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विवेक श्रीवास्तव की कहानी : बातें


कहानी

बातें

-विवेक श्रीवास्तव

शाम के समय शहर के बीचों बीच इस इकलौते पार्क में जब लोग यहां तफरीह के लिए आते हैं। तो हर कोई कुछ न कुछ बयां करता है और सभी लोग दिन भर की थकान बातों की चुस्कियों से मिटाते हैं।

अरे भाई आज प्रेम जी नजर नहीं आ रहे हैं. तिवारी जी ने कहा। अरे प्रेम जी की छोड़िये साक्षात प्रेम देखिए सामने बेंच पर। शर्मा जी बोले। लो भाई गुजर गए अब हमारे दिन, अब तो लैला मजनूं की किलकारियाँ ही यहाँ गूंजेगी राघवराव जी के मुंह से ये वाक्य फूटते ही बुर्जुगों की टोली में बातों की बौछार शुरू हो गयी। तो भला जगतराम जी कैसे चुप रहते आखिर प्रोफेसर के तमगे की इज्जत नहीं चली जाती। कहने लगे कि अरे भाई मैं तो सिर्फ इतना कहूंगा कि पाश्चात्य सभ्यता हमारी संस्कृति को खोखला बना रही है। और उसी का एक रूप ये है। तभी पान की पीक जमीन पर उंडेलते हुए रमजान जी बोले - लो कर लो बात मियाँ आज बड़ी बड़ी बातें कर रहे है और परसों फैशन शो की फोटो देख कर ऐसे उड़ रहे थे कि मानो जवानी के टूटे पंख में फिर से जान आ गयी हो । जगतराम जी मुंह बिचकाते हुए माहौल को गरम करने जा ही रहे थे कि अभी कुछ ही दिन पहले टोली में शामिल हुए नए नवेले मिश्रा जी बात को सम्हालते हुए बोले - अजी छोड़िए क्यों हम सूखी नदिया में अपनी लुटिया डुबो रहे हैं। करने दीजिए जो करते है हमें क्या? उनकी इस बात पर जगतराम जी तुरन्त तुनक कर बोल पड़े तो क्या आप कहना चाहते हैं कि हम अपने बहू बेटियों को ऐसे ही खुला छोड़ दें कि जाओ बीच बाजार में रंगरलिया मनाओ। अरे भाई राघवराव जी ने भी झट से जवाब दिया आपको क्या लगता है ये किसी शरीफ घर की लड़की है पूरी की पूरी बाजारू दिख रही है। देख नहीं रहे कैसे उस लड़के के हाथों में हाथ फंसाए बैठी हुई है । तभी तिवारी जी बोले अजी छोड़िए इन सामाजिक बातों को लाइव शो का आनन्द उठाइए और घर जाइए। मिश्रा जी भी हंसते हुए उनकी हाँ में हाँ मिलाते हुए बोल पड़े बिल्कुल ठीक कहा तिवारी जी पर कुछ हो तब न आखें सेकी जाए। यहाँ तो सिर्फ बातें ही हो रही है। अरे भाई आखों के डाक्टर आप हैं, आप ही कोई युक्ति बताइए। तिवारी जी चुटकी लेते हुए बोले।

अब पार्क में नई घटना घट रही हो और मजनुओं का मजमा न लगे । वो भी उस जगह पर जहाँ कहानियाँ लिखी नहीं जाती फिर भी लोगों की पंसदीदा बन जाती है। जिसे लोग उतने ही चाव से सुनते है जितने चाव से उसे सुनाया जाता है। चमन भइया मजनुओं के गुट का होनहार नेता अपने सभी कार्यकर्ताओं के साथ खड़े खमोशी से नजारे की नजाकत को भांप रहे थे। कि तभी श्याम गुट के एक कर्मठ कार्यकर्ता ने ठिठोली लेते हुए कहा - चमन भइया मार्केट में नया खिलाड़ी आया है और आप चुप बैठे हैं। अरे भाई कभी कभी दूसरों को भी मौका देना चाहिए। चमन ने एक अच्छे नेता की भांति मौके की नाजाकत को समझते हुए कहा। तभी रवि ने बातों में गरमी लाने के लिए कहा - तो क्या भइया हम हाथ पर हाथ धरे बस तमाशा देखेंगे। चमन ने भी अपनी लाचारी को समटते हुए कहा अरे कुछ होने तो दो तब न हम कुछ करे। तभी श्याम ने आहें भरते हुए कहा - पर कुछ भी कहो भइया चिड़िया है एकदम सही । हाँ भइया लगता है नई नई आयी है इस शहर में रवि भी बोल उठा। श्याम ने बातों में और जोश भरते हुए कहा - हाँ बिल्कुल सही कहा साथ में दाना भी लाई है। जवाब में रवि ने भी झट मुहॅ खोल कर कहा कि चमन भइया कह दो कि एक दाने से पेट न भरे तो यहाँ पर और भी दाने खड़े है। आकर चोंच मार ले। अब चमन भाई ने भी अपना तर्क पेश किया। मुझे तो लगता है दोनों भाग के यहाँ आए है। अब नेता जी की बात से कार्यकर्ता कैसे नहीं सहमत होते। रवि ने भी हामी देते हुए कहा - हाँ भइया देखो तो लड़की कितनी डरी सहमी सी दिख रही है मानो कोई उसके सामने बन्दूक लेकर खड़ा हो कि हिली नहीं की गोली मार दी जाएगी।

लो ये भी आ गए। दूर से आते राजेश को देखते हुए श्याम जोर से चिल्लाया। पर ये वहाँ कहाँ जा रहा है। रवि ने भी आंख मिचकाते हुए कहा। अरे भाई जब सामने हो लड़की तो दोस्तों की किसको है पड़ी। लगता है पुरानी जान पहचान है तभी तो प्यार से इमरती खिलाया जा रहा है। चमन भइया से भी अब न रहा गया कमीज की बॉह को उपर उठाते हुए उन्होंने झट से कहा अब तो चलना ही पड़ेगा। नेता जी की शह पर भला कार्यकर्ता कहाँ चुप बैठने वाले थे फट से हो लिए उनके पीछे। और बेंच के करीब पहुंच कर श्याम ने फट से राजेश से कहा अकेले ही अकेले इमरती खाओगे की हमें भी थोड़ा रस चखओगे। अरे क्यो नही श्याम लो तुम भी खाओ एक इमरती श्याम के हाथ में देते हुए राजेश बोला। और साथ ही पास खड़े चमन से बोला अरे चमन भाई इनसे मिलो ये है मेरे मामा के लडके माधव और ये इनकी छोटी बहन माधवी। बेचारे जन्म से ही दोनों अन्धे हैं। आज ही गांव से यहाँ आए है वो अपने मिश्रा जी है न आखों के डाक्टर उन्हीं से इलाज करवाने के लिए। खुली हवा में बैठने को कह रहे थे तो मैंने सोचा हमारे पार्क से बढ़िया जगह कौन सी हो सकती है। और फिर शहर के बड़े बड़े लोग यहाँ आते है उनकी बातें सुनेंगे तो इनका भी मन बहल जाएगा। क्यों भइया

ठीक कहा न ......

समाप्त

(चित्र - काकोली सेन की कलाकृति)

1 टिप्पणियाँ

  1. -विवेक श्रीवास्तव जी अचछी कहानी लिखी है। हमारा समाज औरत काे मान नहीं देना चाहता। इसी का परिणाम हॊती हैं बातें। सारवजनिक जगह पर किसी आदमी के साथ देखा नहीं कि हॊने लगी तमाम तरह की बातें।

    Om Prakash Tiwari
    Jlandhar
    op.tiwari16@gmail.com

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