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मधु सन्धु का आलेख : घरेलू हिंसा - कहानी के दायरे में

आलेख

 

घरेलू हिंसा : कहानी के दायरे में

-डॉ0 मधु सन्धु

उसने स्कूल-कालेज की दौड़ में प्राथमिकताएं हासिल की। अर्थतंत्र में भागीदारी निभाई। ज्ञान-विज्ञान की बुलंदियों का स्पर्श किया। राजसत्ता की राजनीतियों में छलांग लगाई। बड़े-बड़ों के छक्के छुड़ाए। लेकिन पुरुष सत्ता की देन घरेलू हिंसा ने उसका पीछा नहीं छोड़ा। पारिवारिक आदर्श, सामाजिक नियम, राजनैतिक कानून, धार्मिक नैतिकता सब नितान्त बौने एवं व्यर्थ रहे और आधी दुनिया बर्बरताओं की शिकार होती रही। घरेलू हिंसा के उत्पीडन की प्रेतच्छाया उसे जकड़े रही। कहते हैं कि सुरक्षित घर और सुरक्षित परिवार एक सुरक्षित और सभ्य समाज की नींव रखते हैं, पर घर-गृहस्थ ने औरत को कभी सुरक्षा नहीं दी । घर-गृहस्थ उसकी मजबूरी है। घरेलू हिंसा का सामाजिक या आर्थिक स्तर से कोई लेना देना नहीं। यह किसी भी वय, जाति, देश, आयवर्ग, धर्म में घटित हो सकती है। शिक्षित, अर्ध शिक्षित या अशिक्षित परिवारों में कहीं भी इसे देखा जा सकता है। ग्राम्य या शहराती, सुसंस्कृत या असंस्कृत की कोई सीमा रेखा यहां नहीं है।

घरेलू हिंसा एक अभिशाप है। इसके लिए Partner Abuse, Spoose Abuse जैसे शब्द भी प्रचलित हैं। इसमें शारीरिक उत्पीड़न, भावात्मक निराशा तथा सामाजिक एकाकीपन- सभी सम्मिश्रित हैं। बिल क्लिंटन की संसद ने 1994 में Violence Against Women एक्ट पारित किया। इक्कीसवीं शताब्दी के प्रगति लक्ष्यों में तृतीय लक्ष्य नारी उत्पीड़न का खात्मा है। जिसकी उदघोषणा 2000 में The Millennium Development Goals (MDL) द्वारा लैंगिक समानता और नारी सशक्तिकरण की समृद्धि के अंतर्गत की गई। अमेरिकन एकेडेमी ऑफ फेमिली डाक्टरज की अप्रेल 2005 की रिपोर्ट के अनुसार अमेरिका में हर वर्ष दो मिलियन स्त्रियां घरेलू हिंसा की शिकार होती हैं। वहां The National Domestic Violence Hotline है, जहां शिकायतें भी दर्ज करवाई जा सकती हैं और हॉट लाइन के वकीलों द्वारा सुझाव भी लिए जा सकते हैं। The National Domestic Violence Hotline ने तो 2017 तक घरेलू हिंसा का समूल उन्मूलन करने की घोषणा भी की है। Goodsearch.com भी घरेलू हिंसा के खिलाफ बनाई गई वेब साईट है। वहां तो 13 से अठारह वर्षीय किशोरों के लिए New national teen dating abuse helpline भी है।

घरेलू हिंसा हमारे सामने उस परिवार का चित्रा अंकित करती है, जहां पति-पत्नी संबंध शिकार और शिकारी जैसे हैं। जर्मन अनुसंधानकर्ताओं के अनुसार घरेलू हिंसा या उत्पीड़न की शुरूआत वैवाहिक संबंधों में एक दूसरे को नीचा दिखाने या शर्मिंदा करने से होती है। मनोविशेषज्ञ गिजेला ड्रेयर जीवन साथी द्वारा मिलने वाले अपमान की परिणति ही शारीरिक हिंसा मानते हैं। मनीषा लिखती है, ''पति स्त्री देह को शक्ति प्रर्दशन का सुलभ क्षेत्रा मानता है। दुनिया के हर देश, सम्प्रदाय, भाषा एवं जाति के मर्द अपनी पत्नियों को पीटने में अव्वल हैं, इसलिए पढी लिखी सम्पन्न औरत हो या गरीब श्रमिक- सबके पति लात-घूँसे चलाने के मौके तलाशते रहते हैं।.-दुनिया की पचहत्तर प्रतिशत औरतें अपने पति के हाथों कभी न कभी पिटी अवश्य हैं। --- अमेरिकी समाज से बेहद प्रभावित लोगों को आश्चर्य होगा कि वहां की तीस प्रतिशत औरतें मार पीट की शिकायत करती हैं। ग्यारह प्रतिशत औरतें तो गर्भावस्था में पति द्वारा सताई जाती हैं। हमारे यहाँ भी सोलह प्रतिशत औरतें गर्भावस्था के दौरान पिटाई के कारण मर जाती हैं।--- इंटरनेशनल सेंटर फॉर रिसर्च ऑन वुमैन नाम की संस्था का मानना है कि घरेलू हिंसा से जितनी औरतें दुनिया भर में मरती हैं, उतनी तो कैंसर से भी नहीं मरती।''

घरेलू हिंसा की पूरी जानकारी न मिलने के कारण इसका ऑंकड़ों के आधार पर अध्ययन नहीं किया जा सकता। भारत में 70 प्रतिशत स्त्रियां किसी न किसी रूप में घरेलू हिंसा की शिकार हैं। भले ही शिकायत की दर केवल एक प्रतिशत है। भारत में इंडियन पेनल कोड की धारा 498 के अंतर्गत 1983 में घरेलू हिंसा को अपराध के घेरे में लिया गया। आठ मई, 2007, गुरुवार से घरेलू हिंसा निषेध से सम्बद्ध कानून लागू हो गया। इसके अनुसार पत्नी या फिर बिना विवाह किसी पुरुष के साथ रह रही महिला मारपीट, यौन शोषण, आर्थिक शोषण या फिर अपमानजनक भाषा के प्रयोग के हालात में शिकायत कर सकती है और सम्बद्ध पुरुष को कानून का उल्लंघन करने की स्थिति में जेल के साथ-साथ जुर्माना भी हो सकता है। मामले का फैसला मैजिस्ट्रेट को साठ दिन के भीतर करना होगा। यानी घरेलू हिंसा बिल वह बिल है जो स्त्री को घरेलू रिश्तों में सुरक्षा प्रधान करता है। एक बार तो लगा कि बात- बात पर पत्नियों को अपनी कुंठाओं का शिकार बनाने वाले पुरुष सुधर जाएंगे। महिला और बाल विकास मंत्री रेणुका चौधरी का कहना है कि घरेलू हिंसा के नाम पर महिलाओं के साथ जो कुछ हो रहा है, उसे गम्भीरता से लिया जाना जरूरी है। यह कानून महिलाओं को घरेलू हिंसा से निश्चय ही बचाएगा। महिलाएं नितान्त खतरनाक परिस्थितियों में जीने के लिए बाध्य हैं। अगर यह कानून आक्रामक है तो इसे महिलाओं को जिंदा जलाने या अन्य तरीकों से प्रताड़ित करने की दुर्घटनाओं के परिप्रेक्ष्य में देखा जाना चाहिए। ऑंकड़ों के अनुसार घरेलू हिंसा के 34 प्रतिशत मामलों में थप्पड़ मारा जाता है, जबकि घसीटना, लात मारना, पीटना, बाल ,खींचना घरेलू हिंसा के अन्य प्रमुख रूप हैं।

घरेलू हिंसा नारी उत्पीड़न का चरम है। अग्नि परीक्षाएं लेने वाले, जुए में हारने वाले, आपस में मिल-बांटने वाले, शादी की अंगूठी पहना राज दरबारों में गुम हो जाने वाले देव पुरुष, राजाधिराज, स्वामी, मालिक इस देश के आराध्य हैं। उन्हें तो सौ खून भी माफ हैं। कहानी का संदर्भ लें तो नारी उत्पीड़न के चित्रा सामाजिक चेतना के कहानीकार प्रेमचन्द (सुभागी), प्रेम, सौन्दर्य, वेदना के कहानीकार जयशंकरप्रसाद (चूड़ीवाली), मार्क्सवादी कहानीकार यशपाल (करवा का व्रत), मनोविश्लेषणवादी जैनेन्द्र, अज्ञेय (पत्नी, गेग्रीन) आदि में मिल जाते हैं । नए कहानीकारों ने भी नारी उत्पीड़न के अनेक पहलू दिए हैं। कमलेश्वर की राजा निरबंसिया, देवा की मां, मन्नू भण्डारी की बंद दराजों का साथ, अकेली आदि ढेरों उदाहरण खोजे जा सकते हैं। ममता कालिया की रायवाली में पत्नी को ढोल की तरह पीटा जाता है। स्वदेश दीपक की बनी-ठनी में पति पत्नी की जांघ पर तेजाब डाल देता है। दीपक शर्मा की माफी जमीन में पति ने डाक्टर पत्नी का जीना हराम कर रखा है।

घरेलू हिंसा नारी उत्पीड़न का घोर पाश्विक रूप है। बाघ और बकरी सी स्थिति है। बंद दरवाजों के पीछे की इस पाश्विकता से मुक्ति आज पूरे भूमण्डल की चिन्ता है। चिन्तक कहते हैं कि इक्कीसवीं शती घरेलू हिंसा के लिए चुन्नौती की सदी है। यहां मुख्य लक्ष्य इस अभिशाप से मुक्ति पाना है। मैं यहां 2001 से आज तक की कुछ कहानियों का संदर्भ ले इनमें आए घरेलू हिंसा के भिन्न त्रासद रूप अनावृत करने जा रही हूँ।

युगों से पुरुष घर के बाहर जाता रहा है और औरत ने कभी उस पर शक करने के एकाधिकार का प्रयोग, उपयोग, दुरुपयोग नहीं किया। उस पर कभी आरोप नहीं लगाए। नगर वधुओं के यहां, वेश्याओं और काल गर्ल्ज के यहां जाते रहने वाले पुरुषों का यौन शुचिता को लेकर जब तब घरेलू दंगल के बहाने ढूंढना, बौखलाना, औरत का जीना हराम करना- उनकी कुंठाओं के ज्वलंत प्रमाण हैं। रजनी गुप्त की कठघरा[1] में कामकाजी औरत इन्हीं यक्ष प्रश्नों से घिरी पड़ी है। पता नहीं कितने दिनों से वह उस काल कोठरी में सिसकती, सुबकती, चीखती- चिल्लाती, रोती, कलपती पड़ी है। वह दहाड़ रहा है। शेर की तरह गुर्रा रहा है। चीते की तरह दबे पांव वार कर रहा है। पटक पटक कर फेंक रहा है। हथेलियां मरोड़ता है। तर्जनी की हड्डी तोड़ देता हैं। पुलिसियों की तरह यातनाएं देता हुआ कबूले जुर्म करवाना चाहता है- ''तूँ साफ साफ क्यों नहीं बताती हरामजादी ? बोल तेरे साथ उसका लफड़ा किस स्टेज का था।......उसके होंठों के भीतर जबरन अपनी उंगली घुसेड़ते हुए वह गुर्राने लगा।......बता न क्या-क्या ऐश काटे तूने उस कमीने के संग ?.........ऐ कुतिया, तुझे किस बात का घमंड है ? बोल न.........अपनी उस दो टके की नौकरी का, जिसपर मैं थूकता हूँ।..........अकबकाई स्त्री आंखें फाड़े उसे बिटर-बिटर ताकती रही। डर और दहशत के मारे जुबान अकड़ गई और थरथराती देह को मानों लकवा मार गया। कड़कड़ाती ठंड के बावजूद पसीने से भीग गई।''[1] अपराध सिर्फ इतना है कि स्त्री ने प्रेम कविता लिखी है। कुलीग को फोन किया है। कविता तो पुरुषष् भी लिखता है, फोन वह भी कर ही लेता है, लेकिन पल भर में स्त्री को अपराधिन घोषित करके उसे कटघरे में खड़ा कर दिया जाता है। उसे अग्नि परीक्षाओं के लिए विवश किया जाता है। पुरुष ज्वालामुखी बन आग के गोले फेंकने से कभी नहीं चूकता। कहानी कहती है कि घर के कटघरे में स्त्री पुरुष रूपी हिंस्र जानवर के सामने बिलकुल अकेली है।

उर्मिला शिरीष की शहर में अकेली लड़की[1] की दीदी के विवाह को आठ वर्ष हो चुके हैं। मानों आठ वर्ष से समय रक्त पिपासु हो चुका है। इनका एक एक दिन उस पर पाले की तरह भारी पड़ा है। छोटी बहन को बताती है-'' उसने गुस्से में चाकू फेर दिया था। मैंने बचाव के लिए चक्का मार दिया था। उसने भी मुझे चक्का मारा तो मेरा सिर दीवार से जा टकराया। पांच टांके आए। पता नहीं कितना खून बह गया था। एक बार चाकू से मारना चाहता था तब मैं छत पर जाकर छुप गई थी टंकी में। पूरा घर परेशान---सुबह उतर कर आई थी। मैंने किसी से आज तक नहीं बताया। पूरा घर चिक चिक करता रहता था, तब मैंने गले में रस्सी लटका ली थी। हल्का सा झटका लग गया था, मुझे लगा आंखें घूम गई हैं और मैं मौत से रू ब रू होकर लौटी हूँ। पूरा घर सतर्क कि मर गई तो सब को जेल हो जाएगी----- हर रोज तमाशे होते थे। उसने डिलीवरी के दिन जरा सी बात पर चाँटा मार दिया था।''[1] यह पति पुरुष पत्नी के पिता को रात रात भर फोन पर धमकियां देता रहता है। पापा और अविवाहित शहर में अकेली रहने वाली छोटी बहन के घर जा उन्हें गालियां देता है। घरेलू हिंसा कदाचित पति पत्नी का आपसी या अंदरूनी मामला नहीं। घरेलू हिंसा से मनुष्य का रिश्तों की पवित्रता से विश्वास उठ जाता है। जवान हो रही लड़कियों के सपने चूर-चूर हो जाते हैं।

पति परमेश्वरों की समझ में आ ही नहीं रहा कि औरत सिर्फ शरीर नहीं है। गोविंद मिश्र की कोशिश[1] का पुजारी पति युवागुरु पत्नी के पर-पुरुष संबंधों की कल्पना नए नए ढंगों से करता है। वह पत्नी को मां बाप के सामने सीढ़ियों से घसीटते हुए उसे कुलछनी होने के कारण घर से निकलने को कहता है और फिर इसे पति-पत्नी का सामान्य झगड़ा कह कर टाल देता है। एक साल बाद वह एक और ढोंग रचता है। वह अपने में मृत भाई सत्येन्द्र तिवारी की आत्मा आने का पाखण्ड रचते हुए कहता है, ''मैं सत्येन्द्र तिवारी बोल रहा हूँ। इस घर में जो औरत है , उसके पर पुरुष संबंध हैं। तुम लोग नहीं देखते, मैं अमर हूँ। इसलिए मुझे सब दिखाई देता है।... अगर सुरक्षा चाहिए तो उसे निष्कासित करो।''[1] मानों यह ढोंगी पति भूत सवार होना मुहावरे को ही क्रियान्वित कर रहा है। पति चाहे घर्मगुरु हो या पुजारी- पत्नी को सबक सिखाने के लिए वह टुच्चे से टुच्चा हर काम कर सकता है। पत्नी रात बच्चे को लेकर होटल में रहती है। सुबह वहीं से उठकर दोनों स्कूल चले जाते हैं। शाम को वह उसी घर में लौटने के लिए अभिशप्त है, जहां से उसे बार-बार निकाला जाता है। अविनाश की गुरुदेव[1] में गुरुदेव के मोबाइल पर किसी लड़की का अश्लील एस0 एम0 एस0 पढ़ कर पत्नी सवाल-जवाब क्या करती है कि पति उसे पीट-पीट कर पूरे छह महीने के लिए अस्पताल भेज देता है। उस हादसे के बाद पत्नी ऐसी खामोश होती है कि उसकी खामोशी जीवन भर नहीं टूटती। यानी घरेलू हिंसा द्वारा घर के भीतर आतंकवाद फैलाकर पुरुष निधड़क होकर अपनी मनमानियों और अनैतिकताओं के चोर दरवाजे खोलते हैं।

एक रूमानी अवधारणा है कि औरत पुरुष/ पति का इन्तजार करती है और एक यथार्थ सत्य है कि पुरुष का गृह प्रवेश ही घरेलू हिंसा की दानवीयता के साथ होता है। अनामिका भट्ट की डूबता सूरज[1] में जब तक पति हीरालाल शहर में था, मेहनत मजदूरी करके परिवार का पालन करने वाली कपूरी सुखी थी, बच्चे प्रसन्न थे। बेटा रमेश गांव के बाद शहर के स्कूल में पढ़ने लगा था, लेकिन जैसे ही हीरालाल शहर से गांव आता है, जीवन सूत्र बिखर जाते हैं। वह बच्चे की पढ़ाई छुड़ाता है, आड़े वक्त पत्नी के काम आने वाले बुजुर्ग को अपमानित करता है, मारना पीटना तो उसका क्षेत्राधिकार है। कहता है,''यह कपूरी तो औरत जात है, कमअकली... साली, तेरे बाप ने कभी पढ़ाई करी है, जो तूँ अपनी औलाद पढ़ाएगी.... साली, तेरी जैसी औरतों को ठीक करना हीरालाल को खूब आता है।...... कहते कहते हीरालाल ने कपूरी को पांच छह थप्पड़ रसीद कर दिए।''[1]

घरेलू हिंसा की कहानियां कहती हैं कि पुरुष अगर पति है तो इन्सान हो ही नहीं सकता । शहराती- ग्रामीण, स्वस्थ- अपाहिज, शिक्षित- अशिक्षित, स्वदेशी- विदेशी- सब एक ही थैले के चट्टे- बट्टे हैं। मंदबुध्दि, नपुंसक, अपाहिज, नेत्रहीन पुरुष भी पति का चोला पहनते ही आपे में नहीं रहते। पत्नी को मारना है और जान से मारना है तथा ऐसे मारना है कि हत्या का सुराग तक न मिले- यह सब उसके क्षेत्राधिकार में आता है। दीपक शर्मा की कुन्जी[1] कहानी में पुत्रा मां की मृत्यु के उनचास वर्ष बाद उसकी हत्या की दुर्घटना परामनोविज्ञान द्वारा याद कर रहा है। माँ सुकंठी अंधे संगीतकार नाना की इकलौती संतान थी। बेटी को संगीत में पारंगत बनाने के पश्चात नाना ने अपने एक अंधे शिष्य से उसकी शादी करके उसे घर जमाई बना लिया। नाना की मृत्यु के साथ ही पिता ने माँ से रुपयों वाली अलमारी की कुंजी मांगनी शुरू कर दी। पति की पैसे की भूख पहचानने वाली पत्नी जानती थी कि कुंजी मिलते ही पति उसे मार डालेगा, इसीलिए वह कुंजी नहीं देती। अंधे पिता अंधी मां की सचमुच पैसों के लिए हत्या कर देते हैं।

मुशर्रफ आलम जौकी की शाही गुलदान[1] मुस्लिम संस्कृति के संदर्भ में हर आदमी के अंदर बैठे क्रूर तानाशाह शासक के उस वहशीपन की कहानी है, जो मजाक भी करे तो औरत के प्राण नाखूनों तक आ जाएं ।नायक पत्नी फरहीन को मजाक में तलाक कहकर अंदर तक लहूलुहान कर देता है। फरहीन जानती है कि शादीशुदा औरतों के लिए इससे बड़ी गाली नहीं बनी। यह मौत से भी बड़ी गाली है। एह वह देश है कि जहां अगर कोई माडल पत्नी को पीटता या तलाक लेता है, तो उसके द्वारा विज्ञापित प्राडक्ट फेल हो जाती है। पति दूसरी बार शराब के नशे में तलाक तलाक तलाक कहता है और पिता अपने शरीयती ईमानों के कारण इसे घरेलू झगड़ा न रहने देकर मजहब का, इमाम का मामला बनाना चाहते हैं।

शिरोमणि महत्तो की दारू[1] की गंध अनमेल विवाह के संदर्भ में स्त्री को मिलने वाली शारीरिक और मानसिक यंत्रणाएं लिए है। मास्टर पति शराब पीकर पच्चीस -तीस साल छोटी पत्नी की पिटाई करता है और मास्टर की मां उस पर झाड़ू ही नहीं चलाती, उसे घर से भी निकाल बाहर करती है। दारू बेच कर वह गुजारा करने लगती है तो लांछन उसे घेर लेते हैं। यहां तक कि बेटा भी उसे घृणा भरी ऑंखों से देखता है और वह सोचती है कि क्या जवान हो रहे बेटे को भी सतीत्व की अग्नि परीक्षा देनी होगी।

भारतीय दंड संहिता की धारा 315-316 के अनुसार भ्रूण हत्या कानूनन अपराध है। फिर भी इस देश में प्रति वर्ष 20 लाख से अधिक मादा भ्रूण हत्याएं होती है। यह कार्य छुप-छुपा कर तो हो ही रहा है, कई स्थलों पर इसके लिए बोर्ड भी लटक रहे हैं। इस हिंसा से मादा का जन्म से पूर्व का संबंध है। सक्षम पुरुष वैसे तो हिंसा क्षेत्र का सबसे बड़ा खिलाड़ी है। कई जगह वह अपनी चुप्पी द्वारा भी घरेलू हिंसा का कत्ल का समर्थन कर रहा है। लड़की के पास जन्म लेने का अधिकार भी नहीं है। पूनम सिंह की भंवर[1] की सास उमा तिवारी सामाजिक कार्यकर्ता तथा गर्ल्स स्कूल की प्रिंसिपल है। यह सास भी बहू की अल्ट्रा साउंड की रिपोर्ट में दो जुड़वां बच्चियों का समाचार सुन बौखला उठती हैं । डाक्टर से कहती है,'' दो दो लक्ष्मियों को मैं कहाँ स्थापित करूंगी डाक्टर। मुझे गणेश कार्तिक की पूजा करनी है। लक्ष्मी में प्राण प्रतिष्ठा आप न कराएं प्लीज।'' वह देश जहां हर शहर के अस्पताल के बाहर लिखा हो- 299 रुपए में सुरक्षित गर्भपात, वहां हत्यायें और भी आसान हो जाती हैं। यही कारण है कि आज भारत का लैंगिक अनुपात लगातार डगमगा रहा हैं । 10 दिसम्बर 2007 के दैनिक भास्कर के अनुसार आंकड़ा 1000 लड़कों के पीछे 798 लड़कियों का है।

यह टेक्नालाजी का जमाना है। औरतें टेक्नालाजी समझ भी रही हैं और उसे एन्जाय भी कर रही हैं, उसका उपयोग और उपभोग दोनों कर रही हैं। सच्चाई यह है कि वे चाहे सातवें आसमान को छू लें, लेकिन मौज मस्ती उनकी हस्त रेखाओं में है ही नहीं। शमोएल अहमद की अनकबूत[1] साइबर क्राइम और साइबर नैतिकता के घिनौने चेहरे को अनावृत करते हुए स्त्री पुरुष यानी पति पत्नी की घरेलू स्थिति स्पष्ट करती है। साइबर नैतिकता में भी कबूले-जुर्म औरत द्वारा ही करवाया जाता है। प्रेमचंद की शतरंज के खिलाड़ी की तरह यहां भी चुस्त चालाक पत्नी थोड़ी बहुत चालाकी के साथ कम्प्यूटर पर यहां वहां चैट कर रहे (मुँह मार रहे) पुरुष को बाहर का रास्ता दिखा देती है और वह साइबर कैफे में याहू मैसेन्जर के वीरान किलों में अपने चैटिंग के खेलों की महफिल सजा लेता हैं। वह टाइगर वुड नाम से साईबर संस्कृति में छलांग लगा शकीला, खुशबू गुमनाम, माधुरी, ब्यूटी इन चेन आदि के यौन सम्पर्क में आता है। लेकिन जैसे ही उसे पता चलता है कि ब्यूटी इन चेन और कोई नहीं उसकी अपनी पत्नी नजमा ही थी, वह गुस्से से काँपने लगता है। सचमुच का चीता बन उस पर झपट पड़ता है। क्योंकि वह जानता है कि हर मौज-मस्ती पुरुष के लिए ही बनी है। लातें, धूँसे - घरेलू हिंसा पुरुष के क्षेत्राधिकार में धुसपैठ करने वाली स्त्री की नियति है।

घरेलू हिंसा की कानूनी सुनवाई हो ही नहीं सकती। कानून चश्मदीद गवाह चाहता है। सबूत मांगता है। घरेलू हिंसा औरत का कद छोटा कर देती है। जिसे घर में इज्जत नहीं मिली, उसे बाहर कौन सम्मान देगा ? वह मिटती-पिटती रहेगी, पर अत्याचारों का घुऑं तक बाहर निकलने नहीं देगी। औरतें पूरा जीवन इसी आस में बिता देती हैं कि यह सुधर जाएगा। शायद वे उस चमत्कार की प्रतीक्षा में रहती हैं, जो कभी घटित हो ही नहीं सकता।

पुरुष चाहे चार-चार शादियां करे, वेश्याओं के चक्कर लगाये या विवाहेतर प्रेम के लिए इधर-उधर मुँह मारता रहे- न कोई पत्नी उसकी खबर ले सकती है, न परिवार उसे कोसता है और न समाज बहिष्कृत करता है।

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