने पड़े और फिर पंडित जी को बार-बार बताया कि जिले में अंसारी बिरादरी के कितने वोट हैं। बहरहाल किसी तरह पंडित जी काबू में आये तो ठाकुर अजय सिंह बिदक गये। उनको एक प्रभावशाली ठाकुर से ठीक कराया। पर अब समझो लाइन सीधी है। कल ही मैंने इनकमटैक्स इंस्पेक्टर को अपनी दुकान पर भेज दिया था। साले दोनों भाइयों की सिट्टी-पिट्टी गुम हो गयी। मैंने मामला रफ़ा-दफ़ा कराया और भाइयों से कहा कि कायदे से मुझे मेरे हिस्से का मुनाफा देते जाओ नहीं तो जेल चले जाओगे। देखो यार जो लोग मुझे कुत्ता समझते थे, आज कुत्ते की तरह मेरे पीछे घूमते हैं। सौ पचास लौण्डों का एक गिरोह भी मेरे साथ खड़ा हो गया है। जो काम पुलिस से नहीं हो पाता वह काम ये कर देते हैं। अब तो लखनऊ के भी दो-चार चक्कर लगा लेता हूं। दुआ करो कि आगे का काम यानी टिकट मिल जाये।` मैं खत़ पढ़कर सोचने लगा। शकील ने अच्छा किया या बुरा किया? मेरी समझ में नहीं आया।

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शहर गया तो मालूम हुआ कि मिश्रा जी से मेरी मण्डली मिलती रहती है। कलूट को पार्टी का सदस्य बना लिया गया है। आधार यही बना था कि दस साल पहले अपने कलकत्ता प्रवास के दिनों में कलूट ज्योति बसु के साथ जेल गये थे। इतने समर्पित कार्यकर्ता को पार्टी सदस्य क्यों न बनाया जाता लेकिन कलूट ने पार्टी मेम्बर बनने का जो विवरण दिया था वह बहुत अलग था।

कलूट ने बताया कि मिश्रा जी ने कहा कि कचहरी आ जाना वहां फारम भरवाएंगे। जब ये कचहरी गए तो मिश्रा जी ने इनसे कहा कि तुम्हें मालूम है तुम एक आल इंडिया पार्टी के सदय बन रहे हो। तुम संसार के कम्युनिस्ट आंदोलन में शामिल होने जा रहे हैं। इस पार्टी की मेम्बरशिप के लिए तो लोग तरसते हैं। बहुत भाग्यशाली होते हैं जिन्हें मेम्बरशिप मिलती है। तुम्हें एक कार्ड मिलेगा जिसे देखकर अच्छे-अच्छे अधिकारी एक बार चौंक जाया करेंगे। इस तरह की भूमिका बांधने के बाद मिश्रा जी ने कहा- “कलूट भाई अपनी खुशी में दूसरे कामरेडों को शामिल करो। देखो यहां पंडित दीनानाथ बैठे हैं, सूरज चौहान हैं, आबरु साहब हैं, अब तुम इस बिरादरी में शामिल हो रहे हो।”

“अरे साफ-साफ कहो कि चाय पिया चाहत हो।”, आबरु साहब ने मिश्रा जी से कहा।

“अरे चाय हम पीते रहते हैं. . .इस समय. . . र

“जाओ बच्चा सामने माखन हलवाई की दुकान से गुलाब जामुन और समोसा ले आव. . . चाय बोल दियो कि मिश्रा जी के बस्ता म पहुंचा देव।”

“अच्छा तो उन सबने तुम्हें 'काटा`, मैंने पूछा।

कलूट हंसने लगा, “अरे नहीं साजिद मियां. . .ऐसा का है।”

“नहीं ये तो गल़त है।”

“साजिद भाई . . .ये बेचारा दिन भर साइकिल के पीछे मुर्गियों का ढ़ाबा लिए गांव - गांव का चक्कर काटता है तब कहीं दस-बीस रुपया कमा पाता है।” मुख्तार ने कहा।

“चलो अभी चलते हैं मिश्रा जी के पास”, मुझे गुस्सा आ गया।

“नहीं नहीं रहे देव”, कलूट ने कहा।

“रहने कैसे दिया जाए”, मुख्त़ार बोला।

“बातें तो इतनी ऊंची-ऊंची करते हैं और हाल ये है”, ताहिर ने बीड़ी का दम लगाने से पहले कहा।

मुझे लगा ये सब मुझे घेर रहे हैं। कह रहे हैं यही आपकी पार्टी के आदर्श हैं। यही वे लोग हैं जो गरीबों के लिए पृथ्वी पर स्वर्ग उतार लाएंगे।

मैंने सोचा मिश्रा जी पर सीध हमला करने से पहले ज़रा दूसरे लोगों को भी टटोल लिया जाए। मैं सूरज सिंह चौहान के पास गया, वह काली शेरवानी चढ़ाए कचहरी जाने की ताक में चौराहे पर खड़े थे। मुझे देखकर पान की दुकान की तरफ घसीटने लगे। मैंने उन्हें चायखाने की तरफ घसीटना शुरू किया और हम दोनों चाय पीने बैठ गए। चौहान साहब को पूरी भूमिका बांधकर मैंने पूरा किस्सा सुनाया। वे काफी दार्शनिक-भाव के साथ सुनते रहे। उन्होंने चुप्पी तोड़ी और बोले- “कामरेड तुम तो जानते ही हो कि इस पार्टी में हाईकमान का विश्वास जीतना बहुत कठिन है। पर एक बार किसी का विश्वास जम जाये तो उसे उखाड़ना और मुश्किल है। मिश्रा ने लखनऊ में अपना विश्वास जमा दिया है। ये जो कलूट के साथ हुआ कोई नयी बात नहीं है। मिश्रा ऐसे काम करते रहते हैं। हम लोग लखनऊ में कहते हैं तो डांट उल्टा हमें पड़ती है। कहा जाता है आप लोग ज़िला कमेटी में गुटबंदी कर रहे हैं। जाओ जाकर काम करो एक दूसरे की शिकायतें न किया करो. . .कामरेड मिश्रा तो फिर भी वैसे नहीं हैं। हम बताए आपको सात-आठ साल पहले हमारे ज़िला सेक्रेटरी त्रिभुवन हुआ करते थे। हाई कमान के चहेते। प्रांतीय नेतृत्व की नाक का बाल । लेकिन ज़िला स्तर पर उनकी

बड़ी काली करतूतें थीं। हम लोग जब भी लखनऊ में बात उठा तो यही जवाब मिलते की गुटबंदी न करो। काम करो। अब साहिब पूरी जिला कमेटी. . . एक दो जनों को छोड़कर बड़ी त्रस्त हो गयी। क्या करें क्या न करें। बड़ी मुश्किल से मौका आया। जब सी.पी.एम. का विभाजन हुआ तो हमारे जिला सेक्रेटरी ने बैठक बुलाई। हमें मालूम था कि उनके रुझान नक्सली हैं, उन्होंने हम सबसे पूछा कि बताओ क्या करें? सी.पी.एम. में रहे या नक्सली हो जायें। हम लोगों ने कहा कामरेड आप हमारे नेता हैं। जो आप निर्णय लेंगे वही हमारा भी फैसला होगा। कामरेड ने कहा- ठीक है हम सी.पी.एम.एल. में चले जाते हैं। अगले दिन उन्होंने अखबार में छपवा दिया। हम तीन ज़िला कमेटी के मेम्बर अखबार लेकर लखनऊ गये और प्रांतीय नेताओं से पूछा कि हम लोग क्या करें? हमारे कामरेड सेक्रेटरी तो नक्सली हो गये हैं? हमसे कहा गया लखनऊ से किसी को भेजा जायेगा। आप लोग जिला कमेटी की मीटिंग करें और नया सेक्रेटरी चुन लें। तो इस तरह त्रिभुवन से हमारा पीछा छूटा। अब कामरेड मिश्रा ये सब हरकतें करते हैं। आपको मालूम नहीं, ये उन किसानों से ज्य़ादा फीस वसूल करते हैं जो पाटी के हमदर्द हैं। मतलब हम जान-जोखिम में डालकर लोगों को पार्टी के पास लाते हैं और मिश्रा जी उन्हें भगा देते हैं, क्या किया जाये?``

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केसरियापुर लौट आया तो बिन्देसरी फिर दिखाई पड़ने लगी। कभी अकेली और कभी मां के साथ। जब अकेली होती और मेरे पास कोई बैठा न होता तो किसी बहाने से मैं उसे बुला लेता। लेकिन डर भी लगता कि यार चारों तरफ से खुला घर है। रहमत और गुलशन आते रहते हैं। कहीं कोई देख न ले। लेकिन दिल है कि मानता नहीं। एक आद मौका देखकर कुछ लाने के लिए उसे कमरे में भेज चुका हूं और उसके पीछे-पीछे मैं भी गया हूं। जल्दी में जो कुछ हो सकता है उस पर उसने कभी एतराज़ नहीं किया है। अब तो बस मौके की बात है और मौका कैसे, किस तरह, कहां, कब? मेरे ख्य़ाल से मेरी इस मजबूरी को

बिन्देसरी भी समझती है और उसने साबित कर दिया कि मुझसे ज्य़ादा समझदार है।

एक दिन खाना खाने के बाद दोपहर को मैं लेटा था कि बिन्देसरी का भाई राजू आ गया। वह गांव के ही स्कूल में कक्षा चार में पढ़ता है। उसने कहा- बाबू जी और अम्मां न्योते में गये हैं। बाबू कह गये हैं रात में आप हमारे घर सो जाना। दीदी डरात है।

“रात में आ जाना. . .मुझे तुम्हारा घर नहीं मालूम है. . .देखा तो है पर. . .”

“आ जइबे।” वह चला गया।

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मोटी खेस ओढ़े, रात के अंधेरे में गांव की गलियों से होता मैं नम्बरी के घर पहुंचा। छप्पर के दोनों तरफ टटि्टयां लगीं थी। बीच से जाने का रास्ता था, सामने दरवाज़े के अंदर रौशनी थी। मैं अंदर आ गया कच्ची साफ सुथरी ताक पर एक दिया जल रहा था जिसकी रौशनी में लिपी-पुती कच्ची दीवारों का असमतल स्वरूप रौशनी में कलात्मक छबियां बना रहा था। कुछ देर बाद वह आई, अपनी बच्ची को सुला रही थी। मैंने उसे अपने पास बुलाया।

“आज कचर लेव जितना कचरे का है।” वह बोली और साथ लेट गयी।

“रात में ये उठती तो नहीं।”

राजसेरी?

हां।

उठती है, जब भूख लगती है।

मैं कुछ चिंता करने लगा।

“तुम्हें देख के डर न जायेगी”, वह हंसी।

“सुसराल में तुम्हारा झगड़ा है”, मैंने सुना था कि ससुराल वाले उससे खुश नहीं हैं।

“झगड़ा कुछ नहीं है. . .एक दीया से पूरे घर में उजाला कैसे

हो सकता है”, वह बोली।

“क्या मतलब?”

“हमारा छोटा देवर हम को चाहत रहे. . . हम कहा चलो ठीक है. . .छोटे भाई हो हमरे आदमी के . . .छोटे को देखा-देखी जेठ जी भी ललचा गये. . . समझे बहती गंगा जी है. . . हम मना कर दिया . . .घर का पूरा कामकाज जेठजी करते हैं. . .खेती बाड़ी. . .”

“जेठ की शादी नहीं हुई है?”

“उनकी औरत कौनों के साथ भाग गयी।”

“तो जेठ जी तुम्हारे साथ. . .”

“हां, पर हमका अच्छे नहीं लगते।”

“क्यों?”

वह कुछ नहीं बोलती।

“चिन्हारी देवर, वह मेरा हाथ पकड़कर बोली। मैं चुप रहा।

“चिन्हारी नहीं जानते।”

“जानते हैं मतलब पहचान. . .”

“मान लेव रात हो. . .हमारे पास आओ. . .तो चिन्हारी देखके समझे न कि तुम हो?”

आहो, ये बात है ख़ासी भोली-भाली ख्वाहिश है। मासूम इच्छा। पता नहीं कितने समय से यहां प्रेमियों में इसका रिवाज होगा।

“पहले अपने चिन्हारी दोर, मैं बोला।

“खोज लेव”, वह आहिस्ता से बोली और उठकर दीया बुझा दिया।

---

गेहूं में जिस दिन चौथा पानी लगाया गया उसी दिन रात में अचानक बादल घिर आये। रहमत परेशान हो गया। बोला, “पानी न बरसा चाही।”

मुझे भी जानकारी थी कि पानी बरस गया तो फसल बर्बाद हो जायेगी। लेकिन हमारे चाहने से क्या होता। रात में करीब दो बजे तेज़ बारिश शुरू हो गयी और सुबह चार बजे बोरा ओढ़े और फावड़ा लिए

रहमत आ गया। वह खेतों से पानी निकालने के लिए मेड़े काटने जा रहा था। मैं उसके मना करने के बाद भी उसके साथ बाहर निकला। रास्तों में पानी भरा था। जूते हाथ में ले लिए पजामा उड़स लिया और हम खेतों की तरफ बढ़े। अब भी हलकी-हलकी बारिश हो रही थी। पौ फटने का उजास फैल रहा था। खेतों में पानी भरा था। गेहूं की लहलहाती फसल सीने तक पानी में डूबी हुई देखकर मैं घबरा गया।

कोई एक घंटे तक रहमत मेड़ों को काटता रहा। लेकिन चूंकि यह ज़मीन धनही थी यहां धन लगाया जाता था इसलिए पानी के निकास का रास्ता न था। खेतों से मिला तालाब था और दूसरी तरफ ऊंची जमीन थीं दूर-दूर से पानी इधर आकर भर गया था। मुझे लगा कि पानी रोकने के लिए मेड़ तो पहले बनाई जानी चाहिए थी। रहमत का कहना था कि चार पांच गांव का पानी यहां जमा हो जाता है। मेड़ टूट जाती। यहां तो एक बड़ा नाला होना चाहिए जो इस पानी को आगे बड़े नाले तक जोड़ दे और नाला बनवाना आसान नहीं है। पता नहीं कितने किसानों की ज़मीन बीच में पड़ती है और फिर उस पर हज़ारों रुपयों का खर्च आयेगा सो अलग। बहरहाल, अब तो कुछ नहीं हो सकता। मैं छ: महीने की मेहनत, हज़ारों रुपयों और अनगिनत सपनों को पानी में तैरते देखता रहा।

“चौथा पानी न लगाया होता तब भी ठीक होता”, रहमत बोला।

“अब क्या हो सकता है. . .चलो वापस चलें।”

“अब भइया तगड़ी धूप निकल आये और पानी रुक जाये तो कुछ बात बन सकती है”, वह बोला।

पानी, धूप, पाला, कीड़ा. . .धूप निकलने का क्या महत्व है। कितनी ज़रूरी है धूप. . .और वह भी आज ही निकले। कहीं झड़ी लगी रही तो क्या होगा?

करीब ग्यारह बजे झड़ी रुकी लेकिन बादल छाये रहे। मैं यह अंदाज़ा लगाने की कोशिश करता रहा कि दस बीघे ज़मीन में लगाया गेहूं कितना बर्बाद हो गया। पैदावार कितनी होगी और आमदनी कितनी होगी। कितने हज़ार की खाद, बीज, ट्यूबवेल, डांगर की जोड़ी, हलवाहा. . .कुछ तस्वीर साफ नज़र नहीं आई।

इस बारिश से गांव के सब ही लोग दुखी थे। सोचते थे कि पानी बरसने के बाद कीड़ा लगने की संभावना बढ़ जाती है। मुझे यह ख्याल आया कि यार मैं तो पहली बार इस तनाव को झेल रहा हूं लेकिन ये लोग तो जीवनभर झेलते हैं। पीढ़ी दर पीढ़ी झेलते हैं और अगर कभी मिलता भी है तो क्या? यह ज़ाहिर है इनके रहन-सहन से दिल्ली में एक छोटे दुकानदार का जीवन कितना शानदार होता है उसकी तुलना तो यहां बड़े से बड़े सम्पन्न किसान से नहीं हो सकती। यह गांव अकेला नहीं है। पता नहीं सैकड़ों, हज़ारों, लाखों ऐसे गांव हैं, ऐसे लोग हैं, ऐसा जीवन है। इनके साथ समस्या क्या है? क्या पैदावार का सही दाम नहीं मिल पाता? क्या ये उस विशेष श्रेणी में नहीं आते जिन्हें 'राज्य` संरक्षण देता है? फिर ये खेती क्यों करते हैं? और क्या कर सकते हैं? और क्या जानते हैं? मतलब अगर कुछ और करने की सुविधा हो तो क्या ये लोग खेती नहीं करेंगे? क्या ये गांव छोड़ सकते हैं? क्या यहां के रहन-सहन से अलग हो सकते हैं? शायद नहीं या शायद हां।

---

तंग आकर शहर आ गया। अब्बा को मेरी परेशानी पता चली तो कहने लगे- “भई ये तो होता है। आज गरम तो कल नरम. . .खेती इसी का नाम है। देखो अल्लाह ने चाहा तो फायदा ही होगा।”

शहर में मेरे पहुंचते ही चौकड़ी जमा हो गयी। मिश्रा जी के व्यवहार से ये सब दुखी तो थे लेकिन संगठन में काम करने ओर उसकी ताकत पहचानकर खुश भी थे। कामरेड बली सिंह मछुआरों का संगठन बना रहे थे जिसमें उमाशंकर लग गया था। गरीब मछुआरे मछली पकड़ते थे और ठेकेदार उनसे कौड़ियों के भाव मछली खरीदकर कलकत्ता भेज देता था। होता तो यह था कि जब कलकत्ता से ठेकेदार को पैसा मिल जात था तब मछुआरों का भुगतान होता था। मछुआरों को भी कर्ज, उधर देकर बंधुआ बनाने की प्रथा बढ़ रही थी।

नदी के किनारे मछली ठेकेदारों में कभी-कभी “फौजदारी तक हो जाती हैं। सज्जन दादा शहर के सबसे बड़े मछली ठेकेदार हैं। लठैत उनके साथ रहते हैं, दो-चार बंदूकधारी आगे पीछे चलते हैं। ट्रक उनके अपने हैं। अफसरों, वकीलों से जान पहचान है। शहर में उनसे मुकाबला करने के बारे में कोई सोच भी नहीं सकता लेकिन जब बली सिंह ने पार्टी बैनर के साथ उन्हें ललकारा तो उमाशंकर को मज़ा आ गया। बली सिंह के पीछे पार्टी ही नहीं है उनकी अपनी भी ताकत है। ज़िले के बड़े ठाकुर परिवार से है। खानदान में दो दर्जन दोनाली हैं।

मछली वाले आंदोलन के साथ मुख्तार और कलूट को सिलाई मज़दूर यूनियन बनाने का काम सौंपा गया है। शहर में तीन-चार सौ सिलाई मज़दूर है जिन्हें बहुत कम मज़दूरी मिलती है। दुकान मालिक कहते हैं, छोटा-शहर है, लोग ज्यादा सिलाई दे नहीं सकते। मुख्त़ार कहता है, चीज़ों के दाम बढ़ जाते हैं तो शहर वाले दे देते हैं, सिलाई के नये रेट क्यों न देंगे? पिछले पन्द्रह साल से कौन-सी चीज़ है जिसके दाम नहीं बढ़े? सिलाई मज़दूर भी उन चीज़ों को खरीदता है तो जनाब उसकी मज़दूरी तो बढ़ नहीं रही। ख़र्चे बढ़ रहे हैं। आप क्या चाहते हैं वह मर जायें?

इन दोनों ने एक दिन में यूनियन के पचास मेंबर बना दिए तो मिश्रा जी चकरा गये। दरअसल जो कुछ हो रहा है उसका पूरा 'क्रेडिट` तो मिश्रा जी को ही मिल रहा है। अकेले में ताल ठोंकते रहते हैं। हर सप्ताह रिपोर्ट लखनऊ जाती है। वहां से वाह-वाही होती है। लखनऊ में कलूट और मुख्त़ार को कौन जानता है।

शहर का माहौल गर्माया हुआ है। नुक्कड़ बाज़ार का नाम लाल बाज़ार रख दिया गया है क्योंकि यहां के सभी दुकानदार पार्टी को चार आने महीने चंदा देते हैं और अपनी दुकानों पर लाल झण्डा लगाते हैं। मिश्रा जी लखनऊ से हंसिया हथौड़ा के 'बैज` ले आये हैं। कार्यकर्ता इन्हें अपने कुर्तों पर लगाते हैं।

(जारी क्रमश: अगले अंकों में....)

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रचनाकार: असग़र वजाहत का उपन्यास - गरजत बरसत (1)
असग़र वजाहत का उपन्यास - गरजत बरसत (1)
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