विजय शर्मा का आलेख : अपना शहर अपनी दुनिया

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म धुमक्खी, तितलियाँ और भँवरे जगह-जगह जाते हैं तरह-तरह के फूलों पर मँडराते हैं और रस संग्रह करके मधु बनाते हैं. इसी तरह कहा जाता है कि यदि ज्...

धुमक्खी, तितलियाँ और भँवरे जगह-जगह जाते हैं तरह-तरह के फूलों पर मँडराते हैं और रस संग्रह करके मधु बनाते हैं. इसी तरह कहा जाता है कि यदि ज्ञान इकट्ठा करना हो तो घाट-घाट का पानी पीना होगा. माना जाता है कि जो व्यक्ति जितना भ्रमण करता है उसका ज्ञान उतना बढ़ता है. चरन वई मधु बिंधते. घूमने से मधु मिलता है. चलते रहने से उद्देश्य की प्राप्ति होती है. एक समय था जब आज की तरह आवागमन की सुविधा और साधन उपलब्ध न थे तब घूमना इतना आसान न था. लोग अक्सर पैदल चलते थे और आवश्यकता पड़ने पर घोड़े अथवा बैलगाड़ी, नाव आदि का सहारा लेते थे. यूरोप में भ्रमण को खूब बढावा दिया जाता था. एक समय था जब यूरोप में माना जाता था कि जब तक व्यक्ति विश्व भ्रमण नहीं कर लेता था उसकी शिक्षा पूर्ण नहीं मानी जाती थी यह बात दीगर है कि उस समय शिक्षा सबको उपलब्ध न थी कुछ गिने चुने लोग ही शिक्षा हासिल कर सकते थे. कोलम्बस और वास्को डि गामा की यात्राओं का परिणाम आज सबको ज्ञात है. हमारे यहाँ समुद्र पार करना वर्जित था. माना जाता था समुद्र पार करने से धर्म भ्रष्ट हो जाएगा. इसके बावजूद जो लोग इस नियम को तोड कर विदेश यात्रा करते थे उन्हें लौट कर प्रायश्चित करना पड़ता था. पर ऐसे भी लोग हुए जो जिन्दगी भर घूमते रहे. राहुल सांकृत्यायन जिन्दगी भर घूमते रहे और उन्होंने क्या कुछ पाया यह सर्वविदित है. उनका नाम ही पड़ गया घुमक्कड़ स्वामी. माना जाता है कि रचनाकार के लिए घूमना अत्यंत आवश्यक है जब वह विभिन्न स्थानों पर जाता है तो वहाँ के लोगों के जीवन, रहन-सहन, रीति-रिवाज, खान-पान, भाषा-बोली, सभ्यता-संस्कृति से से परिचित होता है जो उसके लेखन की प्रेरणा और सामग्री बनता है.

देखना यह है कि क्या यह नियम सर्वमान्य है या इसके अपवाद भी हैं. असल बात विस्तार की नहीं वरन

गहराई की है. लेखन के लिए संवेदनशील होना जीवन को उसकी समग्रता में जीना आवश्यक है. यह एक स्थान पर रहते हुए भी संभव है वरना लोग सारी जिन्दगी घूमते हुए जिन्दगी को इतने सतही तरीके से, इतना ऊपर-ऊपर जीते हैं कि जिन्दगी समाप्त हो जाती है और उन्हें पता ही नहीं चलता है कि यह क्या है. क्या जो लेखक अपने स्थान को नहीं छोड़ते हैं वे उच्च कोटि की रचनाएँ नहीं कर सकते हैं? नहीं करते हैं? या उनका साहित्य मानवता की संवेदनाओं से अछूता रहता है? क्या वे संकुचित विचार धारा को प्रस्तुत करते हैं? अथवा उनका साहित्य भी मानवता के हित की बात करता है? क्या वे अन्य लोगों के मन की बात नहीं कहते हैं? क्या ऐसे लेखक सम्मान के अधिकारी नहीं होते हैं? इस आलेख में ऐसे ही कुछ लेखकों को जानने-समझने का प्रयास हुआ है जिन्होंने अपना जन्म स्थान नहीं छोड़ा जो एक ही स्थान पर रहते हुए रचना कर्म करते रहे और जिन्होंने विश्व साहित्य में अपना स्थान बनाया. इतना ही नहीं इन लेखकों ने इतनी उच्च कोटि की रचनाएँ विश्व को दी कि उन्हें नोबेल पुरस्कार से नवाजा गया.

लोगों की रूचि भिन्न-भिन्न होती है. कुछ लोगों को घूमना बहुत अच्छा लगता है वे हर समय घर से निकल पड़ने को तत्पर रहते हैं. दूसरी ओर ऐसे भी लोग हैं जिन्हें घर छोड़ने के नाम पर बुखार आता है. वे जब तक अत्यावश्यक न हो अपने घर से बाहर निकलना पसन्द नहीं करते हैं. कुछ ऐसे भी लोग होते हैं जिन्हें घूमने का बहुत शौक होता है परंतु किसी न किसी कारण से उनकी यह इच्छा पूरी नहीं हो पाती है. कभी निजी परेशानी, कभी अर्थिक कठिनाई, कभी कुछ और. कुछ और ऐसे भी लोग हैं जिनके साथ कोई परेशानी नहीं होती है वे साधन सम्पन्न भी होते हैं परंतु वे अपने स्थान से बाहर जाने की आवश्यकता महसूस नहीं करते हैं. ऐसे रचनाकार भी हुए हैं जिन्होंने अपना शहर कभी नहीं छोड़ा परंतु इससे उनके लेखन की गुणवत्ता में कोई कमी नहीं आई. उनका साहित्य उनका दृष्ठिकोण संकुचित नहीं हुआ है. बहुत सारे ऐसे रचनाकार हुए हैं जिन्होंने अपना शहर नहीं छोड़ा परंतु आलेख की सीमा को देखते हुए यहाँ मात्र कुछ रचनाकारों की ही चर्चा की जा रही है.

लेखकों के अपने स्थान से बाहर न जाने के बहुत कारण हो सकते हैं एक समय था जब यातायात के साधनों का अभाव था पर आज बात ऐसी नहीं है. तीव्रतम गति के वाहन उपलब्ध हैं, फिर भी कुछ लेखक यात्रा करना पसन्द नहीं करते हैं. कभी-कभी अर्थाभाव भी कारण बनता है पर कुछ लेखक ऐसे भी लेखक है जिन्हे ऐसी कोई दिक्कत नहीं है पर वे अपना शहर नहीं छोड़ते हैं, छोड़ना नहीं चाहते हैं, जैसे कि ओरहान पामुक. उनके साथ ऐसी कोई बन्दिश न थी. वे खूब समृद्ध परिवार से आते हैं उनकी शिक्षा-दीक्षा भी बहुत भली-भाँति हुई परंतु एक दिन सब छोड़ कर उन्होंने लेखक बनने का निश्चय किया और स्वयं को एक कमरे में बन्द कर लिया. बरसों-बरस लिखते रहे. उनकी माँ अक्सर उनसे कहतीं ‘तुम थोडे वक्त के लिए बाहर क्यों नहीं निकलते, माहौल बदलने की थोड़ी कोशिश क्यों नहीं करते... सफर पर क्यों नहीं चले जाते.’ परंतु पामुक ने न केवल अपना शहर इस्ताम्बूल नहीं छोड़ा बल्कि अपनी इमारत ‘पामुक अपार्टमेंट्स’ को भी नहीं छोड़ा. उन्होंने न केवल अपना शहर और इमारत नहीं छोड़ी है वरन अपने कमरे को खिड़की से सदा एक ही दृश्य को घूरा और उच्च कोटि की रचनाएँ दीं.

ऐसे रचनाकार भी हुए हैं जिन्होंने अपना शहर कभी नहीं छोड़ा परंतु इससे उनके लेखन की गुणवत्ता में कोई कमी नहीं आई. उनका साहित्य उनका दृष्ठिकोण संकुचित नहीं हुआ है. बहुत सारे ऐसे रचनाकार हुए हैं जिन्होंने अपना शहर नहीं छोड़ा परंतु आलेख की सीमा को देखते हुए यहाँ मात्र कुछ रचनाकारों की ही चर्चा की जा रही है.

लेखकों के अपने स्थान से बाहर न जाने के बहुत कारण हो सकते हैं एक समय था जब यातायात के साधनों का अभाव था पर आज बात ऐसी नहीं है. तीव्रतम गति के वाहन उपलब्ध हैं, फिर भी कुछ लेखक यात्रा करना पसन्द नहीं करते हैं. कभी-कभी अर्थाभाव भी कारण बनता है पर कुछ लेखक ऐसे भी लेखक है जिन्हे ऐसी कोई दिक्कत नहीं है पर वे अपना शहर नहीं छोड़ते हैं, छोड़ना नहीं चाहते हैं, जैसे कि ओरहान पामुक. उनके साथ ऐसी कोई बन्दिश न थी. वे खूब समृद्ध परिवार से आते हैं उनकी शिक्षा-दीक्षा भी बहुत भली-भाँति हुई परंतु एक दिन सब छोड़ कर उन्होंने लेखक बनने का निश्चय किया और स्वयं को एक कमरे में बन्द कर लिया. बरसों-बरस लिखते रहे. उनकी माँ अक्सर उनसे कहतीं ‘तुम थोडे वक्त के लिए बाहर क्यों नहीं निकलते, माहौल बदलने की थोडी कोशिश क्यों नहीं करते... सफर पर क्यों नहीं चले जाते.’ परंतु पामुक ने न केवल अपना शहर इस्ताम्बूल नहीं छोड़ा बल्कि अपनी इमारत ‘पामुक अपार्टमेंट्स’

को भी नहीं छोड़ा. उन्होंने न केवल अपना शहर और इमारत नहीं छोड़ी है वरन अपने कमरे को खिडकी से सदा एक ही दृश्य को घूरा और उच्च कोटी की रचनाएँ दीं.

पामुक का जन्म १९५२ में इस्ताम्बूल में हुआ. इस्ताम्बूल एक प्राचीन शहर है दो दुनियाओं की मिलन स्थली. यह स्थल पूर्व और पश्चिम की सभ्यताओं का संगम है. एक समय यह व्यापार की धड़कन हुआ करता था. खूब जीवंत शहर था. इसे ही पामुक ने अपने अधिकाँश कार्य व्यापार का केंद्र बनाया है. ओरहान पामुक २२ साल की उम्र तक एक कलाकार बनने का स्वप्न पाल रहे थे और ज्यादातर समय चित्रकारी करते रहते थे. इस समय तक वे अपने पिता के पुस्तकालय की सारी किताबों से परिचित हो चुके थे भले ही उन्होंने सबको पढ़ा नहीं था. लेकिन वे देख थे कि इन किताबों में वे या उनके लोग, उनकी सभ्यता-संस्कृति कहीं भी न थी. दुनिया का केंद्र तुर्की न था. यह बात उन्हें गहरे कचोटने लगी. जो साहित्य वे पढ़ रहे थे उसके केंद्र में ज्यादा समृद्ध, ज्यादा उत्तेजक जीवन था. कुछ बाद में उन्हें यह भी पता चला कि दुनिया के बहुत सारे अन्य देश और उनके लोगों का जीवन, उनकी सभ्यता-संस्कृति विश्व साहित्य का हिस्सा नहीं है. वे विश्व साहित्य के केंद्र में नहीं हैं. पामुक पश्चिमी और यूरोपीय साहित्य की बात कर रहे हैं. तब उनके लिए पढ़ने का अर्थ था एक दूसरी दूर की, भिन्न और अजनबी दुनिया में विचरण करना. तुर्की जो पूर्व और पश्चिम की मिलन स्थली है वह पश्चिमी साहित्य का केंद्र तो दूर उसका हिस्सा भी न था. उस साहित्य में उसका प्रवेश न था.

पामुक ने निश्चय किया कि वे तुर्की के भूगोल, इतिहास, समाज, सभ्यता, संस्कृति को साहित्य का केंद्र बनाएँगे. इसके लिए उन्होंने निरंतर प्रयास किया. स्वयं को एक कमरे में बन्द कर लिया और लिखना प्रारम्भ कर दिया. तब से लेकर आज तक उन्होंने लिखने के अलावा कोई और काम नहीं किया है. उनकी मेहनत और लगन का नतीजा हुआ ‘स्नो’, ‘माई नेम इज रेड’, ‘इस्ताम्बुलः मेमोरीज ऑफ ए सिटी’, ‘द ब्लैक बुक’, ‘केवेडेट बे एंड हिज संस’, ‘द ह्वाइट कैसेल’, ‘द साइलेंट हाउस’, ‘द न्यू लाइफ’. अपनी किताब ‘इस्ताम्बूल ः मेमोरीज ऑफ अ सिटी’ में पामुक स्वयं कहते हैं कि मैंने इस्ताम्बूल को कभी नहीं छोड़ा - अपने बचपन के घरों, गलियों और आस-पडोस को कभी नहीं छोड़ा. हालाँकि समय-समय पर मैं दूसरे जिलों में रहा हूँ पर फिर पामुक अपार्टमेंट्स में लौट आया हूँ जहाँ मेरे पहले फोटोग्राफ लिए गए थे और जहाँ मेरी माँ ने मुझे पहली बार बाँहों में उठाया था. इस्ताम्बूल का भाग्य उनका भाग्य है. वे शहर से बहुत गहरे जुडे हुए हैं क्योंकि आज जो वे हैं वैसा उन्हें इस शहर ने बनाया है. उन्होंने इस्ताम्बूल को साहित्य का केंद्र बना दिया और इस केंद्र में इतना आकर्षण था कि नोबेल समिति का ध्यान उनकी ओर गया और उन्हें २००६ का नोबेल पुरस्कार मिला. पामुक नोबेल पुरस्कार पाने वाले सबसे कम उम्र के साहित्यकार हैं. उनके साहित्य का विश्व की अधिकाँश भाषाओं में प्रकाशन हो चुका है. तुर्की में उनकी किताबों की रिकॉर्ड तोड बिक्री होती है. वे अपने साहित्य के साथ-साथ अपने साक्षात्कारों के लिए भी जाने जाते हैं.

फ्लॉबेयर जब इस्ताम्बूल शहर में आया था तो इसकी गलियाँ बहुत गुलजार थीं. इनमें तमाम क्रिया-कलाप चलते रहते थे. शहर में रौनक थी. गत्यात्मकता थी. इससे प्रभावित होकर उसने घोषणा कर दी कि जल्द ही इस्ताम्बूल विश्व की राजधानी बन जाएगा. पामुक को अफसोस है कि ऐसा न हुआ बल्कि इस शहर का इतना पतन हुआ कि यह दुनिया की तो दूर तुर्की की राजधानी भी न बन सका. ओटोमन साम्राज्य के पतन के साथ-साथ इस्ताम्बूल का भी पतन हो गया. दुनिया भूल ही गई कि इस्ताम्बूल का भी अस्तित्व है. जब १९५२ में ओरहान पामुक का जन्म हुआ यह शहर बहुत गरीब और दुनिया से बहुत कटा हुआ था. अपने दो हजार साल के इतिहास में यह शहर कभी भी इतना मुफलिस न था.

पामुक की दृष्टि में यह सदा से खंडहरों और साम्राज्य के अंत की उदासी का शहर रहा है. सारी जिन्दगी या तो वे इसकी उदासी में नहाते रहें हैं या फिर इसकी उदासी को अपनी बना कर जीते रहे हैं. जिन्दगी में कम-से-कम एक बार चिंतन करते हुए हम इस इस बात का निरीक्षण अवश्य करते हैं कि हमारा जन्म किन परिस्थितियों में हुआ है. हम दुनिया के इसी खास स्थान पर इसी खास तारीख को क्यों पैदा हुए? इन परिवारों जिनमें हम पैदा हुए, जिन देशों और जिन शहरों को जीवन की लॉटरी ने हमारे लिए चुना - वे हमसे प्रेम की उम्मीद करते हैं और अंत में हम उन्हें प्रेम करते भी हैं तहे दिल से - परंतु क्या हम इससे बेहतर के हकदार थे? एक बुढाते और जबरदस्ती उन्नत बनाए गए इस्ताम्बूल जैसे शहर में, शहर जो साम्राज्य के पतन की राख में दबा पड़ा है में, जनम लेने के कारण पामुक कभी-कभी स्वयं को अभागा मानते हैं, परंतु तभी उनके भीतर से एक आवाज उठती है जो प्रतिरोध करते हुए इस बात को उनका दुर्भाग्य नहीं वरन सौभाग्य कहती है.

पामुक का जन्म एक ऐसे समय में हुआ जब असल में शहर एक बहुत बुरे दौर से गुजर रहा था लेकिन उनका परिवार काफी प्रतिष्ठित था. कुछ लोग इस बात से सहमत न होंगे कि यह इस्ताम्बूल का उतार का काल था. अक्सर वे शिकायत नहीं करते हैं, उन्होंने अपने जनम के शहर को भी वैसे ही स्वीकार कर लिया है जैसे अपने शरीर को. कभी-कभी उन्हें लगता है काश वे और खूबसूरत होते और सुगठित होते (देखने में वे खासे खूबसूरत हैं). जैसे शारीरिक सौष्ठव को लेकर उनकी हसरत है वैसे ही जन्मस्थान को लेकार भी यह इच्छा जोर मारती है कि काश वे किसी बेहतर देश में जन्मे होते. इसी तरह उन्हें यह भी लगता है यदि वे एक औरत होते तो कैसा रहता? क्या अच्छा होता? लेकिन यह उनका भाग्य है और भाग्य से तर्क नहीं किया जाता है. उनकी किताब ‘इस्ताम्बूल ः मेमोरीज ऑफ अ सिटी’ भाग्य के विषय में है.

जब पामुक ने लिखना प्रारम्भ किया तो उनका जोर शोर से स्वागत हुआ कारण यह था कि उनके पहले जो लेखक लिख रहे थे वे साहित्य को सामाजिक दायित्व मान कर रचना कर रहे थे. उन लोगों के कार्य में राजनीति और नैतिकता की भरमार थी. वे सपाट और यथार्थवादी थे उनके यहाँ किसी प्रयोग की कोई गुंजाइश न थी. पामुक उन लोगों की भाँति नहीं लिखना चाहते थे क्योंकि उन्हें इससे बेहतर साहित्य का चस्का लग चुका था. उन्होंने अपने पाठकीय जीवन के प्रारम्भ से ही विश्व के बेहतरीन लेखकों का अध्ययन किया था, विलियम फॉक्नर, वर्जीनिया बुल्फ, प्रूस्त जैसे लेखकों को पढ़ा और पढ़ कर आनन्द लिया था. उनके साहित्य पर इन लेखकों का प्रभाव स्पष्ठ रूप से देखा जा सकता है. साठ और सत्तर के दशक में रचा गया साहित्य अपनी लोकप्रियता खो रहा था अतः इस दौर में जब पामुक अपना साहित्य ले कर आए तो पाठकों के लिए यह ताजी हवा के एक झोंके के समान था लोगों ने उनको हाथों-हाथ लिया. नई पीढी ने उनके साहित्य का स्वागत किया.

कुछ सालों के बाद जब पामुक की किताबें बेशुमार संख्या में बिकने लगीं तुर्की की किताबों की बिक्री का रिकॉर्ड टूटने लगा तो उनकी प्रसिद्धि पर ग्रहण लगने लगा वे कहते हैं कि नौवें दशक के मध्य में उनकी किताबों की बिक्री लोगों की कल्पना से कई गुना ज्यादा हो गई तो तुर्की प्रेस और वहाँ के बौद्धिक समुदाय के साथ उनके हनीमून बरस समाप्त हो गए. उसके बाद से उनके देश में उनकी किताबों के कथानक विषय वस्तु की समीक्षा न हो कर उनके प्रचार प्रसार और बिक्री की आलोचना मुख्य हो गई. और दुर्भाग्य से आज वे अपने साहित्य से ज्यादा अपनी राजनीतिक टिप्पणियों के लिए जाने जाते हैं. टिप्पणियाँ जो वे अंतरराष्ठ्रीय साक्षात्कारों के सन्दर्भ में करते हैं उन्हें उनके अपने देश में बिना सन्दर्भ के प्रस्तुत किया जाता है और उनकी आलोचना की जाती है. इस्ताम्बूल के शासन तंत्र पर की गई उनकी टिप्पणियों को तोड़ मरोड़ कर प्रस्तुत किया जाता है. वे अपने देश में लोगों की आँख की किरकिरी हैं. जितने विद्रोही वे हैं नहीं उससे ज्यादा विद्रोही उन्हें दिखाया जाता है. राष्ट्रीय हितों का दावा करने वाले उन्हें जबरदस्ती बदनाम करने पर तुले हैं कभी कभी उन्हें मूर्ख सिद्ध करने का भी प्रयास किया जाता है. स्वयं पामुक के अनुसार वे इतने मूर्ख नहीं हैं ऐसे लोगों के संकीर्ण नजरिए को भली भाँति जानते समझते हैं. इस्ताम्बूल भौगोलिक रूप से भ्रमित देश है, वैसे ही जैसे तुर्की राष्ठ्र. यहाँ साठ प्रतिशत लोग परम्परावादी हैं और चालीस प्रतिशत जनता पश्चिम के राष्ट्रों का मुँह जोहती रहती है. ये दोनों समूह पिछले दो सौ सालों से बहस कर रहे हैं. पूर्व और पश्चिम के बीच की यह स्थिति नारकीय है, तुर्की में यही जीवन शैली है. पामुक इसी जटिलता, इसी संकरता और इसके कारण आई जीवन की विभिन्नता और समृद्धि को अपने साहित्य का अंग बनाते हैं.

अपने उपन्यास ‘माई नेम इस रेड’ में वे एक पुल का कार्य करना चाहते हैं क्योंकि पुल किसी महादेश, किसी सभ्यता का प्रतिनिधित्व नहीं करता है किसी एक का नहीं होता है साथ ही वह दोनों सभ्यताओं का अवलोकन करने की अनोखी स्थिति में होता है और उनसे बाहर भी होता है. यह पुल की विशेषता और आश्चर्यजनक खासियत होती है. वे बार बार इसी बात को दोहराते हैं अपनी प्रत्येक किताब में दोहराते हैं यही उनके कार्य की स्वर लहरी है कि सभ्यताओं का टकराव, पार्टियों का टकराव, संस्कृतियों का टकराव महत्वपूर्ण नहीं है पिछले कई दशकों से वे तुर्की के पाठकों अपने सभी पाठकों से यही कह रहे हैं. वे सबसे कहते हैं कि दूसरों के बारे में सोचो, दूसरे महादेशों के विषय में सोचो. दूसरे महादेशों के लोग, दूसरी सभ्यताएँ, दूसरी संस्कृतियाँ तुम्हारी तरह ही हैं. वे जोर दे कर कहते हैं यह समानता की बात साहित्य भली-भाँति समझाता है. अच्छे साहित्य और उपन्यासों पर ध्यान देना चाहिए राजनीतिज्ञों पर विश्वास नहीं करना चाहिए पामुक का ऐसा दृढ विश्वास है.

ऐसे ही एक और लेखक १९८८ के नोबेल पुरस्कार विजेता हैं नजीब महफूज. उन्होंने भी कभी अपना शहर कैरो (काहिरा) नहीं छोड़ा. उनकी जान पर बन आई उन्हें सुरक्षा की दृष्टि से देश के बाहर ले जाने के प्रयत्न हुए परंतु उन्होंने अपना शहर, अपना घर नहीं छोड़ा और लगातार सृजन में संलग्न रहे. उन्होंने विपुल साहित्य रचा और अपनी रचनाओं में काहिरा को सदा के लिए अमर कर दिया. काहिरा पहले भी विख्यात था परंतु उन्होंने इस शहर को आधुनिक साहित्य का हिस्सा बना दिया. यहाँ तक कि जब उन्हें नोबेल पुरस्कार मिला तो उसे लेने भी वे स्वयं नहीं गए उनकी दो बेटियाँ गई थीं.

नजीब महफूज भी भाग्य पर विश्वास करते हैं उनके अधिकतर उपन्यासों में भाग्य की प्रबलता दीख पड़ती है परंतु इस कारण उनके पात्र संघर्ष करना, कर्म करना छोड़ नहीं देते हैं वे अंत तक अपने भाग्य को बदलने के लिए लड़ते हैं. भाग्य पौरत्व दर्शन का एक प्रमुख हिस्सा है. बड़े-से-बड़ा तार्किक भी कहीं-न-कहीं भाग्य को स्वीकार करता है. इससे कर्म की महत्ता कम नहीं हो जाती है. नजीब महफूज अपने जीवन के अंतिम दिनों तक सक्रिय रहे. उनका कहना था, ‘‘अगर लिखने की तलब कभी मुझे छोड़ गई तो उस दिन को मैं चाहता हूँ कि वह मेरा अंतिम दिन हो’’ ‘द चिल्ड्रेन ऑफ गेबेलावी’ ‘ऑटम क्वायल’ ‘द थीफ एंड द डॉग्स’ ‘ए हाउस ऑन द नाइल’ ‘मीरामार’ ‘ए विस्पर ऑफ मैडनेस’ ‘हिकमत कूफू’, ‘खान अल-खलीली’ ‘अमाम अल अर्श’ ‘टीचिंग ऑफ चेती’, ‘जकाक अल मिदक’ ‘इक्कोज ऑफ एन ऑटॉबाईग्राफी’ और ‘ड्रीम्स ऑफ रिक्युपरेशन’ ‘लैली अल्फ लैला’, ‘रदुबीस’ आदि उनकी रचनाएँ हैं. निरंतर लिख कर उन्होंने विपुल साहित्य रचा. अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के संबंध में उनका कहना है कि इसे पवित्र माना जाए. विचार केवल प्रति-विचार के रूप में ही सुधारे जा सकते हैं. उन्होंने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता में विश्वास करते हुए भी सामाजिक शांति को उससे ऊ पर स्थान दिया. लोग तर्क और विचार की रोशनी को बुझा देना चाहते हैं. अभिव्यक्ति की आजादी की हर हाल में रक्षा होनी चाहिए और किसी विचार को अगर परास्त या दुरुस्त करना है, तो बलपूर्वक नहीं बल्कि प्रतिरोधी विचारों के द्वारा ही ऐसा किया जा सकता है. अपने शहर काहिरा में रहते हुए उन्होंने अरबी उपन्यास को बुलन्दी पर पहुँचाया. उसे इतना प्रौढ़ बनाया कि वह नोबेल पुरस्कार का हकदार बना. उनके हर उपन्यास का प्रकाशन मिस्र में एक सांस्कृतिक घटना होती थी और गिब्राल्टर से लेकर खाड़ी तक कोई भी साहित्यिक चर्चा उनके नाम के बिना पूरी नहीं हो सकती है.

महफूज भी अपनी रचनाओं में अस्तित्व के प्रश्न से जूझ रहे हैं. अपने उपन्यास ‘जकाक अल मिदक’ (‘मिदक ऐली’) में गली को महफूज ने एक स्टेज की तरह सजाया है जिसमें रंगबिरंगे लोग हैं. मिदक ऐली का वर्णन प्यारा और पारदर्शी है. यह बहुरंगी भीड़ मनोवैज्ञानिक यथार्थवाद को प्रस्तुत करती है. यह अपनी एक खास और अनोखी हलचल से भरी हुई है. इस उपन्यास में मिस्र की राजधानी काहिरा का परिवेश, वहाँ की गलियाँ, जीवन शैली, रिश्ते और संस्कृति सभी कुछ जीवंत हो कर सामने आ जाते हैं. इनमें उन्होंने परम्परावादी अरब शहरी जीवन का चित्रण किया है. मूल रूप से इसकी जडे सम्पूर्ण जीवन से जुडी हैं फिर भी एक ही साथ यह गए जमाने के बहुत सारे रहस्यों को भी सीने पर रखे हुए है.

महफूज इसे अपना भाग्य मानते हैं कि वे इन दो सभ्यताओं के मिलन से बनी सभ्यता में जन्मे और उन्होंने इसका दूध पीया और इसके साहित्य एवं कला से उनका पोषण हुआ. इसके साथ ही वे कहते हैं कि उन्होंने पश्चिमी जगत की समृद्ध और आकर्षक संस्कृति की सुधा को भी पिया है. इन्ही सबकी प्रेरणा और खुद अपनी उत्कंठा से शब्द उनसे निसृत होते रहते हैं. वे कहते हैं, ‘‘मैं दो सभ्यताओं के मिलन का पुत्र हूँ. इन सभ्यताओं का इतिहास के किसी मोड पर कभी मिलन हुआ था. इनमें से एक फराओ कालीन सभ्यता सात हजार साल पुरानी सभ्यता है और दूसरी इस्लामिक एक हजार चार सौ साल पुरानी सभ्यता.’’

उनका मानना है कि कला का हृदय बहुत विशाल होता है और यह बहुत सहानुभूति रखने वाली है. जैसे यह प्रसन्न रहने वालों पर कृपा करती है वैसे ही यह अभागों को छोड़ नहीं देती है. यह दोनों को ही जो उनके हृदय में उमड़-घुमड़ रहा होता है उसे अभिव्यक्त करने देती है. सभ्यता के इतिहास के इस निर्णायक क्षण में यह अविश्वसनीय और अस्वीकार्य है कि मानवता की सिसकियाँ शून्य में समाप्त हो जाएँ. इसमें शक नहीं कि मानवता प्रौढ़ हो गई है और हमारा युग महाशक्तियों से अपेक्षाओं के बीच प्रवेश कर रहा है. मनुष्य का मस्तिष्क अब नष्ट करने और सर्वनाश करने के सारे कारणों को समाप्त कर डालने में लगा है. जैसे वैज्ञानिक औद्योगिक पर्यावरण प्रदूषण को साफ करने में लगे हैं बौद्धिक लोगों को मानवता के नैतिक प्रदुषण की सफाई में लगना है. वे बौद्धिक लोगों का आह्वान करते हुए कहते हैं यह हमारा अधिकार और कर्तव्य दोनों है कि हम सभ्य देशों और उनके अर्थशास्त्रियों से वह कदम उठाने को कहें.

वे अपने नोबेल भाषण में यह भी कहते हैं कि प्राचीन काल में प्रत्येक राजा केवल अपने लोगों की भलाई के काम करता था. दूसरे शत्रु माने जाते थे या शोषण का वायस माने जाते थे, पहले राज्य बहुत संकीर्ण उद्देश्यों को लेकर चलते थे. अपनी सर्वोच्चता और निजी गौरव के अलावा किसी और बात की इज्जत न थी. केवल व्यक्तिगत ख्याति और उच्चता को मूल्य दिया जाता था. इस बात को सिद्ध करने के लिए बहुत सी नैतिक बातों, आदर्शों और मूल्यों को नष्ट कर दिया जाता था, अनेक अनैतिक साधन न्यायसंगत माने जाते थे, बहुत से लोगों को नष्ट होना पड़ता था. झूठ, मक्कारी, षडयंत्र, क्रूरता सब नकारात्मक बातें तब ज्ञान और महानता के लक्षण मानी जाती थीं. आज इस विचार को जड़ से ही बदलने की जरूरत है. आज एक सभ्य लीडर की महानता की माप उसके वैश्विक दृष्टिकोण और उसकी समस्त मानवता के प्रति उत्तरदायित्व की भावना से होनी चाहिए. आज के युग में विकसित देश और तीसरी दुनिया एक परिवार की तरह हैं. प्रत्येक मनुष्य ने जो ज्ञान, बुद्धि और सभ्यता पाई है उसके अनुसार उस पर इस बात की जिम्मेदारी है कि वह सम्पूर्ण विश्व को एक परिवार माने. मैं अपने कर्तव्य की सीमा का उल्लंघन नहीं कर रहा होऊँ गा यदि मैं तीसरी दुनिया की ओर से कहूँ कि हमारी बदहाली के दर्शक मात्र न बने रहें. अपने स्तर के अनुकूल भूमिका निभाएं. दुनिया के चारों कोनों में मनुष्य की बात तो छोड़ ही दीजिए जानवर, पेड़-पौधे तक के प्रति कोई गलत काम न हो, आप यह देखें. विकसित राष्ट्र के रूप में यह आपका दायित्व है. देशों और नेताओं की बड़ी-बड़ी बातों, वायदों और योजनाओं के खोखलेपन की याद दिलाते हुए वे कहते हैं कि बातें बहुत हो लीं, अब काम करने का समय है. हमने बहुत कहा. अब काम करने का वक्त आ गया है.

वे कहते हैं कि यह समय है जब लुटेरेपन और अनाधिकार के युग को समाप्त किया जाए. हम उस युग में हैं जब नेता पूरे ग्लोब के लिए जिम्मेदार हैं. वे दक्षिण अफ्रीका के गुलामों, अफ्रीका के भूख से मरने वालों, पैलेस्तीन और इजराइल के लोगों को दमन से बचाने की गुजारिश कर रहे हैं. इजराइल के लोगों को उनके महान आध्यात्मिक विरासत को नापाक करने से बचाने की अपील कर रहे हैं. ऋ ण में दबे हुए लोगों को बचाने की बात कर रहे हैं. वे मनुष्यता के उत्थान के प्रति चिंतित हैं. अपने नोबेल भाषण वे न केवल मिस्र की नुमाइन्दगी करते हैं वरन पूरी तीसरी दुनिया के नुमाइन्दे बन कर उभरते हैं. इस बुजुर्ग रचनाकार का परिवार बहुत फैला हुआ, बड़ा विशाल है. इनका परिवार न केवल उनका अपना शहर, अपना देश है वरन पूरी मनुष्यता है. उनकी कहानियों में भी हमें अस्तित्ववाद की महत्वपूर्ण चिंतन धारा मिलती हैः तर्क बनाम ईश्वर पर आस्था बौद्धिक नजरिए की सीमाएँ और विकल्प, एक व्यक्ति का अस्तित्व संबंधी संघर्ष आदि, आदि. महफूज एक कमाल के कहानीकार हैं. उनके कहानी संग्रह ‘गॉड्स वल्र्ड’ की चुनिन्दा कहानियों में इसकी एक झलक मिलती है. अस्तित्व के प्रश्नों को उन्होंने किस तेवर के साथ रखा है और जो उत्तर प्रस्तुत किए हैं वे भी काबिले तारीफ हैं. महफूज के लेखन को स्पष्ट रूप से तीन भागों में बाँटा जाता है. मसलन ऐतिहासिक, यथार्थवादी तथा आध्यात्मिक-रहस्यवादी. उनके साहित्य में मनुष्य जीवन अंतःसलिला के रूप में चलता है और उसे रेखांकित भी किया जाता रहा है.

ऐसी ही एक कवयित्री हैं विस्लावा शिम्बोस्र्का. २ जुलाई १९२३ को पौलैंड के एक छोटे से शहर में जन्मी शिम्बोस्र्का १९३१ से क्राकोव शहर में रह रहीं हैं. वे न तो साक्षात्कार देने में विश्वास करती हैं न ही बाहर घूमने फिरने में. उनकी पढ़ाई द्वितीय महायुद्ध में बाधित हुई परंतु बाद में उन्होंने अपनी यूनिवर्सिटी की शिक्षा पूरी की. साहित्य तथा समाजशास्त्र में डिग्री ली. अपने कवि जीवन में उन्होंने बहुत थोक के भाव से कविताएँ नहीं लिखीं परंतु कविताओं की गुणवत्ता के आधार पर उन्हें १९९६ का साहित्य का नोबेल पुरस्कार मिला. पहले उन्हें अपने देश पोलैंड के बाहर बहुत कम लोग जानते थे, नजीब महफूज की भाँति वे भी केवल अपने देश में जानी जाती थीं परंतु पुरस्कार मिलते ही उनकी कविताओं का विश्व की अनेक भाषाओं में अनुवाद हुआ और उनकी कविता पाठकों तथा विद्वानों के बीच समान रूप से सराही गई. यूरोप की विभिन्न भाषाओं में तो उनके काव्य का अनुवाद हुआ ही साथ ही अरबी, हीब्रू, जापानी, चीनी के साथ-साथ हिन्दी में भी उनकी कविताएँ अनुवादित हुई हैं. शिम्बोस्र्का बचपन में अपने परिवार के साथ क्राकोव में आ बसीं तो फिर उसे छोड़ कर कभी नहीं गई. वे एक पुरानी इमारत की पाँचवीं मंजिल पर रहती हैं जिसमें लिफ्ट की सुविधा भी नहीं है. मगर उन्हें इस बात से कोई शिकायत नहीं है.

जहाँ ओरहान पामुक साक्षात्कार देने के लिए प्रसिद्ध हैं वहीं शिम्बोस्र्का साक्षात्कारों से दूर रहती हैं उन्होंने नोबेल पुरस्कार मिलने के बावजूद भी साक्षात्कार नहीं दिए और शोरशराबे से दूर अपने घर में काव्य सृजन में लगी हुई हैं. ‘साउंड्स, फीलिंग, ठॉट्स ः सेवेंटी पोयम्स’, ‘पीपुल ऑन द ब्रिज’, ‘व्यू विथ ए ग्रेन ऑफ सैंड ः सलेक्टेड पोयम्स’, ‘नथिंग ट्वाइस ः सलेक्टेड पोयम्स’, ‘पोयम्स, न्यू एंड कलेक्टेड’, ‘नथिंग्स अ गिफ्ट’, ‘मिरकल फेयर’, आदि उनके कविता संग्रह इंग्लिश में उपलब्ध हैं. कविता के साथ-साथ वे बहुत प्रौढ गद्य भी लिखती हैं, जिसके नमूने ‘नॉन्रक्वायर्ड रीडिंग ः प्रोज पीसेस’ में देखे जा सकते हैं. १९४५ में उनकी प्रथम कविता ‘आई सीक द वल्र्ड’ आई और उसके बाद से वे निरंतर सक्रिय हैं. वे बड़े बड़े सिद्धांतों की बातें नहीं करती हैं. हाँ उनके काव्य में मर्मस्पर्शी शब्द चित्र अवश्य मिलते हैं. उन्होंने द्वितीय विश्व युद्ध की विभीषिका देखी है. इसीलिए जब ग्यारह सितम्बर को वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर हमला हुआ तो वे इतनी विचलित हो गई कि उन्होंने उस भयंकर दृश्य को फोटोग्राफ की भाँति अपने शब्दों में बाँध दिया. ‘ग्यारह सितम्बर का फोटोग्राफ’ कविता की पंक्तियाँ हैं ः

वे कूद रहे थे धधकती इमारतों से

एक

दो

कुछ और

कुछ ऊपर थे, कुछ नीचे थे.

एक फोटोग्राफ ने उन्हें कैद किया था

जब वे जीते थे

धरा के ऊपर

धरा तक पहुँचते हुए.

हर आदमी पूरा साबुत

हर एक का अपना चेहरा

और हर एक का अच्छी तरह छिपा हुआ रक्त

अभी समय है उनके केशों के गड़मड हो जाने में

अभी समय है उनकी जेबों से.

कुंजियाँ और चिल्लर निकल कर गिरने में

वे अभी भी हैं हवा की सच्चाई के अन्दर

उन स्थानों में जहाँ अभी अभी

उनके लिए स्थान बना है

उनके लिए मैं सिर्फ दो काम कर सकती हूँ

उनकी उडान का वर्णन करूँ

और अपनी ओर से न दूँ कोई अंतिम शब्द.

शिम्बोस्र्का भी अपने शहर यहाँ तक कि अपनी इमारत से बाहर जाना भी पसन्द नहीं करती हैं परंतु उनकी दुनिया संकुचित नहीं है, उनका नजरिया विस्तृत है. उन्होंने जीवन का उत्सव, प्रेम, मृत्यु, अस्तित्व जैसे विभिन्न विषयों केा अपने काव्य का विषय बनाया है. जब उन्हें नोबेल पुरस्कार मिला तो समिति की एक सदस्य ब्रिजिटा ट्रोटजंग ने अपनी प्रस्तुति में कहा कि ‘शिम्बोस्र्का के रूप में स्वीडिश अकादमी एक प्रतिनिधि - काव्य के एक असामान्य और अनम्य शुचिता और मजबूत प्रतिनिधि को सम्मानित करना चाहती है. कविता जो जीवन के प्रत्योत्तर में है, जीवन की एक राह

है, विचारों और उत्तरदायित्व का कार्य है - अकादमी उसे सम्मानित करना चाहती है.’

नोबेल पुरस्कार ग्रहण करने के लिए उन्हें आमंत्रित करते हुए उन्हीं की कविता ‘अंवेषण’ (डिस्कवरी) की पंक्तियाँ उदृत की उधृत की गई,

मैं शामिल होने से इंकार करने में विश्वास करती हूँ.

मैं बर्बाद जीवन में विश्वस करती हूँ.

मैं कार्य के नष्ठ हुए वर्षों में विश्वास करती हूँ.

विश्वास करती हूँ रहस्यों को कब्र तक ले जाने में.

ये शब्द नियमों के परे ऊँचे जाते हैं

बगैर नजीरों की सहायता खोजे,

मेरी आस्था अडिग है, अंध और बिना नींव के.

इमरे कर्टीज, गाओ जिंग्जियांग जैसे कई अन्य रचनाकारों की भाँति ही प्रारम्भ में शिम्बोस्र्का की कविताओं को उनके अपने देश में प्रकाशित होने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ा. अपने काव्य में वे बड़ी-बड़ी बातें न करके सामान्य मनुष्य की दुनिया को प्रस्तुत करती हैं, उनकी कविताएँ प्रश्न उठती हैं. वे सीधे-सरल तरीके से अपनी बात कहती हैं. शिम्बोस्र्का की कविताओं में एक सादगी मिलती है साथ ही आंतरिक संघर्ष की झलक भी. वे मानती हैं कि जो व्यक्ति कहता है कि वह नहीं जानता है वही पूर्णता की तलाश कर सकता है दुनिया के तानाशाह और अत्याचारी व्यक्ति बहुत भयावह रूप से आत्मा विश्वास से भरे हुए हैं जो मानवता के लिए खतरनाक है. पूर्ण आत्मविशाव्स भयानक होता है. वे सदा तलाश, एक तरह की बेचैनी को कवि धर्म मानती हैं. अपनी अज्ञानता को स्वीकार करके ही कवि आगे बढ़ सकता है. उनकी कविता को उनके ही शब्दों में समेटा जा सकता है. वे अपनी कविता ‘अंडर वन स्मॉल स्टार’ में कहती हैं,

‘नाराज न हो मुझसे, जबान,

कि लिए तुझसे उधार भारी भरकम शब्द,

फिर की मेहनत जमकर सो वे बन जाएँ फूल से हल्के.’

कविताएँ रचने के साथ-साथ उन्होंने अनुवाद और पुस्तक समीक्षा का कार्य भी किया. वे फ्रेंच साहित्य से पॉलिश में अनुवाद करती हैं. जब वे एक पत्रिका के संपादन विभाग की सदस्य थीं उन्होंने पर्यटन, बागवानी, इतिहास, पाकशास्त्र विभिन्न विषयों की किताबों की समीक्षा लिखी.

शिम्बोस्र्का लिखने का उत्सव मनाती हैं उनकी एक कविता का शीर्षक है ‘जॉय ऑफ राइटिंग’. जीवन को सूक्ष्मता से देखने और अनुभव करने वाली यह रचनाकार अपना परिचय देने के लिए ‘मेरी पहचान की विशेषता/हर्षोंमाद और हताशा’ जैसे शब्दों का प्रयोग करती है. वे अपने काव्य में विभिन्न मानवीय संवेदनाओं को स्पर्श करती हैं और स्थान और भाषा की सीमाओं के पार जाकर सार्वजनिक तथा सार्वभौमिक हो जाती हैं. उनमें गम्भीरता, हास्य, हर्ष-उल्लास, हताशा, प्रेम, मृत्यु, यथार्थ, कल्पना, विश्वास, संशय, आदि तमाम विपरीत भाव मिलते हैं परंतु वे विरोधाभासी नहीं हैं. उनके संग्रह ‘व्यू विथ ए ग्रेन ऑफ सैंड’ का फलक काफी विस्तृत है इसमें एक ओर ‘कॉलिंग आउट टू यति’ है तो दूसरे छोर पर ‘दि एंड एंड द बिग्निंग’ है. स्टालिन जिसके सिद्धांतों से वे भ्रमित हैं उस पर कविता है तो अपने परिचय की कविताएँ भी हैं. उन्हें काव्य का मोजार्ट कहा जाता है परंतु उनके काव्य में बीथोवन की तीव्र उत्तेजना भी मिलती है. उनकी कुछ चुनी हुई कविताओं का संग्रह स्वीडिश भाषा में ‘यूटोपिया’ नाम से आया है स्वीडिश अकादमी ने उसी के आधार पर उनका चुनाव पुरस्कार के लिए किया था इस संग्रह की एक कविता है ‘पोसीबिलिटीज’ इसमें वे कहती हैं,

‘मैं असल में सम्भावनाओं पर ध्यान लगाऊँगी/

ताकि अस्तित्व को न्यायोचित ठहराया जा सके.’

पामुक, शिम्बोस्र्का, महफूज जैसे लेखकों ने अपना एकांत स्वेच्छा से चुना है. और इस एकांत का चुनाव उन्होंने अपने सृजन की अनिवार्यता माना है. वे इसमें प्रसन्न हैं. भले ही ये रचनाकार अपने घर, अपने शहर, अपने घर की दुनिया में शारीरिक रूप से रह रहें हों परंतु उनकी मानसिक दुनिया बहुत विस्तृत है बहुत फैली हुई है उनकी पहुँच भौतिकता के पार समस्त विश्व को स्पर्श करती है. उनका साहित्य मानवता की पीड़ा, हर्षोल्लास, सुख-दुःख, इतिहास, वर्तमान, भविष्य का उत्सव मनाता है. कमरे में रहते हुए भी ये लेखक अपने सृजन के द्वारा काल और स्थान की सीमा को तोड़ कर सार्वभौमिक और सार्वजनीन हो गए हैं. ये रचनाकार एक ओर जीवन का उत्सव मनाते हैं वहीं मानवता की रक्षा के लिए चिंतित भी हैं. अपनी रचनाओं में वे तानाशाहों, अत्याचारियों, सत्ता के लोलुप व्यक्तियों का नकाब उघाड़ते हैं. लोगों को इन निरंकुश लोगों से सावधान करते हैं और विश्व कल्याण की कामना करते हैं. ये अपनी रचनाओं में जीवन के उद्देश्य और अस्तित्व के प्रश्नों से अपने-अपने अनोखे तरीकों से जूझ रहे हैं.

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( विजय शर्मा, १५१, न्यू बाराद्वारी, जमशेद्पुर ८३१००१. - ई-मेलः vijshain@yahoo.com

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 आलेख ,1, कविता ,1, कहानी ,1, व्यंग्य ,1,14 सितम्बर,7,14 september,6,15 अगस्त,4,2 अक्टूबर अक्तूबर,1,अंजनी श्रीवास्तव,1,अंजली काजल,1,अंजली देशपांडे,1,अंबिकादत्त व्यास,1,अखिलेश कुमार भारती,1,अखिलेश सोनी,1,अग्रसेन,1,अजय अरूण,1,अजय वर्मा,1,अजित वडनेरकर,1,अजीत प्रियदर्शी,1,अजीत भारती,1,अनंत वडघणे,1,अनन्त आलोक,1,अनमोल विचार,1,अनामिका,3,अनामी शरण बबल,1,अनिमेष कुमार गुप्ता,1,अनिल कुमार पारा,1,अनिल जनविजय,1,अनुज कुमार आचार्य,5,अनुज कुमार आचार्य बैजनाथ,1,अनुज खरे,1,अनुपम मिश्र,1,अनूप शुक्ल,14,अपर्णा शर्मा,6,अभिमन्यु,1,अभिषेक ओझा,1,अभिषेक कुमार अम्बर,1,अभिषेक मिश्र,1,अमरपाल सिंह आयुष्कर,2,अमरलाल हिंगोराणी,1,अमित शर्मा,3,अमित शुक्ल,1,अमिय बिन्दु,1,अमृता प्रीतम,1,अरविन्द कुमार खेड़े,5,अरूण देव,1,अरूण माहेश्वरी,1,अर्चना चतुर्वेदी,1,अर्चना वर्मा,2,अर्जुन सिंह नेगी,1,अविनाश त्रिपाठी,1,अशोक गौतम,3,अशोक जैन पोरवाल,14,अशोक शुक्ल,1,अश्विनी कुमार आलोक,1,आई बी अरोड़ा,1,आकांक्षा यादव,1,आचार्य बलवन्त,1,आचार्य शिवपूजन सहाय,1,आजादी,3,आत्मकथा,1,आदित्य प्रचंडिया,1,आनंद टहलरामाणी,1,आनन्द किरण,3,आर. के. नारायण,1,आरकॉम,1,आरती,1,आरिफा एविस,5,आलेख,4290,आलोक कुमार,3,आलोक कुमार सातपुते,1,आवश्यक सूचना!,1,आशीष कुमार त्रिवेदी,5,आशीष श्रीवास्तव,1,आशुतोष,1,आशुतोष शुक्ल,1,इंदु संचेतना,1,इन्दिरा वासवाणी,1,इन्द्रमणि उपाध्याय,1,इन्द्रेश कुमार,1,इलाहाबाद,2,ई-बुक,374,ईबुक,231,ईश्वरचन्द्र,1,उपन्यास,269,उपासना,1,उपासना बेहार,5,उमाशंकर सिंह परमार,1,उमेश चन्द्र सिरसवारी,2,उमेशचन्द्र सिरसवारी,1,उषा छाबड़ा,1,उषा रानी,1,ऋतुराज सिंह कौल,1,ऋषभचरण जैन,1,एम. एम. चन्द्रा,17,एस. एम. चन्द्रा,2,कथासरित्सागर,1,कर्ण,1,कला जगत,113,कलावंती सिंह,1,कल्पना कुलश्रेष्ठ,11,कवि,2,कविता,3240,कहानी,2361,कहानी संग्रह,247,काजल कुमार,7,कान्हा,1,कामिनी कामायनी,5,कार्टून,7,काशीनाथ सिंह,2,किताबी कोना,7,किरन सिंह,1,किशोरी लाल गोस्वामी,1,कुंवर प्रेमिल,1,कुबेर,7,कुमार करन मस्ताना,1,कुसुमलता सिंह,1,कृश्न चन्दर,6,कृष्ण,3,कृष्ण कुमार यादव,1,कृष्ण खटवाणी,1,कृष्ण जन्माष्टमी,5,के. पी. सक्सेना,1,केदारनाथ सिंह,1,कैलाश मंडलोई,3,कैलाश वानखेड़े,1,कैशलेस,1,कैस जौनपुरी,3,क़ैस जौनपुरी,1,कौशल किशोर श्रीवास्तव,1,खिमन मूलाणी,1,गंगा प्रसाद श्रीवास्तव,1,गंगाप्रसाद शर्मा गुणशेखर,1,ग़ज़लें,550,गजानंद प्रसाद देवांगन,2,गजेन्द्र नामदेव,1,गणि राजेन्द्र विजय,1,गणेश चतुर्थी,1,गणेश सिंह,4,गांधी जयंती,1,गिरधारी राम,4,गीत,3,गीता दुबे,1,गीता सिंह,1,गुंजन शर्मा,1,गुडविन मसीह,2,गुनो सामताणी,1,गुरदयाल सिंह,1,गोरख प्रभाकर काकडे,1,गोवर्धन यादव,1,गोविन्द वल्लभ पंत,1,गोविन्द सेन,5,चंद्रकला त्रिपाठी,1,चंद्रलेखा,1,चतुष्पदी,1,चन्द्रकिशोर जायसवाल,1,चन्द्रकुमार जैन,6,चाँद पत्रिका,1,चिकित्सा शिविर,1,चुटकुला,71,ज़कीया ज़ुबैरी,1,जगदीप सिंह दाँगी,1,जयचन्द प्रजापति कक्कूजी,2,जयश्री जाजू,4,जयश्री राय,1,जया जादवानी,1,जवाहरलाल कौल,1,जसबीर चावला,1,जावेद अनीस,8,जीवंत प्रसारण,141,जीवनी,1,जीशान हैदर जैदी,1,जुगलबंदी,5,जुनैद अंसारी,1,जैक लंडन,1,ज्ञान चतुर्वेदी,2,ज्योति अग्रवाल,1,टेकचंद,1,ठाकुर प्रसाद सिंह,1,तकनीक,32,तक्षक,1,तनूजा चौधरी,1,तरुण भटनागर,1,तरूण कु सोनी तन्वीर,1,ताराशंकर बंद्योपाध्याय,1,तीर्थ चांदवाणी,1,तुलसीराम,1,तेजेन्द्र शर्मा,2,तेवर,1,तेवरी,8,त्रिलोचन,8,दामोदर दत्त दीक्षित,1,दिनेश बैस,6,दिलबाग सिंह विर्क,1,दिलीप भाटिया,1,दिविक रमेश,1,दीपक आचार्य,48,दुर्गाष्टमी,1,देवी नागरानी,20,देवेन्द्र कुमार मिश्रा,2,देवेन्द्र पाठक महरूम,1,दोहे,1,धर्मेन्द्र निर्मल,2,धर्मेन्द्र राजमंगल,2,नइमत गुलची,1,नजीर नज़ीर अकबराबादी,1,नन्दलाल भारती,2,नरेंद्र शुक्ल,2,नरेन्द्र कुमार आर्य,1,नरेन्द्र कोहली,2,नरेन्‍द्रकुमार मेहता,9,नलिनी मिश्र,1,नवदुर्गा,1,नवरात्रि,1,नागार्जुन,1,नाटक,152,नामवर सिंह,1,निबंध,3,नियम,1,निर्मल गुप्ता,2,नीतू सुदीप्ति ‘नित्या’,1,नीरज खरे,1,नीलम महेंद्र,1,नीला प्रसाद,1,पंकज प्रखर,4,पंकज मित्र,2,पंकज शुक्ला,1,पंकज सुबीर,3,परसाई,1,परसाईं,1,परिहास,4,पल्लव,1,पल्लवी त्रिवेदी,2,पवन तिवारी,2,पाक कला,23,पाठकीय,62,पालगुम्मि पद्मराजू,1,पुनर्वसु जोशी,9,पूजा उपाध्याय,2,पोपटी हीरानंदाणी,1,पौराणिक,1,प्रज्ञा,1,प्रताप सहगल,1,प्रतिभा,1,प्रतिभा सक्सेना,1,प्रदीप कुमार,1,प्रदीप कुमार दाश दीपक,1,प्रदीप कुमार साह,11,प्रदोष मिश्र,1,प्रभात दुबे,1,प्रभु चौधरी,2,प्रमिला भारती,1,प्रमोद कुमार तिवारी,1,प्रमोद भार्गव,2,प्रमोद यादव,14,प्रवीण कुमार झा,1,प्रांजल धर,1,प्राची,367,प्रियंवद,2,प्रियदर्शन,1,प्रेम कहानी,1,प्रेम दिवस,2,प्रेम मंगल,1,फिक्र तौंसवी,1,फ्लेनरी ऑक्नर,1,बंग महिला,1,बंसी खूबचंदाणी,1,बकर पुराण,1,बजरंग बिहारी तिवारी,1,बरसाने लाल चतुर्वेदी,1,बलबीर दत्त,1,बलराज सिंह सिद्धू,1,बलूची,1,बसंत त्रिपाठी,2,बातचीत,2,बाल उपन्यास,6,बाल कथा,356,बाल कलम,26,बाल दिवस,4,बालकथा,80,बालकृष्ण भट्ट,1,बालगीत,20,बृज मोहन,2,बृजेन्द्र श्रीवास्तव उत्कर्ष,1,बेढब बनारसी,1,बैचलर्स किचन,1,बॉब डिलेन,1,भरत त्रिवेदी,1,भागवत रावत,1,भारत कालरा,1,भारत भूषण अग्रवाल,1,भारत यायावर,2,भावना राय,1,भावना शुक्ल,5,भीष्म साहनी,1,भूतनाथ,1,भूपेन्द्र कुमार दवे,1,मंजरी शुक्ला,2,मंजीत ठाकुर,1,मंजूर एहतेशाम,1,मंतव्य,1,मथुरा प्रसाद नवीन,1,मदन सोनी,1,मधु त्रिवेदी,2,मधु संधु,1,मधुर नज्मी,1,मधुरा प्रसाद नवीन,1,मधुरिमा प्रसाद,1,मधुरेश,1,मनीष कुमार सिंह,4,मनोज कुमार,6,मनोज कुमार झा,5,मनोज कुमार पांडेय,1,मनोज कुमार श्रीवास्तव,2,मनोज दास,1,ममता सिंह,2,मयंक चतुर्वेदी,1,महापर्व छठ,1,महाभारत,2,महावीर प्रसाद द्विवेदी,1,महाशिवरात्रि,1,महेंद्र भटनागर,3,महेन्द्र देवांगन माटी,1,महेश कटारे,1,महेश कुमार गोंड हीवेट,2,महेश सिंह,2,महेश हीवेट,1,मानसून,1,मार्कण्डेय,1,मिलन चौरसिया मिलन,1,मिलान कुन्देरा,1,मिशेल फूको,8,मिश्रीमल जैन तरंगित,1,मीनू पामर,2,मुकेश वर्मा,1,मुक्तिबोध,1,मुर्दहिया,1,मृदुला गर्ग,1,मेराज फैज़ाबादी,1,मैक्सिम गोर्की,1,मैथिली शरण गुप्त,1,मोतीलाल जोतवाणी,1,मोहन कल्पना,1,मोहन वर्मा,1,यशवंत कोठारी,8,यशोधरा विरोदय,2,यात्रा संस्मरण,31,योग,3,योग दिवस,3,योगासन,2,योगेन्द्र प्रताप मौर्य,1,योगेश अग्रवाल,2,रक्षा बंधन,1,रच,1,रचना समय,72,रजनीश कांत,2,रत्ना राय,1,रमेश उपाध्याय,1,रमेश राज,26,रमेशराज,8,रवि रतलामी,2,रवींद्र नाथ ठाकुर,1,रवीन्द्र अग्निहोत्री,4,रवीन्द्र नाथ त्यागी,1,रवीन्द्र संगीत,1,रवीन्द्र सहाय वर्मा,1,रसोई,1,रांगेय राघव,1,राकेश अचल,3,राकेश दुबे,1,राकेश बिहारी,1,राकेश भ्रमर,5,राकेश मिश्र,2,राजकुमार कुम्भज,1,राजन कुमार,2,राजशेखर चौबे,6,राजीव रंजन उपाध्याय,11,राजेन्द्र कुमार,1,राजेन्द्र विजय,1,राजेश कुमार,1,राजेश गोसाईं,2,राजेश जोशी,1,राधा कृष्ण,1,राधाकृष्ण,1,राधेश्याम द्विवेदी,5,राम कृष्ण खुराना,6,राम शिव मूर्ति यादव,1,रामचंद्र शुक्ल,1,रामचन्द्र शुक्ल,1,रामचरन गुप्त,5,रामवृक्ष सिंह,10,रावण,1,राहुल कुमार,1,राहुल सिंह,1,रिंकी मिश्रा,1,रिचर्ड 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रचनाकार: विजय शर्मा का आलेख : अपना शहर अपनी दुनिया
विजय शर्मा का आलेख : अपना शहर अपनी दुनिया
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