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रचना श्रीवास्तव की कविता : होली के हुड़दंग में हो गई जरा सी भूल...

कविता

फ़िर गलती हो गई

- रचना श्रीवास्तव
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होली के हुडदंग मे
हो गई भूल हमसे भारी
बीवी समझ रंग लगा जिसको
वो निकली पड़ोसन हमारी
मारा सर पे हाथ कहा-
बहनजी गलती हो गई

खेलते खेलते देखा
भीग गई थी बुरी तरह ,
श्रीमती जी हमारी
फगवा की थी उमंग
प्रेम की उठी तरंग
हाथ पकड़ के बोला
जा के कपड़े बदल लो प्यारी
हाथ छोड़ डैमफूल
मै हूँ शरमा जी की नारी
मारा सर पे हाथ
कहा फ़िर गलती हो गई

लगी थी मेज पे
गुझियों की क्यारी
एक खाया दो खाया
खाता गया
औए खा ली ढेर सारी
थोडी देर मै सिर घूमा ,
हो गया भारी
किसी ने कहा
भाई साहब ये है भाँग की बीमारी
मारा सिर पे हाथ
कहा फ़िर गलती हो गई

भाँग का गहरा होता गया रंग
हम होते गए मगन
बेखयाली मे बोल गए
मीना मीना मै हूँ तुम्हारे संग
श्रीमती जी गरज के बोली
है ये मीना कौन ,चढा जिस के प्रेम का रंग
लो मै चली मैके
संभालो आपने छगन मगन
मेरी अब क्या जरूरत
उडाओं उसी के संग आपनी पतंग
मारा सर पे हाथ
कहा फ़िर गलती हो गई
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रचना श्रीवास्तव
डलास, अमेरिका

6 टिप्पणियाँ

  1. रचना जी
    कविता मस्त है। भाई होली पर ऐसा हो ही जाता है। बधाई

    जवाब देंहटाएं
  2. अक्सर ऐसी गलतियाँ जानते बूझते ही होती हैं.

    जवाब देंहटाएं
  3. बेनामी9:36 pm

    aap sab ne kavita ko pasand kiya aap ka dhanyava
    holi me sab chalt ahi kyu?
    rachana

    जवाब देंहटाएं
  4. बेनामी9:49 pm

    aap sab ka bahut bahut dhanyvad ki aap ne kavita pdhi pasand kiya aur smy nikal ke likh
    me dil se abhari hoon
    haan bhai holi me asa ho jata hai
    rachana

    जवाब देंहटाएं

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