के.पी. सक्सेना के दो व्यंग्य

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व्यंग्य   के. पी. सक्सेना मिर्जा का स्वेटर यह पूछे जाने पर कि मिर्जा सिर्फ एक ही पल्ले में ऊन के गोले समेत, इस निर्माणाधीन स्वेटर को...

व्यंग्य

 

के. पी. सक्सेना

मिर्जा का स्वेटर

यह पूछे जाने पर कि मिर्जा सिर्फ एक ही पल्ले में ऊन के गोले समेत, इस निर्माणाधीन स्वेटर को उतारे बगैर क्यों निकल पडे, मिर्जा बमक उठे, "तुम क्या जानो कि रुहानी इश्क क्या होता है ? जो चीज इतनी मेहनत और मोहब्बत से उन्होंने हम पर चढ़ाई है, उसे उतार फेंकें ? हमें जरा बाजार से मसूर की दाल लाने की जल्दी थी। इस पल्ले को उतारने में एक उम्र लग जाती। सो सोचा कि लाओ, पल्ले-गोले समेत ही बाजार हो आएं। जमाना देख ले कि शाहजहां और मुमताज बीवी का इश्क अभी जिन्दा है। बेहतर होगा कि गोला तुम सम्भाल लो और हमारे पीछे-पीछे बाजार तक चले आओ।" अभी हम गोला उठाकर झाड़-पोंछ ही रहे थे कि हमारी भावज (बेगम मिर्जा) बुर्के की छांव तले तैश में फुंकारती हुई दाखिल हुई और किचिन में दाखिल होकर हमारी बीबी को भी घसीट लाई। सारी पृष्ठभूमि उन्हें समझाई और मिर्जा को वो-वो धुली-पुंछी सुनाई कि अगले का पाटिया गुल और ढिबरी टाइट हो गई।

बेगम भाभी के टोटल गुस्से का सारांश यह था कि अक्ल के नाम पर पैदल मिर्जा, जल्दबाजी में बच्चे के स्वेटर का पल्ला डाट आए थे, और अपने स्वेटर के पल्ले में सलाइयों समेत बच्चे को लपेट कर रख आए थे।दोनों ही 'अण्डर कन्स्ट्रकशन' स्वेटरों का डिजाइन एक था और पुरानी उधड़ी हुई धुली ऊन से बन रहे थे। मिर्जा सिर झुकाए बगलें झांक रहे थे, और मैं सोच रहा था कि जब बच्चे के स्वेटर का पल्ला मिर्जा पर फिट आ गया तब मिर्जा के स्वेटर का पल्ला बच्चे पर सही क्यों नही उतरा ? क्या आज के दौर में बाप-बेटों में पल्ले-भर मुहब्बत भी बाकी नहीं रह गई! ऊंट और ऊंट में कोई फर्क नहीं होता...मगर बच्चों और बच्चों में फर्क होता है। बच्चे अमीर और गरीब होते हैं... भूखे और सजे-धजे होते हैं...मगर ऊंट हमेशा नंगा होता हैं! ऊंट अमीर और गरीब कभी नहीं होता!...आजादी के इन महत्त्वपूर्ण ३६ वर्षों का असर बच्चों पर भले ही पड़ा हो...ऊंटों पर नहीं पड़ा।

ऊंट के बारे में एक पंजाबी कहावत हैं कि 'जट चालीस दा...बोता पैंतालीस दा'...बोता ऊंट के बच्चे को कहते हैं! अत: ऊंट के बच्चे की कीमत हमेशा ऊंट से ज्यादा होती है| इन्सानों मे सिर्फ राजनीतिक बच्चों की कीमत ही ज्यादा होतीहै| आम आदमी का अभावग्रस्त बच्चा दो कौड़ी का।...न खाने को, न पहनने को...बिना वजह पृथ्वी पर आने का पाप भोगता है आदमी का बच्चा। ...अब आप कृपया ऊंटों और बच्चों की एक घटना सुनो... दिल्ली और जयपुर के बीच राष्ट्रीय मार्ग पर टूरिस्टों के मनोरंजन के लिए राजस्थान टूरिस्ट डेवलपमेंट कारपोरेशन ने 'मिड वे' नाम का एक उम्दा रेस्त्रां बनाया हुआ है। यों भी भूख के देश में आलीशान रेस्त्रां बनाना एक अच्छी बात है। यहां बच्चों के लिए ऊंट की सवारी की व्यवस्था है। यह भी एक अच्छी बात है। बचपन रहते तक ही बच्चा ऊंट की सवारी कर सकता है। बड़ा होने पर राजनीति और व्यवस्था के ऊंट आदमी की पीठ पर सवार हो जाते हैं और देश धीरे-धीरे आगे बढ़ने लगता है।

खैर...पिछले दिनों दिल्ली के मार्डन स्कूल के बच्चों का एक दल बस सें जयपुर जा रहा था। बच्चे इस रेस्त्रां में उतर गये और ऊंट की सवारी करने लगे। थोड़ी ही देर में जाने किसने कैसी हवा फूक दी कि यच्चों को ऊंट से उतार दिया गया...पैसे वापस कर दिए गए और ऊंट की सवारी बन्द हो गई। अब चक्कर क्या था कि एक सहकारी उच्च अधिकारी अपनी बच्ची के साथ आए हुए थे जो ऊंट की सवारी की जिद कर रही थी। अत: साधारण बच्चों को ऊंट से उतारकर ऊंट किसी खास 'बच्ची' के लिए रिजर्व कर दिया गया। इस घटना पर न बच्चों ने बुरा माना, न ऊंट ने। दोनों ही जानते थे शायद कि 'बाल दिवस'का स्वांग रचाने वाले इस देश में, बच्चे और बच्चे में जमीन और आसमान का फर्क होता है।

..कुछ बच्चे जन्म से ही मुंह में चांदी का चम्मच और सत्ता का शहद लेकर पैदा होते है। शेष सारे बच्चे सिर्फ भूख और अभावों की गर्द लेकर जन्म लेते हैं। ये 'घटिया' बच्चे न बाल दिवसों की रौनक बन सकते हैं, न ही ऊंट की सवारी के योग्य होते हैं। दिल्ली के मार्डन स्कूल के बच्चे फिर भी अच्छे खाते-पीते घरानों के है।उन्हें भी ऊंट की सवारी के आनन्द से वंचित कर दिया अफसर शाही ने| अब जरा उस बच्चे के बारे में सोचिए जो अधनंगा है...भूखा है...सिर्फ बच्चा कहलाने का अपराधी है। वह सिर्फ दूर से यह देख सकता है कि ऊंट कैसा होता है और 'बड़े' बच्चे इस पर कैसे सवारी करते हैं।

घुटी हुई लालसओं का यही जहर आगे चलकर अभावग्रस्त बच्चों को अपराधी बनाता है तो हम कहते हैं कि बाल-अपराध बढ़ रहे हैं।..यही नन्हे-नन्हे कुचले हुए अरमान एक दिन जहर और समाज-विरोध का घिनौना ज्वालामुखी बन जाते है। आप किसी बच्चे से उस की रोटी छीन सकते हैं...मिट्टी का खिलौना छीन सकते हैं...मगर उसके मन की नन्ही-नन्ही कामनाएं नहीं छीन सकते। कल जो लोग इस बच्चे को वोट की लाइन में खड़ा करेंगे, वे आज इसे दो क्षण ऊंट की सवारी या मिट्टी की एक छोटी-सी चिड़िया देने से क्यों कतराते हैं? ...कितनी बाल संस्थाएं...कितने ही शिशु केन्द्र एवं बाल सुधार गृह अपने बड़े-बड़े बोर्ड खोखले ढोलों जैसे लटकाए बैठे हैं, पर देश का आम बच्चा आज भी उतना ही रीता है जितना अपने बचपन में मैं था। बच्चे के हिस्से में, इन ३६ वर्षों में सिर्फ तिरंगे झण्डे की तस्वीर आई है जिसके रंग देखकर वह खुश हो लेता है। कहां हैं वे लोग जो कहते हैं कि इस देश से 'बाल-श्रम' (चाइल्ड लेबर) खत्म हो रहा है ? ठंड में ठिठुरते हजारों मासूम आज भी ईटें ढो रहे है...गाड़ी खींच रहे है...दूसरों के बर्तन मांज रहे हैं। दूसरों की फेंकी हुई जूठन ही इन बच्चों के हिस्से का प्रजातंत्र है...आजादी है।

...महाकवि मिल्टन ने एक बार कहा था कि मैं कई-कई जन्म सिर्फ बच्चा बने रहने को तैयार हूँ...शर्त यह है कि मुझे एक बच्चे की तरह भरपूर जीने का अधिकार मिले। मिल्टन नहीं रहे इस संसार में...सिर्फ कामना रह गई जो आज अधिकांश बच्चों के चेहरे पर एक सपना बनकर मंडराती रहती है।...बच्चे ऊंट को देखते हैं, ऊंट बच्चों को देखता है... दोनों के बीच में एक सम्पूर्ण समाजवाद की दूरी है। खुली कारों पर से सड़क के बच्चों पर माला फेंकना और बात है...बन्द कोठरियों में उनके पेट की भूख और तन की बीमारी आंकना और बात है। ...मदर टेरेसा जैसी हमदर्द हस्तियां सदियों में कहीं एक पैदा होती हैं।-३६ वर्ष से गाल-बजाए जा रहे हैं बाल कल्याण के नाम पर।मजदूर का बेटा मजदूर और भिखारी का बेटा भिखारी ही पैदा हो रहा है। भूख के ढेर पर भूख ही जन्म ले रही है।... अधिकारों की होड़-सी लगी है। जिसके पास नन्हे बच्चों को ऊंट पर से उतार सकने का अधिकार है, वह उसी का भरपूर उपयोग कर रहा है। एक अपने बच्चे की खुशी के लिए कितने ही बच्चों की आंखों से खुशी की चमक छीनी जा रही है। यह उपलब्धि हैं नेहरू के सपनों की|

...मैं देश के मामले में टांग अड़ाना नहीं चाहता। जिनका देश है वह देश को जिधर चाहें मोड़ ले जाएं। मगर बच्चों के मामले में बोलने का मुझे हक है। मैं बच्चों का लेखक हूं...खुद बच्चा रह चुका हूं...बच्चों के अधबुने सपनों की एक पूरी दुनिया देखी है मैंने।...इन अरमानों से खेलता है कोई तो मन कसक उठता है। आप भले ही बाल संग्रहालय, बाल उद्यान, ऊंट और हाथी-घोड़े हटा लो! मगर जब तक ये हैं, इन पर सब बच्चों का समान हक है ! अफसर शाही के पांव पसारने को और भी जमीनें हैं ! चंद बच्चों के चेहरों की हंसी छीनकर अफसरशाही सुर्खरू नहीं होती...स्याह और बदनाम हो जाती है।...बच्चों के भोले मन तो यों भी भी सब कुछ बहुत जल्द भूल जाते हैं! बच्चे जो ठहरे!

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आंसुओं का बैंक बैलेंस

अभी तक भी यही समझता था कि आंसुओं की कोई कीमत नहीं होती...बस, यूं ही फोकट में बह जाते हैं।

...मगर नहीं, केलीफोर्निया की एक लेडी किलीरिन मार्गरेट ने मरते-मरते मेरा भ्रम दूर कर दिया। हुआ यूं कि, दुनिया से खर्च होते वक्त मार्गरेट के पास अस्सी हजार डालर की रकम थी। आगे नाथ, न पीछे पगहा। सो वसीयत कर गई कि रकम उनके अन्तिम संस्कार में शामिल होने वालों में बांट दी जाए।... किस तरह? जो चुपचाप शामिल हों उन्हें पांच-पांच डालर...जो चीख-चीख कर रोए और सीना पीटें, उन्हें पचास-पचास डालर।...मार्गरेट गुजर गयी।...जनाजे में ५०० लोग शरीक हुए। सबके सब दहाड़े मार-मार कर सीना पीटते हुए रो रहे थे। अन्तत: अपने आंसुओं की नकद कीमत वसूल कर अपने घर लौट गये।

मैं इस घटना से रत्ती-भर प्रभावित नहीं हुआ।...काहे से कि मैं उस देश में रह रहा हूं जहां नकली आंसू थोक के भाव लीटरों बह रहे हैं।..और नकदी कैश करा रहे हैं।...इन नकली आंसुओं के पीछे ३६ वर्षों की प्रगति का पूरा इतिहास है। देश की चिन्ता और समस्याओं पर निरन्तर बहते आंसू ...जैसे रूम कूलर में अन्दर ही पानी का प्रवाह होता रहता है।...और इन आंसुओं की भरपूर कीमत है सत्ता...कुर्सी ...गद्दी...अधिकार। मैंने मगरमच्छ आज तक नहीं देखा...देखना भी नहीं चाहता। उसके आंसुओं के बारे में सुना है, मगर यह नहीं सुना कि मगरमच्छ ने कभी अपने आंसुओं की कीमत मांगी हो। इन्सानी मगरमच्छ ज्यादा कल्चर्ड होता है। कीमत वसूल लेता है...नकली आंसू बाद में बहाता है...देशहित में।..इमेज बनी रहती है।

... आंसू बहाने के बहानों की कमी नहीं इस देश में। भूख, सूखा, गरीबी, बाढ़, दुर्घटनाएं, धार्मिक दंगे। जहां मौत की खबर आयी, घर वाले बाद में रोते हैं, नेता पहले ही आंसू-भीगा स्टेटमेण्ट जारी कर देता है कि वह बहुत दुखी है। बन गई इमेज। खरी हो गई सुख सुबिधा की करेंसी ।...मौत एक बडी नुमाइश हो गई इस मुल्क में। आंसुओं से छपे इस नुमाइश के टिकट बेचकर कितनी ही रकम उगाह चुके हैं लोग। मार्गरेट के रोने पर पचास डालर मिले और सिलसिला खत्म हो गया।...यह भी कोई बात हुई ? हमारे यहां साढ़े तीन दशकों से एक-एक आंसू कैश हो रहा है। जब-जब किसी ट्रेजेडी पर मुल्क का कोई रहनुमा रोया है, मुझे हंसी आयी है। रोता हुआ नेता या मंत्री मुझे अच्छा नहीं लगता। रोना ही था तो मंत्री काहे को हुआ ? मतदाता की आंखों में आंसू नेचुरल लगते हैं।

...मगर नेता रोये बगैर मानता भी तो नहीं। अपनी इमेज की कीमत बसूलनी है। अन्दर नकली आंसुओं का भण्डार भरा रहता है। इधर कहीं कोई आफत आई उधर आंसूओं का बटन दबा दिया। सारा देश तरल हो उठा। मरने वाले भी अपने मरने का गम भूल गए। नेता रो रहा है ? मरना सार्थक हो गया।...जैसे-जैसे चुनाव नजदीक आते जाते हैं, आंसुओं की टंकी फुल होती चली जाती है। देशप्रेम बढ़ता चला जाता है।.... मार्गरेट की आत्मा खुश हो रही होगी कि उसके अन्तिम संस्कार पर अगलों को पचास-पचास डालर मिल गए। काश, दिवंगत महिला ने भारतीय अन्तिम संस्कार देखे होते! किसी 'पावरफुल' के कुत्ते का भी अन्तिम संस्कार होता है तो श्रद्धालु पहुंच जाते हैं...आंसू बहाते हैं और कालान्तर में किसी न किसी रूप में अपने बहाये गए आंसुओं का पूरा फायदा टीप लेते हैं। एक भी आंसू फ्री नहीं बहने पाता।...हां, कुछ थर्ड क्लास आंसू ऐसे जरूर होते जिनकी कोई कीमत नहीं होती...मसलन, बेरोजगार नौजवान के आंसू...क्वारी बेटी के बाप के आंसू, लुटी हुई इज्जत के आंसू...धर्म के नाम पर चली हुई गोली के फलस्वरूप टूटी हुई चूड़ियों के आंसू ... किसी बच्चे के भूखे पेट के आंसू...अस्पताल और पुलिस की यातना झेलने वाले के आंसू...वगैरह। मैं इन्हें आंसू ही नहीं मानता। यह तो 'सारे जहां से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा' का नित्य क्रम है। इनकी कोई कीमत नहीं लगती। लगनी भी नहीं चाहिए।

... हर आंसू मोती नही होता। जिनके आंसू 'मोती' होते हैं वे उनकी पाई-पाई वसूलना भी खूब जानते हैं। हमदर्दी कोई सड़क पर पड़ा सिक्का नही है कि किसी के हाथ भी लग जाए। जिनकी हमदर्दी का महत्त्व है वे उसे रिजर्व रखते हैं और सही मौके पर कैश करा लेते हैं...मार्गरेट के रोने वालों की तरह।... आंसूओं का फिक्स्ड डिपाजिट...अभिनय का कौशल और नन्ही सी लिप-सिम्पैथी, कुर्सी और इनको बरकरार रखती है और नकली आंसू धीरे-धीरे विदेशी बैंकों में डालर की शक्ल में बदल जाता है। हैसियत के अनुसार सबका विदेशी बैंकों में इन्हीं घड़ियाली आंसूओं का डिपाजिट है। राजनीति में वे शहीदी आंसू अब रहे ही नहीं जो सीने की तहों से निकलकर आंखों तक आते थे। उन्होंने आजादी दिलाई और आंखों ही आंखों में खुश्क हो गए।

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(टीडीआईएल के हिन्दी कार्पोरा से साभार)

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रचनाकार: के.पी. सक्सेना के दो व्यंग्य
के.पी. सक्सेना के दो व्यंग्य
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