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गौतम राजऋषि की दो कविताएँ


कविताएँ

-गौतम राजऋषि

(1)

रुला-रुला-सा जाये हरदम

ये अंतर तेरा और मेरा

तु संध्या-तारा विशाल व्योम की

धूमिल होता मैं एक सवेरा

पागलपन की हद को लांघती

तेरे लिये ये चाहत मेरी

तु निर्विकार-सी उदासीन-सी

कुछ न कहना आदत तेरी

तुझको सोचूं तुझको ही देखूं

हर लम्हा जो बीता जाये

इस अल्हड़ दीवाने कि क्या

तुझे कभी न याद सताये

तेरी प्रतीक्षा करते-करते

बीत न जाये उम्र ये सारी

तुझ बिन जीने की त्रासदी

प्रलय समान अवसाद भारी

तस्वीर तेरी ही सामने आये

जब भी लूं ये आंखें मूंद

तेरा सामीप्य तेरा स्पर्श

और तेरी उसीहांकी गूंज

कितना कुछ कहना चाहकर भी

वाणी मेरी गुमसुम ही रहती

और तु कहकर इतना सब

फिर भी मानो कुछ ना कहती

कब तक यूं ही रोते रहेंगे

तू उधर और इधर मैं

आ भी जाओ छोड़ के सब

अब साथ रहने मेरे घर में

----

[2]

उलझनें कुछ शेष है अब तक

इतना सब होने के बाद भी

दबी-छुपी-सी चाहत तेरी

और निष्ठा मेरी अपवाद सी

विकल व्याकुल मन की वेदना

तू कभी जो देख ले आकर

सुकून मिल जाये इस बेचैनी को

शिकवा रहे न कोई सारी उमर

उस शाम जब हम मिले थे

और थामा था तूने मेरे हाथ को

खुश्बू वो उतरी नहीं अब तक

मन भूला नहीं उस बात को

वो अनूठी बातें वो सौम्य स्पर्श

और वो स्वप्न समान तेरी नजदीकी

व्योम में उड़ता हुआ मन मेरा

प्रफुल्लित होती मेरी जिंदगी

तुझको सोचना और रोते रहना

बन गयी है अब तो आदत-सी

कुछ कहे पागलपन इसको

और कुछ मुहब्बत भी

समझ लो ना इस खामोशी को

मन गुमसुम जो कहता जाये

कब तक चुप रहेंगे दोनों

कि दर्द हद से बढ़ता जाये

जी तो लेंगे यूं तेरे बगैर भी

चाहे जो भी हो जीने का अंजाम

बस एक तेरी उसहांपर ही

निकल जायेगी ये उम्र तमाम

(चित्र - कृष्णकुमार अजनबी की कलाकृति.)

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