अरविंद कुमार का आलेख : आधुनिक भारत के आंतरिक द्वंद्व

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    अरविंद कुमार का नज़रिया कई धाराओं से बना है. उन में से एक है -- चार्ल्स डार्विन का विकासवाद का सिद्धांत. जब वे लंदन गए तो डार्वि...

 

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 अरविंद कुमार का नज़रिया कई धाराओं से बना है. उन में से एक है -- चार्ल्स डार्विन का विकासवाद का सिद्धांत. जब वे लंदन गए तो डार्विन का घर देखने जाना नहीं भूले. (चित्र राकेश माथुर)

आधुनिक भारत के आंतरिक द्वंद्व

हमारे टकराते बढ़ते क़दम

अरविंद कुमार

द्वंद्व, संघर्ष, टकराव... शब्द कोई भी इस्तेमाल करें, द्वंद्व जीवन की और प्रगति की पहली शर्त है। जब से सृष्टि बनी है, प्रकृति हर दम आपस में टकराव की स्थिति में रही है। जीवन का उदय कब हुआ, कहाँ हुआ, कैसे हुआ, क्यों हुआ... ये बहसें चलती रहेंगी। सच यह है कि हर जीवजाति, वनस्पति, समूह, इकाई आपस में टकराते, लड़ते भिड़ते, हारते जीतते कमज़ोर के विध्वंस और मज़बूत के उत्कर्ष के रूप में संश्लेषण के साथ आगे बढ़ते रहे हैं।

ये तो हुईं बड़ी बड़ी वैज्ञानिक सिद्धांत की बातें--ये सब बातें वैज्ञानिकों विचारकों के पल्ले डाल कर हम आज के भारत के टकरावों पर नज़र डालें। आज के भारत की शुरूआत मैं सन '47 से मान कर चलता हूँ। तब से देश और समाज लगातार टकराव की हालत में रहे हैं। सैंतालीस में मैं 17 साल का था...देशभक्ति से भरपूर, दिल्ली कांग्रेस में छोटे से स्वयंसेवक के तौर पर सक्रिय... उस साल की 14-15 अगस्त की रात मैं कभी भूल नहीं जा सकता... हम लोगों की टोली ट्रक में लद कर करोलबाग़ की सड़कों पर मस्ती में झूमती नारे लगाती चक्कर लगाती रही--मानो हम शोर नहीं मचाते तो देश को पता ही नहीं चलता कि आज़ादी आ गई है। सुबह हुई तो लाल क़िले जा पहुँचे... पंडितजी का भाषण सुनने... हज़ारों लाखों सुनने वाले थे। पंडितजी के भाषण की ख़ूबी थी कि पूरे इतिहास का कम शब्दों में जायज़ा लेते हुए सीधी सादे शब्दों में बता दिया कि हम कौन हैं, कितने पुराने हैं और अब जाना कहाँ है।

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1947 की 15 अगस्त को लाल क़िले से भाषण देते पंडित नेहरू... उस भीड़ में चाँदनी चौक की तरफ़ हम लोगों की टोली भी थी.

पिछली आधी रात, जब हम सड़कों पर नारे लगा रहे थे, संसद भवन में पंडित जी ने ऐतिहासिक भाषण में कहा था- हमारी मुलाक़ात तक़दीर से हो रही है, नियति से अभिसार के इस क्षण के लिए हम कब से बेताब थे! अब बाग़डोर हमारे हाथ में है।

 

देश में जगह जगह दंगे हो रहे थे.... दिल्ली जल रही थी... मैं ने दिल्ली की सड़कों पर सड़ती लाशें देखी हैं... वे दृश्य आँखों के परदे पर अभी तक हैं...

 

ट्रेनों में लद कर भारत से पाकिस्तान और पाकिस्तान से शरणार्थी आ रहे थे. एगर कोई ट्रेन समय पर पहुँच जाए ता मतलब था वह 24 या 48 घंटे लेट है... हमारी टोली का काम था दिन में मुसलमानों द्वारा ख़ीलि किए गए मकानों की सूची बनाना, और रात में दिल्ली स्टेशन से पंजाब से आए शरणार्थियों को उन में बसा देना...

सरकार के पास ख़ुशियों में खो जाने के लिए एक भी क्षण नहीं था। पहले ही दिन 14 को पाकिस्तान बना था। देश इतिहास के सब से भारी टकराव से जूझ रहा था। हर तरफ़ दंगा, मारपीट, ख़ूनखच्चर से निपटना सब से बड़ी चुनौती थी। इस से पार हो जाने पर ही देश बच सकता था। और हम ने देखा कि देश न सिर्फ़ बचा बल्कि आज दुनिया के सब से बड़े स्वतंत्र प्रजातंत्र के रूप में सब की आँखों का तारा है।

विभाजन हिंदु-मुस्लिम टकराव का परिणाम था। आज़ादी से पहले मुसलमान नेता कहते थे कि हिंदु-बहुल भारत में मुसलमान पिच जाएँगे, हिंदु नेता हिंदुत्व ख़तरे में है का नारा लगाते रहते थे। कमाल की बात यह है कि वह टकराव आज तक चल रहा है। कुछ नेताओं की रोज़ी रोटी इस बात पर चलती है कि समूहों के टकराव को जितना बढ़ाएँगे चढ़ाएँगे, जितने उत्तेजक नारे लगाएँगे, जितने भ्रामक तर्क पेश करेंगे, उतना ही दोनों कमाएँगे, सत्ता के क़रीब आएँगे... कई बार लगता है दोनों में मिलीभगत है...

इसी से जु़ड़ा टकराव है आतंकवाद का। आज जिस आतंकवाद से देश और दुनिया जूझ रहे हैं वह इसलामी आतंकवाद के नाम से जाना जाता है। इतिहास में हर धर्म कई लहरों से आंदोलित होते हैं। कभी उग्रवाद ज़ोर पर होता है, कभी उदारतावाद। आज इसलाम उग्रवाद के भीषण दौर में है। यह लड़ाई भारत में ही नहीं, पाकिस्तान में, मिस्र में, सूडान में...कई देशों में चल रही है। इस का हल किसी एक देश के पास नहीं है। इस से निपटने का रास्ता मात्र हथियार नहीं हैं। यह लड़ाई वैचारिक स्तर पर बहुत देर तक चलने वाली है। 

बात धर्म की ही है ही नहीं। धर्म का असली मतलब आध्यात्मिकता होता है। बात है अहम की। अहम की आड़ में ज़र की, ज़मीन की। सही है कि पुराने ज़माने में मंदिर ढहाए गए थे। सवाल यह है कि हम कब तक गड़े मुरदे उखाड़ते रहेंगे। कब पुरातन को भूल कर भविष्य का रुख़ करेंगे। अयोध्या में मंदिर था या नहीं? यह बात नहीं है। सब जानते हैं कि वाल्मीकि में लिखा है: राम की अयोध्या उन के साथ साथ पानी में डूब गई थी। सदियों बाद चीनी यात्रियों ने वहाँ साकेत नाम का बौद्ध नगर देखा था, जहाँ हज़ारों संघाराम थे। वर्तमान अयोध्या की धरती में जो कुछ दबा होगा वह कोई बौद्ध अवशेष होगा। इस लिए बात तथ्य की तो है ही नही है। कहा जा रहा है कि बात विश्वास की, आस्था की, मान्यता की है। बात है किसी भी बहाने किसी समूह को उकसाने की, या उस के तथाकथित निहित स्वार्थ-हित के नाम पर नेतागिरी की। हिंदु मुसलमान, सिख ईसाई से आगे बढ़ जाएँ तो इन सब टकरावों का आधार है आर्थिक भागीदारी। हमारे पास जितनी भी रोटी है उस में से किस को कितना हिस्सा मिलेगा।

 

देश के नेताओं ने इन टकरावों की संभावना 1930 में ही देख ली थी। पंडित नेहरू ने तब कहा था कि आज़ादी के लिए लड़ने के साथ साथ हमें यह भी तय करना चाहिए कि आज़ादी किस के लिए होगी। देश--मतलब क्या? गाँव, शहर, किसान, व्यापारी, उद्योगपति, दिल्ली, पंजाब, बंगाल... हिंदु, मुसलमान, ईसाई, सिख, ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र... अहीर, यादव... नागा, गोरखा... आदिवासी... भील, संथाल... टाटा बिरला, किसान, मज़दूर... ? आख़िर देश इन में कोई एक है या सब कुछ मिला कर? तरह तरह के सवालों और टकरावों की पूरी संभावना थी। इसी लिए जब योजना आयोग बने तो सब से पहले तय किया गया कि उद्योग किसी एक इलाक़े में नहीं लगाए जाएँगे। उन्हें हर हिस्से में फैलाया जाएगा। विकास का मतलब होगा -- सब का विकास।

पर देखा गया कि अधिकांश मलाई उच्च वर्गों के मुँह में जा रही है। पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण की माँग उठना स्वाभाविक, अवश्यंभावी, अपरिहार्य था। (अगर हिंदुओं का ही देश मान लिया जाता तो भी हिंदु का मतलब द्विज जातियाँ तो नहीं ही रह सकता था। शूद्र भी हिंदु हैं, दलित भी। हिंदु देश में भी पिछड़ी जातियाँ पिछड़ी रहें यह देर तक नहीं चल सकता था।) आरक्षण की ज़रूरत न भी पड़ती अगर समाज, सरकार, व्यापारी, कलकारख़ाने सब वर्गों के लोगों को काम मुहैया करने के लिए सक्रिय क़दम उठा रहे होते। हम जानते हैं कि कितने उच्च वर्गीय युवकों को नौकरियाँ क्षमता या क्वालिफ़िकेशन के आधार पर मिलती हैं और कितनों को सिफ़ारिश से। हम कहते कुछ भी रहें, सिफ़ारिश ही नौकरियों का मुख्य स्रोत रही हैं। क्वालिफ़िकेशन की बात केवल तब आती है जह कोई सिफ़ारिशी सामने न हो।

और क्वालिफ़िकेशन की बात तब आएगी जब सभी उँची नीची जातियों के लोगों का पढ़ाई का समान अवसर मिले। ग़रीबों को कम फ़ीस पर बड़े कालिजों में दाख़िला मिल सके। मैं अपनी बात कहता हूँ। मैं वैश्य वंश से हूँ पर निर्धन घर से हूँ। मेरी पढ़ाई मेरठ में मुफ़्त के म्यूनिसपलटी के स्कूल में हुई। मैट्रिक की पढ़ाई भी लगभग मुफ़्त सी, बेहद कम फ़ीस वाले स्कूल में हुई। चार विषयों में डिस्टिंक्शन पाने के बाद भी पारिवारिक क्षमता नहीं थी कि मुझे कालिज भेजा जा सके। बाल श्रमिक के रूप में मैं ने 1945 में काम करना शुरू किया। कुछ मित्रों की प्रेरणा से शाम के समय सस्ते प्राइवेट स्कूलों में पढ़ना शुरू किया। भला हो पंजाब विश्वविद्यालय का कि पचासादि दशक में दिल्ली में उन्हों ने शाम के समय उच्च शिक्षा का सस्ता कालिज कैंप कालिज खोल दिया। नाममात्र की फ़ीस पर मैं वहाँ से अच्छे नंबरों इंग्लिश साहित्य में ऐमए कर पाया। और बाद में हिंदी-इंग्लिश को समांतर कोश और द पेंगुइन इंग्लिशहिंदी/हिंदीइंग्लिश थिसारस ऐंड डिक्शनरी जैसे कोश दे पाया। तो जो टकराव हैं उन में से मुख्य टकराव सभी वर्गों अमीर ग़रीब के लिए तरक्की के अवसर खोलने के हैं। मैं देखता हूँ कि आजकल उच्च तकनीकी शिक्षा की फ़ीस कई गुना बढ़ाई जा रही है। यह एक और तरीक़ा है धनी वर्गों को मिलने वाले प्रश्रय बनाए रखने का। उच्च तकनीक को उन तक सीमित रखने का। आईईटी जैसे संस्थानों नाममात्र की फ़ीस और आरक्षण ही निम्न वर्ग को सत्ता में भागीदारी देने का कारगर तरीक़ा है।

 

पेंगुइन कोश के विमोचन पर बोलते अरविंद कुमार

 

भाषा के टकराव भी देश में उपलब्ध कम दूध में से मलाई पाने की कोशिशों के टकराव हैं। चाहे कभी आंध्र प्रदेश के मुल्की-ग़ैरमुल्की के टकराव हों, बंबई में कभी मराठी-बनाम-मद्रासी या आज हिंदी-मराठी के नाम पर टकराव हों, मलाई के और नेतागिरी के टकराव हैं। भाषा के सवालों में इंग्लिश भाषा के पुनरुत्थान का सवाल भी है। आज़ादी से पहले हम लोग अँगरेजी को अंगरेजों द्वारा हम पर लादी गई भाषा के तौर पर देखते थे। आज़ादी के नारों में एक नारा अँगरेजी के विरोध का भी था। बाद में यह नारा कई पार्टियाँ साठ सत्तर वाले दशक में भी लगाती रहीं। पर जनता ने इस नारे को सिरे से रीजैक्ट कर दिया है। 47 के बाद हम ने देखा कि अँगरेजी हमारे पास एक ऐसी खिड़की या महापथ है जिस से हम संसार से संपर्क तो कर ही सकते हैं, नौकरी और धन दौलत भी बटोर सकते हैं। आज अँगरेजी सामाजिक और निजी तरक़्क़ी की सीढी के तौर पर हर अगड़े पिछड़े वर्ग के मन में बस गया है। बहुतेरे हिंदी वाले अब भी हिंदी ख़तरे में का नारा लगा रहे हैं। जब कि मैं दावे के साथ कह सकता हूँ कि हिंदी तेज़ी से बढ़ रही है। वह हिंदी नहीं जो सरकारी संस्थानों करोड़ों रुपए बरबाद कर के बनाने की काशिश की गई थी, बल्कि वह हिंदी जो जनता, लेखक, पत्रकार और टीवी वाले बना रहे हैं--एक जीतीजागती हिंदी।

 

भाषा की बात यहीं पर ख़त्म नहीं हो जाती। सवाल उठ रहे हैं ब्रजभाषा, अवधी, भोजपुरी, छत्तीसगढ़ी, मालवी, हरियाणवी, गढ़वाली के... अगर बच्चों को मातृभाषा में पढ़ाया जाना है तो आज की हिंदी तो उन की मातृभाषा नहीं ही है। जब भोजपुरी बिहार की भाषा बनेगी तो भोजपुरी स्थानीय स्तर पर शिक्षा का माध्यम भी बनेगी। उस का विकास भी करना होगा। आज भी आंचलिक भाषाओं में पत्रपत्रिकाएँ निकल रही हैं। संसाधन कम होने के कारण उन का स्तर अच्छा नहीं है। जब वहाँ आम आदमी के पास पैसा आएगा, ख़रीदने की ताक़त बढ़ेगी तो उन की स्तर भी ऊँचा उठेगा। उन भाषाओं में फ़िल्में बन रही हैं। टीवी पर चैनल शुरू हो रहे हैं। ऐफ़ऐम रेडियो भी आएँगे।

 

जैसा कि हम ने देखा कि टकरावों के मूल में रोटी रोज़ी है। एक नारा रहा है जो कुछ भी सब में बराबर बाँट दो। पिछले दो सौ सालों से यह संसार के सब से मोहक नारों में रहा है। इस के पीछे भावना बिल्कुल सही है। मैं स्वयं इस नारे के साथ कई दशक रहा हूँ। पर हमेशा यह सवाल मन को सालता था कि बँटवारा किस का? धन का न! धन होगा तब बँटेगा न! परिणाम क्या होगा? हम ग़रीबी का वितरण ही करेंगे। सन 47 का किसान भूखा नंगा था। उसे ग़रीब देश की दौलत का बराबरी का हिस्सा मिले तो पल्ले क्या पड़ेगा। सोवियत संघ में तरह तरह के प्रयोग कर के देखा गया कि केंद्रीय स्तर पर आयोजन कर के उपज नहीं बढ़ पाती। चीन में भी आर्थिक व्यवस्था में परिवर्तन करने पड़े। भारत ही पीछे क्यों रहे?

 

हम लोग बल, बुद्धि और शौर्य में किसी से कम नहीं हैं। हमें अपनी शक्ति आपसी झगड़ों के सम्यक् समाधान कर के सारी की ताक़त प्रकृति से टकराने की ओर लगानी होगी। पूजा पाठ ज़रूरी तो है, लेकिन धर्म के साथ साथ अर्थ का महत्त्व कम नहीं है। कहा गया है भूखे भजन न होत गुपाला। आतंकवाद से लड़ने के लिए भी भूख मिटाना ज़रूरी है।

खेती के लिए चाहिए उन्नत बीज, समय पर पानी। बड़े बड़े बाँधों के अगर हम गाँव गाँव जल संकलन के लिए स्थानीय जल क्षेत्र बना सकें, तो गाँवों की हालत सुधर सकती है। वहाँ ऊर्जा भी पहुँचा सकें, तो एक नई हरित क्रांति हो सकती है। गाँव गाँव में कृषि आधारित उद्योग लगाए जा सकते हैं। गाँव में काम मिलेगा तो पूरे देश की आर्थिक हालत सुधरेगी। तनाव टकराव कम होंगे। गाँव की ख़ुशहाली से उद्योग धंधों की उपज के लिए नए बाज़ार खुलेंगे।

आतंकवाद से जूझने के लिए हाल ही में पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल कलाम ने चार बातें बताईं--1. नागरिक सचेत रहें, 2. देश में एकीकृत इंटैलिजेस विभाग हो, 3. अदालतों में मुक़दमों का निपटारा जल्द से जल्द हो, और 4. आर्थिक प्रगति के माध्यम से ग़रीबी का सफ़ाया हो। हर तरह के आर्थिक विकास के सब से पहली ज़रूरत आजकल है ऊर्जा उत्पादन में तेज़ी से बढोतरी।

 

मैं समझता हूँ कि यह चौथी बात सब से महत्त्वपूर्ण है। ग़रीबी हटाए बिना हम गहरे दलदल में धँसते चले जाएँगे। यही कारण है कि परमाणु समझौते के समर्थन में डाक्टर कलाम ने आवाज़ बुलंद की थी। इस के लिए आर्थिक मामलों के विशेषज्ञ हमारे प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह ने सरकार दाँव पर लगा दी थी। ख़ुशी के बात है कि अब यह समझौता हो चुका है। आर्थिक क्षमता बढ़ने से देश की ताक़त बढ़ेगी। ताक़तवर देशकी तरफ़ टेढ़ी नज़र से देखने की हिम्मत बड़े से बड़ा देश नहीं कर सकता, चाहे वह पाकिस्तान हो, अमरीका हो, रूस हो, चीन हो। आज सन 47 वाला भुखा नंगा भारत नहीं है। कल वह दुनिया के सब से धनी देशों में होगा। तब के टकराव कुछ अलग तरह के होंगे।

--अरविंद कुमार, सी-18 चंद्रनगर, ग़ाज़ियाबाद 201011

 

samantarkosh@gmail.com

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रचनाकार: अरविंद कुमार का आलेख : आधुनिक भारत के आंतरिक द्वंद्व
अरविंद कुमार का आलेख : आधुनिक भारत के आंतरिक द्वंद्व
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