सरोजिनी साहू का उपन्यास : पक्षी-वास (5)

SHARE:

पक्षी-वास डॉ सरोजिनी साहू का बहु-चर्चित उपन्यास अनुवाद :- दिनेश कुमार माली ( पिछले अंक से जारी …) १० परबा बाहर बैठकर अपने न...

पक्षी-वास

डॉ सरोजिनी साहू का

बहु-चर्चित उपन्यास

अनुवाद :- दिनेश कुमार माली

image

(पिछले अंक से जारी…)

१०

परबा बाहर बैठकर अपने नाखूनों से जमीन पर लकीरें खींच रही थी। अंदर झूमरी थी अपने ग्राहक के साथ। वह उसका रोज का ग्राहक था। यह पान की दुकान वाला, हफ्ते में एक दो बार जरुर आता था। परबा को लग रहा था कि वह केवल ग्राहक ही नहीं है, वरन् उसे तो झूमरी का प्रेमी कहना उचित होगा। क्यों कि वह आदमी सिर्फ झुमरी को छोडकर किसी के पास नहीं जाता था। दोनों के बीच रूपया-पैसा का दाम-मोल भी नहीं होता था। जब जो मिलता था, वह देकर चला जाता था। कभी कम, तो कभी ज्यादा।

झूमरी के नाक-नक्श बहुत सुंदर थे। रंग गोरा, पतला शरीर, गंजाम की लड़की, पत्थर जड़ित नथ लगायी हुयी थी। उसके लंबे चेहरे पर नथ खूब सुंदर दिखाई देती थी। और फिर जब वह पान खा लेती थी तो उसके चेहरे का क्या कहना ! बहुत ही खुबसूरत दिखती थी वह। पान दुकान वाला जब भी आता था, झूमरी के लिये अवश्य दो-चार पान लाता था। उसमें से एकाध पान झूमरी, परबा को देती थी खाने के लिये। वास्तव में, वह पान बड़ा ही मीठा और सुगंधित होता था। मानों उसमें कोई पान-मसाला न मिलाकर प्रेम मिला दिया हो। उस आदमी का उधारी भी चलता था झूमरी के पास। कभी-कभी कहता था “बेटे के लिये साइकिल खरीद लिया है, उसे आने-जाने की दिक्कत हो रही थी। पैसा बाद में दे दूंगा।” झूमरी का भी उधार-खाता चलता था उस आदमी के पास। कभी साड़ी, तो कभी खोली का भाड़ा कम हो जाने से वह मुंह खोलकर मांग लेती थी पचास-सौ रुपया।

परबा समझ नहीं पाती थी, यह दाम्पत्य संबंध है, या दोस्ती ? नहीं, ये दाम्पत्य संबंध तो नहीं है, दोस्ती कहा जा सकता है। मगर दोस्ती है, तो पैसा देकर सोने के लिये क्यों आता है ?

एक ही खोली में रहते हुये भी वह आदमी परबा की तरफ एक बार भी नहीं देखता था। परबा के ऐसे कोई स्थायी ग्राहक नहीं थे, जिस पर सुख-दुख में भरोसा किया जा सके। उनकी बस्ती तो एक बाजार थी। जो बोलने में, चलने में, फैशन में, चेहरे की सुंदरता में, जो जितना पारंगत था, उसकी दुकान उतनी ही अच्छी चलती थी। परबा इस होड़ में रहती थी सबसे पीछे। झूमरी नहीं होती, तो शायद उसे खाना भी नसीब नहीं होता। जब किसी औरत का कोई सहारा नहीं होता है, तभी वह उस धंधे में आती है। मगर परबा इस धंधे के लायक भी नहीं थी। वह जायेगी तो कहाँ ?

झूमरी मुंह पर कुछ नहीं बोलने से भी परबा से कटी-कटी रहती थी। वह अब और परबा का बोझ उठा नहीं पायेगी। परबा को अब अपना जुगाड़ खुद कर लेना चाहिये। कितने दिनों तक, झूमरी परबा का दुगुना पैसा, खोली के भाड़े का देती रहेगी ?

झूमरी के मन में और भी असंतोष था, जब से कुंद इस बस्ती में आयी थी, तब से परबा हर रोज एकाध घंटा चली जाती थी उसके घर, अपने सुख-दुख की बात करने के लिये। कभी-कभी, समय-असमय पर, कुंद भी चली आती थी उनकी खोली को। झूमरी सोचती थी एक ही जाति, एक ही गोत्र, एक ही गांव की लड़कियाँ है इसलिये प्रेम-भाव बढ़ गया है। मगर जब इधर झूमरी राह देख रही होती, उधर परबा कुंद के घर से साग-पखाल खाकर लौटती थी। सरल-सी, भोली-सी लड़की सोचकर उसे अपने पल्लू में छुपाकर रखी थी। अब वह दूसरे की दीदी बन बैठी है, दूसरी खोली में।

झूमरी और परबा ने, अब सिर की ऊँचाई तक आधी दीवार खींच दी थी अपनी खोली में। तथा बाकी आधी को पोलिथीन से इस तरह ढ़क दिया था, जिससे वह खोली दो कमरों जैसी लग रही थी। पुरानी साड़ी काटकर एक-एक बड़ा परदा झूला दिया था सामने में। पहले-पहले परबा को बड़ा खराब लगता था, इधर की बातें उधर सुनाई देती थी और उधर की बातें इधर। शर्म से वह पानी-पानी हो जाती थी। अब तो उसकी आदत हो गयी थी। वे लोग चावल के बोरे, गेहूँ के बोरे की तरह लेटी रहती थीं। उनके न खून में कोई आग लगती, न कोई मन में। सोलह साल के लड़के से लेकर साठ साल के बूढ़े आदमी, जो अतिथि की तरह आता था, उनका परबा स्वागत करती थी। जमीन की तरह खुद को बिछा देती थी, देखो मैं अभी सर्वांगसह धरती बन गयी हूँ। मेरे शरीर पर नाचो, कूदो, खोदो, तोड़ो, जर्जर करो। मैं मुंह छुपाकर पड़ी रहूँगी। मैं कुछ भी विरोध नहीं करुँगी।

जैसे कि वह कहना चाहती थी, कब से मैं रेगिस्तान बन गयी हूँ, कब से नदियाँ लुप्त हो गयी हैं, कब से नई कोपलें निकलना भूल गये हैंै पेड़-पौधे, मेरी मिट्टी से। मैं एक रेगिस्तान, जन्महीन, आशाहीन, निर्मम, कठोर। थोडे-से बादलों की प्रतीक्षा में युग-युग स्वप्नहीन रातें, नींद रहित भोर, बिना उल्लास के रति, रुचिहीन प्रीति लेकर बैठी हूँ, जो बैठी हूँ।

कभी बारिश की रातों में झींगुरों की झीं-झीं आवाज सुनने से गांव की याद आ जाती थी। वह आँखे मूँदकर देख पाती डिबरी की रोशनी में, माँ का आधा उज्ज्वला चेहरा। चूल्हे के पास बैठे रहते थे सब लोग, थाली में नमक डाला हुआ चावल का माँड। माँ कहती थी “गरम-गरम पी लो।” श्रावण का महीना हो, बारिश की झड़ी लगी हो, गरम-गरम चावल के माँड में मिरच और लहुसन को मसलकर पीने में जो मजा आता है, वह किसी में नहीं है। खाने के बाद गुदड़ी को ओढ़कर बारिश की रिम-झिम संगीत को सुनती थी। खिसके हुये खप्पर से पानी गिरता था छपक-छपक। माँ घर में से एक पतली नाली काट देती थी आंगन की तरफ। छपक-छपक सुनते-सुनते उसे नींद आ जाती थी।

ऐसे ही एक श्रावण के महीने में माँ को बुखार आ गया था। बारी-बारी, दो-चार दिनों के अंतर में वह काँपने लगती थी। किसिंडा नहीं जा पाती थी। खेत-खलिहान भी नहीं जा पाती थी। चारों तरफ से बादल घिर कर, बारी-बारी से मूसलाधार बारिश ऐसे बरसने लगी, कि छोडने का नाम नहीं ले रही थी। बाप घर में बैठे-बैठे कर भाइयों को गाली दे रहा था। एक साल पहले, छोटा भाई बाप के साथ झगडा करके गाँव छोडकर भाग गया, ‘नक्सल’ होने के लिये। बाप के साथ उसका कभी पटता नहीं था। बाप के मुख से धरम, करम, करम फल की बातें सुनकर उसके शरीर में आग लग जाती थी। व्यर्थ में भगवान को क्यों याद कर रहे हो ? वह कुछ देते हैं क्या ? भगवान-फगवान कुछ नहीं हैं। गांव से नुरी शा, अलेख प्रधान, चूडामणि नायक सब निकल जाने से देखोगे कि गांव का हुलिया कैसे बदल जायेगा ? बाप इन बातों को समझ नहीं पाता था। दोनों के अंदर झगड़ा होता था। वह कई दिनों के लिये घर से गायब हो जाता था। एक साल पहले जब घर छोड़ा था, तो फिर नहीं लौटा। सब कह रहे थे कि वह नक्सल में शामिल हो गया। घर में अभी थे सिर्फ तीन प्राणी। उस सावन के महीने में, मूसलाधार बारिश के दिन, वह औरत बुखार से काँप रही थी और एक लंगड़ा अपने तकदीर को कोसते-कोसते भागवत पुराण गा रहा था अपने बरामदे में बैठकर, और परबा गरम माँड तो दूर की बात, पखाल के एक कटोरे पानी के लिये तरस रही थी।

नींद टूटने से भूख। भूखे पेट में नींद। भूख से मुंह में पानी भर जाता था और सूख जाता था ! ऐसे बैठी रहती थी परबा। समय देखकर भूख चली आती थी, और फिर धीरे-धीरे चली जाती थी। मन हो रहा था डेगची, कडाई के भीतर कुछ भी ढूंढ कर खा लेने के लिये। कितनी बार ढूंढ चुकी थी। एक दाना, चावल भी घर में नहीं था।

बाप अपनी लाठी लेकर बाहर निकल गया था मूसलाधार घोर बारिश में। माँ बुखार से ठिठुर रही थी चटाई पर पड़ी-पड़ी। गिर गई थी आधी दीवार, भीग-भीगकर पानी से। सायं-सायं करती हवा घुस जा रही थी घर के अंदर। परबा के हलक सूख गये थे। और अगर आधी दीवार गिर जाती तो, सब काम तमाम। सिर छुपाने के लिये जगह नहीं मिलती। उसी आधी टूटी दीवार से सटकर, धारायें बन बनकर बह जा रहा था लाल रंग का पानी।

कुछ देर बाद बाप खाली हाथ भीगे हुये शरीर लेकर वापस आया था. परबा बोली “तुम कहाँ गये थे, बा ? तुम यहाँ रुको। मैं नाला की तरफ जा रही हूँ।”

“इतने बारिश में ? तू मत जा बेटी।” बाप ने उसको रोका था

“जाने दो ना, बा। दो चार भाजी के पत्ते कहीं मिल जायेंगे। मुझे जाने दो।”

“इतनी मूसलाधार बारिश में जाओगी ?”

“तुम फिर कैसे बाहर गये थे ?”

उसका बाप चुप हो गया था। बाहर में भले ही हो रही थी बारिश, पर पेट के अंदर तो आग जल रही थी। बाप बेचारा, आस लेकर घर में बैठा होगा, परबा जरुर कुछ जुगाड़ कर लायेगी। परबा डालियों से बने बडा टोपे को लगाकर निकल गयी थी घर से बाहर। सरसी बिल-बिलाकर कुछ बोलना चाह रही थी। पर उसके कान में सरसी की आवाज नहीं पहुंच पायी। इस घनघोर बारिश में अपने घोंसलों में से एक चिड़िया भी बाहर नहीं निकल रही थी, दानों की तलाश में लेकिन परबा निकल गयी थी। नाला में पानी भरकर सूं-सूं कर गरज रहा था। साग-भाजी कहाँ से पायेगी ? पास-पडोस वाले बोल रहे थे कि नक्सल दल जँगल में डेरा डाले हुये थे। मूसलाधार बारिश के कारण कहीं जा नहीं पा रहे थे। मित्र-भानु कह रहा था उसने तो जंगल की ओर से गोलियों की आवाजें भी सुनी थी।

परबा को लगा था कि ऐसे बुरे समय में उसका छोटा भाई ही मदद कर पायेगा। दुःखी-दरिद्रों को दुःख से उबरने के लिये ही तो वह नक्सल में शामिल हुआ था। पूरे छः दिन हो गये, पर घर में चूल्हा नहीं जला। भाई को पता चलने से, कुछ व्यवस्था नहीं कर देगा ? और कितना दूर है जो जंगल ? शायद दो कोस से भी कम ही होगा। वह अपने छोटे भाई को जरुर मिलेगी। बड़ा भाई तो भोपाल जाकर रहने लगा था। इसका चेहरा तो परबा को याद भी नहीं था। परबा ने जब होश सँभाला, तब से शायद एकाध बार वह घर आया होगा। ईसाई हो गया था,तो बस्ती वालों ने उसे बस्ती में घुसने नहीं दिया। मंझला भाई तो सब मोह-माया तोडकर रहने लगा था परदेश में। मर गया था कि जिन्दा है, पता नहीं। न कोई खबर की, और न ही कभी कोई रुपया-पैसा भेजा गांव में माँ-बाप के पास। छोटे भाई के साथ परबा का अच्छा पटता था। साथ बड़े हुये थे, खेले थे, कूदे थे। साथ भूख से तड़पे थे, साथ ही साथ माँड भी पीये थे।

बड़ी उम्मीदों के साथ परबा गयी थी उसके भाई के पास। थोडी भी परवाह नहीं की थी, जंगली जानवरों से। भूख के सामने जैसे कि सब छोटे हैं। लुईगुड़ा गांव में नक्सल, सितानी सेठ से पचास बोरा चावल उठाकर ले गये थे। वह क्या करेंगे उस चावल का ? उनके जैसे गरीब-दुखियों को ही तो बाँटेगे। पचास बोरा चावल क्या उतना जल्दी खत्म हो गया होगा ?

छोटा भाई भी कैसा इंसान है ? गांव के पास जंगल में डेरा डाला हुआ है, एक बार भी घर में पांव नहीं रखा। क्या उसको याद नहीं आते, हम लोग ? क्या इसको हमें देखने की इच्छा नहीं होती ? कोई बोल रहा था उनके वहाँ का नियम-कानून बहुत ही तगड़े हैं। पैरेड करते हैं, बंदूके चलाना सिखाते हैं पढ़ाई करते हैं और तरह-तरह की बातें बता कर दिमाग में बुरादा घुसा देते हैं। ऐसी कितनी सारी बातें। एक जंगल में वे लोग ज्यादा दिन नहीं रहते। पुलिस को पता चल जाने से मुठभेड़ शुरु हो जाती है। इसलिये शायद छोटा भाई गांव में आ नहीं पाता है। उसके जैसी कितनी लड़कियाँ भी नक्सल में शामिल हुई थी। परबा भी शामिल हो जाती, तो माँ-बाप के पास फिर कौन रहता ? उसने देखा था, माँ-बाप दोनों कैसे-कैसे रो-रोकर याद करते रहते थे, अपने बच्चों को ? जंगल में युद्ध कब खत्म होगा ? कब वह लोग गांव के राजा जमींदार जैसे, गरीबों को खैरात बाँटेगे ? अगर यह बात है तो पहले वे लोग दारु की दुकाने बंद क्यों नहीं कर देते ? हमारे भाई-बंधु, चौबीस घंटों में से सिर्फ चार घंटा ही हवा-पानी पहचान पाते हैं, बाकी समय नशे में बेहोश पड़े रहते हैं। इस बार अगर छोटा भाई मिलेगा, तो जरुर कहूँगी कि पहले दारु पीना बंद करवाओ, लोगों को दिन के उजाले व रात के अंधेरे के बीच के फरक को समझाओ। इसके बाद जाकर नुरीशा, अलेख प्रधान जैसों के साथ लडाई करना।

इस बार अगर छोटे भाई के साथ मुलाकात होगी तो उसे खूब गाली देंगी। बोलेगी “नक्सल में शामिल हो गया तो मां-बाप को भूल गया? चल आज मेरे साथ घर चल, दोनो बूढ़ा-बूढ़ी तेरी याद में काँटा-सा हो गये हैं, जिनके लिये लड रहे हो, उनके पेट में एक दाना भी नहीं। चल देख, घर का हाल। लडाई सीखनी है तो सिख, लेकिन घर तो आना-जाना रख। अच्छा, बता तो भईया। माँ-बाप को छोड़कर चला आया, क्या वे तुझे याद भी नहीं आते हैं ?”

देख, ऐसी मूसलाधार घनघोर बारिश के दिन परबा को गांव छोड़ना पड़ा है। उसके दुर्भाग्य ने उसको इस नरक में धकेल दिया, कैसे। दोनों बूढ़ा-बूढ़ी की याद परबा को खूब सताती है। क्या खाये होंगे ? क्या पिये होंगे ? परबा की आँखे आंसूओं से भर गयी, माँ बाप को याद कर। कहाँ-कहाँ नहीं खोजे होंगे, इऩ दोनों ने परबा को ? भाजी चुनने गयी थी, कहीं नाला में बह तो नहीं गयी। उसकी माँ को बहुत संदेह था उस पठान लडके पर। सोचती होगी बडे भाई की तरह वह भी भाग गयी पठान लडके के साथ ? क्या कभी भी जान नहीं पायेगी माँ, कि परबा रायपुर शहर के सबसे घटिया नरक में रह रही है। किसी एक दिन के लिये भी उसके बाप को उस फोरेस्ट-गार्ड पर संदेह नहीं होगा। यद्यपि उस आदमी पर, उसके बाप को बहुत गुस्सा आता था क्योंकि उसके भाई डाक्टर को उसने बंधुआ मजदूर बनाकर भेज दिया था किसी अनजान देश में। फोरेस्ट-गार्ड का लाल-पीले दाँत दिंखाते हुये, उस कुत्सित हँसी की याद कर परबा का शरीर थर्रा गया था। इच्छा हो रही थी छोटे भाई के पास से बंदूक छुडाकर उस आदमी को जान से मार दे। बारिश में भीगी हुई परबा ने जंगल में, भाई को ढूंढते समय देखा था उस आदमी को। वह अपने छोटे से क्वार्टर में बैठकर बीडी का सुट्टा लगा रहा था।

“अरे कौन ? कौन वहाँ खडी है ?”

परबा ने कोई जबाव नहीं दिया था। सब कह रहे थे कि नक्सल जंगल में डेरा डाले हुये है, लेकिन कहाँ ? दूर-दूर देखने से कोई भी तो नहीं दिख रहा था।

“कौन ? सरसी है क्या ? हे पगली, तू इतनी बारिश में भी जंगल में आ गयी। तुझे अपने जान का कोई डर नहीं है, क्या रे ?”

चमक गयी थी परबा। सब उसकी मां को पगली कहते थे। बीच-बीच, जंगल जाकर उसके बड़े भाई को ढूंढती रहती थी इसलिये। परबा भी कितनी बार माँ को समझा चुकी थी “बड़ा भाई तो ईसाई होकर भोपाल में रहता है बेईजू शबर के बेटी के साथ। तू किसलिये फिर जंगल में ढूंढ रही है उसको बता तो। भाई क्या इतने सालों तक जंगल में बैठा रहेगा ?”

टुकर-टुकर ताकते रहती थी उसकी माँ, जैसे कि अतीत के तार को वर्तमान के साथ, कोशिश करके, भी जोड़ नहीं पा रही थी। जैसे कि वह भ्रम की दुनिया में गोते लगा रही हो। उस दुनिया में है घने जंगल, और हैं सुंधी पिचासीनी।

परबा समझाती थी “हे माँ ! .......” फिर भी सरसी अंधेरे गलियारों से निकल नहीं पाती थी। जैसे समय स्थिर हो गया हो। उस समय में वह फंस गयी हो।

परबा माँ को समझाते-समझाते थक गयी थी। अंत में उसने माँ को उसके उसी हाल पर छोड दिया।

बीड़ी फूँकते-फूँकते फोरेस्ट-गार्ड पहुंच जाता है परबा के पास। “अरे तू, तू तो सरसी की बेटी है ना ? तू भी तेरे माँ की तरह पगली हो गयी है, क्या ? इतनी मूसलाधार बारिश में यहाँ कहाँ आयी हो ? आओ, आओ, अंदर आ जाओ।”

भीगी हुई साड़ी परबा के शरीर से चिपक गयी थी। लाज और डर के मारे उसका शरीर कांपने लगा था। वह फिर ऐसे स्थिर खड़ी हो गयी जैसे पत्थर की मूरत बन गयी हो। उसके मुंह से एक भी शब्द नहीं निकला, मगर वह आदमी यमदूत की भाँति उसका रास्ता रोककर खडा था। “अरे ! अरे ! तुम कितनी भीग गयी हो। तुम तो अंतरा सतनामी की बेटी हो ना। आओ, बेटी, बारिश थोडा रुक जाने से, चले जाना।” ऐसा क्या था बेटी के संबोधन में ? परबा के मन से भय चला गया। उसके बाप को भी जानता है वह आदमी, और मां को भी। वह आदमी इतना अच्छी तरह से बात करता है, फिर भी बाप क्यों उसके उपर गुस्सा करता है ? फोरेस्ट-गार्ड के पीछे-पीछे जाकर वह खड़ी हो गयी बरामदे में । उसके शरीर से बूंद-बूंद कर पानी टपक रहा था। पता नहीं कैसे वह अपना होश खो बैठी थी और चली आयी थी जंगल में इतनी दूर।

“और कहाँ आयी थी तुम इतनी मूसलाधार बारिश में ? घर से रुठ कर आयी हो क्या ?”

“नहीं, रुठकर क्यों आऊँगी ?”

“इतनी बारिश में क्या कोई घर से बाहर निकलता है ?”

सिर झुकाकर खड़ी हुई थी परबा। चुपचाप खड़े होने से उसकी माँ की तरह पागल समझ लेगा, इसलिये वह बोली “घर में चावल नहीं थे। मैं शाक-भाजी जंगल से लेने आयी थी।”

“भात खायोगी ?” पूछा था फोरेस्ट-गार्ड ने।

घर के अंदर लकड़ी के चूल्हे पर टग-बग, टग-बग करके भात उबल रहा था। खुशबू से पेट और मन तृप्त हो रहा ता परबा का। एक सप्ताह हुआ है उसको भात छुये हुये। नाक को उसकी खुशबू भी नसीब नहीं हुयी थी। भूख से मुंह से पानी निकल आ रहा था। उसने मन भर कर आज इस खुशबू को सुंध लिया।

फोरेस्ट-गार्ड उसे हाथ से पकड कर ले गया था और बैठा दिया था रस्सी की खटिया पर। परबा ने हाथ छुड़ा लिया था।

“मेरा शरीर भीगा हुआ है।”

“तो क्या हुआ ? भीगा कपड़े क्यों पहन कर रखी हो ? फेंक दो।”

परबा आश्चर्य-चकित होकर उस आदमी की तरफ देख रही थी। तब तक उस गार्ड ने दरवाजा अंदर से बंद कर लिया। “देखोे, कितनी हवा चल रही है!” परबा को डर लग रहा था। उस आदमी ने ऐसे क्यों कहा कि भीगे कपड़े फेंक दो। उस अधेड़ आदमी को कुछ लाज-लज्जा है या नहीं ? पता नहीं, कैसे भात की खुशबू के साथ उसे एक अन्य-गंध का भी अहसास हुआ। डरी हुई हिरण की तरह वह घर जाने के लिए उठ खड़ी हुई। “मैं घर जाऊँगी।”

“जरुर जायोगी।” उस आदमी का कठोर हाथ उसके कंधे पर पड़ा। “मै क्या तुझको यहीं पर रखूँगा ? तुम इस गांव की लडकी हो। तुझको यहाँ रखने से गांव के लोग क्या मुझे रहने देंगे ?”

“मेरे माँ-बाप मेरी राह देखते होंगे।”

“रुक, भात बन गया है, खाकर जाना। मुर्गी पकाया हूँ। मुर्गी का झोल के साथ भात दो मुट्ठी खाकर जाना। पहली बार तो तुम मेरे घर आयी हो।”

बिना किसी कारण, क्यों इतना आदर-सत्कार कर रहा है यह आदमी? जबकि गांव के सबसे अछूत व गरीब लोग है वे लोग। कोई भी उनके हाथ का पानी नहीं पीते है। उनकी छाया पड़ने से दुकान भी अशुद्ध हो जायेगी, इसलिये तो नुरीशा की दुकान से दूर रहना पड़ता है।

गार्ड बोला “मैं बोल रहा था आज तो मेरे घर में दो मुट्ठी चावल खा लेगी। कल क्या तुझे फिर भूख चैन से बैठने देगी ? तेरे भाई लोग तो, साले नकम-हराम, अपने पैदा किये हुये माँ-बाप को पूछे नहीं। तू अगर कहेगी तो तुझे किसी धंधे-पानी में लगा दूँगा। रायपुर के र्इंटा-भट्टा में कितनी लड़कियाँ काम करती है। दिन भर की हाजरी पचहत्तर रुपये हैं। रहने के लिये खोली देंगे। चाय, चावल का जुगाड़ भी मिलेगा। तू थोडे ही न लड़का है, जो अपने माँ-बाप को भूल जायेगी। लड़की है जहाँ भी रहेगीे, अपने माँ बाप का ख्याल रखेगी। तुम्हारे गांव से बिलासीनी, जयंती, तोहफा वगैरह नहीं गये है क्या ?”

परबा धरती और आकाश के बीच झूला झुलने लगने लगी थी। कभी नीचे धरती की तरफ देखती, तो कभी ऊपर आकाश की ओर। कभी-कभी डर से सिहर उठती थी। कभी-कभी हवा में तैर जाती थी। इस आदमी की बात पर वि·ाास करें या न करें। कभी-कभी लगता था उसका अभिप्राय ठीक नहीं है। फिर कभी ऐसा लगता था, इतनी सारी लड़कियों को काम में लगा चुका है, तो कहीं न कहीं उसकी बातें सच भी होंगी। छोड़ो !

गार्ड उसके खुले पीठ पर हाथ फेरते हुये बोलने लगा “क्या बोल रही हो ?” जायेगी, या नहीं जायेगी, वह तो अलग बात है। लेकिन यह आदमी इधर-उधर हाथ क्यों लगा रहा है ?

“हाँ जाऊँगी।” परबा उठ खड़ी हुई

“मेरी माँ आ रही होगी।”

“इस बारिश में। बैठ, एक साथ खाते हैं। मेरे यहाँ कौन है खाने के लिये? अकेला खाने को मन ही नहीं होता। रसोई तो करता हूँ, पर देखोेगी, यह सब खाया नहीं जायेगा, तो फेंक दूंगा। नहीं देख रही हो, उस कोने में आधा बोरा चावल कैसे पड़े हैं ? रात भर चूहे कुतर-कुतर कर खाते रहते हैं। जाते समय दो चार किलो चावल ले जाना अपने घर। देख, मैं दयावान हूँ इसलिये चावल दे रहा हूँ, पर तेरे बाप को यह बात मत बोलना। कौन साला, तेरे बाप को मेरे बारे में भड़काया है? मेरा नाम सुनने से तेरे बाप की आँखों में खून उतर आता है।” एक असह्र बदबू उसके भूखे पेट के तह तक पहुंचकर उसकी आंतडियों को कुतर रही थी।

तब तक इधर परबा को गार्ड आधा निगल चुका था, उधर हांडी में चावल उबल रहे थे। इधर पेट में भूख दौड़ रही थी। उधर एक आदमी लगातार मेहनत कर रहा था। अनकही आवाज में परबा बुला रही थी: “माँ, माँ”

“क्यों ऐसा कर रही हो,पगली ? मैं अकेला रहता हूँ, तू क्या समझेगी अकेले आदमी का दुख ?”

“मुझे छोड़ दे, मुझे जाना है।” परबा अपने को छुडाने की चेष्टा कर रही थी, पर सब व्यर्थ। इधर एक पेट की भूख से घायल, उधर दूसरा शरीर की भूख से। भूखों का कितना भयानक अनुभव है इस संसार में! निस्तेज, थकावट से चूर-चूर, अधमरी, हो गयी थी परबा। और गार्ड था अस्थिर, उन्मादी और अनियंत्रित। चूल्हे पर चढ़ी हुयी हांडी से ढक्कन को धकेलते हुये उबलते चावल और माँड, जीभ लपलपाते हुये आग में कूद रहे थे। आग सफेद चावलों को चट कर जाती थी। रह-रहकर मांसाहार पकने की बास आ रही थी। बहुत तेज आंधी चल रही थी। आंधी उड़ा ले रही थी परबा की संचित सारी संपदा। उसका कौमार्य, नारीत्व कोई जैसे सूद और मूल सहित वसूल कर रहा हो।

“छोड़ दे, हराम जादे, छोड दे, मुझे।” एक का क्षय हो रहा था, तो दूसरा पा रहा था पूर्णता। एक हार रहा था, दूसरे की हो रही थी जीत। एक की आँखों में थे आँसू, दूसरे के होठें पर थी कुटिल हँसी। सिसक-सिसककर रो रही थी परबा, बारिश और झींगुरों की आवाज में दब गया था परबा का रूदन।

भात की हांडी से सूख गया था पानी और भात जलने की बास आ रही थी। चारों तरफ धुंआ ही धुंआ, जले हुए चावल की बास और ना......., चावल अब लुभावना नहीं लग रहा था।

परबा उठकर बाहर आ गयी। पीछे से बुलाकर दयावान गार्ड ने सड़े-गले चावलों का एक झोला उसकी ओर बढ़ाते हुये कह रहा था

“ले, ले जा, अगर र्इंटा-भट्टा जाना हो तो, मेरे साथ भेट करना ”

मशीन की चावल का झोला पकडते हुये सोची थी- छोटा भाई किस जंगल में है ? उसे कैसे सुनाई नहीं दिया, परबा का रोना-धोना ?

११

उस समय प्रधान और शा खानदान के हरे भरे खेतों के कच्चे धानों में क्षीर भर गया था। खेतों के अन्दर होकर जाते समय महकी-महकी मीठी सुंगध से जी भर जाता था। उस समय उदंती के उस तरफ, पंजा भर चांदनी की रोशनी में जैसे, झूला झूल रहे थे कास के फूल। पेड़ों के शिखर पर तपस्वी जैसे बैठे हुये बगुले के झुण्ड, ऐसा लग रहा था कि पेड़ सफेद फूलों से लदा हुआ हो और गगन में एक सुनहरी चद्दर बिछाकर, एक राजकुमारी की तरह सोये हुये हो बादल।

‘आऊँगी, आऊँगी’ कहकर सर्दी फिर भी नहीं आयी थी। भोर-भोर में हल्की-हल्की गुलाबी ठंड पड़ती थी। रात भर भीगे हुये होठों से ओस चुंबन करता जा रहा था पेड-पौधों को। एक मात्र श्रृंगार की तरह नींद उतर आयी थी आँखों की पलकों में।

ऐसी ऋतु में जंगल चंचल हो उठता है, लकड़ी वालों से लेकर ठेकेदारों तक, मौका पाकर घुस जाते है जंगल में। ठक्-ठक् शब्दों से भर उठता है वातावरण। किसी को चाहिये लकड़ी, तो किसी को चाहिये पत्थर। उदंती के उस पार से सुनाई पडते है पत्थर तोडने वालों के गीत। कुछ लोग धरती चीर कर खोजते रहते हैं रत्न, मणि,माणिक और अनमोल पत्थर। अनछुए, कभी नहीं पहने हुए अद्वितीय नीलम, माणिक जैसे भाग्य बदल देने वाले पत्थर सब छुपे रहते हैं, सब मिट्टी के अंदर। जंगल के अंदर चलता रहता है कैंप। लाल-सलाम। लाल-सलाम। सबको देख कर जैसे कि नहीं देख रहा हो, और जैसे कि शर्म के मारे, पक कर लाल हो रहे थे जंगली बेर।

सांझ झटपट ढले जा रही थी। गांव झटपट निर्जन होता जा रहा था। झटपट कदम बढ़ाते हुये आ रहे थे हाथियों के झुण्ड, गांव के खेत-खलिहानों में। जिनके थे, उनका सीना काँप उठता था और जिनके नहीं थे, उन्हें किस चीज का डर ?

सतनामी बस्ती में भूख घूम-घूमकर दस्तक दे रही थी दरवाजे-दरवाजे पर। पौष और बारिश के महीने, सब बराबर। कभी गाय की हड्डियाँ, तो कभी रत्नों के पत्थर।

सरकारी गाड़ियाँ, सरकारी आदमी सब अपनी सुविधानुसार घूमते रहते हैं गांव में। और भूख के मारे बाहर बैठे निर्बल बूढ़ा-बूढ़ियों से जन-गणना का हिसाब लेते है। गांव का रास्ता चोरी हो जाता है। चोरी हो जाते हैं, गांव के स्कूल, गांव के कुएँ, और बीपीएल चावल। चोरी हो जाते हैं गाव के युवक, गांव की युवतियाँ। गायब होते होते समाप्त हो जाते हैं। फिर भी सरकारी लोग आम की गुठलियों से बना माँड को बदनाम करना नहीं भूलते। सलप रस के हानिकारक गुणों के बारे में समझाते हैं। बच्चों को ‘नहीं बेचने’ की सलाह देते हैं। मलेरिया के टीका-सुई बाँटते हैं, गर्भ-निरोध का पाठ पढ़ाते हैं, और आखिर में पोषक खाना खाने का उपदेश देते हैं।

एक के बाद एक उत्सव लगा रहता है गांव में। घर में भले ही खाने के लिये ना हो, लेकिन ठाट-बाट लेकर आती है ‘नुआखाई’। माँ सुरेश्वरी के पास भोग लगता है, महुआ और भुलिया के पत्तों से। कुछ घंटे के लिये भूख को झाडु मार कर भगानी पड़ती है। कुछ घंटे बाद गरीब के घर में, फिर भूख ब्याज सहित हाजिर हो जाती है। गर्त हो जाता है किसानों का बीेड़ा, फसलों मे लगकर तरह-तरह का कीड़ा। धान-गुच्छों की मजबूती की कामना कर ओझा पूजा-पाठ करता हैं। अकाल, अकाल, किसानों का हो जाता है काल। बेटा दूज से भाई दूज तक केवल आशा और निराशा के खेल में बीत जाता है पूरा समय। बंधुआ मजदूरी में गये हुये भाइयों के लिये बहिनें उपवास रखती है। उस साल भी बहिन का भाई गांव नहीं लौटा। उसका उपवास-व्रत व्यर्थ हो जाता है।

हेमंत ऋतु का पदार्पण हो गया था गांव में। मगसर में अभी कुछ दिन बाकी थे। कटी हुई फसलों से धान निकालने में कुछ दिन और बाकी थे। कुछ दिन बाकी थे लक्ष्मी माँ का आहवान करने में। सपने देखने को कई दिन बाकी थे। कई दिन बाकी थे सपने टूटने में।

गाँव की युवतियाँ बकरियां हाँकने जाती थी, तो कभी-कभी बकरियों के बदले खुद गुम हो जाती थी! पोपले मुंह वाले बुजुर्ग लोग अपनी आवाज धीमी हो जाने से पहले, अपने अच्छे दिनों के बारे में बोलना नहीं भूलते थे। सब चर्चाओं में सबसे ऊपर थी वह, जब पतले नली जैसे पैर वाले, ढोल जैसे पेट दिखाते-घुमते हुये नंगे बच्चों की, जो इमानुअल साहिब, पीटर साहब, या तो गाएस साहब की जीप के पीछे-पीछे भागते रहते थे।

सतनामी बस्ती के लोग सोच में पड़ जाते हैं। हर साल धांगडा अपने पैतृक आवास छोड़ रहे हैं, गाय कौन उठायेगा ? बुजुर्ग अपने पीली आंखों से ऊपर देखकर अदृश्य को कुछ पूछते-पूछते अपने विरासत में मिले पेशे को अब संकट में आता देख सोचते रहते हैं।

फिर भी आस-पास के गांवों में गायें मरती है। सतनामी बस्ती में खबर पहुँचती है। नहीं, नहीं होकर मुश्किल से दो चार धाँगड़ा निकलते हैं फुल पैण्ट पहनकर, गमछा बांधकर, कलंदर किसान के दुकान से दारु पीकर। नहीं, नहीं, होकर, फिर भी जीते रहते हैं वे लोग। नहीं, नहीं, होकर जिंदगी ऐसे ही चलती चली जाती है।

१२

सरसी अंतरा को देखकर बरामदे में से दौड़ी चली आयी, जैसे कि उसे कोई किनारा मिल गया हो। दौड़कर अपंग, लंगडा, लाठी के सहारे चलने वाले अंतरा को बोली थी “देखो तो, कैसे उस आदमी ने मुझे थाना में लाकर डाल दिया है ?” बोलते-बोलते रो पड़ी थी सरसी।

बहुत ही गुस्से में आया था घर से अंतरा, जब उसने सुना था कि सरसी पुलिस थाने में बैठी है। घर में खाने को एक दाना भी न था, न तो लोटा था, न कोई थाली। सिर्फ एक कटोरा पड़ा था, वह भी स्टील का। जिस की कोई कीमत नहीं थी। नूरीशा के पास गया था कुछ उधार लेने के लिये, पर उसने साफ-साफ मना कर दिया। कह रहा था “जा पहले कोई पीतल का घड़ा या गमला लेके आ। फिर पैसे ले जाना।” पीतल के घड़े में सरसी की जान थी। मायके से मिला था इसलिये प्रलय होने पर भी वह हाथ से उसे जाने नहीं देना चाहती थी। बालू और राख से रगड-रगड़कर चकचक करके रखती थी, सोने के जैसे चमकता रहता था। अंतरा उसको नूरीशा के पास बंधक रखना नहीं चाह रहा था। लेकिन खाली हाथ पुलिस थाने जाने से फायदा भी क्या? एक पैसे का भी काम नहीं बनेगा।

उस दिन किंसिडा में साप्ताहिक हाट था। जिस दिन हाट लगता था, उस दिन वह घर से जल्दी निकलती थी। रहमन मियां, जिस चबूतरे पर गोश्त काटता था, उसको पहले से धोकर साफ करती थी। उसके बाद वह बाग-बगीचे के काम में लग जाती थी। लौटते वक्त रहमन मियां, बची-खुची आंतडिया-वातड़िया, थोडी-बहुत दे देता था सरसी को। मगर इस गोश्त के लिये किसिंडा जाती थी, ऐसी बात नहीं थी। वास्तव में उस दिन मुर्शिदाबादी पठान लोग, हाट में आकर गाय-मवेशियों की खरीद-फरोख्त का सौदा तय करते थे। किस घर में बूढ़ी गाय है ? तो किस घरमें बछड़ा ? खरीदने व बेचने की कीमत वहीं पर तय कर ली जाती थी। सरसी उस पठान लड़के को चारों तरफ खोजती थी।

अंतरा को मालूम है हर साप्ताहिक हाट से लौटते वक्त सरसी पेट भरकर महुली पीकर लौटती थी। इसलिये खरीदे हुये चावल व गोश्त को चूल्हे के पास फेंककर सो जाती थी। अंतरा गाली देते हुये चूल्हा जलाकर खाना पकाता था। वह समझता था सरसी के दुःख को। परबा की खोजबीन से निराश होकर वह महुली पी लेती थी। एकाध-घंटा बेहोश होने के बाद उसका मन शांत हो जाता था। जवान लड़की घर से चली गयी थी, तो उसका दिल नहीं रोयेगा तो किसका रोयगा ? मगर पुलिस थाने में सरसी का क्या काम ? सचमुच, वह उसने पठान लड़के को पकड़ नहीं लिया है तो ?

बिरंची बगर्ती की साइकिल चोरी हो गयी थी, इसलिये थाने में प्राथमिकी रपट दर्ज कराने गया था। वहाँ उसकी मुलाकात सरसी से हो गयी। आकर बोला “अरे चमार ! तेरे घर वाली तो थाने में बैठी है।” बिरंची बगर्ती ग्वाला है। गाय मवेशियों के साथ जीते हैं, साथ मरते हैं। कितनी बार अंतरा ने उनके गुवालों से मरी गायें और मवेशियों को उठाया था। इसी कारण से कुछ जान-पहचान थी नहीं तो इन ऊंची जाति वाले लोगों का क्या काम, जो खबर देकर जायेंगे ?

अंतरा थाना-पुलिस की बात सुनकर पहले-पहल डर गया था। बाद में, रुपये जुगाड़ करने के लिये इधर-उधर जिसके-तिसके पास गया था। बस्ती के सभी लोग तो उसी के तरह थे। उसको कौन उधर देता ? शा के पास गया तो उसने कोई चीज गिरवी रखने की बात कही। कहीं से कुछ भी उधार नहीं मिला। तकदीर में जो होगा, वही सोचकर थाने पहुँचा था वह।

रास्ते भर अंतरा इधर-उधर की बातें सोच रहा था। बीच-बीच में थानेदार, बंधुआ मजदूरों करने गये लड़को को दूसरे राज्यों से छुड़ाकर लाते थे। इसी तरह कहीं उसका डाक्टर लौटकर नहीं आया है तो ? नहीं तो, यह औरत जरुर कोई झगड़ा-झंझट करके थाना में बैठी होगी। यह औरत थाने में बैठी है, सुनकर आस-पडोस के लोग कानाफूसी करने लगेंगे। ऐसे तो सरसी को लेकर लोग इतनी बातें बोलते रहते हैं ? इसके अलावा, यह एक बात और जुड़ जायेगी।

पता नहीं, कहीं गवाही नहीं देने गयी है तो ? साली को ! क्या पता नहीं है ? पुलिस थाने जाने से बर्बाद हो जायेंगे। उसकी लंगड़ी टाँग को मार-मारकर पुलिस ने और पंगु बना दिया था। यह क्या भूल गयी है वह औरत ? सरसी अंतरा को पकड़कर रोने लगी। “रुक, पहले मैं पता करके आता हूँ कि बात क्या है ?” एक एक कदम चलकर वह बरामदे में पहुँचा। दरोगा बाहर में खड़ा था। अंतरा ने उसका सिर झुकाकर जुहार किया था।

“क्या हुआ ?” बहुत संक्षिप्त प्रश्न पछा था दरोगा ने।

“ये मेरी घर वाली है, इसे थाने में क्यों बुलाये हो ?”

“क्या वह पगली, तुम्हारे घर वाली। देखो, उसने क्या कर दी उस आदमी की हालत ? पत्थर मार-मारकर उस आदमी का सिर फोड़ दिया। देखो, कैसे खून बह रहा है उसके सिर से।”

“जी, इसका दिमाग काम नहीं कर रहा है।”

“तुम भी ऐसे बोल रहे हो।” सरसी ने अचरज के साथ अंतरा को पूछा।

“घर में बाँधकर क्यों नहीं रखते हो उसको ? पागल खाने में क्यों नहीं डाल दिया ?” व्यंग्य करते हुये दरोगा बोला।

“जी ?”

“थाने में कुछ दिन रखोगे तो अपने आप दिमाग ठीक हो जायेगा।”

“ऐसे मत बोलिये, बाबू। मैं उसको छुडाने आया हूँ।”

“तुम्हारे बोलने से क्या छोड़ देंगे ?”

“ना, ना, आपकी दया पर है, मालिक”

“मेरी दया करने से भी उसे नहीं छोड़ा जायेगा। समझे क्या ?”

अब सरसी ने बोलना शुरु किया। उस आदमी ने मुझे जमीन पर क्यों पटक दिया ?

अब चुपचाप बैठा हुआ आदमी उर्दू और बांग्ला मिश्रित भाषा में बोला।

“तुम मुझे हाट में खींच-तान क्यों रही थी ? कौन परबा है ? मुझे क्या पता ? हाट में मेरा लुंगी खींचकर कितना तंग किया ? बदजात् औरत ! मुझे चिकुटी काटकर, दाँतों से काटकर पत्थर से मारकर मेरा क्या हाल की है! देखो, साहिब, इस पगली को मत छोड़ना।”

“चुप,” खूब जोर से चिल्लाकर बोला दरोगा “साले, यहाँ सब नाटक लगाकर रखे हैं। पीटूँगा अभी दोनों को, माँ-बाप सभी याद आ जायेगा।”

तब दरोगा बहुत व्यस्त था। थानेदार नहीं था। शाम को ‘त्रिनाथ मेले’ की पूजा होगी। गाँजा के लिये एक आदमी को भेजा था, अभी तक लौटा नहीं था। कहाँ से यह एक और झमेला ? जिसमें एक भी पैसे की कमाई-धमाई नहीं है। गुस्से से दरोगा कह रहा था “जाओ, पहले रुपया लेकर आओ, फिर मैं देखता हूँ।”

खून से लथ-पथ आदमी ने कहा “सर, मेरा दरखास्त क्यों दर्ज नहीं की ?”

“तेरा घर कहाँ है ? बोल पहले। तुम कहाँ से आये हो ? चोर हो, चांडाल हो। तुमने क्या किया था ? पहले बता। जरुर, तुमने कुछ किया है नहीं तो यह औरत कोई शिकायत करने आती ?”

“मैं क्यों उसकी बेटी भगा ले जाऊँगा ? मैं तो उसकी बेटी का नाम तक नहीं जानता, जनाब” बड़े दुखी मन से बोल रहा था वह मुसलमान आदमी।

“मेरा अभी बहुत काम है, तुम्हारा फैसला थानेदार साहब करेगा, ऐसे ही बैठे रहो।”

दरोगा के पांव पकड लिये थे अंतरा ने। “जी,मैं एक गरीब आदमी हूँ, थाना-कचहरी के लिये मेरे पास पैसा नहीं है ।”

“पैसा नहीं है, तो जुगाड़ करो। जाओ, आज थाना में ‘त्रिनाथ-मेला’ की पूजा है। प्रसाद के लिये कुछ जुगाड़ कर देना थानेदार साहब को कहकर तुम्हारी औरत को छुडवा दूँगा।”

दूर में बैठा हुआ पठान लड़का यह सब नाटक देख रहा था। उसको समझ में आ गया था कि थाना आकर उसने कोई अच्छा काम नहीं किया है। यह राक्षस, उससे कुछ हासिल किये बिना नहीं छोडेगा। उसे अपनी गलती का अहसास हो गया था और वह वहाँ से चुपचाप खिसकना चाह रहा था। यह बात दरोगा ने भांप ली थी। बोला “अरे, तुम कहाँ भाग रहे हो ? अरे, मैं तुमको पूछ रहा हूं, इस की लड़की को लेकर कहाँ भागा था ? कहाँ रखा है इसको ? साले, इसकी लड़की को लेकर बेच दिया और अभी ऐसे बैठा है, जैसे कुछ भी मालूम नहीं।”

“मुझे कुछ भी मालूम नहीं। मैं तो हाट में घूम रहा था। मुझे देखकर इस बूढ़ी ने खींचातानी शुरु कर दी। देखिये ना, कैसे पत्थर मारकर, कैसे चिकुटी काटकर घायल कर दिया है !”

उसी बीच, एक आदमी दरोगा को कागज की पुडिया देकर चला गया। पुडिया को खोलकर उसे सूंघने लगा। फिर मोड़कर अपनी जेब में रख दिया। फिर दोनों प्रतिपक्षों की तरफ देखकर, कर्कश आवाज में बोला “जाओ, भागो यहाँ से। साले, दिमाग चाटने के लिये कोई नहीं मिला तो, यहाँ आ गये।” दरोगा अपना माल पाकर भीतर ही भीतर खुश हो रहा था। उसकी खुशी या गुस्सा से उनका कोई लेना-देना नहीं था। इसके ‘भागो’ बोलने से ऐसा लग रहा था जैसे किसने पिंजरे का द्वार खोल दिया हो और कह रहा हो “जाओ,।” बहुत बड़ी विपत्ति से निकल गये थे जैसे। पठान ने और नहीं बोला कि मेरी रिपोर्ट लिख दिजीये। अंतरा बार-बार दरोगा का पैर पड़कर आभार व्यक्त कर रहा था।

अब दोनों को एक दूसरे से किसी भी प्रकार की कोई गिला-शिकवा नहीं था। जाने की इजाजत मिल जाने के बाद, दोनों पक्ष बरामदा से उतर कर धीरे-धीरे चले गये। रास्ते भर अंतरा सरसी को गाली दे रहा था। तुम एक दिन मुझे भी मरवायेगी। ऐसे काम करने को तुझे कौन कहता है ? आज तो तू थाना में बैठी, कौन तेरा साथ देने आया ? गाँव से इतनी सारी लड़किया भाग रही है, पता भी नहीं चलता। क्या वे सब पुलिस थाने में रिपोर्ट लिखवा आ रहे हैं ? साली, पगली। जेल में कितना कष्ट होता है, तुझे क्या मालूम ? मार-मारकर कमर तोड़ देंगे। तो उठ नहीं पायोगी। यह बाबू तो दयालु था, नहीं तो देखती डंडा से मार-मारकर भुरता बना देता।

“तुमने जैसा काम किया है। मैं लोगो को कैसे अपना मुंह दिखाऊँगा ? लोग कहेंगे कि अंतरा की औरत को पुलिस-थाने में ले गया था। तू और कितना बदनाम कराकर छोडेगी, बोल तो ?”

सरसी के दिमाग में अंतरा की ये सारी बातें घुस नहीं रही थी। बक-बक करता रहता है, करने दो। वह तो थी-एक अलग राज्य में। वह मन ही मन में दो तारों को जोड़ रही थी, गलती से किसी निर्दोष को पत्थर मारकर सिर तो नहीं फोड़ दी है। पता नहीं, कितने दिनों बाद उस पठान लड़के मुराद को देखा था सरसी ने। हाट में परबा के साथ हंस-हंस कर बातें कर रहा था. उस बीच वह ठीक से लडके का चेहरा याद नहीं कर पा रही थी। लेकिन गले के पास वह काला तिल ? पठान लड़के के गले के पास ऐसे ही एक बड़ा काला तिल था। वह किसको पूछेगी ? क्या सच और क्या झूठ ? कौन उसको सच बात बतायेगा ? बड़ा असहाय महसूस कर रही थी। इतने दिनों बाद वह लड़का उसके हाथ में आया था। बेटी की खबर मिलने से पहले ही वह लड़का हाथ से चला गया। साथ में अंतरा नहीं होता तो शायद अभी भी उसका पीछा करती। उसके हाथ-पैर पकडती, पूछती “मेरी बेटी को एक बार, ले आ, मेरे बेटे। बहुत दिनों से मैं उसको देखने के लिये तरस गयी हूँ।” पता नहीं वह लड़का कल सबेरे-सबेेरे छुप-छुपकर किसिंडा छोडकर चला तो नहीं जायेगा ?

सरसी की छाती भारी लग रही थी। अपने किये के लिये वह पछता रही थी। पश्चाताप की आग में जलते हुये भी वह अंतरा के सामने सब बातों को उगल नहीं पाती थी। उसको लग रहा था कि उसकी परबा ने उसके लिये ही घर छोडा है. चार-छः दिन तक भूख से बिलखती हुयी बच्ची घर से बाहर पांव निकाली, तो और लौटी ही नहीं। अगर सरसी मिट्टी के अंदर अपनी संचित पैसों को निकाल कर अपनी बेटी को दे दी होती, तो क्या वह भूख के मारे घर छोड़ चली जाती ?

सरसी याद करने लगी। उस समय उसके दिन का आधा समय होश में, तो आधा समय बेहोशी में कट रहा था। दीवार गिर गयी थी। लेकिन उसके हाथ-पाँव में इतनी ताकत नहीं थी, कि वह दीवार को ठीक कर पाती, पानी की बड़ी-बड़ी धारायें बह रही थी घर के भीतर। पानी ही नहीं बह रहा था, बहती जा रही थी उसकी बेटी। हाय रे ! तकदीर ! उसकी गोदी सूनी करके चार-चार बच्चे उड़ चले गये। ये हीन जीवन रखकर क्या फायदा ? और अब किसके लिये यह घर संसार ? किसके लिये करना-धरना ? ये इन्सान के बच्चे ना होकर, चिडियायों के बच्चे हुये होते तो इतना गम नहीं होता। पंख निकलते ही, सरसी मान लेती कि कुछ ही दिनों में उसके बच्चे छोडकर चले जायेंगे।

सरसी ध्यान नहीं दे रही थी अपने आदमी की तरफ। क्या बोल रहा है ? क्या नहीं बोल रहा है ? इतना समय तक वह कुछ भी नहीं सुन रही थी। उसकी सोच में से उभर कर आये थे जरा से भाव, मुँह की भाषा बनकर “हाँ रे । जरा सुनो तो, हमारे बच्चे चिड़ियों के जैसे थे ना ?”

बकर-बकर करने वाला अंतरा एकदम चुप हो गया था। वे दोनों बस्ती के पास पहुँच गये थे। घर पहुँचते ही सरसी ने मिट्टी खोदकर हांडी बाहर निकाली थी। अंतरा को विस्मित कर उसके सामने फोड़ दी, छोटे मुंह से उसकी बेटी को निगल लेने वाली हांडी को। बोली थी

“ले जा, यह पैसा और किस काम में लगेगा ? ले चावल खरीद लेना, दाल खरीद लेना, खैनी खरीद लेना, बीडी खरीद लेना, कलंदर के पास चले जाना। ये सब तुम्हारे है, ले जाओ।”

अंतरा के पेट में एक दाना भी नहीं पड़ा था तब तक। भूख लग रही थी। सरसी को लेकर चिन्ता से मन भारी लग रहा था। दिल के अंदर से जरा-सी दारु पीने के लिये तड़प पैदा हो रही थी। उसके पाँव थकावट से सुन्न हो जा रहे थे। फिर उसमें से एक पैसा भी उसने नहीं उठाया। यह सारा पैसा परबा के लिये था। इस औरत ने अपना पेट काट-काटकर, मन मारकर इकट्ठा की थी यह पैसा। उसे फूट-फूटकर रोने को मन कर रहा था। वह लाठी पकड़ कर निकल आया था बाहर और बैठ गया था बरामदे में।

१३

“कपोत और कपोती दोनों पक्षी अपने पेड़ पर घौंसला बनाये थे समझा, परमा। एक दूसरे को बिना देखे रह नहीं पाते थे । यह पूरा संसार तो माया है, और माया में सब बंधे हुये हैं। पेड़ की इस डाली से उस डाली तक कूदते-फांदते हुये वह गीत गाते थे, नाचते थे। चोंच में चोंच लगाकर कितनी क्रीड़ा करते थे, कितने हंसी-मजाक करते थे। कुछ दिन बीते, कपोती गर्भवती हुई। कपोत मन ही मन बहुत खुश हुआ कुछ दिन बाद, कपोती ने दो अंडे दिये। कहीं बाहर नहीं जाकर दोनों पक्षी अंडे सेंकने में लगे हुये थे। साँप, बिल्ली और गिद्ध से अंड़ों को बचाकर रखे हुये थे।”

घर के आंगन में मिट्टी गूंथकर रसोईघर की दीवार पर पोत रही थी सरसी। लेकिन उसका ध्यान बाहर बरामदे की तरफ था। उसका आदमी अपंग होने से भी ज्ञान की बातें जानता था। छः आठ महीने सोनपुर की तरफ रह गया, वहाँ से पुरान-भागवत के सारे ज्ञान की बाते सीखकर आया था।

बाहर बरामदे में परमा, कुरैसर, जीवर्धन और छत्र बैठे हुये थे। सबकी उम्र अंतरा के आस पास थी। अंतरा ने भागवत में जो कहानी अवधूत ने यदुराजा को सुनायी थी वही कहानी सुना रहा था। बीच-बीच में एकाध पद्य सुर के साथ गाता था। ऐसे भी अंतरा का कंठ बहुत ही मीठा था। तत्व-ज्ञान की बातें करते-करते वह भाव-विभोर हो जाता था। इसलिये बीच-बीच में उसके बरामदे में लोगों का अड्डा जमता था। कोई ऊँची जाति के लोग देखते थे, तो हँसते थे। बोलते थे, “देखो तो, अब चमार भी पढ़ रहा है वेद-शास्त्र।”

अंतरा का मन ठीक नहीं था। सरसी की बात उसकी सीने में चुभ गयी थी। कितने शौक से उस पगली ने अपनी बेटी के लिये इकट्ठा कर रखा था कुछ रुपया-पैसा। सब लाकर उसके सामने पटक दिया था. और बोली थी “हमारे सब बच्चे चिडियों जैसे है ना ?” मन ही मन बोल रहा था अंतरा “चिड़िया नहीं तो और क्या ? घर को सुना करके जिसका जिधर मन हुआ, उड़ चले।” बाहर बरामदे में बैठकर सुर लगाकर गाने लगा

“ध्यान से सुनो तुम राजन; किसी दूर प्रदेश में था एक वन

रहता था कपोत, एक कपोती के संग ; स्नेह भाव से भरे हुये थे उनके हरेक अंग

रखती थी कपोती, कपोत के संग भोग के आश, सीमित था जीवन उनका, बंधे हुये थे मोह के पाश

नित्य करते रहते थे वे क्रीड़ा के रंग, पल भर भी नहीं छोड़ते एक दूसरे के संग

स्नेह-बंधन में वे बँध जाते, हँसी-खुशी से जीवन बिताते

कभी भी संग न छोड़ना चाहते, विच्छेद होने पर बहुत दुःख पाते

भोजन-शयन में जैसे साथ रहते, साथ वैसे ही वन में घूमते

कपोती का मन जिसमें लगता, तत्पर होकर कपोत उसकी इच्छा पूरी करता

कपोत करता ऐसी सेवा, कपोती मानती उसे अपना देवा

ऐसे ही कुछ दिन बीत है जाते, गर्भवती होकर कपोती, कपोत संग सपने संजोते

दोनों स्नेह से घौंसलें में रहते, पुत्र-आशा में प्यार से अंडे सेंकते

ऐसे ही दिन गुजरे अच्छे, अंडे फोडकर निकले बच्चे

अति कोमल थी दोनों की काया, ये सब थी प्रभु की माया।”

परमा कहने लगा “चिड़िया हुई तो क्या, बच्चों के प्रति लगाव तो होगा ही ? साधारण-सी एक चींटी जब मर जाती है, उसको भी उसके कुटुम्ब वाले पीठ पर लादकर ले जाते हैं। फिर ये तो उनके पैदा किये हुये बच्चे हैं, उसके बाद फिर क्या हुआ अंतरा ?”

और क्या होगा ? बच्चों के पंख निकल रहे थे, वे फडफड़ाना शुरु कर रहे थे। बच्चों की आँखे ठीक से खुली नहीं थी, वे लाड़-प्यार से पल रहे थे। अपने परिवार को खुश देखकर, कपोत-कपोती का मन प्रफुल्लित हो उठता था। बच्चों को खिला-पिलाकर ठीक से रखने की चाहत से कपोत-कपोती दूर आकाश में उड़ जाते थे।

चोंच में दाना लेकर वे लौट आते थे। बच्चों को देखकर माँ का मन खुशी के मारे फूला नहीं समाता था। कभी-कभी वह घबरा जाती थी बच्चों को छोड़ इतना दूर चली आयी है, कहीं कोई देख तो नहीं लेगा। मन में तरह-तरह की चिन्तायें और आशंकायें पैदा हो रही थी। वह दाना तो जरुर चुग रही थी, पर उसका मन तो अटका रहता था अपने घौंसला पर।

“चिड़िया हुई तो क्या ? उसके मन में कोई चिन्ता, भावना नहीं होगी ?” बोला था कुरैसर।

“इसके बाद क्या हुआ ? क्या बिल्ली ने उनके बच्चों को खा लिया ?” पूछ रहा था छत्र।

अंतरा की आँखों के सामने आ जा रहे थे उसके चार-चार बच्चों के चेहरे। कलेक्टर, डाक्टर, वकील और इकलौती लडकी परबा। उसको उसके बच्चे, कपोत की तरह दिख रहे थे। ठुमक-ठुमक कैसे चल रहे थे आंगन में! जैसे कपोत के बच्चों की तरह आंगन में सुख रहे महुवा के फूलों को एक-एक करके वे मुँह में डालते जा रहे हो।

“अंतरा, तुम सो गये क्या ?” गला खंकार कर एक मोटी आवाज में पूछा था परमा ने।

“नहीं, भाई, नहीं, कैसे सो जाऊँगा ? तो अभी सुन, वह तो पेट पालने की बात थी। घर बैठते तो क्या चार-चार प्राणियों का पेट भरता ? कपोत-कपोती दूर-दूर गांवों में जाने लगे, जैसे हम लोग हड्डी उठाने दूर-दूर जगहों पर जाते रहते हैं। गाय उठाने दूर-दूर तक भागते रहते हैं। कहाँ-कहाँ हम लोग नहीं गये हैं, बता तो, भाई ?”

“कपोती देखी उसके बच्चे उड़ना सीख रहे है, डालियों से डालियों पर कूदने लगे हैं। थोड़ा सा उडने पर थक जा रहे हैं। लेकिन पंख हिला कर उड़ना सीख गये हैं। पंख मजबूत होने लगे थे। उस उम्र में बच्चे बड़े नासमझ होते हैं। वे क्या समझ पायेंगे कि चारों तरफ विपदायें ही विपदायें है ? नन्ही-नन्हीं आँखों में उनके, बड़े-बड़े सपने देख रहे हैं माँ-बाप, कितनी ऊंचाई तक उड़ पा रहे है! कभी सूरज को , तो कभी चांद को छूकर आ रहे हैं। नदी, पहाड़ घूमकर आ रहे हैं। बच्चे उडकर, क्या इतनी सी छोटी ऊँचाई को भी छू नहीं पायेंगे ? उनके पंख से भी ज्यादा मन छटपटाता है।

दोनों बच्चे पेड़ की डाली से उतर कर मिट्टी में कूद-फाँद कर रहे थे। ऐसे समय में एक शिकारी वहाँ आ पहुंचा। सुंदर सुंदर चिडिया के दो बच्चों को देख कर उसका मन लुभा गया। चारों तरफ जाल बिछा दिया, बच्चों को प्रलोभन देने के लिये, कुछ दाना भी फेंक दिया। कपोत-कपोती के बच्चे गाना गाते हुये घूम रहे थे। उनको क्या मालूम था कि शिकारी की चाल के बारे में ?

समझा परमा! यह संसार भी ऐसे ही जाल की तरह है। तु सुख के पीछे जितना भागेगा, इतना ही इस जाल में फसता जायेगा। बचकर निकलने का कोई रास्ता भी नहीं मिलेगा।” बोलते-बोलते एक लंबी सांस छोड़ी थी अंतरा ने।

उसके चारों बच्चे सुख के पीछे कहीं ऐसे चले गये, जो और लौटे ही नहीं। वे भी ऐसे ही सुख के पीछे भागकर किसी जाल में फंस गये।

“फिर क्या हुआ अंतरा ?” पूछा था छत्र ने। खट से जैसे अंतरा का नींद टूट गयी। वह सुर लगाकर गाने लगा -

“दाना देखकर नन्हें नयन, फंस जाते है शिकारी के बंधन

तुरंत आ पहुंचते कपोत-कपोती, पास पेड के, हो अस्थिर मति

चोंच में लेके थोड़ा-थोड़ा आहार, खोज रहे थे वे बच्चों को निहार

खोज रहे थे चारों दिशायें, उपर और नीचे, पर कहीं मिले नहीं वे बच्चे

जाल-बंधन में फंसे वे बच्चे, करने लगे चुं चुं चे चे

रह रह कर पंख फड़फडाते, चें चें कर अपना जीव बचाते

हुआ बहुत दुःखी कपोती का चित्त, गिरी भूमि पर होकर अचेत

सुनकर बच्चों का चें चें क्रंदन, कपोती करने लगी प्रचंड-रूदन

कैसे बचाऊँ मैं अपने बच्चे सुंदर, कूद पड़ी वह खुद जाल के अंदर

देखकर फंसा हुआ उसका परिवार, कपोत के दुखों का नहीं था कोई पारावार

अब कैसे रहूंगा मैं अकेला अकेला, जिसका कोई नहीं संगी, साथी और चेला

कपोत कर रहा था ऐसा घोर चिंतन, बार बार हो रहा था अचेतन।”

आह ! आह ! शब्दों से पूरा बरामदा गुंजित हो उठा। क्या-क्या कष्ट भोगने नहीं पड़े ? बिचारे कपोत-कपोती को। कुछ पल के लिये, वे लोग जैसे कि भूल गये थे एक के बाद एक उन्होंने अपने बच्चों को गंवाया है। केवल इतना ही है, कि उनके बच्चे उनके सामने छटपटाकर नहीं मरे हैं। इसलिये नहीं,नहीं कर मन में आस बांधे वे लोग बैठे हुये है, कि उनके बच्चे जरुर कहीं पर भी सुखी ही होंगे।

मिट्टी से लथपथ हाथ लेकर भाग कर आ गयी थी सरसी अंदर से। जमीन के ऊपर घडाम् से बैठ गयी। और जोर-जोर से रोना शुरु कर दी। “मेरा सन्यासी, मेरा डाक्टर, मेरा वकील और मेरी परबा, तुम लोग कहाँ चले गये ?” जैसे कि इस प्रकार की परिस्थिति के लिये को तैयार नहीं थे। सभी लोग दोनों चिड़ियों के दुःख में दुखी थे। ऐसा लग रहा था जैसे कि सरसी ने आकर ताल तोड़ दी हो। परमा बोलने लगा “चुप हो जाओ भाभी, देख रही हो ना, भागवत-पुराण से कितनी दर्द भरी कहानी का श्रवन-गायन हो रहा है ! अंतरा, तुम गाते जाओ। बच्चे, औरत मरने के बाद कपोत का क्या हुआ ?”

“बच्चे, औरत को छोड़कर कपोत और करता भी क्या ? क्या वह जीवन जी पाता ? पेड़ की डाली पर बैठकर वह रोने लगा और मन ही मन वह अपने आपको कोसता रहा।”

छत्र बोला “सुना अंतरा, आगे का पद्य, सुना कैसे वह कपोत अपने परिवार को खोकर तड़प रहा था ?” अंतरा सुनाने लगा, -

“वह मेरी थी मन की वीणा,

उसके बिना अब कैसा जीना

विधी का विधान अटल-अभिन्न

आपदा से पूरा परिवार छिन्न-भिन्न

वन में कितना कष्ट सहूंगा

इससे अच्छा मर पडूंगा

इस घोर-वन गृहस्थी का अर्थ

जन्म हो गया मेरा व्यर्थ

गृहस्थाश्रम में मेरी ऐसी प्रीति

विफल हो गयी मेरी सारी नीति

विधाता का यह कैसा न्याय !

पुत्र-पत्नी सब जाल में फंस जाये

पतिव्रता थी वह एक शिरोमणी

प्राणों से अति प्यारी मेरी गृहिणी

पहले खिलाती पति को खाना

फिर चुगती वह अपना दाना

छोडकर मुझे मंझधार

चली गई वह स्वर्ग सिधार

चले गये सब मेरे सुख

पुत्र-पत्नी के बिना सब दुख ही दुख

बिलख-बिलख कर कपोत करे विलाप

उसके मन में अति संताप

जीवन में, मैं अब क्या करुँगा ?

जाल में पड़कर मैं भी मरुँगा।

---

(क्रमशः अगले अंकों में जारी…)

COMMENTS

BLOGGER
नाम

 आलेख ,1, कविता ,1, कहानी ,1, व्यंग्य ,1,14 सितम्बर,7,14 september,6,15 अगस्त,4,2 अक्टूबर अक्तूबर,1,अंजनी श्रीवास्तव,1,अंजली काजल,1,अंजली देशपांडे,1,अंबिकादत्त व्यास,1,अखिलेश कुमार भारती,1,अखिलेश सोनी,1,अग्रसेन,1,अजय अरूण,1,अजय वर्मा,1,अजित वडनेरकर,1,अजीत प्रियदर्शी,1,अजीत भारती,1,अनंत वडघणे,1,अनन्त आलोक,1,अनमोल विचार,1,अनामिका,3,अनामी शरण बबल,1,अनिमेष कुमार गुप्ता,1,अनिल कुमार पारा,1,अनिल जनविजय,1,अनुज कुमार आचार्य,5,अनुज कुमार आचार्य बैजनाथ,1,अनुज खरे,1,अनुपम मिश्र,1,अनूप शुक्ल,14,अपर्णा शर्मा,6,अभिमन्यु,1,अभिषेक ओझा,1,अभिषेक कुमार अम्बर,1,अभिषेक मिश्र,1,अमरपाल सिंह आयुष्कर,2,अमरलाल हिंगोराणी,1,अमित शर्मा,3,अमित शुक्ल,1,अमिय बिन्दु,1,अमृता प्रीतम,1,अरविन्द कुमार खेड़े,5,अरूण देव,1,अरूण माहेश्वरी,1,अर्चना चतुर्वेदी,1,अर्चना वर्मा,2,अर्जुन सिंह नेगी,1,अविनाश त्रिपाठी,1,अशोक गौतम,3,अशोक जैन पोरवाल,14,अशोक शुक्ल,1,अश्विनी कुमार आलोक,1,आई बी अरोड़ा,1,आकांक्षा यादव,1,आचार्य बलवन्त,1,आचार्य शिवपूजन सहाय,1,आजादी,3,आत्मकथा,1,आदित्य प्रचंडिया,1,आनंद टहलरामाणी,1,आनन्द किरण,3,आर. के. नारायण,1,आरकॉम,1,आरती,1,आरिफा एविस,5,आलेख,4290,आलोक कुमार,3,आलोक कुमार सातपुते,1,आवश्यक सूचना!,1,आशीष कुमार त्रिवेदी,5,आशीष श्रीवास्तव,1,आशुतोष,1,आशुतोष शुक्ल,1,इंदु संचेतना,1,इन्दिरा वासवाणी,1,इन्द्रमणि उपाध्याय,1,इन्द्रेश कुमार,1,इलाहाबाद,2,ई-बुक,374,ईबुक,231,ईश्वरचन्द्र,1,उपन्यास,269,उपासना,1,उपासना बेहार,5,उमाशंकर सिंह परमार,1,उमेश चन्द्र सिरसवारी,2,उमेशचन्द्र सिरसवारी,1,उषा छाबड़ा,1,उषा रानी,1,ऋतुराज सिंह कौल,1,ऋषभचरण जैन,1,एम. एम. चन्द्रा,17,एस. एम. चन्द्रा,2,कथासरित्सागर,1,कर्ण,1,कला जगत,113,कलावंती सिंह,1,कल्पना कुलश्रेष्ठ,11,कवि,2,कविता,3240,कहानी,2361,कहानी संग्रह,247,काजल कुमार,7,कान्हा,1,कामिनी कामायनी,5,कार्टून,7,काशीनाथ सिंह,2,किताबी कोना,7,किरन सिंह,1,किशोरी लाल गोस्वामी,1,कुंवर प्रेमिल,1,कुबेर,7,कुमार करन मस्ताना,1,कुसुमलता सिंह,1,कृश्न चन्दर,6,कृष्ण,3,कृष्ण कुमार यादव,1,कृष्ण खटवाणी,1,कृष्ण जन्माष्टमी,5,के. पी. सक्सेना,1,केदारनाथ सिंह,1,कैलाश मंडलोई,3,कैलाश वानखेड़े,1,कैशलेस,1,कैस जौनपुरी,3,क़ैस जौनपुरी,1,कौशल किशोर श्रीवास्तव,1,खिमन मूलाणी,1,गंगा प्रसाद श्रीवास्तव,1,गंगाप्रसाद शर्मा गुणशेखर,1,ग़ज़लें,550,गजानंद प्रसाद देवांगन,2,गजेन्द्र नामदेव,1,गणि राजेन्द्र विजय,1,गणेश चतुर्थी,1,गणेश सिंह,4,गांधी जयंती,1,गिरधारी राम,4,गीत,3,गीता दुबे,1,गीता सिंह,1,गुंजन शर्मा,1,गुडविन मसीह,2,गुनो सामताणी,1,गुरदयाल सिंह,1,गोरख प्रभाकर काकडे,1,गोवर्धन यादव,1,गोविन्द वल्लभ पंत,1,गोविन्द सेन,5,चंद्रकला त्रिपाठी,1,चंद्रलेखा,1,चतुष्पदी,1,चन्द्रकिशोर जायसवाल,1,चन्द्रकुमार जैन,6,चाँद पत्रिका,1,चिकित्सा शिविर,1,चुटकुला,71,ज़कीया ज़ुबैरी,1,जगदीप सिंह दाँगी,1,जयचन्द प्रजापति कक्कूजी,2,जयश्री जाजू,4,जयश्री राय,1,जया जादवानी,1,जवाहरलाल कौल,1,जसबीर चावला,1,जावेद अनीस,8,जीवंत प्रसारण,141,जीवनी,1,जीशान हैदर जैदी,1,जुगलबंदी,5,जुनैद अंसारी,1,जैक लंडन,1,ज्ञान चतुर्वेदी,2,ज्योति अग्रवाल,1,टेकचंद,1,ठाकुर प्रसाद सिंह,1,तकनीक,32,तक्षक,1,तनूजा चौधरी,1,तरुण भटनागर,1,तरूण कु सोनी तन्वीर,1,ताराशंकर बंद्योपाध्याय,1,तीर्थ चांदवाणी,1,तुलसीराम,1,तेजेन्द्र शर्मा,2,तेवर,1,तेवरी,8,त्रिलोचन,8,दामोदर दत्त दीक्षित,1,दिनेश बैस,6,दिलबाग सिंह विर्क,1,दिलीप भाटिया,1,दिविक रमेश,1,दीपक आचार्य,48,दुर्गाष्टमी,1,देवी नागरानी,20,देवेन्द्र कुमार मिश्रा,2,देवेन्द्र पाठक महरूम,1,दोहे,1,धर्मेन्द्र निर्मल,2,धर्मेन्द्र राजमंगल,2,नइमत गुलची,1,नजीर नज़ीर अकबराबादी,1,नन्दलाल भारती,2,नरेंद्र शुक्ल,2,नरेन्द्र कुमार आर्य,1,नरेन्द्र कोहली,2,नरेन्‍द्रकुमार मेहता,9,नलिनी मिश्र,1,नवदुर्गा,1,नवरात्रि,1,नागार्जुन,1,नाटक,152,नामवर सिंह,1,निबंध,3,नियम,1,निर्मल गुप्ता,2,नीतू सुदीप्ति ‘नित्या’,1,नीरज खरे,1,नीलम महेंद्र,1,नीला प्रसाद,1,पंकज प्रखर,4,पंकज मित्र,2,पंकज शुक्ला,1,पंकज सुबीर,3,परसाई,1,परसाईं,1,परिहास,4,पल्लव,1,पल्लवी त्रिवेदी,2,पवन तिवारी,2,पाक कला,23,पाठकीय,62,पालगुम्मि पद्मराजू,1,पुनर्वसु जोशी,9,पूजा उपाध्याय,2,पोपटी हीरानंदाणी,1,पौराणिक,1,प्रज्ञा,1,प्रताप सहगल,1,प्रतिभा,1,प्रतिभा सक्सेना,1,प्रदीप कुमार,1,प्रदीप कुमार दाश दीपक,1,प्रदीप कुमार साह,11,प्रदोष मिश्र,1,प्रभात दुबे,1,प्रभु चौधरी,2,प्रमिला भारती,1,प्रमोद कुमार तिवारी,1,प्रमोद भार्गव,2,प्रमोद यादव,14,प्रवीण कुमार झा,1,प्रांजल धर,1,प्राची,367,प्रियंवद,2,प्रियदर्शन,1,प्रेम कहानी,1,प्रेम दिवस,2,प्रेम मंगल,1,फिक्र तौंसवी,1,फ्लेनरी ऑक्नर,1,बंग महिला,1,बंसी खूबचंदाणी,1,बकर पुराण,1,बजरंग बिहारी तिवारी,1,बरसाने लाल चतुर्वेदी,1,बलबीर दत्त,1,बलराज सिंह सिद्धू,1,बलूची,1,बसंत त्रिपाठी,2,बातचीत,2,बाल उपन्यास,6,बाल कथा,356,बाल कलम,26,बाल दिवस,4,बालकथा,80,बालकृष्ण भट्ट,1,बालगीत,20,बृज मोहन,2,बृजेन्द्र श्रीवास्तव उत्कर्ष,1,बेढब बनारसी,1,बैचलर्स किचन,1,बॉब डिलेन,1,भरत त्रिवेदी,1,भागवत रावत,1,भारत कालरा,1,भारत भूषण अग्रवाल,1,भारत यायावर,2,भावना राय,1,भावना शुक्ल,5,भीष्म साहनी,1,भूतनाथ,1,भूपेन्द्र कुमार दवे,1,मंजरी शुक्ला,2,मंजीत ठाकुर,1,मंजूर एहतेशाम,1,मंतव्य,1,मथुरा प्रसाद नवीन,1,मदन सोनी,1,मधु त्रिवेदी,2,मधु संधु,1,मधुर नज्मी,1,मधुरा प्रसाद नवीन,1,मधुरिमा प्रसाद,1,मधुरेश,1,मनीष कुमार सिंह,4,मनोज कुमार,6,मनोज कुमार झा,5,मनोज कुमार पांडेय,1,मनोज कुमार श्रीवास्तव,2,मनोज दास,1,ममता सिंह,2,मयंक चतुर्वेदी,1,महापर्व छठ,1,महाभारत,2,महावीर प्रसाद द्विवेदी,1,महाशिवरात्रि,1,महेंद्र भटनागर,3,महेन्द्र देवांगन माटी,1,महेश कटारे,1,महेश कुमार गोंड हीवेट,2,महेश सिंह,2,महेश हीवेट,1,मानसून,1,मार्कण्डेय,1,मिलन चौरसिया मिलन,1,मिलान कुन्देरा,1,मिशेल फूको,8,मिश्रीमल जैन तरंगित,1,मीनू पामर,2,मुकेश वर्मा,1,मुक्तिबोध,1,मुर्दहिया,1,मृदुला गर्ग,1,मेराज फैज़ाबादी,1,मैक्सिम गोर्की,1,मैथिली शरण गुप्त,1,मोतीलाल जोतवाणी,1,मोहन कल्पना,1,मोहन वर्मा,1,यशवंत कोठारी,8,यशोधरा विरोदय,2,यात्रा संस्मरण,31,योग,3,योग दिवस,3,योगासन,2,योगेन्द्र प्रताप मौर्य,1,योगेश अग्रवाल,2,रक्षा बंधन,1,रच,1,रचना समय,72,रजनीश कांत,2,रत्ना राय,1,रमेश उपाध्याय,1,रमेश राज,26,रमेशराज,8,रवि रतलामी,2,रवींद्र नाथ ठाकुर,1,रवीन्द्र अग्निहोत्री,4,रवीन्द्र नाथ त्यागी,1,रवीन्द्र संगीत,1,रवीन्द्र सहाय वर्मा,1,रसोई,1,रांगेय राघव,1,राकेश अचल,3,राकेश दुबे,1,राकेश बिहारी,1,राकेश भ्रमर,5,राकेश मिश्र,2,राजकुमार कुम्भज,1,राजन कुमार,2,राजशेखर चौबे,6,राजीव रंजन उपाध्याय,11,राजेन्द्र कुमार,1,राजेन्द्र विजय,1,राजेश कुमार,1,राजेश गोसाईं,2,राजेश जोशी,1,राधा कृष्ण,1,राधाकृष्ण,1,राधेश्याम द्विवेदी,5,राम कृष्ण खुराना,6,राम शिव मूर्ति यादव,1,रामचंद्र शुक्ल,1,रामचन्द्र शुक्ल,1,रामचरन गुप्त,5,रामवृक्ष सिंह,10,रावण,1,राहुल कुमार,1,राहुल सिंह,1,रिंकी मिश्रा,1,रिचर्ड फाइनमेन,1,रिलायंस इन्फोकाम,1,रीटा शहाणी,1,रेंसमवेयर,1,रेणु कुमारी,1,रेवती रमण शर्मा,1,रोहित रुसिया,1,लक्ष्मी यादव,6,लक्ष्मीकांत मुकुल,2,लक्ष्मीकांत वैष्णव,1,लखमी खिलाणी,1,लघु कथा,288,लघुकथा,1340,लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन,241,लतीफ घोंघी,1,ललित ग,1,ललित गर्ग,13,ललित निबंध,20,ललित साहू जख्मी,1,ललिता भाटिया,2,लाल पुष्प,1,लावण्या दीपक शाह,1,लीलाधर मंडलोई,1,लू सुन,1,लूट,1,लोक,1,लोककथा,378,लोकतंत्र का दर्द,1,लोकमित्र,1,लोकेन्द्र सिंह,3,विकास कुमार,1,विजय केसरी,1,विजय शिंदे,1,विज्ञान कथा,79,विद्यानंद कुमार,1,विनय भारत,1,विनीत कुमार,2,विनीता शुक्ला,3,विनोद कुमार दवे,4,विनोद तिवारी,1,विनोद मल्ल,1,विभा खरे,1,विमल चन्द्राकर,1,विमल सिंह,1,विरल पटेल,1,विविध,1,विविधा,1,विवेक प्रियदर्शी,1,विवेक रंजन श्रीवास्तव,5,विवेक सक्सेना,1,विवेकानंद,1,विवेकानन्द,1,विश्वंभर नाथ शर्मा कौशिक,2,विश्वनाथ प्रसाद तिवारी,1,विष्णु नागर,1,विष्णु प्रभाकर,1,वीणा भाटिया,15,वीरेन्द्र सरल,10,वेणीशंकर पटेल ब्रज,1,वेलेंटाइन,3,वेलेंटाइन डे,2,वैभव सिंह,1,व्यंग्य,2075,व्यंग्य के बहाने,2,व्यंग्य जुगलबंदी,17,व्यथित हृदय,2,शंकर पाटील,1,शगुन अग्रवाल,1,शबनम शर्मा,7,शब्द संधान,17,शम्भूनाथ,1,शरद कोकास,2,शशांक मिश्र भारती,8,शशिकांत सिंह,12,शहीद भगतसिंह,1,शामिख़ फ़राज़,1,शारदा नरेन्द्र मेहता,1,शालिनी तिवारी,8,शालिनी मुखरैया,6,शिक्षक दिवस,6,शिवकुमार कश्यप,1,शिवप्रसाद कमल,1,शिवरात्रि,1,शिवेन्‍द्र प्रताप त्रिपाठी,1,शीला नरेन्द्र त्रिवेदी,1,शुभम श्री,1,शुभ्रता मिश्रा,1,शेखर मलिक,1,शेषनाथ प्रसाद,1,शैलेन्द्र सरस्वती,3,शैलेश त्रिपाठी,2,शौचालय,1,श्याम गुप्त,3,श्याम सखा श्याम,1,श्याम सुशील,2,श्रीनाथ सिंह,6,श्रीमती तारा सिंह,2,श्रीमद्भगवद्गीता,1,श्रृंगी,1,श्वेता अरोड़ा,1,संजय दुबे,4,संजय सक्सेना,1,संजीव,1,संजीव ठाकुर,2,संद मदर टेरेसा,1,संदीप तोमर,1,संपादकीय,3,संस्मरण,730,संस्मरण लेखन पुरस्कार 2018,128,सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन,1,सतीश कुमार त्रिपाठी,2,सपना महेश,1,सपना मांगलिक,1,समीक्षा,847,सरिता पन्थी,1,सविता मिश्रा,1,साइबर अपराध,1,साइबर क्राइम,1,साक्षात्कार,21,सागर यादव जख्मी,1,सार्थक देवांगन,2,सालिम मियाँ,1,साहित्य समाचार,98,साहित्यम्,6,साहित्यिक गतिविधियाँ,216,साहित्यिक बगिया,1,सिंहासन बत्तीसी,1,सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी,1,सी.बी.श्रीवास्तव विदग्ध,1,सीताराम गुप्ता,1,सीताराम साहू,1,सीमा असीम सक्सेना,1,सीमा शाहजी,1,सुगन आहूजा,1,सुचिंता कुमारी,1,सुधा गुप्ता अमृता,1,सुधा गोयल नवीन,1,सुधेंदु पटेल,1,सुनीता काम्बोज,1,सुनील जाधव,1,सुभाष चंदर,1,सुभाष चन्द्र कुशवाहा,1,सुभाष नीरव,1,सुभाष लखोटिया,1,सुमन,1,सुमन गौड़,1,सुरभि बेहेरा,1,सुरेन्द्र चौधरी,1,सुरेन्द्र वर्मा,62,सुरेश चन्द्र,1,सुरेश चन्द्र दास,1,सुविचार,1,सुशांत सुप्रिय,4,सुशील कुमार शर्मा,24,सुशील यादव,6,सुशील शर्मा,16,सुषमा गुप्ता,20,सुषमा श्रीवास्तव,2,सूरज प्रकाश,1,सूर्य बाला,1,सूर्यकांत मिश्रा,14,सूर्यकुमार पांडेय,2,सेल्फी,1,सौमित्र,1,सौरभ मालवीय,4,स्नेहमयी चौधरी,1,स्वच्छ भारत,1,स्वतंत्रता दिवस,3,स्वराज सेनानी,1,हबीब तनवीर,1,हरि भटनागर,6,हरि हिमथाणी,1,हरिकांत जेठवाणी,1,हरिवंश राय बच्चन,1,हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन,4,हरिशंकर परसाई,23,हरीश कुमार,1,हरीश गोयल,1,हरीश नवल,1,हरीश भादानी,1,हरीश सम्यक,2,हरे प्रकाश उपाध्याय,1,हाइकु,5,हाइगा,1,हास-परिहास,38,हास्य,59,हास्य-व्यंग्य,78,हिंदी दिवस विशेष,9,हुस्न तबस्सुम 'निहाँ',1,biography,1,dohe,3,hindi divas,6,hindi sahitya,1,indian art,1,kavita,3,review,1,satire,1,shatak,3,tevari,3,undefined,1,
ltr
item
रचनाकार: सरोजिनी साहू का उपन्यास : पक्षी-वास (5)
सरोजिनी साहू का उपन्यास : पक्षी-वास (5)
http://lh4.ggpht.com/_t-eJZb6SGWU/SnRZavHFneI/AAAAAAAAGWg/5CSnflIveBM/image%5B3%5D.png?imgmax=800
http://lh4.ggpht.com/_t-eJZb6SGWU/SnRZavHFneI/AAAAAAAAGWg/5CSnflIveBM/s72-c/image%5B3%5D.png?imgmax=800
रचनाकार
https://www.rachanakar.org/2009/08/5.html
https://www.rachanakar.org/
https://www.rachanakar.org/
https://www.rachanakar.org/2009/08/5.html
true
15182217
UTF-8
Loaded All Posts Not found any posts VIEW ALL Readmore Reply Cancel reply Delete By Home PAGES POSTS View All RECOMMENDED FOR YOU LABEL ARCHIVE SEARCH ALL POSTS Not found any post match with your request Back Home Sunday Monday Tuesday Wednesday Thursday Friday Saturday Sun Mon Tue Wed Thu Fri Sat January February March April May June July August September October November December Jan Feb Mar Apr May Jun Jul Aug Sep Oct Nov Dec just now 1 minute ago $$1$$ minutes ago 1 hour ago $$1$$ hours ago Yesterday $$1$$ days ago $$1$$ weeks ago more than 5 weeks ago Followers Follow THIS PREMIUM CONTENT IS LOCKED STEP 1: Share to a social network STEP 2: Click the link on your social network Copy All Code Select All Code All codes were copied to your clipboard Can not copy the codes / texts, please press [CTRL]+[C] (or CMD+C with Mac) to copy Table of Content