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सरोजिनी साहू का उपन्यास : पक्षी-वास (3)

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पक्षी-वास डॉ सरोजिनी साहू का बहु-चर्चित उपन्यास अनुवाद :- दिनेश कुमार माली ( पिछले अंक से जारी …) उर्वशी का बेटा स्कूल जाता ह...

पक्षी-वास

डॉ सरोजिनी साहू का

बहु-चर्चित उपन्यास

अनुवाद :- दिनेश कुमार माली

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(पिछले अंक से जारी…)

उर्वशी का बेटा स्कूल जाता है। स्टेशन प्लेटफाँर्म के बाहर एक बड़ा सा घर जिसमें बड़े आँफिसरों की बीवियाँ गरीब बच्चों को पढाती है। उर्वशी का बेटा उसी स्कूल में जाता है। इसलिए उस अकेली के ही घर में हर दिन सवेरे-सवेरे चूल्हा जलता है।

परबा ने उस कड़सी को तेज आग पर रखा, सूखी हुई मछलियों को भूनने के लिये।

उर्वशी ने पुछा “वह राक्षस किधर गया ? परबा”

“हाँ दीदी, देखो ना मेरी छाती पर कितना जोर से मुक्का मारा था जिसका अभी भी दर्द छूटा नहीं है।”

मुँह में कपड़ा ठूँसने के बाद भी अपनी हँसी को रोक नहीं पा रही थी उर्वशी। बोली “तुम उस नपुंसक को दिखाने के लिये क्यों मर रही थी ?”

“मैं क्यों दिखाउँगी। मैं तो अपने आँचल को ढक चुकी थी, उसके देखने के तुरंत बाद।”

“वह मर नहीं जाता ? तेरे जैसी सरल लड़की को देखकर उसने ऐसा किया। मेरे को हाथ लगाकर देखता तो दादी-नानी सारी की सारी सब याद दिला देती, हाँ।”

परबा जानती थी कि गूडा की मरजी के बिना यहाँ, किसी के लिये भी रहना संभव नहीं है। परबा यह भी जानती थी कि उर्वशी जितना हाँक रही थी, गूड़ा के सामने असल में कुछ भी नहीं बोल सकती थी। एक छोटी लकड़ी से उलट-पुलटकर रही थी उन सूखी मछलियों को, तो इसकी गंध से पेट की भूख को भड़का दिया, जिससे मुंह में पानी भर आया परबा के। कभी-कभी पेटभर पखाल खाने से माँ-बाप की याद आ जाती थी। क्या खाते होंगे वे बूढ़े माँ-बाप ? कौन जाने शमिया दुआल की तरह सूख-सूखकर मर गये होंगे ? उसका बाप उसे पास बिठाये बिना कभी भी पखाल नहीं खाता था। हर दिन पहला निवाला वह परबा को खिलाता था। बोलता था, “तीन लड़कों के बाद में पैदा हुई है मेरी बेटी। उसकी शादी टिटलागढ़, काँटाभाजी की तरफ करवाऊँगा। उसके कान-नाक के जेवर उसके तीन भाई जुगाड़ नहीं कर देंगे क्या ?"

“मैं आपको छोड़कर नहीं जाऊँगी, बा।”

“अगर तुम शादी नहीं करोगी, लोग क्या कहेंगे ? तीन-तीन बड़े भाई होने के बाद भी तेरे लिए दूल्हा नहीं खोज पाये।” जब पास में मंझला भाई डाक्टर होता था, तब बा उससे कहते, “मेरी बेटी के लिये एक कंठी नहीं खरीद पाओगे तुम ?”

“यह कंठी क्या चीज है ?“

“सोने का हार है, सुनार के पास बनाना पड़ता है।”

खो गये या मर गये कौन जानता है ? सभी भाई स्वार्थी हो गये।

बाप को बार-बार बुखार आता था। उसका एक पैर ठीक से काम नहीं कर रहा था मगर पेट क्या ये सब बातें जानता था ? गरीब लोग जिस प्रकार से भूख को जानते है, दूसरे जानते है क्या ?

माँ जा रही थी किसिन्डा, रहमन मियां के गोदाम में काम करने के लिये। दिन-भर बरामदा में बैठकर बड़बड़ा रहा था बाप। शक की वजह से वह माँ के बारे में गंदी-गंदी बातें करता था। पेंगा और महनी बूढ़ा बातों में मिर्च-मसाला लगाकर कहते थे। परबा गुस्सा से आग-बबूला हो उठती थी। बोलती थी “आप क्यों काम नहीं करते हो ? बा, बैठे-बठे इतनी गंदी-गंदी बातें बोलते रहते हो। आपको कुछ समझ में नहीं आता है क्या ?”

“तेरी माँ तो छिनाल है। रहमन मियां की रखैल !”

“ऐ बा, तुम अगर ऐसी बाते करोगे तो मैं घर छोड़कर चली जाऊँगी।”

“जाना है, तो तू भी जा ! मैं किसी को भी रोकूंगा नहीं। साले लोग पंख लगने पर सभी उड़ गये, कोई भी नहीं रुका। और तू रहकर और कौनसा निहाल कर देगी ?”

बाप की ये बातें सुनकर परबा का मन विचलित हो गया था। दुःख से वह टूट चुकी थी। परबा तो अपने आप को बाप की लाड़ली प्यारी जान मानती थी। उसके बिना उसका बाप एक पल भी जिन्दा नहीं रह सकता था। मगर बाप ऐसी बातें कर रहा था अभी। एक क्षण के बाद, उसे अपनी बाप के मन की व्यथा का अहसास हुआ। वह उसकी नाराजगी का कारण समझ चुकी थी।

इतना गुस्सा और नाराज होने के बाद भी अंतरा ने एक गाना गाया :

“हे किराये का मकान,

न तुम हो इसके, ना तुम्हारा

पंचतत्वों का बना घर,

देह कुछ दिन का सहारा ।”

परबा की आँखे आँसूओं से छलकने लगी। उर्वशी बोली “सब कुछ जला देगी क्या, परबा ? तेरा ध्यान कहाँ है ? मछली जलने की गंध आ रही है ?”

परबा का ध्यान लौट आया। भूनी मछली से भरी कड़सी को लेकर अपनी खोली में वापिस आ गयी

माँ के लिये परबा का मन बहुत दुखी था। कितना मेहनत करके माँ कमाती थी ? फिर भी, बाप उसको

बदनाम किये जा रहा था। शरीर तो जीर्ण-शीर्ण हो चुका था। एक पैसे की ताकत नहीं थी। उनको तो चुपचाप बैठना चाहिये था। क्यों ऐसे ऊफनता रहता था ?

एक दिन नरेश ने ढोल बाँधने का काम दिया था बाप को। ढोल को कसकर नहीं बाँध पा रहा था वह। इसलिए जिस किसी को देखता था, को सहायता के लिए विनती करता था। “आओ तो, बेटा ! मेरी सहायता करो।” पता नहीं, कैसे कसकर बाँधा था उस ढोल को बाप ने, कि जब नरेश ने उस पर अपने हाथ से दो-चार बार ढाप मारी, पर ढोल ढंग से नहीं बजा। तो वह नाराज होकर बाप को बुरी तरह से लताड़ने लगा “अगर तुमसे यह काम नहीं होता, तो तुमने मुझे पहले बताया क्यो नहीं ? मेरे चमड़े को क्यों बरबाद कर दिया ? मैं तुझको एक भी पैसा नहीं दूँगा, बता देता हूँ। आँख से तो दिखाई नहीं देता, और कहता है कि मैं ढोल बनाऊँगा ?”

परबा के बाप का ढोल बनाने में बड़ा नाम था। चिकने चमड़े को भी खींच कर अच्छी तरीके बांध लेता था। बारिश की एक बूँद गिरने से भी ठम-ठम की आवाज निकल आती थी ढोल से। उसको फिर इतना अपमानित किया नरेश ने ! इतना गाली-गलौच किया कि बस मारना ही बाकी रह गया था ! उसी दिन से पता चल गया परबा को कि बाप और काम नहीं कर पायेगा।

परबा बाप को भी दोषी नहीं ठहरा पाती। भाईयों को दोष देती थी। बड़ा भाई एक लड़की को लेकर भाग गया और ईसाई भी हो गया, बेईजू शबर की लड़की से शादी करने के लिये। मंझला वाला लड़का तो बाप का चेहेता था। पर काम करने गया, सो गया ही गया। छोटा वाला क्रोधी और चिड़चिड़े स्वभाव का था। गांव के आवारा लड़कों की गलत संगत में पड़कर नक्सल फौज में भर्ती हो गया। गांव की लड़की कुन्द को वह दिल दे बैठा था। न जाने कैसे, सब कुछ भूलकर, वह नक्सल में चला गया। बाप के साथ बिल्कुल भी नहीं पटता था उसका। दोनों आपस में झगड़ा किया करते थे। कितनी बार बाप ने उसे अपने घर से निकाल दिया था। घूम-फिरकर वह वापस घर लौट आता था। किन्तु एक दिन वह जब घर छोड़कर चला गया, तो फिर लौटा ही नहीं। एक साल के बाद ही पता चला, वह नक्सल बन गया है।

कुंद की मां विधवा थी। फिर भी उसका बकरा उसको कमा कर देता था। वह केवल बकरा ही नहीं बल्कि कुंद का भाई बोलने से भी चलेगा। पूरे गांव भर में सबसे शानदार, मस्त जीव था वह। किसान हो, प्रधान, अगरिया हो या हलवाई, सब अपनी अपनी बकरियों को ले आते थे उसके घर में गर्भवती करवाने के लिये। उससे कुंद की माँ को दो-चार पैसा मिल जाता था। घोड़े जैसा ऊँचा, उद्दण्ड़ यह जीव लगता था जैसे कि भगवान का अवतार हो। उसके छू देने से भी बांझ पेड़ों में फूल भर जाते थे। लोग जब अपनी अपनी बकरियों को लाते थे तो साथ में सिंदूर, दूब, डाल पत्ते भी लेकर आते थे। घर के पिछवाड़े बंधे हुये बकरा को पहले पहल खाने के लिये डाल के दो टुकड़े देते थे और फिर सिंदूर, दूब लगाकर पूजा करते थे भोलेश्वर महादेव के नाम से। उसके बाद कुंद की माँ के पास छोड़कर जाते थे उनकी अपनी बकरियों को। कुंद की माँ बोलती थी “जा, मेरे बाप, एकाध घंटा छोड़कर आना। महाप्रभु की जब दया होगी, तब ही गर्भ ठहरेगा ।”

मानो, गर्भधारण जैसे एक पवित्र अनुष्ठान हो। किसी के मन में कोई पाप नहीं होता, कोई घृणा नहीं होती। परबा और उसकी सहेलियों ने कई बार देखा था उस सौ पुरुष वाले पराक्रम को एवं उसके ईश्वरीय संभोग को ! उन्होंने देखा था कि एक बकरा किस प्रकार भगवान बन जाता था। एक दिन परबा कुंद को इस बस्ती की एक खोली में मिली थी। कहां से आकर, झूमरी ने यह खबर दी थी।

“रे परबा, तुम्हारे गांव बजीगुड़ा से एक ल ड़की आकर यहाँ पहुँची है। वह तुम्हारे बारे में जानती है।”

झूमरी की बात सुनकर परबा धक् सी रह गयी।

“सच बोल रही हो, झूमरी, फिर किसका कपाल फूटा हमारे गांव में ?”

उत्सुकता को दबा नहीं पायी और भागने लगी परबा नीचे वाली खोली की तरफ। खोली के बाहर बैठी थी कुंद। कुंद को देखकर परबा को अपने पांव के नीचे की जमीन खिसकती नजर आयी।

“तू तो मेरी भाभी बनती। तू कैसे आगयी इस नरक में ?”

परबा की बात सुनकर बिलख-बिलख कर रो पड़ी थी कुंद। सिसकी के बाद सिसकी आ रही थी। परबा के आँखों में भी आंसू आगये। परबा रोने जैसी होकर बोली, “और मत रो कुंद, मैं समझ गयी, तुम्हारे नहीं बोलने से भी क्या मैं नहीं समझ पाऊँगी ? बता, तेरे पास कौनसी चीज की कमी थी ? तुम्हारा वह बकरा कैसा है, रे ?”

वही मर गया, तभी तो यह हालत हुयी है। पागल होकर घूमा कुछ दिन तक, किसी की भी बात नहीं मानता था। जो सामने मिलता, उसे मारने दौड़ पड़ता। एक दिन तो किसिंडा चलागया। लोगों ने कहा, रेल्वे लाइन के नीचे छटपटाकर उसके प्राण निकल गये। मेरी मां खोजने गयी थी। कुछ पता नहीं कर पायी उसका।

“तुम जंगल की तरफ गयी थी रे, कुंद ?”

कुंद चुप रही।

“हरामजादी, तुम बकरा की बात तो कर रही है, अपनी दुर्दशा की बात क्यों नहीं बताती ? वो फोरेस्ट-गार्ड....”

कुंद को जैसे कि बचने का कोई रास्ता नहीं मिल रहा था । परबा के मुंह से फोरेस्ट-गार्ड का नाम सुनकर रुका हुआ रोना फिर फफक-फफक कर बाहर निकलने लगा था।

“रो मत मेरी बहिन, ये सब हमारी किस्मत का खेल है। और क्या कर सकते थे ? तू किसी को मत बताना कि मैं यहां हूँ। मैं भी किसी को नहीं बताऊँगी। भूख लगे तो मेरे पास आ जाना।” बोलते-बोलते परबा ने रोना शुरु कर दिया। वह तो अभी झूमरी की भूमिका निभा रही थी। संभाल लेगी कुंद को किसी भी तरह। उसने कुंद को अपनी बाहों में ले लिया “मेरी बहिन, मेरी भाभी।”

बाट जोहते-जोहते थक गये, पर इस साल भी बारिश नहीं आयी। तपती धूप में जंगल जलता जा रहा था। कभी खुशहाल प्रजा की भाँति घिरी हुई लतायें और झाड़ियाँ सूख गयी, और जंगल लग रहा था प्रजा-विहिन। एक जमाने से राजा-जमीदार जैसे खड़े हुए साल, बीजा, अर्गुन, गम्भारी के पेड़ सब आज दुःखी प्रजा जैसे श्रीहीन होकर असहाय लग रहे थे। उदंती नदी एक रंगहीन, रसहीन प्रौढ़ा औरत के जैसी पैर पसार कर बैठी थी। पूरा इलाका तप उठता था पहाड़-पर्वतों के लंबी-लंबी सांसों से। मिट्टी में कब से जंभाई लेते मुंह के, जैसी दरारे पड चुकी थी। दूर से पत्थर काटने वालों की ठक्-ठक् की आवाज जरुर हवा में तैरती हुई आ रही थी मगर, यह कोई गीत नहीं था।

इस बीच, आम, जामुन एक ऋतु के फल बाँटकर अब ठूंठ के ठूंठ बन कर बैठे थे। हाथियों के झुण्ड की बात तो रहने दो, एक लंगूर भी नहीं कूद रहा था इस डाली से उस डाली पर।

घड़-घड़कर बादल गरज रहे थे, किसी दूर गांव के ऊपर। नवरंग पुर या नुआपाड़ा के ऊच्पर। कभी-कभी आकाश में बिजली चमक रही थी। कभी उतर की तरफ, तो कभी दक्षिण की तरफ। कभी-कभी भरी दुपहरी कोभी बादल ढक कर रख लेती थी। कई आशा लिये गांव वाले घर के बाहर, रास्ते के ऊपर, होठों पर खुशी और मुस्कान लिये आपस में बातें कर रहे थे, देखो, उधर देखो, बादल, सात बेटों की माँ, बनकर आ रही हैं। कोई बीड़ी सुलगा रहा था, कोई बाड़ ठीक कर रहा था, तो कोई गीतों में सुर मिला रहा था। कई खुशमिजाज तो पेट भर पीकर रास्ते के ऊपर मतवाले हाथी की तरह झूमते हुये घूम रहे थे। अंधेरा छा जा रहा था, मानों किसी ने काला कंबल बिछा दिया हो सारे आकाश में। अभी यह लटका हुआ कंबल सारे जंगल को ढक देगा। पेड-पौधे अपनी कमर से कमर सटाकर, हाथ में हाथ फसाकर गोल-गोल नाचना चाहते थे। मगर वे एक दूसरे से इतना दूर थे कि हाथ बढाने से भी कोई किसी की कमर को छू भी नहीं पाते थे। हाय ! कितने बुरे दिन ! बादल नीचे आ रहे थे। मगर पेड़ अपनी ताल, और नहीं बैठा पा रहे थे।

कौन जाने रसहीन जंगल के व्यवहार से दुखित और अपमानित होकर कहीं बादल चले गये हो, दूसरे रास्ते पर धीरे-धीरे ? बादल पीछे हटते हुये जा रहे थे। असहाय मनुष्य हाथ बढ़ाकर उनको पकड़ नहीं पाते थे। पेड़-पौधे स्तब्ध रह गये थे। कई दिनों से कहीं खो सी गयी थीं चिड़ियें। मुश्किल से जो एकाध जिन्दा बची थी, वे अपनी आवाज में बादलों को पुकार रही थी

“रुक जाओ, एक पल के लिये रुक जाओ।”

बादल जैसे, रुठ गये थे कि नहीं रुकेंगे। बादलों के रास्ते में यह गांव आया, इसलिये उस गांव के ऊपर से चले गये, नहीं तो गांव के साथ उनकी कैसी प्रीति ?

हाथ बढ़ाने से बादल को छू नहीं पाते थे। मनुष्यों की लंबी-लंबी दुख भरी सांसे भी छू नहीं पा रही थी बादलों को। कभी-कभी बादल ऐसे ही अपना विपुल यौवन दिखाकर चले जाते थे दूसरे गांव को। जंगल में रहने वाले लोग हताश और निराश हो जाते थे। जंगल को जलाकर खेती के लिये जमीन तैयार कर रखी थी, कब से उन लोगों ने। धरती माँ को कबसे ‘सलप रस’ और ‘मुर्गे के खून’ की प्रसाद चढ़ा चुके थे। फिर भी इन्द्र भगवान खुश नहीं हो रहे थे।

इन्द्र देवता क्रोध में थे. उन्हें मनाना पड़ेगा। इसलिये गांव वालों ने अपने ओझा के साथ सलाह मशविरा भी किया। इन्द्र देवता को बहलाना फुसलाना पड़ेगा, सलप रस और मुर्गे की बलि चढ़ाकर। मगर इन्द्रदेवता तो लंपट देवता है। वे सिर्फ खाने-पीने से खुश नहीं होते है। जंगल के वांशिदे आखिरकार एक हल खोज लेते हैं। बूढ़ा ओझा के सलाह मशविरे से जमीन साफ की जाती है। सब सलप रस पीते हैं और इन्द्र देवता को थोड़ा भोग चढ़ाते हैं। अब सभी जवान लड़कियां निर्वस्त्र हो जाती है। उपर से इन्द्र देवता उनके रूप लावण्य का उपभोग करते हैं, किशोरियों के भरे-पूरे यौवन को देखकर। अब इन्द्र देवता रुक नहीं सकते थे। उनका शरीर गीतों के बोलों के साथ झूम उठता था। इन्द्र के वीर्य की तरह विक्षिप्त हो, गुच्छा-गुच्छा होकर बादल फूट पड़ते थे। जंगल के वाशिंदे कुछ समझे या न समझे, मगर इतना जान जाते थे कि नारी शक्ति स्वरुपा है। वह भूदेवी है। भूदेवी के आहवान् से इन्द्रदेवता त्राहि-त्राहि करने लगते हैं।

हल्की-हल्की बारिश के बाद, इन्द्र फिर माया रचते हैं। बादलों के बीच में सूर्य के दर्शन होने लगते हैं। ऐसी ही आस्था और अनास्था को लेकर जंगल वाले जीते थे। सब यही सोचते थे, कि यह सब किस्मत का खेल है। अपने-अपने कर्मों का फल मानते थे। भाग्य के विरुद्ध जाने का उनमें साहस नहीं था। और उनके पास कोई उपाय भी नहीं था।

वे अपनी सरलता से सिर्फ विश्वास करना जानते थे। वे केवल जानते थे दो देवियों के बारे में, ‘करमसानी’ और ‘करममानी’ के बारे में। कर्मों के अनुसार वे फल देती थी। कर्मा पेड़ की डाली को गाढ़कर, कर्म देवता की पूजा करते थे वे लोग। एक दूसरे के हाथों में हाथ फंसाकर, बालों में ‘कर्मा पेड़’ की डाली गूंथकर, दारु पीकर देवी-देवताओं को दारु का प्रसाद चढ़ाकर गाना गाते थे नाचते थे माँदर की ताल पर।

“गायेंगे कर्मा के गीत

पर गाने का बोल नहीं है आता

शत्-शत् प्रणाम है कर्मासानी माता

प्रसन्न हो हे भगवती ! हे माता !”

ऐसा क्या दुष्कर्म किये थे उन लोगों ने ? बादल, शैतान की हंसी होठों पर लेकर चले जाते थे जैसे घोड़े पर सवार हो। जाते वक्त केवल दो बूंद पानी गिरा देते थे, जैसे कोई दो मुट्ठी तंदूल फेंक कर चला जाता हो।

निरुपाय होकर, बरामदे में बैठकर, जुगाली करते हुये बुजुर्ग लोग सोचते थे कि घोर पाप का समय आ गया है। पोटली बांधकर देश-प्रदेश जाने के लिये तैयार हो जाते थे स्वप्नदर्शी युवक। और युवतियां साप्ताहिक हाट में जाकर गायब हो जाती थीं। कहीं, किसी को भी पता नहीं चलता था गांव में। गांव की युवतियां गायब हो जाती थी। और युवक कहकर गये थे कि दो महीने में चले आयेंगे, मगर लौटते नहीं थे। बे-मौसम में बचा खुचा पानी, पहाड़ के सीने पर डालकर चले जाते थे इन्द्रदेव। झाड़ी जंगल बढ़ जाता था परन्तु खेती नहीं होती थी। पेड़-पौधे भले ही बढ़ जाते थे, पर गांव आदमियों से खाली हो जाता था। जो जा नहीं पाते थे वे बरामदा में केवल खंभा बनकर रह जाते थे। सिर्फ थोड़ी-सी बारिश के लिये जंगल के वांशिंदे इतना कष्ट उठाते थे।

वे लोग जिसको नहीं देखा था, उस पर विश्वास करते थे। और जिसको देखा था, उसको समझ नहीं पाते थे। कभी भगवान बड़े लगते थे, तो कभी सरकार। भगवान और सरकार के द्वन्द में, किसके आगे हाथ फैलाये, वे समझ नहीं पाते थे। धूप, मधु, साल के बीज, तेंदू पता, महुआ, बेंत आदि बेचते थे वे लोग, बदले में खरीदते थे भात, चावल, सब्जी, नमक और कपड़ा। सरकार शिक्षक भेजती थी, चावल भेजती थी, दवाई भेजती थी, रास्ता भेजती थी, बिजली भेजती थी, मगर उदंती के उस पार कुछ भी नहीं पहुंच पाता था ये सब। पर उदंती को इस पार से उस पार चले जाते थे शीशम, गंभारी, साल के पेडों की लकड़ियां।

ऐसे जंगल से गायब हो जाते थे शेर, भालू और हाथी. और बढ़ जाती थी नक्सलियों की फौज। शेर की दहाड़ के बदले सुनाई देती थी बंदूकों की गोलियों की आवाजें। जंगल में तैयार होता था एक अलग भारतवर्ष। ऐसे जंगल लुप्त हो रहे थे। लुप्त होते थे आस-पास के लोग। मगर बादल ये बातें नहीं समझते थे। दोनों देवियां कर्मसानी, कर्ममानी भी नहीं समझ पाती थी, नहीं समझ पाते थे आँखों में सपने संजोये हुये परदेश गये हुये युवक-युवतियां।

सवेरे उठते समय सरसी का सिर दुख रहा था। भारी होकर सिर ऐसा लग रहा था जैसे पीछे की तरफ कोई खींच रहा हो। बांस की बनी चटाई से उठकर दीवार के सहारे बैठ गयी। सवेरे से ही सिर इतना जोर से पकड़ा था कि ऐसा लग रहा था कि कहीं उसे बुखार न हो जायेगा। चूड़ियों की खनखनाहट सुनकर कब से उठकर बाहर बैठा अंतरा, बोला

“जरा, चाय-पानी तो पिला”

सरसी सुनकर भी चुपचाप ऐसे ही बैठी रही। सिर के अंदर जैसे कि कोई हथौड़ी लेकर मार रहा हो। पिछले रात की बात उसे याद हो आयी। अंतरा के उपर गुस्सा होकर खाना छोड़कर उठ गयी थी, शुरुकानी के घर जाकर दस रूपये का दारु पीकर आयी थी। वैसे भी सरसी देशी दारु नहीं पीती थी। थकान मिटाने के लिए कभी-कभी एकाध गिलास महुली पी लेती थी। बचपन से आज तक उसने कभी देशी दारु छुई तक नहीं थी। उसको याद आया, जब वह पांच-छः साल उम्र की थी, देशी दारु पीने से उसके गांव के पन्द्रह-सोलह आदमी छटपटाकर मर गये थे। उनमें से एक उसके ताऊजी भी थे।

सरसी का बाप दो-चार घर से इसलिए वापिस आगया था, कि उसका स्वागत-सत्कार दारु के साथ नहीं किया गया था। वापिस आकर कहने लगा था “वे लोग भूखमरे है, कंगाल हैं। दारु पीने के लिये पास में पैसा नहीं है, तो मेरी बेटी का क्या भरण-पोषण करेंगे ? जो मैं उनके घर रिश्ता करुँगा। जब मैं गया था उनके घर, तो दारु के लिए पांच रूपये भी नहीं निकाल पाये थे। मेरी कटोरी में कुसना दारु डाल दिये थे।”

सन्यासी का बाप उस समय, हट्टा-कट्टा, बड़ा ही सुंदर दिख रहा था। बाहें थी दोनों खंभे के जैसी। सिर्फ दो आदमी, मरी हुई बड़ी भैंस की लाश को किसिंडा तक अपने कंधों के बल से लाद कर ले जाते थे। सरसी का बाप उस समय ‘सिडिंगागुड़ा’ गया हुआ था। इतनी बडी भैंस को, सिर्फ दो लड़के उठाकर ले जाते हुये देखकर वह आश्चयऱ् चकित होकर एक घड़ी तक उन्हें देखता ही रह गया। सरसी का बाप पूछ रहा था

“तुम दोनों लड़के किसके हो ?”

सन्यासी का बाप मसखरी करते हीं-हीं कर दाँत निपोरते हुए हँसने लगा। बोला

“क्यों, अपनी लड़की से शादी करवायेगा क्या ?”

“साला, लपंगा कहीं के ! मेरी बेटी को दूंगा या नहीं, यह तो बाद की बात है। पहले तेरे बाप का नाम तो बता ?”

“क्या मेरे बाप से दोस्ती करोगे ?”

साथ कंधा देने वाला लड़का मुस्कराते हुये बोला,

“अरे, यार, क्यों इतना परेशान कर रहा है ? बाबा के साथ क्यों उलझ रहा है ? चुपचाप बता देने से तो बात खत्म।”

“बाबा, इसके बाप का नाम निकस सतनामी है। मरे हुये एक अर्सा हो गया है। आपका कोई काम था क्या, उनसे ?”

“इस भैंस को कहां लेकर जा रहे हो।”

“बीजीगुड़ा, हमारे गांव”

दो दिन के बाद सरसी का बाप आ पहुँचा था अंतरा के घर। अंतरा की मां बरामदे में बैठकर झाडु बांध रहीं थी। साथ में आंगन में सूख रहे भैंस के मांस की तरफ भी देख रही थी। ये घर जरुर निकस सतनामी का ही होगा। सरसी के बाप ने पहचान लिया।

“यह निकस सतनामी का घर है क्या ?”

बूढ़ी अचरज के साथ मेहमान की तरफ देखने लगी। इतने दिन बाद उसके आदमी का नाम किसी ने पुकारा था। गांव वाले ‘अंतरा का घर’, ‘अंतरा की माँ’ के नाम से पुकारते थे। यह कौन है? जो निकस सतनामी को खोज रहा है। एक अर्से पहले से वह मर चुका है। लोग तो उसका नाम भी भूल चुके थे।

“तुम कौन से गाँव से आये हो ? क्या काम है ?-”

“तेरे बेटे का नाम अंतरा है ना ?” भैंस को अपने कंधे पर लादकर ले जाते हुये मैने उसको देखा था। “वाह ! बड़ा सुंदर हट्ठा-कट्टा नौजवान है।”

अंतरा की माँ को ताज्जुब हुआ। यह अनजान आदमी उसके बेटे के ऊपर डोरे डाल रहा है क्या ?

“क्या हो! मेरे बेटे के उपर तुम्हारी इतनी नजर क्यों ? नहीं, नहीं बोलकर इतनी बड़ी बात बोल रहे हो ?”

जलती हुई बीड़ी को दीवार पर रगड़कर, बुझाकर कान के ऊपर रख दिया था सरसी के बाप ने।

“इतना गुस्सा क्यों कर रही हो ? तुम्हारे बेटे के उपर कोई डोरे-वोरे नहीं डाल रहा हूँ। उसके लिये शादी का प्रस्ताव लेकर आया हूँ ।”

“तुम कौनसे गांव के हो ? किसकी बेटी के लिये प्रस्ताव लेकर आये हो।”

“वह मेरी बेटी है।”

“क्या तुम ठूंठ हो? गांव में तुम्हारा कोई सगा-संबंधी नहीं है ? जो यहां अकेले आये हो।”

“गुस्सा क्यो कर रही हो ? मैं तो सिंडिगागुडा जा रहा था। तुम्हारे बेटे से रास्ते में मुलाकात हुई। वह लोग भैंस ढोकर आ रहे थे।”

“अच्छा, अच्छा, तुम बैठो यहाँ। मैं अपने पास-पडोसियों को बुला लेती हूँ। उनके साथ तुम बात कर लेना।”

बाप के मुंह से ये सब बाते सरसी ने सुनी थी। अंतरा का खूब गुणगान कर रहा था। घोड़े के बच्चे की तरह चंचल व ताकतवर। काम करेगा, खायेगा। उसको कभी भी किसी चीज का अभाव नहीं होगा।

‘बिजीगुडा’ से सगे संबंधियों को लेकर अंतरा की मां आयी। और संबंध की बात पक्का कर गयी। कुछ महीनों बाद, शादी होकर सरसी बीजीगुड़ा आयी थी। सचमुच, बहुत ही शक्तिशाली था वह। कहां-कहां दूर-दूर के गांव जाकर भैंस की हड्डी लाकर बेचता था रहमन मियां के गोदाम में। सतनामी लोगों का वह अगुआ था। जो ज्यादा किया, धरा, वह ही अगुआ होगा ना।

सन्यासी के जन्म वाले साल में, अगर उसका पैर नहीं टूटता तो उसकी यह अवस्था नहीं होती। पैर तुड़वाकर वह अकर्मण्य हो गया। बैठा रहता था। इसलिए तो सरसी को दौड़ना पड़ रहा था किसिंडा। किसिंडा जाने के पीछे सरसी का और एक उद्देश्य भी था। उस अंचल में आश्विन से मार्गशीष महीने के बीच मुर्शिदाबादी पठान सब डेरा डालते थे। उस समय वे लोग बूढ़े, निठल्ले हो या जवान बैल हो, मोल-दाम लगाकर खरीदते थे। वे लोग दिन के समय खरीदी हुई गायों की टोली को चराने के लिये पहाड़ के नीचे तक ले जाते थे। लगभग पचास गायों की टोली हो जाने पर, वे लोग तीन-चार अलग-अलग समूहों में बँट जाते थे। और उनको हाँकते हुये ले जाते थे कोलकत्ता, मालदा और मुर्शिदाबाद के तरफ। गायों के साथ-साथ वहाँ चमड़े की भी खरीददारी होती थी। ये सब सामान लेकर, उनका एक दल, ट्रक बदल बदलकर ले जाते थे उनके देश।

आजकल मुर्शिदाबादी पठान लोग आना-जाना कम कर दिये थे। आ रहे थे केवल पांच-सात आदमी। पहले जैसी आमदनी भी तो नहीं रही। लोगों का गाय पालने का शौक भी घट गया था। केवल कुछ पुराने खानदानी लोग, गांव में अपनी शान-शौकत के लिए गुवालों मे, गौशालाओं में कुछ गायें बाधकर रखे थे. गांव में गाय के बदले आजकल घूमते थे फटफटिये।

उसी मुर्शिदाबाद पठान लड़के के उपर, सरसी को बड़ा संदेह होता था। उस साल वह लड़का किसिंडा आया था। फिर बाद में कहां गायब हो गया, पता नहीं चला ? पतली-पतली मूँछे, बड़ी-बड़ी आंखें, पतले-पतले होंठ, तलवार की धार जैसी नाक, ठुड्डी पर निकल आयी थी बबरी दाढ़ी।

उस लड़के को खोजने हर साल, आश्विन से मार्गशीष महीने तक, रोज पाच-छ कोस रास्ता पैदल चलकर सरसी आ जाती थी रहमन मियां के गोदाम तक। वहीं सब पुराने लोग होते थे, जो हर साल आते थे। लेकिन वह लड़का, और नहीं आता था। अहमद हारुक लियाकत से सरसी उस लड़के के बारे में पूछती। वह उस लड़के के बारे में कुछ बता नहीं पाते। लड़के का नाम मुराद, अबुबकर का भांजा। अबुबकर तो कब से अतिसार की बीमारी से मर चुका था। इधर से लौटते समय पुरूलिया में उसका देहान्त हो गया। सब मिलकर गड्ढा खोदकर रास्ते में ही दफना दिये थे। बूढ़ा निसंतान था। मुराद के अलावा उसका कोई और नहीं था।

सरसी पूछती थी “मुराद कहाँ रहता है, बाबू ?”

लियाकत मियां अचरज से पूछता “उससे तुम्हारा क्या काम है ?”

“तुम पहले बताओ ना, वह किधर चला गया ? इसके बाद मैं तुमको बताऊंगी।”

लियाकत समझ नहीं पाता था. सरसी क्या बोलना चाह रही थी। पर बेचारी औरत का मन तोड़ नहीं पाता था। कह रहा था कि मुराद तो सीमा-पार कर बांग्लादेश चला गया।

“कहाँ है वह देश ? तुम लोगों के गांव से वह कितना दूर पड़ता है ? उस देश में वह क्यों चला गया ? जाते समय उसके साथ और कौन-कौन गये ? बताओ ना !”

“तू इतना सब कुछ क्यों पूछ रही है ? बता, उसके ऊपर तुम्हारी कोई उधारी है क्या ?”

“मैं, गरीब, कहाँ से पाउंगी रूपया पैसा जो उधार दूंगी। एक मुट्ठी खाने को तो नसीब नहीं होता है। पर वह लड़का मेरी एक बड़ी संपत्ति चुरा कर ले गया है। किस देश में चला गया है ? बताओ, ना ! कहाँ है वह देश ? रेल में जाने से कितना पैसा लगता है ?”

“तू वहाँ जायेगी क्या ?” हीं-हीं करके हँस दिया था लियाकत। “जा, यहाँ से पगली”

सरसी को गुस्सा आता था। वह पागल नहीं थी। सब उसे पागल क्यों सोचते हैं ? अपने बेटे-बेटियों की खबर लेना क्या पागलपन है ? अगर हाँ तो, वह जरुर पगली है। उसके चार-चार बच्चे कौन किधर चले गये कि वह पता भी नहीं लगा पायी।

“हे भगवान ! तीन-तीन मेरे लड़के कमाकर लाते और मैं बैठकर खाती। देखो रे, मेरी फूटी किस्मत ! इस पेट के लिये दो मुट्ठी खाना जुगाड़ नहीं कर पा रही हूँ। किस हालत में होंगे मेरे बच्चे लोग ? पता नहीं। और मेरी बेटी ? ओ मेरी परबा तू कहाँ है ? रे ! मेरी बच्ची !” भावुक होकर सरसी रो पड़ी।

बरामदे में बैठकर हुक्म चला रहा था अंतरा। धमकाने के स्वर मे पूछा “दिन में सपने देख रहीं है क्या ? मेरा सिर दुःख रहा है। इसलिये चाय-पानी पिलाने को कह रहा था। अनसुनी कर, तुम जागते-जागते सपने देख रही हो क्या, अभी तक?”

सरसी चटाई समटने लगी थी। वह आज किसिंडा नहीं जा पायेगी। उसका सिर भारी-भारी लग रहा था। मुंह धोकर चूल्हा लीपना शुरु कर दी थी। दांतुन दाँतों के बीच दबाकर, पूरे घर का झाडु की। एक लुत्था गोबर बाहर से खोज कर लायी और पानी में घोलकर आंगन में छींटने जा रही थी, तभी गुस्से से तम-तमाकर अंतरा बाहर बरामदे से उठकर आगया। पूछने लगा “तुझे कुछ सुनाई नहीं देता है क्या ? बहुत लापरवाह हो गयी है तू ? दूंगा खींच के दो घूंसा, तो पता चलेगा। ”

“मारेगा, मार। मेरे उपर इतना गुस्सा क्यों हो रहा है ? मारना ही था तो फोरेस्ट-गार्ड को क्यों नहीं मारा ? तू अगर मर्द होता तो गार्ड को दो घूंसा नहीं मार देता।”

अंतरा की मर्दानगी को जैसे, किसी ने झकझोर कर आघात कर दिया हो। गुस्से में आग-बबूला होकर अंतरा सरसी की तरफ झपट पड़ा। “साली, देखेगी ?” अंतरा में और पहले जैसी ताकत नहीं रही। फिर भी उसने धड़ाक से एक घूंसा तान दिया था सरसी की पीठ पर। ऐसे भी सरसी का सिर दुःख रहा था। ऊपर से इस घूँसेे ने सरसी को हिला सा दिया था।

“साले, जंगली, जिन्दा लाश, तू मुझे क्यों मार रहा है ? बे ! मैने तेरा क्या बिगाड़ा था?” जोर से एक धक्का मार दिया अंतरा को। अंतरा लडखडाकर नीचे गिर गया था। और उसके हाथ की लाठी फिसल कर तीन हाथ की दूरी पर गिर गयी। सरसी की आँखे पश्चाताप के आंसूओं से भर उठी। आंसू भरी आँखों से उसने अपने नीचे गिरे आदमी को उठाया।

सरसी का सहारा पाकर अंतरा उठा, पर अभी भी उसका गुस्सा शांत नहीं हुआ था। नाग साँप की भाँति फुफकार रहा था। बोल रहा था “मैं शहर में जाकर भले ही भीख माँग लूंगा, पर तेरे हाथ से पानी भी नहीं छुऊँगा। साली, शरीर बेचकर खा रही है। वैश्या कहीं की ! रहमन की रखैल, कहीं की !”

सरसी और अपने आप को संभाल नहीं पायी। नागिन की तरह फुंफकारते हुये झपट पडी। और बोलने लगी “निकल, निकल, तू इस घर से ! भाग, नहीं तो मैं जा रही हूँ। जहर खाकर मर जाऊँगी। लेकिन इस घर के आंगन में पांव नहीं रखूंगी। तू मेरा आदमी होकर, मुझे बदनाम कर रही हो। मैं और यहाँ किसी भी हालत में नहीं रहूंगी।” गाली देते-देते जमीन पर बैठ गई, जोर-जोर से रोने लगी सरसी।

“सुबह-सुबह, बिना बात का हल्ला-गुल्ला कर रही हो। मैं बोल देता हूँ तो तुझे लग जाती है। गांव के सभी जब मेरा मखौल उड़ाते हैं, तो उस समय कुछ नहीं होता।”

“सच्ची में, तू क्या अलग बोल दिया जो ?” रोते-रोते बोली सरसी।

“सीता माता को भगवान राम ने भी तो बदनाम किया था। अग्नि-परीक्षा ली थी। घर से निकाल भी दिया था। अरे ! लोग तो कुछ भी करने से कुछ न कुछ बोलेंगे। जब अपना आदमी उनकी बातों में विश्वास करेगा तो सीने में चक्कू चलाने जैसा लगता है।”

जब चरित्र पर एक बार कलंक लग जाता है, तो छूटता नहीं है। कितनी भी कोशिश कर लो, कितना भी देते-लेते रहो। सब बेकार। सरसी के सिर में आधासीसी दर्द हो रहा था। इस घटना के बाद उसका सर दर्द न जाने कहाँ गायब हो गया, मानो यह दर्द उस दर्द से कई गुणा बढ़कर हो। सुबह के चूल्हे-चौके का काम कर किसिंडा जाने की सोच रही थी। गरीब आदमियों के शरीर में कितनी भी पीड़ा हो, घर में कितनी भी दिक्कतें हो, पेट के खातिर उन्हें काम पर जाना ही पड़ता है। अंतरा के मुख से उगलते हुए जहर को सुनने के बाद सरसी को जाने के लिए हिम्मत नहीं थी। अभी-अभी अंतरा ने उसको रहमन मियां का रखैल बोल कर गाली दी थी। और किस मुंह से वह जायेगी रहमन के गोदाम की तरफ ? वह तो सिर्फ गोदाम में काम नहीं करती, गोदाम के नजदीक जो बगीचा था, जिसमें किस्म-किस्म के पेड़-पौधे थे, उसकी रखवाली का भी काम करती थी। जिस दिन जैसा काम करने का हुक्म दिया जाता था वह उस काम को करती थी। अगर उसे दो रूपया और दो मुट्ठी चावल नहीं मिले तो उसका घर कैसे चलेगा ?

उसने तय कर लिया था कि अब कभी किसिंडा नहीं जायेगी। घर में चूल्हा जले या ना जले,उसको उससे क्या मतलब ? जब पेट में आग लगती है, तब पता चलता है कि कहने और करने में कितना अंतर है ? मिट्टी और पुआल लाकर रसोई घर के बरामदे को लेपने का काम करने लगी। तब से अंतरा अपनी लाठी लेकर कहीं चला गया था। अचानक सरसी को याद आगया कि लियाकत बता रहा था मुर्शिदाबाद की तरफ से पठान लोगों का एक और दल किसिंडा आयेगा। तभी से उसके मन में मुराद को लेकर आशा की किरण जाग उठी। हो सकता है उस दल में मुराद भी हो ? उसका मन शंकित हो उठता था, कहीं वे लोग आकर काम कर दूसरी जगह तो नहीं चले जायेंगे। जल्दी-जल्दी से अपना काम पूरा कर थोड़ी-सी नमक वाली चाय बना दी। उसने देखा कि अंतरा घूम-फिरकर बरामदे में आकर बैठा हुआ था। एक कटोरी चाय और दो मुट्ठी ‘मूढी’ लाकर रख दी थी अंतरा के सामने। और बोली कि “मैं किसिंडा जा रही हुँ, उसके बगीचे में पानी देना है। उसके गोश्त की दुकान भी धोनी है।”

अंतरा ने सरसी की बात का कोई उत्तर नहीं दिया। चाय के साथ मूढी मिलाकर फूँक-फूँककर पी रहा था। सरसी जाते समय बोली “बरतन में पखाल रखा है, मन होने से खा लेना। रहमन मियां के बगीचे की घेराबंदी के तार एक तरफ से खुल गयी है, उसे बनाना पडेगा।”

क्यों पता नहीं, आज सरसी ने ज्यादा-ज्यादा काम के बारे में बताया था। शायद वह मुराद को ढूंढने जा रही थी, इस बात को छुपाने के लिये, या फिर अभी-अभी अंतरा ने उसके चरित्र पर आरोप लगाये थे इसलिए। वह घर से दबे-दबे पाँवों से जा रही थी। सरसी को मालूम था कि वह चाय के साथ बरामदा में बैठकर मूढी खा रहा था। उसके सामने से जाते वक्त उसके पाँव एक दूसरे में उलझ गये थे। वह अपने आप को असहाय अनुभव कर रही थी।

बरगद वाले मोड़ को पार करने के बाद थोड़ा अच्छा लग रहा था सरसी को। सन्यासी का बाप जो सोचना चाहें, सोचें पर जब तक उसके हाथ पाँव चलेंगे, वह सब के लिये करेगी, ढूंढेगी, सोचेंगी, व चाहेंगी। कोई न कोई दिन ऐसा जरुर आयेगा, जब उसके घर वालें सभी मिल जायेंगे। बेटे, बेटी, नाती, नातिन के हल्ला-गुल्ला, हँसी-मजाक से खिल उठेगा वह घर। इतना ही तो वह चाहती थी !

आज वह मुराद को पूछेगी, “कहाँ लेकर रखा है उसकी बेटी को ? जब ले गया था तो एक बार तो लौटा लाना चाहिये था उसके अपने मायके को।” तीन भाइयों के पैदा होने के बाद में इकलौती लाड़ली बेटी, क्या खाती होगी ? क्या पीती होगी ? उसकी सास कैसी होगी ? वह आज मुराद को पूछेगी कि अलग जाति, अलग देश का होकर उसकी बेटी को लेकर क्यों भाग गया था ? कौन जानता है पठान लोगों के रहन-सहन, वेशभूषा, चाल-चलन से वह परेशान न हो ? मुराद का चेहरा उसकी आंखों के सामने आ जाता था। पतली मूंछे, बबरी दाढ़ी, धारीदार लूंुंगी के उपर एक पंजाबी कुर्ता पहना हुआ वह लड़का उसकी बेटी को फुसला रहा था।

सरसी किसिंडा में पहुंचकर रहमन के गोदाम में जायेगी क्या? वह तो सीधी चली गई थी पठानों के डेरा तक। लियाकत वहाँ पर नहीं था। सरसी कभी-कभार उसके साथ अपने सुख-दुख की बातें करती थी। हारुफ सिगड़ी पर खाना पका रहा था। सरसी ने पुछा

“भाई, और कौन-कौन आने वाले थे तुम्हारे देश से ? वे लोग आये क्या ?”

हारुफ प्याज काटते हुये बोला

“हाँ, सोलेमान और शौकत आये हैं। सिर्फ, दो लोग ही आये हैं. और कोई नहीं।”

“क्यों ? तुम्हारा कुछ काम था ? तुमको क्या रहमन ने भेजा है ?”

“नहीं, उस लड़के के बारे में पूछ रही थी।”

“तुम मुराद के पीछे भागते-भागते एक दिन पागल हो जाओगी। तुम क्या पागल हो गयी हो, जो मुराद तुम्हारी बेटी को ले कर भागेगा? हम में से किसी ने भी तेरी बेटी को ले जाते हुये नहीं देखा, समझी ? अब तुम घर जा।”

“तुम सच बोल रहे हो, भाई ?”

“अरे मुराद तो हमारे साथ मुर्शिदाबाद लौटा था। वहीं से सीमा पार कर अपने छोटे मामा के घर चला गया था। सभी को पता है।”

“तब मेरी परबा ? परबा कहाँ गई ?”

हारुफ कुछ नहीं बोला। वह इतना ही जानता है कि यह काम उसके रिश्तेदार नहीं कर सकते थे।

सरसी का मन मान नहीं रहा था। उस दिन ऐसे ही साप्ताहिक हाट लगा था। सरसी काम करके रहमन के घर से लौट रहीं थी। उसने देखा था कि मुराद के साथ उसकी बेटी हँस-हँसकर बातें कर रही थी। अचानक सरसी को देखकर कहाँ गायब हो गया था वह लड़का ? सरसी ने परबा को पूछा था

“क्या बोल रहा था वह लड़का ?”

“कौन ?”

“वही, पठान।”

गंभीर मुद्रा में परबा ने जबाब दिया था “अपने देश के बारे में बता रहा था।”

“तू हीं-हीं कर रही थी ।”

“क्या बोल रही है ?” चिडचिड़ा गयी परबा

सरसी तुरंत कुछ बोल नही पायी थी। मगर कुछ दूर जाने के बाद बोली थी “परदेशियों से बात मत करना।”

“क्यों ? वह क्या मुझे खा जायेगा ?” हँस रही थी परबा।

“बता रही हूँ न, उससे बात मत करना।”

“उसके साथ सभी लोग बात करते हैं। वह बड़ा मजाकिया है। सबको पान खिलाता है। बड़ा अच्छा आदमी है। तुम उस पर क्यों गुस्सा कर रही हो ? देख, मेरे लिये क्या लाया है वह ?” साड़ी मे से गाँठ खोलकर हरे रंग के पत्थरों से जड़ा हुआ एक जोड़ी कान का झूमका।

“कितने रूपये का है ?” हँस रही थी परबा।

“पैसा क्या ? वह पैसे नहीं लेगा।”

सर्वनाश। सरसी के मन में डर पैदा हो गया। वह इकलौती बेटी थी। पान के पत्ते की तरह गोल-सा चेहरा, नाक-नक्श, आँखे अति सुन्दर। अभाव होते हुये भी शरीर से शुष्कपन नहीं झलकता था। खूब इच्छा थी सरसी, कि बेटी को किसी अच्छे घर, अच्छे लडके के साथ शादी कराने की। भले नौकरी पेशा वाला न हो, पर कम से कम हर महीने दो हजार कमाता हो। आजकल के लडके तो अपना जातिगत पेशा नहीं करते हैं, छोड चुके हैं। ऊची जाति वाले लोगों के साथ मिलकर कितने-कितने प्रकार का काम करने लगे हैं आजकल। शहर-कस्बों में जाकर कारखानों में काम करने लगे हैं। अपनी लड़की के लिए वह एक ऐसा लड़का ढूंढेगी, जो उसको दोनों वक्त का भरपेट खाना दे पायेगा। मगर उसकी बेटी कब से दूसरे जाति वालों से मेल मिलाप बढ़ा चुकी थी, उसे इस बात का पता नहीं था।

उसने गुस्से में परबा के हाथ से कान के झूमकों को लेकर फेंक दिये थे।

“तुम मुझे क्या इस बस्ती में रहने नहीं दोगी? तुम्हारे भाई शबर की लड़की को शादी करके गाँव छोड़कर चला गया। इसलिये दूसरों के घर में शरण लेनी पड़ी थी हमको। तुमने भी वही रास्ता चुन लिया क्या ? मालूम पड़ेगा तो तेरा बाप क्या बोलेगा ? अगर तेरे बाप को मालूम पड़ गया तो किसी लूले-लंगड़े, बूढ़े के साथ शादी करवा देगा। तुमको किसने यह दुर्बुद्धि दी ?” परबा को खींचते हुये ले जा री थी सरसी। जैसे हाथ छोड़ते ही वह पठान लड़के के साथ भाग जायेगी। रास्ते भर हजारों सवाल पूछती रहती थी “सिर्फ बात कर रही थी या क्या-क्या कर रही थी, सच-सच बता।”

“और क्या करुँगी ?” पलट कर पूछा था परबा ने।

अब सरसी एकदम चुप हो गयी। क्या उत्तर देती ऐसे प्रश्नों का ? दोनों चुपचाप चलने लगे. लग रहा था मानो अंदर ही अंदर झंझावात उठ रहे हो। सरसी ने परबा का हाथ इतने जोर से पकड़ रखा था कि परबा अपमानित महसूस कर रही थी।

“मेरा हाथ तो छोड।”

जैसे ही सरसी को इस बात का ध्यान आया था, तो उसने धीरे से उसका हाथ ढ़ीला कर दिया। अचानक क्या सोचते हुये उसने पूछा “तुझको कहीं अकेले में ले गया था वह लड़का ?”

परबा को माँ के इस तरह के सवाल-जबाव अच्छे नहीं लग रहे थे। वह गुस्से में थी, पर कुछ नहीं बोली।

“पूछ रही हूँ ना, क्या वह लड़का तुझको जंगल की तरफ ले गया था ?”

“क्यों बेकार की बातें कर रही हो ? हाँ, मैं गयी थी उसके साथ, तो क्या हो गया ?”

“छिनाल ! तू मरी क्यों नहीं ? खुद का सर्वनाश खुद कर रही हो ?”

परबा को सरसी पीटने लगी, जैसे कि परबा के शरीर पर बहुत धूल-धंगड जमा हुआ हो। सरसी पीटते-पीटते कहने लगी “तुमने ऐसा काम कर दिया रे, मेरी बेटी !”

“ऐसा क्या कर दिया मैने ? क्यों मुझे बेकार की गाली दे रही हो ?”

और सरसी ने कुछ नहीं कहा। कहीं वह झूठ-मूठ से अपनी बेटी पर लांछन तो नहीं मढ़ रही थी। भगवान करे उसकी बेटी को कुछ न हुआ हो। बेटी के लिये उसने अपना पेट काट-काटकर मिट्टी के गड्ढे में पैसा बचाकर रखे थे ताकि नाक के लिये दो तारा-फूल, और पांव के लिये एक जोड़ी पायल बनवायेगी। मगर बेेटी जैसे हाथ से निकली जा रही थी।

गाली सुनने से अच्छा है, सोचकर माँ के हाथ की मुट्ठी से निकलकर परबा बड़े-बड़े कदम बढ़ाकर आगे निकल गयी। अनवरत बहने वाले स्रोत की भाँति, उसे रोक नहीं पायेगी सरसी। “हे परबा ! हे परबा !” पीछे से आवाज दे रही थी, पर उसे पकड़ नहीं पा रही थी।

घर पहले पहुँच कर बाप के सामने इस बात की शिकायत की परबा ने। मानो परबा अंतरा की जान हो। बेटी के आँखों में आसू देखकर उसका दिल पसीज जाता था। जैसे ही सरसी घर पहुंची, अंतरा बेटी की तरफदारी करते हुये सरसी के साथ झगड़ना शुरु कर दिया।

अंतरा के मुँह से गंदी-गंदी गाली सुनकर चुपचाप सहन कर ली थी सरसी। मगर सही बात नहीं बतायी थी। सही बाते जानने के बाद, अंतरा उसकी बेटी को या तो मार देगा या काट देगा, इसी बात का उसे डर था। माँ होना कितना कठिन होता है ! उस दिन सरसी को इस बात का अहसास हो गया। इतना दिन ध्यान रखने के बाद भी बेटी एक दिन भाग जायेगी, इस बात का ख्याल तक न था। उस दिन से सरसी का शक मुराद के उपर होने लगा था। जितना भी समझायें, उसके मन से साप्ताहिक हाट का वह दृश्य हट नहीं पाता था। वह किसी के सामने मुंह खोलकर इस बात को बोल भी नहीं पाती थी।

“परबा रे, कहाँ चली गई, मेरी बेटी ?” वह अपने आप में बड़बड़ा रही थी।

सरसी रहमन मियां के बगीचे में गोभी और मूली की क्यारियों में पानी दे रही थी। देखी थी पत्तों के बीच में से छोटे-छोटे फूल दिखने लगे थे. बाड़ को सट कर लगे हुये थे एक कतार में अरहर के पौधे। पीले फूलों से लद गये थे। कुछ दिन बाद इन पर कच्चे फल आयेंगे। पतली नली की तरह पेड़ के उपर झूल रहे थे मूंगा के लंबे-लंबे फल। एक तरफ थी बैंगन की क्यांरी, उस तरफ से किसी ने पांव से दबाकर बाड़ को सुला दिया था। उसको नहीं उठाने से गायें-भैंसे घुसकर सब चट कर जायेंगी। रहमन मिया बाड़ी-बगीचे में कोई रुचि नहीं रखता था। गोदाम के पीछे एक छोटा-सा आधा कमरा था उसका। उसी में सब कूड़ा-करकट रखा करता था। सन्यासी जब बेईजू शबर की बेटी को भगाकर ले गया था, उसी समय बस्ती वालों से बचने के लिये सरसी उसी कमरे में डेरा डाली हुयी थी। अपने हाथ से मिट्टी काटकर, पत्थर जोडकर टुटे हुये आधे कमरे को वह पूरी तरह सजा ली थी कुछ ही दिनों में। बच्चों को लेकर कितने दिन तक इस कूड़े-करकट के ढेर में वह रह भी पाती ? कितनी ही फालतू की चीजों को फेंक कर कमरे को रहने लायक बना ली थी वह। रहमन देखा कि वह बड़ी मेहनती औरत थी, घर के सज्जे के उपर लौकी की लता भी चढ़ा चुकी है। अंतरा को बोला था इस छोटी सी जमीन को घेर कर तुम अपना बाड़ी-बगीचा कर लो, बेकार क्यों बैठे रहोगे ?

पति-पत्नी दोनों मिलकर झाड़ी, घास आदि लाकर इस जमीन के चारों तरफ बाड़ बना लिये थे। मिट्टी खोदे। बाजार से बीज खरीद कर लाये थे। गोबर वगैरह डालकर मिट्टी को उपजाऊ बनाये थे। रहमन के गोदाम के पास एक पुराना बिना काम का कुंआ था। खारा पानी होने से उस कुंआ का कोई पानी नहीं पीता था। कुंआ साफकर चारों तरफ की जंगल-झाड़ी साफ की थी उन दोनों ने। पानी पाकर खिल उठा था वह बगीचा। रहमन मियां देखा एक गोचर जमीन को सोना बना दिया है इस औरत ने। खुश होकर एक जोड़ा साड़ी और धोती भेज दिया था उसके नौकर के हाथ।

साग-सब्जी जो भी निकलता था, सब रहमन मियां के घर जाता था। रहमन का बड़ा परिवार। फिर भी सब्जी-बाजार आना नहीं पड़ता था। सब सरसी दे देती थी। और एकाध जो बच जाता था, वह उसका अपना परिवार के लिये रख लेता। सिर्फ साग-सब्जी से क्या पेट भर पाता था ? दो दाना चावल नहीं मिलने से। सरसी पूछती थी “दुकान में मेरे लायक कोई काम है क्य़ा?” “तेरे लिये और कहाँ से काम लाऊँगा ? सरसी !” झल्लाकर कभी-कभी बोलता था रहमन मियां।

“दो दाना चावल घर में नहीं होने से कभी मन होने से दो-चार रूपया देता था रहमन। लेकिन हर रोज देना उसके लिये भी संभव नहीं था। तब भी सरसी बगीचा में पानी देती थी, मिट्टी कूरेदती थी। उसको लगता था वह रहमन का बगीचा नहीं, सरसी का बगीचा है। जिस दिन वह आँख भींच लेगी, यह बगीचा भी हमेशा-हमेशा के लिये सूख जायेगा।

मन होने पर रहमन मियां, दुःख-सुख, इधर-उधर की बातें भी किया करता था। उसकी पहली बीवी ‘वात’ की बीमारी से उठ-बैठ नहीं पारही थी। वह चिन्ता करने लगता था। सरसी बोलती थी “भईया, भाभी को कहियेगा, मैं आकर हाथ-पांव पर तेल मालिश कर दूंगी।”

“धत्, चमारन ! तुझे क्या तेरी भाभी घर में घुसने देगी ?”

“हाँ, ठीक, ठीक बोल रहे हो” सिर हिलाती थी सरसी। रहमन पूछता था “तेरे बड़े बेटे की क्या खबर है ? नाती-पोता हुआ कि नहीं ? पढ़ाई-लिखाई करके बाबू होकर बैठा है। उसको तो माँ-बाप का ख्याल रखना चाहिये।” यह बात सुनने से सरसी की आँखे भर आती थी। एक-एक करके सभी बच्चों के चेहरे याद हो जाते थे। परबा की याद आने से वह व्याकुल हो उठती थी। छाती भर जाती थी। बेटे तो जैसे-तैसे कमाकर अपना पेट भर लेंगे, पर उसकी बेटी परदेश में क्या कर रही होगी ? पता नहीं।

सरसी पूछती थी “भईया पिछले सालों में वह जो पठान लड़का आपके गोदाम में आया करता था, उसका अता-पता मुझे दे पायेंगे ?”

रहमन को मालूम था सरसी के शक की सब बातें। कहता था किसके बारे में पूछ रही हो ? वह जो मुराद, इसके बारे में? अरे ! इस लड़के के न कोई आगे है न कोई पीछे। तू उसके पीछे बेकार में लगी हुई हो ।

अब रहमन मियां के ऊपर भी सरसी को शक पैदा होने लगता था। रहमन की दो बीवियाँ। उसकी बेटी को ले जाकर मुराद के सौतन के गले में तो नहीं बाँध दिया ? बड़ी वाली सौतन अगर परबा को खाने को दो मुट्ठी चावल नहीं देती होगी तो ? सरसी का मन हुं-हुं करने लगा। “मेरी परबा, मेरी बेटी, कहाँ चली गयी रे तू ?”

कभी-कभी बेटी के बारे में सोचते-सोचते पति-पत्नी के बीच झगड़ा शुरु हो जाता था। रोते थे वे। दुख भूलने के लिये सरसी शुरूकानी के पास से महुली खरीद कर पीती थी और अंतरा जाता था कलंदर किसान के दारु की दुकान पर।

वापस आकर दोनों नशे में धुत्त् होकर रोते थे। रोने से नशा और प्रगाढ़ होता था। अंतरा कहता था, देखोगी ! एक दिन यह पूरा गांव सूना हो जायेगा। जवान लोग काम खोजने के लिये परदेश गये। और लड़कियों को पता नहीं, रातों रातों में कोई चुरा कर ले जा रहा है। सवेरा होते ही दो चार लड़किया गायब। देखना, एक दिन यह गांव पूरा का पूरा ठूंठ हो जायेगा।

नशे में रोते-रोते सरसी पूछती है, “रात को कौन ले जाता है इन लड़कियों को ?”

“कौन ले जाता है ? पता नहीं!” अंतरा खोज नहीं पाता था इसका उत्तर। बातों-बातों में दोनों को नींद आ जाती थी।

“नरक कुछ भी नहीं है, जानते हो कृष्णा ? यहां ही स्वर्ग है और यहीं है नरक। जो जैसा करेगा, वह वैसा भरेगा।”

“आप ठीक कह रहे हो। हम लोगों ने ऐसा क्या पाप किया था जो ऐसे भुगत रहे हैं ?” अनमना होकर कृष्णा बोला।

“संसार में आकर किसने पाप नहीं किया है, बता तो ? यह संसार ऐसा ही है। नहीं चाहने पर भी पाप हो जाता है। तुम्हारे शरीर में यह पापी पेट है या नहीं ?”

“भूख की तुमने कैसे याद दिला दी ? इस पेट के बारे में कितना कम सोचेंगे, उतने ही सुखी रहोगे।” कृष्णा बोलते-बोलते बरामदा से उतरकर धीरे-धीरे झुककर चला गया। अंतरा के सामने था उसका घर। बरामदा में बैठकर बड़-बड़ाकर भगवान के बारे में असंतोष जाहिर कर रहा था।

अंतरा को भूख लगने से या दुख लगने से भागवत-पुराण के पद्य सुनाने लगता था। कृष्णा को जाते देखकर अंतरा के अंदर भगवत दर्शन के भाव जाग गये। तथा जोर जोर से गाने लगा, ताकि कृष्णा सुन सके।

“जिन्ह हरि भगति ह्मदय नहीं आनी

जीवत शव समान तेई प्राणी।

जो नहीं करई राम गुन गाना

जीह सो दादुर जीह समाना ।।”

गाना सुनकर कृष्णा का चिड़चिड़ापन दुगना हो गया।

“छोड़ो, इन बेकार की बातों को।”

कृष्णा को पार्किन्सन की बीमारी थी। हाथ, शरीर हर समय थरथराता रहता था। इसलिये छोडो बोलते समय लग रहा था कि नफरत से हरिनाम की उपेक्षा कर रहा हो। क्यों वह हरि का नाम लेगा जब हरि उसे दो वक्त की रोटी नहीं दे पाता है ? उसका सिर जोर-जोर से ऐसे हिल रहा था जैसे नहीं, नहीं, कुछ भी नहीं। ईश्वर नहीं, नहीं-नहीं की दुनिया में न कोई सुख है, और नहीं कोई प्राप्ति। अपना यहाँ कोई नहीं है। जो भी देख रहे हो, वह कुछ भी नहीं है।

कभी-कभी अंतरा को लगता था कि गांव के सब लोग एक से बढ़कर एक पापी है। जैसे ब्राज के सारे ग्वालें पिछले जन्मों में ऋषि-मुनि थे, वैसे ही वे लोग सभी पापी है। उसके जैसे ही सभी ने कुछ न कुछ पाप किया है। इसलिये ये सब कष्ट पा रहे है। केवल शुरुकानी, नुरीसा, कलंदर जैसे कुछ लोगों को छोड़कर बाकी सभी दुःख पा रहे हैं।

(क्रमश: अगले अंकों में जारी…)

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