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कान्ति प्रकाश त्यागी की कविता - जूता महिमा


जूता चलता है

डॉ० कान्ति प्रकाश त्यागी


आओ दोस्तों,तुम्हें सुनाएं जूते की महिमा
जिसका चल रहा, उसकी ही होती गरिमा
रूस के थे ख्रुश्चेव निकेता
यू०एन०ओ० में रखा जूता
मन चलों को करना पड़े हैंडिल
उन्हें दिखाओ, सिर्फ़ एक सैंडिल


गली मोहल्ले में करे, कोई उल्टा काम
उसको तो न बचा सकते जय श्रीराम
अर्ध बाल मुंडन,काला मुंह, गर्धभ सवारी
गली गली में देखें तमाशा, नर और नारी


कभी कभी ऐसा भी होता
बगैर गलती के पड़ता जूता
जिसका जूता, उसी का सर
भाई झूठ नहीं है रत्ती भर


खोला होगा, आगरे में मानसिक दवाखाना
फिर खोलना पड़ा होगा, जूतों का कारखाना
यदि मरीज काबू न आएं
जूते दिखाकर अन्दर लाएं
पड़ते जिसे, मिरगी के दौरे
जूता सूंघा कर होते थोरे


कुछ निपुण हैं, करने में तेल मालिश
कुछ बन गए बड़े, करके बूट पालिश
एक दूकान पर लगी जूतों के सेल
घुसने को हो रही जनता, पेलम पेल
आप एक जोड़ी खरीदेंगे
तो एक जोड़ी फ़्री पड़ेंगे
छोटा पहनिए, काटेगा जूता
बड़ा पहनो, तो बांधो फ़ीता


ग्राम सभाएं, जन सभाएं
राज सभाएं, लोक सभाएं
विधान सभाएं, चुनाव सभाएं
बताओ, कुछ ऐसी सभाएं,
जहां चले न हो जूते
बात, बेबात पर न
कितनों के सर फूटे


कहीं लूट पाट, कहीं धमाका,कहीं हड़कम
कही मारपीट, कहीं धरना, कहीं जूत पत्रम
नेता हो या अभिनेता
हर कोई चला रहा जूता


बाज़ारों में, गलिहारों
मन्दिर,गुरुद्वारों में
नुक्कड़ , चौपालों में
हलवाई, गोपालों में
केवल एक शस्त्र चलता
शस्त्र सिर्फ़ होता जूता


करना किसी को सभा मॆं हूट
श्रोतागण फ़ेंके, टूटे चप्पल बूट
श्रोतागण, नंगे पैर मंदिर जायें
जूते चप्पल पहन कर आयें


प्रभु बोले,मैं न अयोध्या जाऊं
कहा भरत ने, तो मैं प्राण गवाऊं
अनुज, तुम्हें कैसे समझाऊं
राज करो, ले जाओ खड़ाऊं


भगवान राम पहने होते जूते
निषाद केवट कैसे पग धोते
यदि सुदामा पहन कर गए होते जूते
क्यूं, करुणाकर नयन जल से पग धोते


जिह्वा तो सब कुछ कर अन्दर घुसती
बिना भाव के ,खोपड़िया पर जूती पड़ती
कानपुरी,कोल्हापुरी,जोधपुरी,एक्शन
पेशावरी,रेबोक,लिबर्टी,नाइक,फ़ेशन


जूतों में नाम पा गए बाटा
नेनों ले कर अब आये टाटा
अगर जूते न चुराती साली
कैसे बनती आधी घरवाली
कुछ अपराध में ऎसे शातिर
धर लिए गय़े, जूते की खातिर


बेटे को आने लगे, बाप का जूता
समझो उसको भाई, न केवल बेटा
मज़बूरी में एक बाप, जूते पर रखता पगड़ी
दूसरा बाप, जूते की ठोकर से उछाले पगड़ी


कुछ को जूते रखने का इतना शौक
तरह तरह के , जूतों का रक्खा स्टोक
इसलिए कहता हूँ, जूतों पर रक्खो ध्यान
न जाने कब करना पड़े, तुम्हें, इन्हें प्रणाम
*******

(चित्र - साभार ज्ञानदत्त पाण्डेय की मानसिक हलचल)

3 टिप्पणियाँ

  1. बहुत अच्छी रचना. धन्यवाद

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  2. बेनामी10:15 pm

    बहुत अच्छा जूता है, कितने में पड़ा ? :)

    जवाब देंहटाएं
  3. हमारा जूता तो धन्य हो गया। तीन बार तल्ला बदलने के बाद भी पैरों में और ब्लॉग लिंक में चल जा रहा है! अभी इतना बेकार भी नहीं है कि सभा में फैंका जा सके!
    धन्यवाद जी, आपको और कान्ति प्रकाश त्यागी जी को भी।

    जवाब देंहटाएं

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