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सीताराम गुप्ता का आलेख : होली की प्रासंगिकता

होली की प्रासंगिकताः

घातक मनोभावों से मुक्ति का पर्व है रंगोत्सव

-सीताराम गुप्ता

होली एक ओर तो बुराई पर अच्छाई की जीत के प्रतीक के रूप में मनाई जाती है तो दूसरी ओर रंगों तथा हास्य के पर्व के रूप में भी। कुछ लोगों को इस पर्व के फूहड़पन या अमर्यादित हुड़दंग पर आपत्ति है तो कुछ इसे अश्लील पर्व की संज्ञा भी देते हैं क्योंकि इस पर्व में कई बार सामान्य शिष्टाचार की सीमाओं का अतिक्रमण भी हो जाता है। इस प्रकार होली विशेषरूप से फाग या रंगोत्सव, जो होलिका दहन की रात्रि के पश्चात् अगले दिन मनाया जाता है, मनाने या खेलने की विधि को लेकर विभिन्न विचारधाराएँ देखने-सुनने में आती हैं। लेकिन क्या वास्तव में रंगों से खेलने का ये त्यौहार अश्लील या असभ्य कहा जा सकता है? यदि ध्यानपूर्वक अवलोकन करें जो जीवन में ऐसे क्षणों की भी आवश्यकता है जब हम अपने मन में समाए घातक मनोभावों अथवा विकारों से मुक्त हो सकें। होली का हुड़दंग हमें ये अवसर उपलब्ध कराता है। इस अवसर पर हमारे अवचेतन मन में एकत्र विकृत भाव या विकार किसी भी रूप में बाहर निकल कर हमें तनावमुक्त कर प्रफुल्लित बना देते हैं।

रंगों का हमारे मनोभावों पर और हमारे मनोभावों का हमारे शरीर पर गहरा असर पड़ता है। होली के अवसर पर हर व्यक्ति अपने पसंदीदा रंग ख़रीदकर दूसरों पर लगाता है जिससे उसे आनन्द की अनुभूति होती है और यह आनंदानुभूति अनेक व्याधियों के उपचार में सहायक होती है। होली का गहरा संबंध हास्य से भी है क्योंकि होली के रंगों से हास्य की सृष्टि होती है। रंगों और कीचड़ से पुते चेहरे हास्य की सृष्टि में सहायक होते हैं। दूसरों को रंगने या मूर्ख बनाने की चेष्टा में ख़ुद ही रंगा जाना तथा मूर्ख बन जाना, रंग लगाने के बहाने थोड़ी छूट लेने के प्रयास में पकड़े जाना और उपहास का पात्र बनना ये सब क्रिया-कलाप करने वालों को स्वयं और देखने वालों को भी गुदगुदाते हैं। और हास्य में जो उपचारक शक्ति होती है वह किसी से छुपी नहीं है। हँसना न केवल एक अच्छा व्यायाम है जो गले से उपर के सभी अंगों ओर मांसपेशियों की जकड़न को दूर कर देता है अपितु यह ध्यान का ही एक रूप है। ध्यान अर्थात् एक बिन्दु पर चेतना की एकाग्रता। जब हम हँसते है तो सोच नहीं पाते। जब हम अन्य कोई भी कार्य करते हैं तो ध्यान के कार्य से भटकने की आशंका रहती है और ऐसे में कार्य की संपूर्णता में बाधा उत्पन्न हो जाती है। ध्यान को कार्य पर एकाग्र करना ही सफलता की गारंटी है। हँसने के दौरान ध्यान वि शृंखलित नहीं होता। चिंतन रुक जाता है। बाह्म संसार से कुछ क्षणों के लिए कट जाने के कारण तनाव से मुक्त हो जाते हैं। हँसने के दौरान शरीर में जिन लाभदायक हार्मोंस का उत्सर्जन होता है वे न केवल तनाव को समाप्त करते हैं अपितु शरीर में रोगों से लड़ने की क्षमता का विकास कर हमें स्वस्थ बनाए रखने में भी सहायक है। होली हास्य के माध्यम से रूपांतरण की प्रक्रिया ही तो है।

होली के हुड़दंग का लाभ उठाते हुए हम ऊल-जलूल हरकतें करते हैं। करनी भी चाहिएँ। यह हरकतें हमें विकारों से मुक्त करने में सहायक होती है। विकारों से मुक्ति का अर्थ है नये भाव से जीवन की शुरूआत। होली ही एक ऐसा पर्व है जो हमें पुराने, ख़राब, तनावपूर्ण संबंधों और नकारात्मक दृष्टिकोण तथा निराशावादिता को तिलांजलि देने का अवसर प्रदान करता है। होली के रंगों और हुड़दंग के माध्यम से जीवन में व्याप्त निराशाजनक विचारों से मुक्त होकर नये आशावादी विचारों के साथ उत्साहपूर्ण जीवन की शुरूआत संभव है। ये व्यक्ति के पुनर्जन्म जैसी अवस्था है।

हँसी मजाक़ या गाली-गलोच के माध्यम से ही सही होली एक ऐसा अवसर है जो हमें अपनी भड़ास निकालने का अवसर प्रदान करता है। एक तरह से इस दिन पिछले पूरे साल की क्षतिपूर्ति का अवसर मिल जाता है। परिचितों के मध्य संबंध सुधारने या मनमुटाव दूर करने तथा अपरिचितों से नये संबंध बनाने का ये एक अच्छा अवसर है। होली ही एक ऐसा त्यौहार है जब कोई बुरा नहीं मानता। किसी को रंगों से सराबोर कर दीजिए ओर बदले में उससे मित्रता स्थापित कर लीजिए। कई बार गाल पर एक चुटकी गुलाल कमाल कर देता है।

भारत एक पुरुष प्रधान देश है। पुरुषों और स्त्रियों की सामाजिक स्थिति और उनके अधिकारों में काफी अंतर है। स्त्री को प्रायः क़दम-क़दम पर दबना पड़ता है। घर में भी बाहर भी। होली के अवसर पर विशेष रूप से उत्तर भारत के ग्रामीण अंचलों में होली खेलते समय स्त्रियाँ पुरुषों पर कोड़े या डंडे बरसाती है। ब्रज की फूलों की होली के साथ-साथ नंदगाँव और बरसाने की लट्ठमार होली भी बहुत प्रसिद्ध है। इस अवसर पर स्त्रियाँ पुरुषों से साल भर का बदला ले लेती है। वास्तव में शोषित वर्ग को उसके विकारों और हीन भावनाओं से मुक्ति प्रदान करने का पर्व भी है होली।

प्रायः वसंत ऋतु के मध्य में यह पर्व मनाया जाता है। इस दौरान प्रकृति में भी ख़ास परिवर्तन दृष्टिगोचर होता है। एक तरफ धरती रंग-बिरंगे फूलों से लद जाती है तो दूसरी तरफ ऐसी वनस्पतियाँ और पेड़-पौधे भी हैं जो अपना पुराना लिबास उतार फेंकते हैं और निपट नंगे हो जाते हैं। ये सब होता है मौसम के कारण। मौसम में परिवर्तन तथा उसके प्रभाव से प्रकृति में परिवर्तन। इसी तरह व्यक्ति के मनोभावों में परिवर्तन से संभव है उसके भौतिक शरीर में परिवर्तन। होली इस परिवर्तन का अवसर प्रदान करती है। प्रकृति के परिवर्तन को देखें और उससे तादात्म्य स्थापित कर प्रेरणा ग्रहण करें। मौसम का बदलना अनिवार्य घटना है। जब मौसम का बदलना अनिवार्य है तो मनुष्य का बदलना भी अनिवार्य है। हम भी बदलें। अपने अंतर्मन में समाए घातक मनोभावों से मुक्त हो जाएँ। जिस प्रकार पेड़ अपनी पुरानी पीली पड़ गई पत्तियों को फेंक नई पत्तियाँ धारण कर पुनर्जन्म पाता है हम भी नकारात्मक भावों से मुक्त होकर सकारात्मक भावों का विकास कर नये जीवन में प्रवेश करें। परिवर्तन के अभाव में ये विकास ये पुनर्जन्म संभव नहीं।

होली एक ऐसा पर्व है जो दूषित मनोभावों से मुक्त कर सकारात्मक परिवर्तन का आधार प्रस्तुत करता है। प्रायः हमारे सभी पर्व चाहे वो दशहरा-दीपावली हों या होलिका-दहन सभी बुराई पर अच्छाई की विजय के प्रतीक के रूप में मनाए जाते हैं। असतो मा सद्गमय की कामना की जाती है। लेकिन जब तक मन में विकार मौजूद हैं जब तक कैसे ‘‘असतो मा सद्गमय’’ की ओर अग्रसर हो सकेंगे अथवा बुराई पर अच्छाई की विजय प्राप्त कर सकेंगे? सत्य और अच्छाई का संबंध तो मनाभावों से ही है अतः सकारात्मक परिवर्तन या रूपांतरण के लिए रंगों के इस पर्व में ग़ोता लगाकर विकार मुक्त होना अनिवार्य है। यही इसकी प्रासंगिकता है।

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संपर्क

सीताराम गुप्ता

ए.डी.-106-सी, पीतमपुरा,

दिल्ली-110034

ईमेल srgupta54@yahoo.co.in

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