विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका -  नाका। प्रकाशनार्थ रचनाएँ इस पते पर ईमेल करें : rachanakar@gmail.com अधिक जानकारी इस पेज पर [लिंक] देखें.
रचनाएँ अथवा रचनाकार खोजें -

पिछले अंक

उत्तर प्रदेश की लोक-कथाएं

साझा करें:

लोक कथा   कलियुगी पति-भक्ति क्या मथुरा , क्या बरसाना - - क्या गोकुल , क्या नंदगांव! मतलब यह कि ब्रजक्षेत्र की इंच - इंच जमीन पर पतिव्र...

लोक कथा

lok katha 

कलियुगी पति-भक्ति

क्या मथुरा , क्या बरसाना - - क्या गोकुल , क्या नंदगांव! मतलब यह कि ब्रजक्षेत्र की इंच - इंच जमीन पर पतिव्रता सुशीला की महिमा गाई जाती थी। लोग कहते कि अगर साक्षात पतिव्रता नारी के दर्शन करना चाहते हो तो देवी सुशीला के दर्शन करो। थी भी यही बात। सुशीला की जिन्दगी का हर पल अपने पति के लिए था। पति के दर्शन किए बिना वह जल न पीती। एक बार वह अपनी एक सहेली के यहाँ गई। सहेली का पति कहीं परदेस गया हुआ था। लेकिन खाने के लिए सहेली ने नाना प्रकार के स्वादिष्ट व्यंजन पकाए थे। सुशीला यह देखकर हक्की - बक्की रह गई। वह तो पति की अनुपस्थिति में एक बूंद तक ग्रहण करने की बात न सोच सकती थी। इसलिए उससे न रहा गया। वह बोली , " बहन , तुम कैसी स्त्री हो! तुम्हारे पति तो परदेस में हैं और तुमने अपने लिए इतनी तरह के व्यंजन पकाए हैं। भला एक पतिव्रता के लिए यह सब शोभा देता है! सच्ची पतिव्रता तो वह है जो पति को देखे बिना जल तक न पिए। "

सुशीला की सहेली बड़े मुंहफट स्वभाव की थी। दिल की भी वह बड़ी साफ थी। बोली , " बहन सुशीला , यह सब ढकोसलेबाजी मुझसे नहीं चलती। अगर मैं अपने पति के बाहर होने पर भी अच्छा खाना खाती हूँ तो इसका मतलब यह तो नहीं होता कि मैं उन्हें नहीं चाहती। मैं तो जैसी खुश उनके सामने रहती हूँ वैसी ही उनके पीछे भी। अगर कोई मुझ पर उंगली उठाने पर ही तुला होगा तो उसे मैं रोक नहीं सकती। बाकी यह तो सिर्फ मैं जानती हूँ या मेरे पति , कि हम एक - दूसरे को कितना चाहते हैं। " सहेली के इस जवाब से सुशीला जल - भुनकर रह गई। उसने मुंह चुनियाकर कहा , " यह तो सब ठीक है , लेकिन तुम पतिव्रता नहीं हो। पतिव्रता स्त्री के लिए शास्त्रों में लिखा है कि पति की गैरहाजिरी में वह जल तक न पिए। " सहेली ने इसका भी करारा जवाब दिया। बोली , " ऐसे शास्त्र मेरे ठेंगे से! " अन्त में बात यहाँ तक बढ़ गई कि सुशीला तुनककर अपने घर लौट आई।

घर आकर सारा किस्सा उसने अपने पति को बताया। पति भी सुशीला को बहुत चाहता था और उसकी निष्काम पति - भक्ति से बहुत प्रभावित था। फिर भी कभी - कभी उसे यह जरूर लगता था कि यह सब ढोंग है। अगर पति एक महीना तक घर पर न रहे तो क्या कोई स्त्री बिना अन्न - पानी के एक महीना तक रह सकती है! और उसे लगा कि यह बिलकुल असंभव है। अगर कोई जिद्दी स्त्री इस बात पर अड़ ही जाए तो जीवित नहीं बच सकती। यह सोचकर पति ने सुशीला की परीक्षा लेने का विचार बनाया। कई दिनों तक वह तरह - तरह से सुशीला को कसौटी पर कसता रहा , लेकिन सुशीला हर बार खरी उतरती। कभी वह स्नान देर से करता , तो कभी खेत से दोपहर ढले लौटता। कभी - कभी तो ऐसा होता कि परोसी थाली तक सामने होने पर वह बहाना बनाकर बाहर निकल जाता और दिन ढले लौटता। लेकिन सुशीला ने कभी भी पति के खाने से पहले पानी तक न पिया। एक दिन सुशीला के पति ने कहा , " आज मेरा मन खीर और पुआ खाने का हो रहा है। इसलिए खूब इलायची गरी डालकर पुए और चिरौंजी , किशमिश , केसर डालकर खीर बना बनाओ। " ये दोनों चीजें सुशीला को भी बड़ी प्रिय थीं। इसलिए खूब मन लगाकर उसने ये चीजें बनाई। केसर और इलायची और देसी घी की सुगन्ध से बनाते समय ही सुशीला के मुंह में पानी आने लगा। चीजें बना चुकने के बाद सुशीला ने अपने पति से झटपट स्नान कर लेने को कहा।

लेकिन पति को तो उस दिन धैर्य की परीक्षा लेनी थी। इसलिए काफी देर तक वह ढील डाले रहा और टालता रहा। सुशीला के बार - बार कहने पर , आखिर में हारकर , वह बाल्टी - लोटा और रस्सी लेकर नहाने गया। नहाने में भी उसने काफी देर लगा दी। इधर सुशीला की आतें मारे भूख के कुलबुलाने लगी थी। लेकिन जैसे ही देहरी के बाहर उसे पति के खड़ाऊं की आवाज सुनाई दी , उसे दिलासा बंधी कि अब तो खाने का समय आ ही गया। लेकिन जैसे ही पति ने देहरी दे अंदर पैर रखे , दायें पैर की खड़ाऊं से पैर ऐसा फिसला कि वह चारों खाने चित फैल गया। बाल्टी - लोटा हाथ से छूटकर दूर जा गिरे और आँखें फैली की फैली रह गई। यह देखा तो सुशीला जिस हालत में थी वैसी ही दौड़ी पास जाकर सिर हिलाया , आवाजें दीं , लेकिन सब बेकार। पति अगर जिंदा होता तब तो बोलता ही , लेकिन उसके तो प्राण पखेरू उड़ चुके थे , इसलिए भला वह कैसे बोलता।

सुशीला की आंखें डबडबा आई और गला भर आया। उसका मन हुआ कि धाड़ मारकर रो पड़े। लेकिन तभी उसे खीर और पुए का ध्यान हो आया। उसने सोचा कि पति अब मर ही गए हैं। रोने से जी तो पाएंगे नही। हां , आस - पड़ोस के लोग जरूर जुड़ जाएंगे। और तब खीर - पुए खाने का मौका तो मिलने से रहा। इसलिए बेहतर यह होगा कि पहले मैं खीर - पुए खा लूं , तब रोना - धोना शुरू करूं। यह सोचकर वह चुपचाप गई और जल्दी - जल्दी खीर उड़ाने लगी। पुए अगले दिन के लिए रख लिए , क्योंकि उनके खराब होने का डर न था। असलियत यह थी कि पति मरा नहीं था , बल्कि मरने का नाटक किए पड़ा था। इसलिए अपनी पत्नी की यह सारी हरकतें वह देखता रहा। जब सुशीला खीर खूब जी भरकर खा चुकी तो झटपट मुंह धोया और लम्बा - सा घूंघट निकालकर पति के पास गई और सीने से चिपटकर रोने लगी। रोने के साथ - साथ वह यह भी कहती जाती थी - -

" तुम तो चले परमधाम कूं , हम हूँ सूं कुछ बक्खौं (कहो)। "

उसका पति कुछ देर तक तो उसके नकली प्रेम और दुख को सहन करता रहा। लेकिन अन्त में उससे न रहा गया। और जैसे ही सुशीला ने अपना जुमला `तुम तो चले परधाम कूं हम हूँ सूं कुछ बक् खौ' खत्म किया , वैसे ही उसके पति ने उसीसे मिलता - जुलता एक जुमला जड़ दिया। पति का जुमला इस प्रकार था - -

खीर सड़ोपा करि तौ पुअनूं कूं तौ चक् खौ। "

अब तो सुशीला की ऐसी हालत हो गई कि काटो तो खून तक न निकले। उसे क्या पता था कि उसका पति नाटक किए पड़ा है और उसकी परीक्षा ले रहा है! मन ही मन वह रह - रहकर अपने आपको कोसती रही कि यह क्या किया। क्यों न जबान पर काबू रखकर बुद्धि से काम लिया! और उसके बाद फिर कभी किसी ने सुशीला के मुंह से अपने पतिव्रत धर्म की तारीफ नहीं सुनी। पहले जैसी डींगे हांकना अब सुशीला ने बन्द कर दिया था।

-------.

 

शेखचिल्ली और कुएं की परियां

एक गांव में एक सुस्त और कामचोर आदमी रहता था। काम - धाम तो वह कोई करता न था , हां बातें बनाने में बड़ा माहिर था। इसलिए लोग उसे शेखचिल्ली कहकर पुकारते थे। शेखचिल्ली के घर की हालत इतनी खराब थी कि महीने में बीस दिन चूल्हा नहीं जल पाता था। शेखचिल्ली की बेवकूफी और सुस्ती की सजा उसकी बीवी को भी भुगतनी पड़ती और भूखे रहना पड़ता। एक दिन शेखचिल्ली की बीवी को बड़ा गुस्सा आया। वह बहुत बिगड़ी और कहा , " अब मैं तुम्हारी कोई भी बात नहीं सुनना चाहती। चाहे जो कुछ करो , लेकिन मुझे तो पैसा चाहिए। जब तक तुम कोई कमाई करके नहीं लाओगे , मैं घर में नहीं , घुसने दूंगी। " यह कहकर बीवी ने शेखचिल्ली को नौकरी की खोज में जाने को मजबूर कर दिया। साथ में , रास्ते के लिए चार रूखी - सूखी रोटियां भी बांध दीं। साग - सालन कोई था ही नहीं , देती कहाँ से? इस प्रकार शेखचिल्ली को न चाहते हुए भी नौकरी की खोज में निकलना पड़ा।

शेखचिल्ली सबसे पहले अपने गांव के साहूकार के यहाँ गए। सोचा कि शायद साहूकार कोई छोटी - मोटी नौकरी दे दे। लेकिन निराश होना पड़ा। साहूकार के कारिन्दों ने ड्योढ़ी पर से ही डांट - डपटकर भगा दिया। अब शेखचिल्ली के सामने कोई रास्ता नहीं था। फिर भी एक गांव से दूसरे गांव तक दिन भर भटकते रहे। घर लौट नहीं सकते थे , क्योंकि बीवी ने सख्त हिदायत दे रखी थी कि जब तक नौकरी न मिल जाए , घर में पैर न रखना। दिन भर चलते - चलते जब शेखचिल्ली थककर चूर हो गए तो सोचा कि कुछ देर सुस्ता लिया जाए। भूख भी जोरों की लगी थी , इसलिए खाना खाने की बात भी उनके मन में थी। तभी कुछ दूर पर एक कुआं दिखाई दिया। शेखचिल्ली को हिम्मत बंधी और उसी की ओर बढ़ चले। कुएं के चबूतरे पर बैठकर शेखचिल्ली ने बीवी की दी हुई रोटियों की पोटली खोली। उसमें चार रूखी - सूखी रोटियां थीं। भूख तो इतनी जोर की लगी थी कि उन चारों से भी पूरी तरह न बुझ पाती। लेकिन समस्या यह भी थी कि अगर चारों रोटियों आज ही खा डालीं तो कल - परसों या उससे अगले दिन क्या करूंगा , क्योंकि नौकरी खोजे बिना घर घुसना नामुमकिन था। इसी सोच - विचार में शेखचिल्ली बार - बार रोटियां गिनते और बारबार रख देते। समझ में नहीं आता कि क्या किया जाए। जब शेखचिल्ली से अपने आप कोई फैसला न हो पाया तो कुएं के देव की मदद लेनी चाही। वह हाथ जोड़कर खड़े हो गए और बोले , " हे बाबा , अब तुम्हीं हमें आगे रास्ता दिखाओ। दिन भर कुछ भी नहीं खाया है। भूख तो इतनी लगी है कि चारों को खा जाने के बाद भी शायद ही मिट पाए। लेकिन अगर चारों को खा लेता हूँ तो आगे क्या करूंगा? मुझे अभी कई दिनों यहीं आसपास भटकना है। इसलिए हे कुआं बाबा , अब तुम्हीं बताओ कि मैं क्या करूं! एक खाऊं , दो खाऊं , तीन खाऊं चारों खा जाऊं? " लेकिन कुएं की ओर से कोई जवाब नहीं मिला। वह बोल तो सकता नहीं था , इसलिए कैसे जवाब देता!

उस कुएं के अन्दर चार परियां रहती थीं। उन्होंने जब शेखचिल्ली की बात सुनी तो सोचा कि कोई दानव आया है जो उन्हीं चारों को खाने की बात सोच रहा है। इसलिए तय किया कि चारों को कुएं से बाहर निकालकर उस दानव की विनती करनी चाहिए , ताकि वह उन्हें न खाए। यह सोचकर चारों परियां कुएं से बाहर निकल आई। हाथ जोड़कर वे शेखचिल्ली से बोलीं , " हे दानवराज , आप तो बड़े बलशाली हैं! आप व्यर्थ ही हम चारों को खाने की बात सोच रहे हैं। अगर आप हमें छोड़ दें तो हम कुछ ऐसी चीजें आपको दे सकती हैं जो आपके बड़े काम आएंगी। " परियों को देखकर व उनकी बातें सुनकर शेखचिल्ली हक्के - बक्के रह गए। समझ में न आया कि क्या जवाब दे। लेकिन परियों ने इस चुप्पी का यह मतलब निकाला कि उनकी बात मान ली गई। इसलिए उन्होंने एक कठपुतला व एक कटोरा शेखचिल्ली को देते हुए कहा , " हे दानवराज , आप ने हमारी बात मान ली , इसलिए हम सब आपका बहुत - बहुत उपकार मानती हैं। साथ ही अपनी यह दो तुच्छ भेंटें आपको दे रही हैं। यह कठपुतला हर समय आपकी नौकरी बजाएगा। आप जो कुछ कहेंगे , करेगा। और यह कटोरा वह हर एक खाने की चीज आपके सामने पेश करेगा , जो आप इससे मांगेंगे। " इसके बाद परियां फिर कुएं के अन्दर चली गई।

इस सबसे शेखचिल्ली की खुशी की सीमा न रही। उसने सोचा कि अब घर लौट चलना चाहिए। क्योंकि बीवी जब इन दोनों चीजों के करतब देखेगी तो फूली न समाएगी। लेकिन सूरज डूब चुका था और रात घिर आई थी , इसलिए शेखचिल्ली पास के एक गांव में चले गए और एक आदमी से रात भर के लिए अपने यहाँ ठहरा लेने को कहा। यह भी वादा किया कि इसके बदले में वह घर के सारे लोगों को अच्छे - अच्छे पकवान व मिठाइयां खिलाएंगे। वह आदमी तैयार हो गया और शेखचिल्ली को अपनी बैठक में ठहरा लिया। शेखचिल्ली ने भी अपने कटोरे को निकाला और उसने अपने करतब दिखाने को कहा। बात की बात में खाने की अच्छी - अच्छी चीजों के ढेर लग गए। जब सारे लोग खा - पी चुके तो उस आदमी की घरवाली जूठे बरतनों को लेकर नाली की ओर चली। यह देखकर शेखचिल्ली ने उसे रोक दिया और कहा कि मेरा कठपुतला बर्तन साफ कर देगा। शेखचिल्ली के कहने भर की देर थी कि कठपुतले ने सारे के सारे बर्तन पल भर में निपटा डाले। शेखचिल्ली के कठपुतले और कटोरे के यह अजीबोगरीब करतब देखकर गांव के उस आदमी और उसकी बीवी के मन में लालच आ गया शेखचिल्ली जब सो गए तो वह दोनों चुपके से उठे और शेखचिल्ली के कटोरे व कठपुतले को चुराकर उनकी जगह एक नकली कठपुतला और नकली ही कटोरा रख दिया। शेखचिल्ली को यह बात पता न चली। सबेरे उठकर उन्होंने हाथ - मुंह धोया और दोनों नकली चीजें लेकर घर की ओर चल दिए।

घर पहुंचकर उन्होंने बड़ी डींगें हांकी और बीवी से कहा , " भागवान , अब तुझे कभी किसी बात के लिए झींकना नहीं पड़ेगा। न घर में खाने को किसी चीज की कमी रहेगी और न ही कोई काम हमें - तुम्हें करना पड़ेगा। तुम जो चीज खाना चाहोगी , मेरा यह कटोरा तुम्हें खिलाएगा और जो काम करवाना चाहोगी मेरा यह कठपुतला कर डालेगा। " लेकिन शेखचिल्ली की बीवी को इन बातों पर विश्वास न हुआ। उसने कहा , " तुम तो ऐसी डींगे रोज ही मारा करते हो। कुछ करके दिखाओ तो जानूं। " हां , क्यों नहीं? " शेखचिल्ली ने तपाक से जबाव दिया और कटोरा व कठपुतलें में अपने - अपने करतब दिखाने को कहा। लेकिन वह दोनों चीजें तो नकली थीं , अत: शेखचिल्ली की बात झूठी निकली। नतीजा यह हुआ कि उनकी बीवी पहले से ज्यादा नाराज हो उठी। कहा , " तुम मुझे इस तरह धोखा देने की कोशिश करते हो। जब से तुम घर से गए हो , घर में चूल्हा नहीं जला है। कहीं जाकर मन लगाकर काम करो तो कुछ तनखा मिले और हम दोनों को दो जून खाना नसीब हो। इन जादुई चीजों से कुछ नहीं होने का। "

बेबस शेखचिल्ली खिसियाए हुए - से फिर चल दिए। वह फिर उसी कुएं के चबूतरे पर जाकर बैठ गए। समझ में नहीं आ रहा था कि अब क्या किया जाए। जब सोचते - सोचते वह हार गए और कुछ भी समझ में न आया तो उनकी आंखें छलछला आई और रोने लगे। यह देखकर कुएं की चारों परियां फिर बाहर आयी और शेखचिल्ली से उनके रोने का कारण पूछा। शेखचिल्ली ने सारी आपबीती कह सुनाई। परियों को हंसी आ गई। वे बोलीं , " हमने तो तुमको कोई भयानक दानव समझा था। और इसलिए खुश करने के लिए वे चीजें दी थीं। लेकिन तुम तो बड़े ही भोले - भाले और सीधे आदमी निकले। खैर , घबराने की जरूरत नहीं। हम तुम्हारी मदद करेंगी। तुम्हारा कठपुतला और कटोरा उन्हीं लोगों ने चुराया है , जिनके यहाँ रात को तुम रुके थे। इस बार तुम्हें एक रस्सी व डंडा दे रही हैं। इनकी मदद से तुम उन दोनों को बांध व मारकर अपनी दोनों चीजें वापस पा सकते हो। " इसके बाद परियां फिर कुएं में चली गयीं।

जादुई रस्सी - डंडा लेकर शेखचिल्ली फिर उसी आदमी के यहाँ पहुंचे और कहा , " इस बार मैं तुम्हें कुछ और नये करतब दिखाऊंगा। " वह आदमी भी लालच का मारा था। उसने समझा कि इस बार कुछ और जादुई चीजें हाथ लगेंगी। इसलिए उसमें खुशीखुशी शेखचिल्ली को अपने यहाँ टिका लिया। लेकिन इस बार उल्टा ही हुआ। शेखचिल्ली ने जैसे ही हुक्म दिया वैसे ही उस घरवाले व उसकी बीवी को जादुई रस्सी ने कस कर बांध लिया और जादुई डंडा दनादन पिटाई करने लगा। अब तो वे दोनों चीखने - चिल्लाने और माफी मांगने लगे। शेखचिल्ली ने कहा , " तुम दोनों ने मुझे धोखा दिया है। मैंने तो यह सोचा था कि तुमने मुझे रहने को जगह दी है , इसलिए मैं भी तुम्हारे साथ कोई भलाई कर दूं। लेकिन तुमने मेरे साथ उल्टा बर्ताव किया! मेरे कठपुतले और कटोरे को ही चुरा लिया। अब जब वे दोनों चीजें तुम मुझे वापस कर दोगे , तभी मैं अपनी रस्सी व डंडे को रुकने का हुक्म दूंगा। " उन दोनों ने झटपट दोनों चुराई हुई चीजें शेखचिल्ली को वापस कर दीं। यह देखकर शेखचिल्ली ने भी अपनी रस्सी व डंडे को रुक जाने का हुक्म दे दिया।

अब अपनी चारों जादुई चीजें लेकर शेखचिल्ली प्रसन् न मन से घर को वापस लौट पड़े। जब बीवी ने फिर देखा कि शेखचिल्ली वापस आ गए हैं तो उसे बड़ा गुस्सा आया। उसे तो कई दिनों से खाने को कुछ मिला नहीं था , इसलिए वह भी झुंझलाई हुई थी। दूर से ही देखकर वह चीखी , " कामचोर तुम फिर लौट आए! खबरदार , घर के अंदर पैर न रखना! वरना तुम्हारे लिए बेलन रखा है। " यह सुनकर शेखचिल्ली दरवाजे पर ही रुक गए! मन ही मन उन्होंने रस्सी व डंडे को हुक्म दिया कि वे उसे काबू में करें। रस्सी और डंडे ने अपना काम शुरू कर दिया। रस्सी ने कसकर बांध लिया और डंडे ने पिटाई शुरू कर दी। यह जादुई करतब देखकर बीवी ने भी अपने सारे हथियार डाल दिए और कभी वैसा बुरा बर्ताव न करने का वादा किया। तभी उसे भी रस्सी व डंडे से छुटकारा मिला। अब शेखचिल्ली ने अपने कठपुतले व कटोरे को हुक्म देना शुरू किया। बस , फिर क्या था! कठपुतला बर्तन - भाड़े व जिन - जिन चीजों की कमी थी झटपट ले आया और कटोरे ने बात की बात में नाना प्रकार के व्यंजन तैयार कर दिए।

----

(टीडीआईएल हिन्दी कार्पोरा से साभार)

टिप्पणियाँ

ब्लॉगर: 2
रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

---प्रायोजक---

---***---

---प्रायोजक---

---***---

|नई रचनाएँ_$type=list$au=0$label=1$count=5$page=1$com=0$va=0$rm=1$h=100

प्रायोजक

--***--

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

~ विधा/विषय पर क्लिक/टच कर पढ़ें : ~

|* कहानी * || * उपन्यास *|| * हास्य-व्यंग्य * || * कविता  *|| * आलेख * || * लोककथा * || * लघुकथा * || * ग़ज़ल  *|| * संस्मरण * || * साहित्य समाचार * || * कला जगत  *|| * पाक कला * || * हास-परिहास * || * नाटक * || * बाल कथा * || * विज्ञान कथा * |* समीक्षा * |

---***---



---प्रायोजक---

---***---

|आपको ये रचनाएँ भी पसंद आएंगी-_$type=three$count=6$src=random$page=1$va=0$au=0$h=110$d=0

प्रायोजक

----****----

नाम

 आलेख ,1, कविता ,1, कहानी ,1, व्यंग्य ,1,14 सितम्बर,7,14 september,6,15 अगस्त,4,2 अक्टूबर अक्तूबर,1,अंजनी श्रीवास्तव,1,अंजली काजल,1,अंजली देशपांडे,1,अंबिकादत्त व्यास,1,अखिलेश कुमार भारती,1,अखिलेश सोनी,1,अग्रसेन,1,अजय अरूण,1,अजय वर्मा,1,अजित वडनेरकर,1,अजीत प्रियदर्शी,1,अजीत भारती,1,अनंत वडघणे,1,अनन्त आलोक,1,अनमोल विचार,1,अनामिका,3,अनामी शरण बबल,1,अनिमेष कुमार गुप्ता,1,अनिल कुमार पारा,1,अनिल जनविजय,1,अनुज कुमार आचार्य,5,अनुज कुमार आचार्य बैजनाथ,1,अनुज खरे,1,अनुपम मिश्र,1,अनूप शुक्ल,14,अपर्णा शर्मा,6,अभिमन्यु,1,अभिषेक ओझा,1,अभिषेक कुमार अम्बर,1,अभिषेक मिश्र,1,अमरपाल सिंह आयुष्कर,2,अमरलाल हिंगोराणी,1,अमित शर्मा,3,अमित शुक्ल,1,अमिय बिन्दु,1,अमृता प्रीतम,1,अरविन्द कुमार खेड़े,5,अरूण देव,1,अरूण माहेश्वरी,1,अर्चना चतुर्वेदी,1,अर्चना वर्मा,2,अर्जुन सिंह नेगी,1,अविनाश त्रिपाठी,1,अशोक गौतम,3,अशोक जैन पोरवाल,14,अशोक शुक्ल,1,अश्विनी कुमार आलोक,1,आई बी अरोड़ा,1,आकांक्षा यादव,1,आचार्य बलवन्त,1,आचार्य शिवपूजन सहाय,1,आजादी,3,आदित्य प्रचंडिया,1,आनंद टहलरामाणी,1,आनन्द किरण,3,आर. के. नारायण,1,आरकॉम,1,आरती,1,आरिफा एविस,5,आलेख,4095,आलोक कुमार,2,आलोक कुमार सातपुते,1,आवश्यक सूचना!,1,आशीष कुमार त्रिवेदी,5,आशीष श्रीवास्तव,1,आशुतोष,1,आशुतोष शुक्ल,1,इंदु संचेतना,1,इन्दिरा वासवाणी,1,इन्द्रमणि उपाध्याय,1,इन्द्रेश कुमार,1,इलाहाबाद,2,ई-बुक,341,ईबुक,196,ईश्वरचन्द्र,1,उपन्यास,262,उपासना,1,उपासना बेहार,5,उमाशंकर सिंह परमार,1,उमेश चन्द्र सिरसवारी,2,उमेशचन्द्र सिरसवारी,1,उषा छाबड़ा,1,उषा रानी,1,ऋतुराज सिंह कौल,1,ऋषभचरण जैन,1,एम. एम. चन्द्रा,17,एस. एम. चन्द्रा,2,कथासरित्सागर,1,कर्ण,1,कला जगत,112,कलावंती सिंह,1,कल्पना कुलश्रेष्ठ,11,कवि,2,कविता,3061,कहानी,2275,कहानी संग्रह,245,काजल कुमार,7,कान्हा,1,कामिनी कामायनी,5,कार्टून,7,काशीनाथ सिंह,2,किताबी कोना,7,किरन सिंह,1,किशोरी लाल गोस्वामी,1,कुंवर प्रेमिल,1,कुबेर,7,कुमार करन मस्ताना,1,कुसुमलता सिंह,1,कृश्न चन्दर,6,कृष्ण,3,कृष्ण कुमार यादव,1,कृष्ण खटवाणी,1,कृष्ण जन्माष्टमी,5,के. पी. सक्सेना,1,केदारनाथ सिंह,1,कैलाश मंडलोई,3,कैलाश वानखेड़े,1,कैशलेस,1,कैस जौनपुरी,3,क़ैस जौनपुरी,1,कौशल किशोर श्रीवास्तव,1,खिमन मूलाणी,1,गंगा प्रसाद श्रीवास्तव,1,गंगाप्रसाद शर्मा गुणशेखर,1,ग़ज़लें,542,गजानंद प्रसाद देवांगन,2,गजेन्द्र नामदेव,1,गणि राजेन्द्र विजय,1,गणेश चतुर्थी,1,गणेश सिंह,4,गांधी जयंती,1,गिरधारी राम,4,गीत,3,गीता दुबे,1,गीता सिंह,1,गुंजन शर्मा,1,गुडविन मसीह,2,गुनो सामताणी,1,गुरदयाल सिंह,1,गोरख प्रभाकर काकडे,1,गोवर्धन यादव,1,गोविन्द वल्लभ पंत,1,गोविन्द सेन,5,चंद्रकला त्रिपाठी,1,चंद्रलेखा,1,चतुष्पदी,1,चन्द्रकिशोर जायसवाल,1,चन्द्रकुमार जैन,6,चाँद पत्रिका,1,चिकित्सा शिविर,1,चुटकुला,71,ज़कीया ज़ुबैरी,1,जगदीप सिंह दाँगी,1,जयचन्द प्रजापति कक्कूजी,2,जयश्री जाजू,4,जयश्री राय,1,जया जादवानी,1,जवाहरलाल कौल,1,जसबीर चावला,1,जावेद अनीस,8,जीवंत प्रसारण,130,जीवनी,1,जीशान हैदर जैदी,1,जुगलबंदी,5,जुनैद अंसारी,1,जैक लंडन,1,ज्ञान चतुर्वेदी,2,ज्योति अग्रवाल,1,टेकचंद,1,ठाकुर प्रसाद सिंह,1,तकनीक,31,तक्षक,1,तनूजा चौधरी,1,तरुण भटनागर,1,तरूण कु सोनी तन्वीर,1,ताराशंकर बंद्योपाध्याय,1,तीर्थ चांदवाणी,1,तुलसीराम,1,तेजेन्द्र शर्मा,2,तेवर,1,तेवरी,8,त्रिलोचन,8,दामोदर दत्त दीक्षित,1,दिनेश बैस,6,दिलबाग सिंह विर्क,1,दिलीप भाटिया,1,दिविक रमेश,1,दीपक आचार्य,48,दुर्गाष्टमी,1,देवी नागरानी,20,देवेन्द्र कुमार मिश्रा,2,देवेन्द्र पाठक महरूम,1,दोहे,1,धर्मेन्द्र निर्मल,2,धर्मेन्द्र राजमंगल,2,नइमत गुलची,1,नजीर नज़ीर अकबराबादी,1,नन्दलाल भारती,2,नरेंद्र शुक्ल,2,नरेन्द्र कुमार आर्य,1,नरेन्द्र कोहली,2,नरेन्‍द्रकुमार मेहता,9,नलिनी मिश्र,1,नवदुर्गा,1,नवरात्रि,1,नागार्जुन,1,नाटक,110,नामवर सिंह,1,निबंध,3,नियम,1,निर्मल गुप्ता,2,नीतू सुदीप्ति ‘नित्या’,1,नीरज खरे,1,नीलम महेंद्र,1,नीला प्रसाद,1,पंकज प्रखर,4,पंकज मित्र,2,पंकज शुक्ला,1,पंकज सुबीर,3,परसाई,1,परसाईं,1,परिहास,4,पल्लव,1,पल्लवी त्रिवेदी,2,पवन तिवारी,2,पाक कला,23,पाठकीय,62,पालगुम्मि पद्मराजू,1,पुनर्वसु जोशी,9,पूजा उपाध्याय,2,पोपटी हीरानंदाणी,1,पौराणिक,1,प्रज्ञा,1,प्रताप सहगल,1,प्रतिभा,1,प्रतिभा सक्सेना,1,प्रदीप कुमार,1,प्रदीप कुमार दाश दीपक,1,प्रदीप कुमार साह,11,प्रदोष मिश्र,1,प्रभात दुबे,1,प्रभु चौधरी,2,प्रमिला भारती,1,प्रमोद कुमार तिवारी,1,प्रमोद भार्गव,2,प्रमोद यादव,14,प्रवीण कुमार झा,1,प्रांजल धर,1,प्राची,367,प्रियंवद,2,प्रियदर्शन,1,प्रेम कहानी,1,प्रेम दिवस,2,प्रेम मंगल,1,फिक्र तौंसवी,1,फ्लेनरी ऑक्नर,1,बंग महिला,1,बंसी खूबचंदाणी,1,बकर पुराण,1,बजरंग बिहारी तिवारी,1,बरसाने लाल चतुर्वेदी,1,बलबीर दत्त,1,बलराज सिंह सिद्धू,1,बलूची,1,बसंत त्रिपाठी,2,बातचीत,1,बाल कथा,346,बाल कलम,25,बाल दिवस,4,बालकथा,68,बालकृष्ण भट्ट,1,बालगीत,16,बृज मोहन,2,बृजेन्द्र श्रीवास्तव उत्कर्ष,1,बेढब बनारसी,1,बैचलर्स किचन,1,बॉब डिलेन,1,भरत त्रिवेदी,1,भागवत रावत,1,भारत कालरा,1,भारत भूषण अग्रवाल,1,भारत यायावर,2,भावना राय,1,भावना शुक्ल,5,भीष्म साहनी,1,भूतनाथ,1,भूपेन्द्र कुमार दवे,1,मंजरी शुक्ला,2,मंजीत ठाकुर,1,मंजूर एहतेशाम,1,मंतव्य,1,मथुरा प्रसाद नवीन,1,मदन सोनी,1,मधु त्रिवेदी,2,मधु संधु,1,मधुर नज्मी,1,मधुरा प्रसाद नवीन,1,मधुरिमा प्रसाद,1,मधुरेश,1,मनीष कुमार सिंह,4,मनोज कुमार,6,मनोज कुमार झा,5,मनोज कुमार पांडेय,1,मनोज कुमार श्रीवास्तव,2,मनोज दास,1,ममता सिंह,2,मयंक चतुर्वेदी,1,महापर्व छठ,1,महाभारत,2,महावीर प्रसाद द्विवेदी,1,महाशिवरात्रि,1,महेंद्र भटनागर,3,महेन्द्र देवांगन माटी,1,महेश कटारे,1,महेश कुमार गोंड हीवेट,2,महेश सिंह,2,महेश हीवेट,1,मानसून,1,मार्कण्डेय,1,मिलन चौरसिया मिलन,1,मिलान कुन्देरा,1,मिशेल फूको,8,मिश्रीमल जैन तरंगित,1,मीनू पामर,2,मुकेश वर्मा,1,मुक्तिबोध,1,मुर्दहिया,1,मृदुला गर्ग,1,मेराज फैज़ाबादी,1,मैक्सिम गोर्की,1,मैथिली शरण गुप्त,1,मोतीलाल जोतवाणी,1,मोहन कल्पना,1,मोहन वर्मा,1,यशवंत कोठारी,8,यशोधरा विरोदय,2,यात्रा संस्मरण,29,योग,3,योग दिवस,3,योगासन,2,योगेन्द्र प्रताप मौर्य,1,योगेश अग्रवाल,2,रक्षा बंधन,1,रच,1,रचना समय,72,रजनीश कांत,2,रत्ना राय,1,रमेश उपाध्याय,1,रमेश राज,26,रमेशराज,8,रवि रतलामी,2,रवींद्र नाथ ठाकुर,1,रवीन्द्र अग्निहोत्री,4,रवीन्द्र नाथ त्यागी,1,रवीन्द्र संगीत,1,रवीन्द्र सहाय वर्मा,1,रसोई,1,रांगेय राघव,1,राकेश अचल,3,राकेश दुबे,1,राकेश बिहारी,1,राकेश भ्रमर,5,राकेश मिश्र,2,राजकुमार कुम्भज,1,राजन कुमार,2,राजशेखर चौबे,6,राजीव रंजन उपाध्याय,11,राजेन्द्र कुमार,1,राजेन्द्र विजय,1,राजेश कुमार,1,राजेश गोसाईं,2,राजेश जोशी,1,राधा कृष्ण,1,राधाकृष्ण,1,राधेश्याम द्विवेदी,5,राम कृष्ण खुराना,6,राम शिव मूर्ति यादव,1,रामचंद्र शुक्ल,1,रामचन्द्र शुक्ल,1,रामचरन गुप्त,5,रामवृक्ष सिंह,10,रावण,1,राहुल कुमार,1,राहुल सिंह,1,रिंकी मिश्रा,1,रिचर्ड फाइनमेन,1,रिलायंस इन्फोकाम,1,रीटा शहाणी,1,रेंसमवेयर,1,रेणु कुमारी,1,रेवती रमण शर्मा,1,रोहित रुसिया,1,लक्ष्मी यादव,6,लक्ष्मीकांत मुकुल,2,लक्ष्मीकांत वैष्णव,1,लखमी खिलाणी,1,लघु कथा,245,लघुकथा,1269,लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन,241,लतीफ घोंघी,1,ललित ग,1,ललित गर्ग,13,ललित निबंध,19,ललित साहू जख्मी,1,ललिता भाटिया,2,लाल पुष्प,1,लावण्या दीपक शाह,1,लीलाधर मंडलोई,1,लू सुन,1,लूट,1,लोक,1,लोककथा,340,लोकतंत्र का दर्द,1,लोकमित्र,1,लोकेन्द्र सिंह,3,विकास कुमार,1,विजय केसरी,1,विजय शिंदे,1,विज्ञान कथा,68,विद्यानंद कुमार,1,विनय भारत,1,विनीत कुमार,2,विनीता शुक्ला,3,विनोद कुमार दवे,4,विनोद तिवारी,1,विनोद मल्ल,1,विभा खरे,1,विमल चन्द्राकर,1,विमल सिंह,1,विरल पटेल,1,विविध,1,विविधा,1,विवेक प्रियदर्शी,1,विवेक रंजन श्रीवास्तव,5,विवेक सक्सेना,1,विवेकानंद,1,विवेकानन्द,1,विश्वंभर नाथ शर्मा कौशिक,2,विश्वनाथ प्रसाद तिवारी,1,विष्णु नागर,1,विष्णु प्रभाकर,1,वीणा भाटिया,15,वीरेन्द्र सरल,10,वेणीशंकर पटेल ब्रज,1,वेलेंटाइन,3,वेलेंटाइन डे,2,वैभव सिंह,1,व्यंग्य,2013,व्यंग्य के बहाने,2,व्यंग्य जुगलबंदी,17,व्यथित हृदय,2,शंकर पाटील,1,शगुन अग्रवाल,1,शबनम शर्मा,7,शब्द संधान,17,शम्भूनाथ,1,शरद कोकास,2,शशांक मिश्र भारती,8,शशिकांत सिंह,12,शहीद भगतसिंह,1,शामिख़ फ़राज़,1,शारदा नरेन्द्र मेहता,1,शालिनी तिवारी,8,शालिनी मुखरैया,6,शिक्षक दिवस,6,शिवकुमार कश्यप,1,शिवप्रसाद कमल,1,शिवरात्रि,1,शिवेन्‍द्र प्रताप त्रिपाठी,1,शीला नरेन्द्र त्रिवेदी,1,शुभम श्री,1,शुभ्रता मिश्रा,1,शेखर मलिक,1,शेषनाथ प्रसाद,1,शैलेन्द्र सरस्वती,3,शैलेश त्रिपाठी,2,शौचालय,1,श्याम गुप्त,3,श्याम सखा श्याम,1,श्याम सुशील,2,श्रीनाथ सिंह,6,श्रीमती तारा सिंह,2,श्रीमद्भगवद्गीता,1,श्रृंगी,1,श्वेता अरोड़ा,1,संजय दुबे,4,संजय सक्सेना,1,संजीव,1,संजीव ठाकुर,2,संद मदर टेरेसा,1,संदीप तोमर,1,संपादकीय,3,संस्मरण,714,संस्मरण लेखन पुरस्कार 2018,128,सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन,1,सतीश कुमार त्रिपाठी,2,सपना महेश,1,सपना मांगलिक,1,समीक्षा,802,सरिता पन्थी,1,सविता मिश्रा,1,साइबर अपराध,1,साइबर क्राइम,1,साक्षात्कार,18,सागर यादव जख्मी,1,सार्थक देवांगन,2,सालिम मियाँ,1,साहित्य समाचार,91,साहित्यम्,6,साहित्यिक गतिविधियाँ,211,साहित्यिक बगिया,1,सिंहासन बत्तीसी,1,सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी,1,सी.बी.श्रीवास्तव विदग्ध,1,सीताराम गुप्ता,1,सीताराम साहू,1,सीमा असीम सक्सेना,1,सीमा शाहजी,1,सुगन आहूजा,1,सुचिंता कुमारी,1,सुधा गुप्ता अमृता,1,सुधा गोयल नवीन,1,सुधेंदु पटेल,1,सुनीता काम्बोज,1,सुनील जाधव,1,सुभाष चंदर,1,सुभाष चन्द्र कुशवाहा,1,सुभाष नीरव,1,सुभाष लखोटिया,1,सुमन,1,सुमन गौड़,1,सुरभि बेहेरा,1,सुरेन्द्र चौधरी,1,सुरेन्द्र वर्मा,62,सुरेश चन्द्र,1,सुरेश चन्द्र दास,1,सुविचार,1,सुशांत सुप्रिय,4,सुशील कुमार शर्मा,24,सुशील यादव,6,सुशील शर्मा,16,सुषमा गुप्ता,20,सुषमा श्रीवास्तव,2,सूरज प्रकाश,1,सूर्य बाला,1,सूर्यकांत मिश्रा,14,सूर्यकुमार पांडेय,2,सेल्फी,1,सौमित्र,1,सौरभ मालवीय,4,स्नेहमयी चौधरी,1,स्वच्छ भारत,1,स्वतंत्रता दिवस,3,स्वराज सेनानी,1,हबीब तनवीर,1,हरि भटनागर,6,हरि हिमथाणी,1,हरिकांत जेठवाणी,1,हरिवंश राय बच्चन,1,हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन,4,हरिशंकर परसाई,23,हरीश कुमार,1,हरीश गोयल,1,हरीश नवल,1,हरीश भादानी,1,हरीश सम्यक,2,हरे प्रकाश उपाध्याय,1,हाइकु,5,हाइगा,1,हास-परिहास,38,हास्य,59,हास्य-व्यंग्य,78,हिंदी दिवस विशेष,9,हुस्न तबस्सुम 'निहाँ',1,biography,1,dohe,3,hindi divas,6,hindi sahitya,1,indian art,1,kavita,3,review,1,satire,1,shatak,3,tevari,3,undefined,1,
ltr
item
रचनाकार: उत्तर प्रदेश की लोक-कथाएं
उत्तर प्रदेश की लोक-कथाएं
http://lh6.ggpht.com/raviratlami/SFEi4-IFszI/AAAAAAAADOs/7kUaDVcCp-U/lok%20katha_thumb%5B1%5D.jpg?imgmax=800
http://lh6.ggpht.com/raviratlami/SFEi4-IFszI/AAAAAAAADOs/7kUaDVcCp-U/s72-c/lok%20katha_thumb%5B1%5D.jpg?imgmax=800
रचनाकार
https://www.rachanakar.org/2008/06/blog-post_8220.html
https://www.rachanakar.org/
https://www.rachanakar.org/
https://www.rachanakar.org/2008/06/blog-post_8220.html
true
15182217
UTF-8
सभी पोस्ट लोड किया गया कोई पोस्ट नहीं मिला सभी देखें आगे पढ़ें जवाब दें जवाब रद्द करें मिटाएँ द्वारा मुखपृष्ठ पृष्ठ पोस्ट सभी देखें आपके लिए और रचनाएँ विषय ग्रंथालय SEARCH सभी पोस्ट आपके निवेदन से संबंधित कोई पोस्ट नहीं मिला मुख पृष्ठ पर वापस रविवार सोमवार मंगलवार बुधवार गुरूवार शुक्रवार शनिवार रवि सो मं बु गु शु शनि जनवरी फरवरी मार्च अप्रैल मई जून जुलाई अगस्त सितंबर अक्तूबर नवंबर दिसंबर जन फर मार्च अप्रैल मई जून जुला अग सितं अक्तू नवं दिसं अभी अभी 1 मिनट पहले $$1$$ minutes ago 1 घंटा पहले $$1$$ hours ago कल $$1$$ days ago $$1$$ weeks ago 5 सप्ताह से भी पहले फॉलोअर फॉलो करें यह प्रीमियम सामग्री तालाबंद है STEP 1: Share to a social network STEP 2: Click the link on your social network सभी कोड कॉपी करें सभी कोड चुनें सभी कोड आपके क्लिपबोर्ड में कॉपी हैं कोड / टैक्स्ट कॉपी नहीं किया जा सका. कॉपी करने के लिए [CTRL]+[C] (या Mac पर CMD+C ) कुंजियाँ दबाएँ