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ऋषि कुमार शर्मा का आलेख : कान्हा बरसाने में आइ जइयों, बुलाइ गई राधा प्यारी


होली पर्व पर विशेष

कान्हा बरसाने में आइ जइयों, बुलाइ गई राधा प्यारी ।

-ऋषि कुमार शर्मा

वृषभान लली राधा और देवकी नंदन कृष्ण की प्रेम भरी पिचकारियों से लबालब ब्रज की होली विश्व–विख्यात हैं । आज भी बड़ी धूमधाम से संपूर्ण ब्रज में होली मनाई जाती है । बदली हुई परिस्थितियों और समय – चक्र की गतिशीलता ने हो सकता है होली के रंग कुछ फीके कर दिए हों ;किन्तु आज भी ब्रज के रसिया, ब्रज की होली में उसी प्रेम और प्रीति के दर्शन करते हैं जो कि रति किशोरी श्री राधिका और नंदलला श्री कृष्ण के हृदय में व्याप्त थी ।

ब्रज की होली में नन्दगॉव और बरसाने की लठामार होली विश्वविख्यात है ।इस होली की अपनी अनूठी विशेषता हैं जो अन्य स्थानों की होली परम्पराओं से भिन्न हैं । नंदगॉव और बरसाने की होली में भी, बरसाने की होली अधिक रंग–रंगीली होती हैं। बरसाना वृषभानु नन्दिनी राधा का गॉव, नन्दगॉव कृष्ण कन्हैयॉ का गॉव हैं। संभवत: यही एकमात्र कारण हैं कि नन्दगॉव का प्रत्येक व्यक्ति बरसाना को अपनी ससुराल समझाता है और बरसानें के पुरूष अपने में सखी भाव की मान्यता रखते है।

फाल्गुन शुक्ला नवमी को बरसाने मे लट्ठमार होली खेली जाती हैं। जिसमे नन्दगॉव के सखा और बरसाने की गोपिकाएँ प्रतीक रूप में स्त्री–पुरूष होली खेलते है । कोई नहीं जानता कि कितने समय से बरसाने का कण–कण नन्दगॉव के कृष्ण–कन्हैयॉ को होली खेलने का निमंत्रण देता चला आ रहा है ।

‘‘अइयों–अइयों रे कन्हैया नन्दलाल रंगीली होली में

दुल्हन प्यारी राधिका रे ,दूल्हा नंदकुमार’’

बरसाने के इस सामूहिक निमंत्रण के अतिरिक्त राधा भी अपने कृष्ण को बरसाने आने का निमंत्रण दे रही हैं।

कान्हा बरसाने में आइ जइयों, बुलाइ गई राधा प्यारी ।‘

नन्दगॉव के पुरूष बरसाना आकर होरी के रसिया और सखियॉ गाते हुए बरसाने की स्त्रियों को छेड़ते है । तब रंग–बिरंगी ओढ़नी और चुनरियों से ढकी हुई स्त्रियॉ उन पर लाठियों का प्रहार प्रारम्भ कर देती हैं। पुरूष अपने सिर पर सींग से बनी हुए ढाल से लाठियों का प्रहार रोकते हैं। इस लट्ठमार होली से पूर्व बरसाने के भव्य श्री जी के मंदिर में नन्दगॉव और बरसाने के गोस्वामियों में मान–अभिमान,अनुराग और उल्लास से परिपूर्ण संगीत में उत्तर–प्रत्युत्तर होते हैं।

होली के दिन नन्दगॉव का प्रत्येक पुरूष अपने का रसिया कृष्ण और बरसाने की प्रत्येक स्त्री अपने को राधा समझती हैं। इसी प्रेम–भावना में विभोर वे परस्पर ऐसी होली खेलते हैं कि रंग की फुहारों से ब्रज की धरती और उड़ते अबीर-गुलाल से आकाश ही नहीं उनके हृदय भी रंग जाते हैं।

एक ओर राधिका और दूसरी ओर कृष्ण जी हैं। दोनों ओर से पिचकारियॉ चल रही हैं और गुलाल पड़ रहा हैं। केसरिया रंग में रंगे हुए विविध स्नेह रंगों से ऐसी झर लग गई हैं। मानों बरसाने में वर्षा ने झड़ी लगा दी हैं ।

उत तें कन्हाई लरिकाई के सखन लीन्हें,

करि चतुराई केलि होरी की मचाई है।

इत वृषभान की कुमारी सुकुमारी प्यारी,

आली गन आली में रसीली सी सोहाई है।।

बरसाने की होली का एक अन्य कवि नें इस प्रकार चित्रण किया हैं:–

होरी होरी करत अबीर भरि झोरी लीन्हें,

खोरी -खोरी फिरैं ग्वाल ,बाल समुदाई है ।

कीरति किसोरी संग गोरी -यूथ, यूथ मिलि,

भरी अनुराग फाग स्यामा सो मचाई हैं ।

केसर के रंग साने सुरंग नेह सरसाने

मानों बरसाने बरसाने झरि लाई है ।

एक और कवि का चित्रण इस प्रकार है:–

होरी के सुजान रची आली सुरु स्यामा–स्याम,

केसर अबीर लें गुलाल नीर घोरी हैं।

राधा और कृष्ण की परस्पर प्रीति तथा विनोद का बरसाने की होली में मूर्त रूप प्रस्तुत हो उठता हैं। बरसाने की होली मे जो रस बरसता हैं, उसे प्राप्त करने के लिए देवता भी उत्कंठित रहते हैं :– ‘‘ जो रस बरसाने में, वो रस बैकुण्ठ में नॉय । ’’ और इसीलिए कहा जाता हैं कि बरसाने की होली देखने के लिए सूर्य का रथ भी कुछ समय के लिए रुक जाता है, और शायद बरसाने में सूर्य कुछ अधिक समय पश्चात अस्त होता हैं।

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