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रचना श्रीवास्तव की कविताएँ : ऐ जी सुनते हो...



चंद कविताएँ

- रचना श्रीवास्तव

वो है मेरी माँ


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ख़ुद कष्ट सह के मुझ को जनम दिया जिस ने वो है मेरी माँ
पहला परिचय दुनिया से करवाया जिसने वो है मेरी माँ
रही गंदे में पड़ा उसका बच्चा कब वो देख सकती थी
सुला सूखे में मुझको ख़ुद गीले में सोती थी
लँगोट मेरी समय बे समय धोती थी
घिन कभी वो न करती थी
मेरी पहली मेहतरानी
थी वो मेरी माँ


भूख से पहले मिला खाने को मुझको
उसके हाथ से ही मिला हर निवाला मुझको
जो मैं चाहती थी बना देती थी
मुझको हर समय वो रसोई में खड़ी दिखती थी
पहला खाना मेरा बनाया जिसने वो थी मेरी माँ
नन्हें कदमों को चलना सिखाया
पहला शब्द हमें पढ़ाया ,
अच्छे बुरे का भेद बताया
हमको गीता कुरान सुनाया
बनी जो मेरी पहली शिक्षिका वो थी मेरी माँ


बीमार पडूँ तो लाख जतन करती थी
कभी अजवाइन का तेल मालती थी तो कभी हींग लगाती थी ,
कभी हल्दी का गरम दूध पिलाती थी
हाथ जोड़ मन्नतें मांगती थी
मेरी पहली वैद्य थी मेरी माँ
स्कूल से आने पर बहुत सी बातें होती थी
जो सारी माँ से कहनी होती थी
बचपन की वो छोटी खुशियां छोटे छोटे ग़म
जो माँ से साँझे करते थे हम
मेरी पहली दोस्त थी मेरी माँ


कर दे जो कोई चुगली मेरी ,
उस से खूब बहस करती थी
घर आ के मेरी भी बात सुनती थी
फिर क्या करूं क्या न करूं ,फैसला सुना देती थी
बनी जो पहली वकील और न्यायाधीश मेरी ,वो थी मेरी माँ
आँचल के साए तले में बड़ी होने लगी
जीवन में किस पथ जाऊं कौन सी राह अपनाऊं
बताती समझती रही मेरी माँ
जीवन को निर्देशित कर ,मुझको अच्छा भविष्य दिया
पहली निर्देशिका भी थी मेरी माँ


प्रारम्भ हुआ जीवन का सफर ,इस बड़े संसार में
थी उसकी प्रार्थनाओं साथ में
कि मालती रहेगी हाथ कठिनाइयां राह में
ईश्वर का वचन लगा उसके हर व्यवहार में
पाया जिस के रूप में भगवन मैंने वो है मेरी माँ
मेरा अस्तित्व मेरा प्यार
रग रग में बहता उसका दुलार
मेरी हर साँस पर जिसका अधिकार,
चरणों में जिसके मेरा संसार
वो है मेरी माँ केवल मेरी माँ

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एक कदम यूँ बढ़ाया मैंने...

कटुता की भावना की जो मिटा दिया मैंने
स्वयं में इंसानियत का जन्म होता पाया मैंने
प्यार की सरिता में जो बहती गई मैं
हरियाली चहुँ ओर फैलाया हमने
दुनिया की अच्छी बातें भी जान गई मैं
आंखों पर पड़ा परदा जो हटाया मैंने
उम्मीद का हाथ जो थामा लिया मैंने
एक नया सूरज हर ओर उगता पाया मैंने
किसी दिन आपने ने ही घर बनाया वहां पर

बिछी थी धरती पर जहाँ छाया मैंने
मन को अँधेरों ने जब भी घेरा कभी
नन्हा सा एक दिया आँगन में जलाया मैंने
सारी परेशानियाँ हाथ मलती रह गई
एक बार जो प्रार्थनाओं को हाथ उठाया मैंने
दिल में हो चाह तो सब कर सकते हैं हम
पंगु को भी गिरी लांघते देखा है मैंने
रास्ते बन गए स्वयं मंजिल दोस्तों
आपने पर कर विश्वास जो कदम बढ़ाया मैंने

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ऐ जी सुनते हो


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ऐ जी सुनती हो
मैं तुम से प्यार करती हूँ
पर कितना ,
ये तो नहीं जानती हूँ
चाहती हूँ पर इतना ,
की तुम्हारी बातों में मेरा जिक्र हो
तुम्हारी सोचो में ,
शामिल होना चाहती हूँ
क्या ये पागलपन है?


हाँ,,ये पागलपन ही तो है
के तुम से ये मैं क्या चाहती हूँ
पर क्या करुँ दिल ही तो है
तुम्हारी एक मुस्कान से ,
ये घर महकता है
प्यारी सी कोई बात
जो तुम कह के जाते हो
उसी के सहारे तो मेरा दिन बीतता है
कोई तुम को देखे तो बुरा लगता है
तुम करो किसी की तारीफ तो ,
दिल धड़कता है.
तुम पर शक करती नहीं मैं
स्वयं से ज्यादा तुम पर यकीन करती हूँ
फिर भी न जाने क्यों जलती हूँ


ये जलन ही,
शायद मेरे प्यार का रूप है
तू ही छाँव तू ही मेरे प्यार की धूप है
गले लग के तुझसे बहुत सुकून मिलता है
बांहों में तेरी जीवन का सुख मिलता है
मैं पतझड़ तू मेरा मधुमास है
तू ही मेरे जिंदा रहने का अहसास है
कभी ये करती हूँ
कभी वो करती हूँ
तुम्हारी चाहत के लिया न जाने क्या क्या करती हूँ
तुम जानते नहीं ,
तुम्हारे जाने के बाद ,
तुम को ही सोचती हूँ
तुम्हारी चीजों से तुम्हारी खुशबू लेती हूँ
तुम्हारे लिया न जाने क्या क्या सजाती हूँ
ऐ जी सुनते हो मैं तुम से प्यार करती हूँ
पर कितना ये नहीं जानती हूँ

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रचना श्रीवास्तव

रेडियो संचालक १६०० ऍम रेडियो
कवयित्री २००४ से अब तक, रेडियो सलाम नमस्ते और फ़नएइसिया पर कविता
पाठ, मंच संचालन

डेंटन टीएक्स, यूएसए

3 टिप्पणियाँ

  1. बेनामी8:57 pm

    i like all poem. but meri ma and ye ji sunte ho is very good
    thanks rachana

    जवाब देंहटाएं
  2. बेनामी9:04 pm

    hi rachana
    itne salal shabdon me itni payari aur gahri baat
    thanka

    juli

    जवाब देंहटाएं
  3. बेनामी10:58 pm

    rachana ji
    i love your poems.
    thanks
    antlika

    जवाब देंहटाएं

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