विजय शर्मा का आलेख : पर्ल बक : निजी त्रासदी का उदात्तीकरण

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(पर्ल बक – चित्र साभार नोबेलप्राइज.ऑर्ग) नोबेल पुरस्कार विजेता पर्ल बक से हिन्दी के बहुत से पाठक परिचित हैं. उनका ‘गुड अर्थ’ एक समय के ...

(पर्ल बक – चित्र साभार नोबेलप्राइज.ऑर्ग)

नोबेल पुरस्कार विजेता पर्ल बक से हिन्दी के बहुत से पाठक परिचित हैं. उनका ‘गुड अर्थ’ एक समय के चीन के जीवन का आइना है. यह चीन के एक गरीब किसान वाँग लंग के जीवन के उतार-चढ़ाव की महागाथा है. साथ ही यह मनुष्य की जिजीविषा, उसकी नैतिकता, उसके मन में चलने वाले द्वंद्वों, उसके आंतरिक और बाह्य संघर्षों, उसके अच्छे-बुरे कर्मों, उसके पतन और उत्थान का महाकाव्य भी है. इस तरह यह मात्र चीन के एक किसान की कहानी न रह कर सार्वभौमिक कहानी बन जाती है.

इस उपन्यास में एक बच्ची का चरित्र आया है. जिसका पूरे उपन्यास में कोई नाम नहीं है, वाँग उसे बेवकूफ बच्ची कहता है. यह बच्ची मानसिक रूप से अविकसित है और नायक के लिए दुःख और करुणा का वायस है. यह सदा हँसती रहती है. जब भी पिता पुत्री की आँखें मिलती है वह हँसती है. शुरु-शुरु में वह निहाल होता है पर जैसे-जैसे समय बीतता है उसका धैर्य चुकने लगता है. वह बच्ची के मुँह से अपने लिए कुछ शब्द सुनने की आशा करता है, जैसे कि इस उम्र में उसके अन्य बच्चे उसे ‘डा डा’ पुकारते थे पर उसकी यह आशा दुराशा मात्र सिद्ध होती है. समय बीतता जाता है जो मुस्कुराहट खुशी लाती थी वह चिढ पैदा करने लगती है. वह मुनभुनाने लगता है, ‘बेवकूफ, मेरी बिचारी बेवकूफ बेटी.’ वह मन ही मन रोता है. बच्ची इतनी अक्षम है कि उसे खाना खिलाना पड़ता है. सूरज दिखाना पड़ता है और सर्दी, वर्षा, पानी से बचाने के लिए चिंता करनी पड़ती है. वह इतनी नासमझ है कि जब सब लोग रो रहे होते हैं तब भी वह हँसती रहती है, घंटों कपड़े के एक टुकडे को तह लगाती, खोलती रहती है. कोई आए, कोई जाए, कोई कुछ करे, कहे, उसे कोई फर्क नहीं पड़ता है. वह केवल अपने माँ बाप को पहचानती है पर उनसे भी कोई संवाद कायम नहीं कर सकती है. बाद के वर्षों में जैसी कि उम्मीद थी वाँग लंग की बहु का कथन, ‘ऐसे लोगों को जीना नहीं चाहिए’ वाँग की बेबसी और गुस्से को बढ़ाता है पर वह लाचार है. कुछ आलोचक इस चरित्र का अर्थ बेबस मानवता से लेते हैं. वे इसे मनुष्यता की शाश्वत असहायता का प्रतीक मानते हैं.

इसी तरह उन्होंने एक और कहानी लिखी, ‘द चाइल्ड हू नेवर ग्रू’ इसमें भी वे एक अविकसित मानस के बच्चे की बात लिखती हैं और ऐसे बच्चों की माँ पर क्या गुजरती है इसका वर्णन करती हैं. ‘माई सेवरल वल्र्ड्स’ भी इसी कथानक पर उनका काम है और उनका ‘द गिफ्ट्स दे ब्रिंग’ भी ऐसी ही एक रचना है. ‘टाइम इज नून’ में भी ऐसे अविकसित मानस के बच्चे संकेत के हैं.

पर्ल बक का समय ऐसा समय था जब विकलांगता चाहे वह मानसिक हो अथवा शारीरिक समाज में अभिशाप मानी जाती थी और न केवल वह व्यक्ति समाज के द्वारा दुत्कारा जाता था वरन पूरा परिवार अछूत मान लिया जाता था. ऐसे लोग परिवार पर एक धब्बा होते थे और परिवार के लिए समाज में शर्मनाक स्थिति पैदा करते थे. आज समय बदल गया है ऐसे बच्चों के इलाज और देखभाल के लिए पर्याप्त साधन और सुविधाएँ उपलब्ध हैं और उनके लिए शब्दावली भी बदल चुकी है आज हम उन्हें विकलांग नहीं कहते हैं उनके लिए ‘मेंटली चैलेंज्ड’ शब्द का प्रयोग करते हैं. उस काल में लोग ऐसे परिवार से कोई संबंध नहीं रखना चाहते थे जिस का कोई सदस्य किसी भी प्रकार की अपंगता का शिकार होता था. इसलिए जो लोग समर्थ होते थे वे दिल पर पत्थर रख कर ऐसी संतान को समाज की नजरों से बचा कर रखते थे. उसको छिपा कर रखते थे. कहीं उसका उल्लेख नहीं करते थे. उसके अस्तित्व को पूरी तरह से नकार दिया जाता था. जीवित संतान को भी लोग सामाजिक बदनामी के भय से मृत घोषित कर देते थे. छिप-छिप कर भले ही जार-जार रोए पर उसे खुले तौर पर अपना स्वीकार करने की हिम्मत नहीं कर पाते थे.

ऐसे अभिभावकों की असहायता, दारुण दुःख को समझा जा सकता है. पिता के लिए भी ऐसी संतान कष्टकर होती है परंतु माँ का, स्त्री का कष्ट कई गुणा ज्यादा होता है. ‘टाइम इज नून’ की नायिका मानसिक रूप से अविकसित बच्चे को जन्म देकर इतनी टूट गई है कि वह अपने पति से सहवास के लिए स्वयं को तैयार ही नहीं कर पाती है. माँ बच्चे को डॉक्टरी परीक्षण के लिए ले जाती है. डॉक्टर जाँच के बाद स्थिति बताने के पहले चुप रहता है तो यह चुप्पी कितनी जानलेवा होती है, यह प्रतीक्षा कितनी नाजुक घडी होती है. इसके लिए बक बहुत सटीक उदाहरण प्रस्तुत करती हैं. वे लिखती हैं कि ‘जन्म देने के समय की प्रतीक्षा का दर्द इस इंतजार के दर्द के समक्ष कुछ नहीं है. सारा जीवन, सारी दुनिया रुक गई. इस क्षण दुनिया में इस कमरे, इस बूढे आदमी, इस बच्चे और उसके सिवा कुछ नहीं बचा.’ पर डॉक्टर एक लम्बे समय तक कुछ नहीं कहता है. चुप रहता है. वह धीरे-धीरे बच्चे को उसके कपड़े पहना देता है. शायद डॉक्टर भी इस कडुवे सच को कहने का साहस जुटा रहा है. उसका चेहरा झुर्रियों से विकृत हो गया है. अंत में वह बच्चे की वास्तविक स्थिति माँ को बताता है. सुन कर माँ को लगता है कि उसके अस्तित्व पर बिजली गिर गई है, वह फट गया है. उस समय मेडिकल साइंस आज की तरह विकसित नहीं था. अधिकतर ऐसे केस लाइलाज माने जाते थे, उस समय थे भी लाइलाज.

पर्ल बक के लेखन में मानसिक रूप से अविकसित बच्चों और उनके अभिभावकों का चित्र बार-बार आया है. बहुत कम पाठक जानते हैं कि इन पंक्तियों में बक स्वयं को चित्रित कर रही हैं. बहुत समय तक दुनिया को नहीं मालूम था कि पर्ल बक ने १९२१ में, २९ बरस की उम्र में एक बच्ची को जन्म दिया जो जन्म के समय स्वस्थ थी परंतु कुछ दिन बाद उन्हें ज्ञात हुआ कि वह सामान्य बच्ची नहीं है. पहले वे इस बात को स्वीकार नहीं कर पाई पर बाद में वे इस बात को छिपाने लगीं कि उनकी कोई ऐसी बेटी है. उन्होंने इस राज को बीस साल तक छिपाए रखा. जो लोग जानते थे वे उन लोगों से मिन्नतें करती कि वे इस बाबत चुप रहें. उनके पति जॉन लोसिंग बक विकलांग बच्चे पर खर्च करने के पक्ष में नहीं थे और दोनों के बीच तनाव बढ़ने लगा जिसकी परिणती १८ साल के वैवाहिक जीवन के बाद उनके तलाक में हुई. पर्ल बक के प्रकाशक रिचर्ड वाल्स उनकी लगन और संघर्ष को देख रहे थे. उनका भी हाल ही में तलाक हुआ था. १९३५ में लोसिंग से तलाक के बाद उन्होंने वाल्स से विवाह किया और अमेरिका में बस गई. लोसिंग ने बाद में एक चीनी महिला से शादी की और उनके दो स्वस्थ बच्चे हुए. १९७५ में लोसिंग की मृत्यु हुई.

उन दिनों चीन में ऐसे बच्चों की देखभाल के लिए कोई संस्थान न था. पर्ल अपनी बच्ची कैरोलाइन ग्रेस बक या कैरोल (उनकी माँ का नाम भी कैरोलाइन था) को अमेरिका में रखना चाहती थीं क्योंकि उन्हें पता चला था कि न्यू जर्सी के ‘वाइनलैंड ट्रेनिंग स्कूल’ में ऐसे बच्चों की अच्छी तरह देखभाल की जाती है. परंतु उसका खर्च बहुत ज्यादा था. पर्ल ने निश्चय किया कि वे स्वयं उपार्जन करेंगी और बच्ची को इस संस्थान में रखेंगी. और इस तरह उन्होंने स्वयं को लिखने के लिए सपर्पित कर दिया. लिख वे पहले भी रहीं थी पर अब लिखने का एक खास मकसद था. उन्होंने अपने निजी दुःख को लेखन के सहारे झेला यह कहा जाए तो अतिशयोक्ति न होगी. उन्होंने लिखा और खूब लिखा. चालीस किताबें लिखीं. निजी त्रासदी के दौरान भी वे घंटों घंटों लिखती थीं. इतना ही नहीं उन्होंने अपनी निजी त्रासदी को अन्य कई उद्दात कार्यों में परिवर्तित कर दिया और मानवता के लिए एक नायाब उदाहरण छोड़ गईं. इस तरह अपने लेखन और विकलाँग बच्चों के लिए किए गए कल्याणकारी कार्यों के कारण वे सदा के लिए अमर हो गईं.

वे लिख कर चुप न बैठी रहीं उन्होंने अपनी बेटी की अवस्था की सही जानकारी के लिए खूब प्रयास किया. बहुत विशेषज्ञों से सम्फ किया, सलाह की. बाद में उन्हें ज्ञात हुआ कि यह वंशानुगत है इसका कारण उनके या उनके पति अथवा दोनों के जींस हैं और जब तक उन्हें यह बात पता चली बहुत देर हो चुकी थी. करोल ठीक होने की उम्र पार कर चुकी थी. अगर कम उम्र में बीमारी का पता चल जाए और इलाज किया जाए तो स्थिति काबू में रहने की संभावना बनती है. उनकी बेटी तो न ठीक हो सकी लेकिन उनके इस अथक प्रयास से आगे चलकर न जाने कितने बच्चों का कल्याण हुआ और हो रहा है. न जाने कितने माता पिता को राहत मिल रही है. उन्होंने इस दिशा में ऐतिहासिक योगदान दिया है.

पर्ल कैरोल के अस्तित्व को नकारती नहीं थीं पर उसके विषय में किसी को कुछ बताती भी नहीं थीं. एक बार जब उनके एक पड़ोसी ने कैरोल की स्थिति पर एक लेख लिखा तो उन्होंने उसे छपने से रोकने का हर सम्भव प्रयास किया. वे कैरोल की निजता को बचाए रखना चाहती थीं साथ ही माँ के रूप में अपने दर्द को भी. वे एक परफेक्शनिस्ट थीं भला अपनी बेटी के अधूरेपन को कैसे सार्वजनिक रूप से स्वीकार कर पातीं. इसकी पूर्ति के लिए उन्होंने एक तीन महीने की बच्ची को गोद लिया. १९२५ में जिस बच्ची को उन्होंने गोद लिया था बाद में वह जेनिस वाल्स कहलाई और उनकी वारिस भी बनी, और जिसने उनके बाद कैरोल की देखभाल की. वे स्वयं ट्यूमर से ग्रसित थीं और पुनः माँ बनने में असमर्थ थीं. बाद में उन्होंने कई और बच्चों को गोद लिया, खास कर एशियन अमेरिकन अनाथ बच्चों को. १९४९ में उन्होंने ‘वेलकम हाउस’ की स्थापना की जहाँ इन बच्चों का पालन-पोषण होता है. मानवता के लिए किया गया उनका यह सबसे बड़ा कार्य है. दुनिया की बेहतरी के लिए उनका यह अनोखा योगदान है.

पहले उन्होंने स्वयं बच्ची की देखरेख और उसे कुछ कार्यों में प्रशिक्षित करने की कोशिश की परंतु यह निराशाजनक था. जब उन्हें इस कार्य में स्वयं सफलता न मिली तब उन्होंने इससे संबंधित प्रशिक्षित और पेशेवर लोगों की सहायता लेने की बात सोची. जब अपनी बेटी को लेकर वे विशेषज्ञों के पास भटक रहीं थी तब एक डॉक्टर ने उन्हें सुझाया, ‘एक जगह देखो जहाँ यह खुश रह सके. इसे वहाँ रखो और तुम अपना जीवन जीओ.’ अनुभव किया जा सकता है यह सुन कर उनका हृदय कैसे टुकडे-टुकडे हो गया होगा. उन्हें वैसा ही अनुभव हुआ जैसा कि नाखून को माँस से अलग करने पर होता है. लेकिन जब उन्होंने ठंडे मन से सोच-विचार किया तो उन्हें डॉक्टर की बात में सार नजर आया और उन्होंने इस पर अमल करने का निश्चय किया. परंतु यह बहुत खर्चीली योजना थी. उन्होंने कई देशों में इसकी जानकारी ली. सबसे ज्यादा अच्छा और सुरक्षित तथा उचित उन्हें अमेरिका का ‘वाइनलैंड का प्रशिक्षण केंद्र’ लगा. बच्ची की देखरेख का खर्च पर्ल बक की औकात से कहीं ज्यादा था. वे लिखती हैं कि उन्होंने पता किया है कि वे अपने बच्चे के रहने के लिए जैसा स्थान चाहती हैं वह मँहगा है और उनके पास पैसे नहीं हैं. इस खर्च को किसी और को नहीं उन्हें ही देना है. उन्हें स्वयं ही उपाय करना है कि वे अपने बच्चे के साथ क्या करना चाहती हैं. यदि पिता अपनी मेहनत की कमाई ऐसे बच्चे पर व्यर्थ नहीं करना चाहता है पर क्या माँ भी ऐसे बच्चे को छोड दे? वे ऐसा न कर सकीं.

बक सहायता के लिए बहुत लोगों के पास गई और उन्हें सहायता मिली भी. इसी सिलसिले में वे श्रीमती फिनले से मिलीं जो ‘न्यू यॉर्क टाइम्स’ के एक एजक्युटिव की पत्नी थीं. श्रीमती फिनले पर्ल की बात सुन कर, यह देख कर कि एक युवा माँ अपने अविकसित बच्चे की सहायता के लिए कितना संघर्ष कर रही है, बहुत प्रभावित हुई उन्होंने न केवल २,००० डॉलर कर्ज की व्यवस्था की वरन एक और करार भी करवाया. करार था कि यदि बक एक ईसाई समुदाय के लिए बच्चों की एक कहानी लिखें तो उन्हें ५०० डॉलर दिए जाएँगे. अंधा क्या चाहे दो आँखें. पर्ल बक इन लोगों की कितनी कृतज्ञ हुई होंगी सोचा जा सकता है. इस आर्थिक मजबूती ने उन्हें जीने और लिखने का सहारा दिया. अब वे न केवल अपनी बच्ची को उचित स्थान पर रख सकती थीं वरन चैन से बैठ कर लिख भी सकती थीं और उन्होंने यही किया. बच्ची दूर थी वे उसे कई बरस देख न सकीं. इससे उनके मन में अपराध बोध था जिसे उन्होंने लिखा भी है परंतु कहते हैं न आँख ओट पहाड ओट. बच्ची दिन-रात उनकी आँखों के समक्ष न थी, सो उसका दर्द भी उनके सामने प्रत्यक्ष न था. अतः वे अपना मन लिखने में समर्पित कर सकीं और उन्होंने खूब लिखा. इतना अच्छा लिखा कि उन्हें पुलित्जर और नोबेल पुरस्कार मिला.

वे पढाने के साथ-साथ लिखने का कार्य पहले से ही कर रहीं थीं और जिस किताब पर करार हुआ था उसे उन्होंने लिखा भी परंतु ‘द यंग रिवोल्यूशनरी’ के पहले उन्होंने वह लिखा जो उनके दिमाग में काफी समय से उमड़-घुमड़ रहा था. और इस तरह ‘गुड अर्थ’ रची गई जिसके आते ही उनकी ख्याति फैल गई. ‘ईस्ट विंड, वेस्ट विंड’ इसके पहले आ चुकी थी. गुड अर्थ ने उन्हें ख्याति, पुरस्कार और पाठक दिए. पाठक आज भी इसे चाव से पढ़ता और सराहता है. आज भी अमेरिका में इसे उच्च साहित्य का दर्जा प्राप्त है. इस बीच उन्होंने अपनी बच्ची की अस्वस्थता के कारण का पता लगाने का अथक प्रयास किया और उन्होंने पता लगाया भी. साठ के दशक में जा कर उन्हें पता चला कि कैरोल को एक असामान्य बीमारी है जिसे मेडिकल भाषा में पी के यू (फेनिलकेटोनूरिया) कहते हैं. पी के यू के फाल्स्वरूप एक विशिष्ठ प्रकार की मानसिक अस्वस्थता होती है. इसके अन्य लक्षण हैं ब्लोंड (सुनहरे) बाल, नीली आँखें तथा चर्म पर एक्जीमा और मूत्र तथा शरीर से एक तीखी गंध आना. कैरोल में यह सब वर्तमान था. इन लक्षणों की जानकारी का श्रेय भी एक जिद्दी माँ को ही जाता है. श्रीमती बोर्जनी एजलैंड के दो बच्चे इस बीमारी से ग्रसित थे परंतु डॉक्टर यह मानने को तैयार ही नहीं थे कि यह अन्य मानसिक बीमारियों से अलग प्रकार की अक्षमता है. मगर इस माँ ने हिम्मत नहीं हारी वह बार-बार कहती थी कि उसके बच्चों के अंतःवस्त्रों से एक भिन्न प्रकार की गंध आती है. यहाँ तक कि एक डॉक्टर ने परेशान हो कर कह डाला कि हो न हो उन्हें ही कोई बीमारी है, उन्हें बच्चों का नहीं अपनी नाक का इलाज कराना चाहिए. कोई उनकी बात मानने को तैयार न था पर वे लगी रही और अन्ततः एक डॉक्टर को उनकी बात में कुछ दम लगा. उसने विभिन्न परीक्षण किए और बात सही निकली. यह एक भिन्न प्रकार की मानसिक अक्षमता का लक्षण है. आज इस बीमारी का पता मूत्र परीक्षण द्वारा ही किया जाता है.

यह बीमारी किसी भी परिवार के बच्चे को हो सकती है. यह अमीर-गरीब का फर्क नहीं करती है. पी के यू से ग्रसित बालक किसी भी बात या काम पर अपना ध्यान केंद्रित नहीं कर पाता है. वह कुछ शब्द बोलता है जिसे केवल उसके नजदीकी लोग ही समझ पाते हैं, आज ऐसे बच्चों को अपना काम करने के लिए प्रशिक्षित किया जा सकता है लेकिन उन्हें अकेला नहीं छोड़ा जा सकता है. उन्हें निरंतर स्वस्थ लोगों के संरक्षण और निरीक्षण में रखना पड़ता है. बक ने इस तरह के बच्चों के अभिभावकों के संग मिल कर खूब काम किया और साहित्य से भी ज्यादा इस कार्य के द्वारा मानवता की सेवा की. उन्होंने वाइनलैंड में दोमंजिली इमारत बनवाई और संस्थान के बोर्ड में सम्मानित सदस्य बनीं. इसके लिए उन्हें ढेरों पुरस्कार और सम्मान मिले. अस्सी साल की उम्र में फेफडे के कैंसर से १९७३ में बक की मृत्यु के बाद जेनिस वाल्स कैरोल की अभिभावक बनीं. वे पर्ल फाउंडेशन तथा पर्ल द्वारा स्थापित अन्य संस्थानों को भी सम्भालने लगीं. आज पर्ल बक नहीं हैं लेकिन उनके बनाए संस्थान ऐसे बच्चों की देखभाल के लिए काम कर रहे हैं. उन्होंने इसके लिए तमाम शोध कार्य की व्यवस्था की, आज भी शोध कार्य जारी है. कैरोल ने एक लम्बी उम्र पाई. अपनी माँ की तरह ही वह भी फेफड़े के कैंसर से ग्रसित थी. उसके कई ऑपरेशन हुए, केमियोथेरेपी दी गई परंतु वह ३० सितम्बर १९९२ को जो सोई तो फिर उठी ही नहीं. वह सत्तर वर्ष की उम्र में गुजरी. तब तक वह अपने कई काम जैसे कपड़े पहनना, बाल काढना, खाना खाने के लिए काँटे-छुरी का प्रयोग करना आदि खुद करने लगी थी.

एक प्रश्न मन में उठता है यदि पर्ल बक की बेटी ऐसी न होती तो क्या वे लिखतीं? उत्तर भी स्वतः आ जाता है. हाँ वे अवश्य लिखती, पर तब वह न लिखतीं जो उन्होंने लिखा है. वह लिखना कुछ और होता.

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( विजय शर्मा, १५१, न्यू बाराद्वारी, जमशेद्पुर ८३१००१. ई-मेलः vijshain@yahoo.com

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रचनाकार: विजय शर्मा का आलेख : पर्ल बक : निजी त्रासदी का उदात्तीकरण
विजय शर्मा का आलेख : पर्ल बक : निजी त्रासदी का उदात्तीकरण
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