रचनाकार.ऑर्ग की विशाल लाइब्रेरी में मनपसंद रचनाकार अथवा रचनाएँ खोजें -
 नाका में प्रकाशनार्थ  रचनाएं इस पते पर ईमेल करें : rachanakar@gmail.com अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें.

संजीव कुमार की चंद कविताएँ

कविताएँ

-संजीव कुमार

उनकी याद

आज उनकी याद आई
आंसू भर आए आंखों में
फिर सोच में पड़. गया मैं
हमें भी याद करेंगी संतानें हमारी
आज हम कुछ ऐसा कर रहे हैं
जिससे कायम रहेगी आजादी हमारी।


आज तो देश का यह हाल है
ख्याल नहीं किसी को आजादी का
आज हम एक ऐसे चोर हैं
जो लूटते हैं अपने ही घर को
आज अपना हाल देख
आंसू भर आए आंखों में
क्षमा चाहता हूं उनसे
जिन्होंने हमें आजादी दी।


क्षमा कर सकते हैं मुझको वो
क्षमा कर नहीं सकता मैं खुद को
आजादी के नशे में इतना खो गया था मैं
याद नहीं रही आजादी की परिभाषा मुझको।

मुस्कुराना जरूरी है

डाक्टर ने कहा है
मुस्कुराना जरूरी है

ग़म में है हर आदमी
रोने से क्या होगा
ग़म में भी मुस्कुराएगा
तो ग़म भाग जाएगा।

सफलता असफलता
दो पहलू हैं ज़िन्दगी के
जो असफलता पर भी मुस्कुराएगा
वही सफल कहलाएगा।

समाज में अपनी जगह बनानी है
तो मिलो सभी से मुस्कुरा कर
सभी आपको चाहेंगे
यदि आप मुस्कुराएंगे।

क्यों फैला है भ्रष्टाचार

अपने मन में अक्सर सोचा करता हूं कई बार
अपने देश में ही क्यों फैला है इतना भ्रष्टाचार

नेता और अधिकारी सारे क्यों हैं मालामाल
मेहनत कश और मज़दूर देश का हो गया कंगाल
वीर सिपाही सीमा पर करता यही पुकार
अपने देश में ही क्यों फैला है इतना भ्रष्टाचार

अनेक धर्म हैं अनेक भाषाएँ फिर भी एक तिरंगा
हिन्दू और मुस्लिम के बीच में क्यों होता है दंगा
मैंने देखा इन्सानियत को बिकते बीच बाज़ार
अपने देश में ही क्यों फैला है इतना भ्रष्टाचार

कभी तो मानव जागेगा लिए बैठा यही आस
करेगा सो भरेगा तू क्यों है बब्बर उदास
साई कहते इस जग में मतलब का व्यवहार
अपने देश में ही क्यों फैला है इतना भ्रष्टाचार

ग्यारह बच्चे घर में हैं पर है जनगणना अधिकारी
औरों को शिक्षा देते कहां गई अकल तुम्हारी
झट से बले सब जायज. है यहां अपनी है सरकार
अपने देश में ही क्यों फैला है इतना भ्रष्टाचार

बचपन में पापा कहते थे ईश्वर भाग्य विधाता है
जन्म देने वाली मां से बढ़कर अपनी भारत माता है
आज ईमानदार और सत्यवादी बहुत हो चुका लाचार
अपने देश में ही क्यों फैला है इतना भ्रष्टाचार

अपाहिज मानव

यहां हर मानव अपाहिज है
मैं भी अपाहिज हूं
तुम भी।
यहां कोई गूंगा कोई बहरा
और कोई अंधा है।

कल शान्ति की इज्जत लुटी
शर्मा जी ने आंखें बंद कर लीं
वर्मा जी को कुछ सुनाई न दिया
और मैं कुछ बोल न सका।

जब प्रेम का गला दबाया गया था
तब भी ऐसा ही हुआ था।
यही नहीं
जब ईमान सरे आम लूटा गया था
तब भी हम कुछ न कर सके थे
क्यों कि अब हम

अपाहिज बन चुके हैं
ना अब हमें
किसी की चीखें सुनाई देती हैं
न किसी के आंसू दिखाई देते हैं ¸
और
न हम अन्याय के सामने
कुछ बोल सकते हैं।

आंधी

कल रात की आंधी ने
एक चिनगारी से
इस सुलगते हुए दिल
को जला डाला
जो राख बनी थी उसे
हवा ने उड़ा डाला।

कल तुमने अपने चमन से
एक भँवरे को भगा डाला
जो सिर्फ ग़म पीता था
उसे तूने जहर पिला डाला।
कल की आंधी ने मेरा
सब कुछ उड़ा डाला
जो कुछ मेरा था उसे
पड़ोसी के यहां पहुंचा डाला।

कल की आंधी ने
एक आदमी को
जानवर बना डाला और
उस जानवर को तूने जला डाला।

-------.

संपर्क:

संजीव कुमार

डी-108/, छतरपुर एक्सटेंशन

नई दिल्ली – 110074

3 टिप्पणियाँ

  1. संजीव कुमार ने
    चन्द कविताओं
    के ज़रिये
    यथार्थ को
    कल्पनात्मक
    भरे मिश्रित
    बन्ध में बुना.

    जवाब देंहटाएं
  2. बेनामी8:54 pm

    poems are good
    thanks

    जवाब देंहटाएं

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.