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अशोक गौतम का व्यंग्य : धोखे की टट्टी!!

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ड़ोसी और मुहल्‍ले वालों से बीसियों बार जूते खाने के बाद भी मैं बेशरमी पर डटा रहा। और खुषी की बात कि पड़ोसी अपनी जमीन बचाता-बचाता टूट गया,पर मैं उसकी जमीन मारते -मारते नहीं टूटा। जैसा कि अक्‍सर होता आया है कि जीत बेशरमी की होती है,अबके मेरी हो गई। आखिर मैंने पड़ोसी की दो फुट जमीन मार ही ली। मत पूछो ,आजकल मैं कितना खुश हूं! सच पूछो तो किसी की जर,जोरू और जमीन मारने में परमानंद मिलता है। जिस रोज आप भी किसी की ,जर,जोरू जमीन पर हाथ भांजोगे आप को भी इस परमानंद की अनुभूति हो जाएगी । सच कहूं तो इतना परमानंद स्‍वर्ग प्राप्‍ति पर भी नहीं होता।

पिछले कल सगर्व पड़ोसी की मारी जमीन पर लाल मिर्च के पौधे लगा रहा था कि सामने से राम आते दिखे। परेशान कतई भी नहीं! यार हद हो गई! ये राम आखिर बनें किस मिट्‌टी के हैं? सदियों से बेघर! पहले लोगों के मन में रह लिया करते थे,पर जबसे लोगों के मन तामसिक हो गए तो बिस्‍तर उठाया मंदिर में फैला दिया। फिर वहां पर पुजारी ने अपना विद फैमिली बिस्‍तर फैलाया तो धर्मशाला में आ गए। धर्मशाला से धर्म उठ लोकतंत्र बैठा तो नेताओं की शरण में चले गए। नेताओं ने आश्वासन दिये,‘बन्‍धु! सरकार बनाने में हमारा सहयोग दो तो हम तुम्‍हारा मंदिर बनाने में सहयोग दें।' बेचारे उनके साथ तबसे सरकार बनाने में जी जान से जुटे। इनके साथ एक बार धोखा,दो बार धोखा! तबसे पीजी हो चले हैं।

चेहरे पर वैसी ही मुस्‍कुराहट! यार, भगवान ऐसे ही भगवान थोड़े होते हैं। और इधर अपना चेहरा! सबके हक मारने के बाद भी सूजा ही रहता है।

मैंने मिर्च के बूटे का तना पड़ोसी की ओर कर उनसे पूछा,‘ और राम! क्‍या चल रहा है आजकल? बड़े खुश नजर आ रहे हो?'

‘हां यार, बात ही खुशी की है।' कह वे वहीं जमीन पर बैठ गए। घर बैठाने से तो मैं रहा। असल में क्‍या है न! आदर्शों और आदर्श वादियों से अपना जन्‍म से ही छत्‍तीस का आंकडा़ रहा है।

‘क्‍या कहीं से फिर आश्वासन मिल गया?'

‘तुम्‍हें कैसे पता चला?' वे पड़ोसी से भी ज्‍यादा परेशान दिखे।

‘ साठ साल हो गए उल्‍लू बनते-बनते। इतना भी नहीं समझते यार! बड़े भगवान बने फिरते हो। तभी तो तुम्‍हें कोई धेले को भी नहीं पूछता।' मैंने कहा तो वे झेंपे। कुछ देर असमंजस में रहने के बाद फुसफुसाए,‘यार सुन!'

‘हां बोलो।'

‘उन्‍होंने फिर चुनाव के घोषणा पत्र में मेरे मंदिर का षंख बजाया है।'

‘ये कुर्सी का सारा खेल है यार! यहां क्‍या! जब मन किया मार दी चुनाव के शंख में फूंक। जनता का स्‍यापा यहां है किसको? इनको और काम तो कुछ है नहीं। जनता कहती थक गई कि महंगाई के कान में शंख की फूंक मार दो, जीना कुछ आसान हो। पर नहीं। जनता कहती थक गई कि भ्रष्‍टाचार के कान में शंख की फूंक मार दो तो जीना कुछ आसान हो। पर नहीं। इस देश में अब शंख पूजा का नहीं बजता ,चुनाव का ही बजता है। पर चुनाव से आपका क्‍या लेना देना! ये तो लुच्‍चे-लफंगों का प्रिय विलास है।'

‘यार उन्‍होंने एक बार फिर मेरा मंदिर बनाने का संकल्‍प दोहराया है। कहते हैं कि जैसे लंका के लिए पुल बनाया था वैसे हमारे लिए सत्‍ता तक पुल बना दो तो हम तुम्‍हारे मंदिर के बारे में पिछली बार से कुछ अधिक गंभीर हों।' उनके चेहरे की चमक देख मुझे बहुत गुस्‍सा आया। इतनी बार धोखा खाने के बाद भी नहीं सुध रहे हो यार तो कब सुधरोगे!

‘तो क्‍या सोच रहे हो?'

‘सोच रहा हूं एकबार और उन पर फिर विश्वास कर लूं।' अब समझ में आया यार,‘एक बार धोखा खाने के बाद जो संभले उसे इंसान कहते हैं,और जो बार- बार धोखा खाने के बाद भी न संभलें उसे भगवान कहते हैं।'

‘क्‍या मतलब तुम्‍हारा?' वे चौड़े हो गए तो मैंने उन्‍हें षांत करते हुए कहा,‘बन्‍धु मेरे कहने का तात्‍पर्य नटशेल में यह है कि राजनीति में विश्वास अपने बाप पर भी न करो और ये तो....'

‘तो???'

‘पीजी में ही डटे रहो। सब ठीक तो चल रहा है न वहां?'

‘क्‍या मतलब तुम्‍हारा?'

‘यही कि रोटी-पानी ठीक मिल रहा है न!'

‘मतलब?'

‘सब ठीक नहीं चल रहा तो मेरे पास आ जाओ। सौ-दो सौ कम दे देना। है तो मुझे आदर्शों से नफरत,पर किसी आदर्शवादी की सेवा कर थोडा़ परलोक सुधार लेता।' क्‍यों बंधु?

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अशोक गौतम

द्वारा- संतोष गौतम, निर्माण शाखा,

डॉ. वाय. एस. परमार विश्वविद्यालय, नौणी,सोलन-173230 हि.प्र.

Email a_gautamindia@rediffmail.com

2 टिप्पणियाँ

  1. अच्‍छा व्‍यंग्‍य।

    जो धोखा खाने के बाद भी न संभले उसे भगवान कहते हैं।

    इसे मैं हर आदमी पर लागू कर सकता हूं। इसके लिए अधिक मेहनत करने की जरूरत नहीं है। बस भगवान की पुरानी नेमतों को नजरअंदाज कर समस्‍याओं का रोना रोने वालों की लिस्‍ट बना लो। :)

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  2. बार-बार तो धोखा जनता खाती आ रही है। अच्छा किया रवि भैया जो अशोक जी का लिखा फ़ड़कता हुआ लेख पढवा दिया। अब समझ मे आ रहा है कि जनता को जनार्दन क्यों कहते हैं,जो बार-बार धोखा खाने के बाद भी न संभले उसे भगवान कहते हैं।वाह्।

    जवाब देंहटाएं

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