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योगेन्द्र कृष्णा की कविताएं हिंदी काव्य-परंपरा में नया अध्याय जोड़ती हैं : अरुण कमल

योगेन्द्र कृष्णा के काव्य संकलन 'बीत चुके शहर में' का लोकार्पण

 

पिछले दिनों प्रलेस के तत्वावधान में माध्यमिक शिक्षक संघ सभागार, पटना में संवाद प्रकाशन, मुंबई से प्रकाशित योगेन्द्र कृष्णा के काव्य-संकलन बीत चुके शहर में का लोकार्पण चर्चित वरिष्ठ कवि अरुण कमल के द्वारा किया गया. समारोह की अध्यक्षता समकालीन जनमत के प्रधान संपादक रामजी राय ने की. उनकी प्रतिनिधि कविताओं पर समालोचनात्मक टिप्पणी करते हुए अरुण कमल ने अपने वक्तव्य में कहा कि योगेन्द्र कृष्णा की कविताएं संपूर्ण हिंदी काव्य-परंपरा में एक नया अध्याय जोड़ती हैं. उन्होंने कहा कि बीत चुके शहर में की कविताओं में आज का हिंसक होता सामाजिक परिदृश्य एक नए मुहावरे में उजागर हुआ है.

आयोजन की शुरुआत करते हुए कवि शहंशाह आलम ने कहा कि योगेन्द्र कृष्णा के इस रचनात्मक साहस को वे सलाम करते हैं.

इस अवसर पर समीक्षक ओम निश्चल ने पुस्तक की अंतर्वस्तु पर विस्तार से चर्चा करते हुए कहा कि आठवें दशक से ही बिहार का काव्य-परिदृश्य काफी समृद्ध हुआ है. पुस्तक में संकलित कविताओं की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि इनकी कई कविताएं मूल्यों के टूटने का दर्द बयान करते हुए वर्तमान समय को रूपांतरित करती हैं. यथार्थ को बुनने का उनका एक अपना तरीका है. वे नेपथ्य की गतिविधियों को संजीदगी से दर्ज करते हैं. उन्होंने कवि की सुबह के पक्ष में, हत्यारे जब बुद्धिजीवी होते हैं, हत्यारे जब मसीहा होते हैं, बीत चुके अपने शहर में, पूर्वजों के गर्भ में ठहरा समय, कम पड़ रहीं बारूदें तथा दिल्ली में पहली बार जैसी कविताओं की विशेष चर्चा करते हुए कहा कि इन कविताओं के माध्यम से कवि अपने समय के बड़े प्रश्नों से मुठभेड़ करता दिखता है. उन्होंने कहा कि अपनी कविताओं में योगेन्द्र बिलकुल ही नए एवं मौलिक मुहावरे के साथ प्रस्तुत हुए हैं. ये कविताएं इन्हें अग्रिम पंक्ति के समकालीन कवियों के बीच खड़ा करती हैं.

अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में समकालीन जनमत के प्रधान संपादक रामजी राय ने कहा कि योगेन्द्र कृष्णा ने अपनी हत्यारा सीरीज की कविताओं में समय की जो बारीकियां दर्ज की हैं वे बेहद दिलचस्प हैं.

समारोह का समापन कथाकार शिवदयाल ने अपने धन्यवाद-ज्ञापन के साथ किया. इस अवसर पर रवीन्द्र राजहंस, कुमार मुकुल, विनय कुमार, संजय कुमार कुंदन, भगवती प्रसाद द्विवेदी, सुधीर सुमन, जावेद हसन, एम के मधु, मुसाफिर बैठा, अरुण नारायण समेत शहर के अनेक सुधी पाठक, साहित्यकार एवं बुद्धिजीवी उपस्थित थे.

 

शहंशाह आलम, सचिव

प्रगतिशील लेखक संघ, पटना

1 टिप्पणियाँ

  1. बेनामी9:52 pm

    Arun Kamal agar aisa kah rahe hain to iska kuchh matlab hai...aur tab to pustak padhni hi hogi.

    ANIRUDDH BHATT

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