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कान्ति प्रकाश त्यागी की कविता - ऊषा

हास्य-व्यंग्य कविता

ऊषा

-डा० कान्ति प्रकाश त्यागी

दारोगा ने कड़क आवाज़ में

हवलदार को तलब किया ,

पंडित रामरतन को फ़ौरन

पकड़ने का हुकम दिया I


हुकुम मिलते ही रतनसिंह हवलदार ने

पंडित जी का दरवाज़ा खटखटाया ,

उनको गिरफ़्तार करने का ,

दारोगा का फ़रमान सुनाया I


आओ! रतन बेटा क्या बात है ?

घर पर तो सब ठीक ठाक है ,

गुरु जी ! आपको लेने आया हूँ ,

मज़बूरी में फ़र्ज़ निभाने आया हूँ I


मेरा कसूर !, कसूर तो सर जी बतायेंगे

हम तो केवल , पकड़ कर ले जायेंगे ,

पंडित जी को थाने लाया गया ,

दारोगा के सामने बुलाया गया I


पंडित जी ! आपके घर

के पास से गुज़र रहे थे ,

आप वहां जोर जोर से

किसके साथ चिल्ला रहे थे ?I


आप वहां क्या करते हैं ?.

क्या कोई धंधा चलाते हैं ?

माई बाप मैं, हिन्दी टीचर हूँ

बच्चों को हिन्दी पढ़ाता हूँ ,

अच्छी तरह समझाने के लिए,

साथ साथ कविता गाता हूँ I


सुनें, ज़रा एक कविता सुनाओ,

फ़िर उसका मतलब समझाओ I


यह है ऊषा की मंजुल लाली,

जो आधे घंटे को आती है I


फ़िर और उज़ाला होता है ,

यह उसमें घुलमिल जाती है I


अच्छा! यह है ऊषा की मंजुल लाली

जिसने, करा दी कितनों की ज़ेब खाली

यह तो सरासर धंधा है

बनाया लोगों को अंधा है I


अच्छा! आगे सुनाओ

बिलकुल मत घबराओ I


उषा लाई सुन्दर प्रभात ,

डोलने लगे तरु पात पात I


यह किसका लड़का है प्रभात ?.

जिसकी सुन्दरता ने मचाया उत्पात

उसके आने से तरु पात पात हो जाती है,

वह भी शायद उजाले में घुलमिल जाती है I


ऊषा, मंजुल, तरु, प्रभात और

पंडित जी को धर लो,

कम से कम इस महीने का

कोटा तो पूरा कर लो I


रतन सिंह बोला हुजूर !

गुरु जी को छोड़ दो ,

केवल दास की खातिर

अपने वसूल तोड़ दो I


नेक चलनी का सर्टिफ़िकेट ले लो ,

दक्षिणा ले कर इन्हें चलता कर दो I

मैं इनकी नेक चलनी का सर्टिफ़िकेट दूंगा ,

इनका शिष्य होने का फ़र्ज़ पूरा कर दूंगा I


ऊषा को मत पढ़ाइये ,

और आप चले जाइये I


क्या मैं संध्या में पढ़ा सकता हूँ ?.

पढ़ा कर घर का खर्च चला सकता हूँ I


संध्या भी फंसा रखी है ,

आपने आफ़त मचा रखी है I


जाइये! फ़िर देखेंगे

आप से फ़िर मिलेंगे।

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