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सरोजिनी साहू का उपन्यास : पक्षी-वास (अंतिम किश्त)

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पक्षी-वास डॉ सरोजिनी साहू का बहु-चर्चित उपन्यास अनुवाद :- दिनेश कुमार माली ( पिछले अंक से जारी …) .....असमय पर ही उसका संसार ...

पक्षी-वास

डॉ सरोजिनी साहू का

बहु-चर्चित उपन्यास

अनुवाद :- दिनेश कुमार माली

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(पिछले अंक से जारी…)

.....असमय पर ही उसका संसार टूट गया था। हाहाकर करते रोते-बिलखते, कपोत भी जाल में गिर गया और उसने अपने प्राण-त्याग दिये।” बोलते-बोलते चुप हो गया अंतरा। “ना कोई आह ! ना कोई चूं-चूं।” जैसे कि समय घायल होकर गिर गया हो, और पत्थर बन गये थे सारे सुनने वाले श्रोतागण। धीरे से अंतरा अपनी लाठी पक़ड़कर ठक्-ठक् कर निकल गया था बाहर की तरफ। पीछे-पीछे एक-एक कर सभी अपने-अपने घर की तरफ निकल पड़े।

सरसी भीतर से बाहर की तरफ भागकर आयी और इधर-उधर झांकने लगी। ना, अंतरा तो कहीं भी नहीं दिख रहा है। इतनी बड़ी-बड़ी बातें सुनाकर वह आदमी कहाँ चला गया ? बिना कुछ खाये, बिना कुछ पीये, कहाँ गया होगा वह अंतरा ? हांडी-फोड़कर जो पैसा निकाली थी, उसी में से दस किलो चावल खरीद कर ले आयी थी सरसी। ना कोई सब्जी, ना कोई दाल, एक मुट्ठी चावल उबालकर पेट भर देने से बात पूरी।

चूल्हे में से राख हटाकर सूखे हुये कुछ लकड़ी के टुकडों को डाल दिया था सरसी ने। फूंक लगाकर धीरे-धीरे आग लगा रही थी चूल्हे में। कुछ देर फूंक लगाने के बाद, हल्का-हल्का धुंआ निकलने लगा था चूल्हे में से। कहाँ चला गया था अंतरा ? फिर एक बार बाहर निकल कर अंतरा के लौटने की राह ताकने लगी।

चूल्हे पर पानी बैठाकर चावल डाल दी थी सरसी, चावल उबलकर भात बन गया, लेकिन सन्यासी का बाप लौटा नहीं। चिन्ता से सरसी का मन अस्थिर हो रहा था। खूब सारी खराब-खराब बातें आने लगी थी उसके मन में। सरसी को रोना आ गया था।

‘जाऊँ या ना जाऊँ’, होकर सरसी निकल पडी थी नाले की तरफ। अनमनी होकर भाजी चुनते-चुनते उसकी नजर पड़ गयी थी दो-चार धोंधों पर। उन धोंधों को साड़ी के पल्लू में बांध ली थी सरसी। आज उसको भूंजकर पीसकर चटनी बना देगी अंतरा के लिये।

“कहाँ जायेगा, अंतरा ?” कुछ भी समझ नहीं पा रहा था। घर से अचानक निकल गया था अंतरा। उसके किस्मत में थे इतने सारे दुख-दर्द! कहाँ बाँटेगा उनको? कोई भी जगह नहीं मिल पा रही थी। आँखों में बार-बार पानी भर आता था, पड़ौसियों के सामने वह रो नहीं पाता था। आँखों के आंसू छिपाकर, वह चल पड़ा था बरामदे में से। कौन है उसका ? वह कहाँ जायेगा ? कुछ देर तक बैठा रहा पीपल के पेड़ के नीचे। माँ की तरह आंचल फैलाकर खड़ा था वह पीपल का पेड़। गरमी में ठंडी-ठंडी हवा देता था वैसे, पास में बैठकर माँ झूला रही हो पंखी जैसे।कौआ, कोयल , ऐसे कितने सारे पक्षी उसकी डालियों पर घोंसला बनाये हुये थे। बुलाते हुए उड़ जा रहे थे,तो कभी लौट आते थे। गाय अपने बछड़ी के साथ सोयी हुई थी कुछ ही दूर पर। अंतरा सोच रहा था, जैसे कि यदुराजा को अवधूत संसार की माया के बारे में समझा रहे थे वैसे ही हरिदास मठ में, कितने सारे शास्त्र-पुराण पढ़ कर कभी वह भी अपने दूसरे शिष्यों को समझाता था। अंतरा सोच रहा था माया-बंधन छोड़कर फिर एक बार वह मठ चला जाता ? लेकिन वह क्या संभव था ?

जैसे माँ के पल्लू के तले, उसके पंखी की ठंडी-ठंडी हवा में, अंतरा की आँखे लग गयी थी। वहीं पर, उसी पेड़ की गोदी में वह सो गया था। नींद टूटते समय देखा कि सूरज दूसरी तरफ जा चुका था। अरे ! इतनी देर तक सो गया यहाँ । आह ! बेचारी पगली सरसी उसको नहीं पाकर रोते-रोते हाल-बेहाल हो गयी होगी। पूरे बस्ती भर के लोगों को तंग कर दी होगी, उसको ढूंढने के लिये। अंतरा ने यह ठीक काम नहीं किया। धीरे-धीरे वह अपने घर की तरफ लौट चला।

“कहाँ चले गये थे तुम ? कहाँ-कहाँ मैने नहीं ढूंढा तुमको ?” बोलते-बोलते रो पड़ी थी सरसी। “मुझे छोड़कर कहीं चले जाने का इरादा था क्या ?”

“तुमको छोड़कर कहाँ जाऊँगा ? तुम तो मेरे गले में बंधी हुयी हो। किसके पास छोडकर जाऊँगा ? जो जहाँ हो पाया, चला गया, लेकिन मैं कहाँ जाऊ ? तेरी माया-बंधन से क्या मैं मुक्त हो पाऊँगा, सरसी ?”

“आखिरी में तुम भी ऐसे बोलते हो, जैसे कि मैं तुम्हारे लिये एक बोझ हूँ। मुझे तो थानेदार ले गया था जेल में सड़कर मर जाती, मुझे छुडवाकर क्यों ले आया ? अभी भी समय है, जाना है तो चला जा। मैं तुम्हें नहीं रोकूँगी। मुझे छोडकर इतने साल तक आश्रम में रहा, लोग मुझे भला-बुरा कहने लगे। ऐसे समय में भी मैंने छोटे-छोटे बच्चों को अपनी गोदी में लिये बड़ा किया या नहीं ? अभी कौन है मेरे पास ? ना कोई बेटा, न कोई बेटी। आज हूँँ, कल आँख मूंद लूंगी। मैं अब और तुम्हारे रास्ते में कांटा नहीं बनूंगी।”

अंतरा समझ गया, नाराज होकर जो मुंह में आ रहा है, वह बकवास किये जा रही है, पगली। कहाँ जायेगा पगली को छोड़कर ? यदुराजा को अवधूत जितना भी समझायें, क्या यह माया का चक्र वास्तव में टूटता भी है ? कभी सरसी अपने सन्यासी को जंगल में ढूंढती है, तो कभी किसिंडा में अपनी परबा को। अगर वह चला जायेगा, तो उसको भी कहीं न कहीं जाकर ढूंढने लगेगी।

सरसी आंसू पोंछते हुये अलुमिना थाली में भात-पखाल परोस दी। भूने हुये घोंघों को पीसकर मिर्च,लहसुन मिलाकर कब से चटनी बनाकर रखी थी। छोटी-सी कटोरी में चटनी लाकर रख दी। फिर से जाल-जंजाल में फंस गये थे कपोत-कपोती। सब माया है, जानते हुये भी, निकल आने का कोई उपाय नहीं। नहीं, नहीं, सचमुच में कोई उपाय नहीं।

१४

किसके आगे शिकायत करेगी, चैती ? इमानुअल साहब के आंख भींचने के बाद, मैम साहिब आस्ट्रेलिया में जाकर रहने लगी थी। अभी इगनेस साहिब के दायित्व में था सब कुछ। एक अच्छा इंसान, लेकिन चैती के साथ उसका कोई परिचय नहीं था, इसलिये इगनेस साहिब को मिलने के लिये चैती साहस नहीं जुटा पाती थी। हाँस्टल का कार्य-भार सभालने वाली सिस्टर स्नेहलता से बोली थी “दीदी, आप इगनेस साहिब से पूछकर मेरे सन्यासी की कोई खोज-खबर नहीं ले लेती ? सन्यासी के आते ही हम यहाँ से गांव चले जाते। गांव में रहते, जो भाग्य में होता, देखा जाता।”

तीन महिने के लिये जापान गया हुआ था सन्यासी। उस समय चैती को चार महीने का गर्भ था। सन्यासी ने समझाया था, देख सिर्फ तीन महीनों की ही तो बात है, देखते ही देखते, समय पार हो जायेगा। मैं जा रहा हूँ, ढ़ेर सारे रुपये कमाकर लाऊँगा। अपना एक घर बनायेंगे, उसमें तुम्हारे माँ-बाप, मेरे माँ-बाप सभी साथ में रहेंगे। बड़े-बड़े शहर, बड़ी-बड़ी जगहों में कोई भी जाति-पाति को नहीं मानता। वहाँ खूब आराम से रहेंगे।

चैती जानती थी केवल उसका मन रखने के लिये सन्यासी, ये सब बातें करता था। वह, नहीं कभी पैसों के पीछे भागता था, और नहीं किसी संसार के पीछे। मिशन को छोड़कर वह किसी दूसरे जगह रह भी पायेगा, ऐसा नहीं लग रहा था चैती को। मिशन जीवन के साथ वह अपने आपको ऐसे ढाल दिया था कि उससे निकलकर बाहर एक अलग घर-परिवार बनाने की बात केवल एक झूठ के अलावा कुछ भी नहीं थी।

पहले-पहले तो चिट्ठी-पत्र भेजता था, मिशन आँफिस में फोन भी करता था। उसकी आवाज उसके बोल सुनने से चैती के मन को शांति मिलती थी। रोज दीवार के उपर लकीरें खींचकर रखती थी, सन्यासी के लौटने के दिनों का हिसाब। सन्यासी फोन पर समझाता था उसको “तुम पर दो-दो बड़ी जिम्मेदारियां सौंप कर आया हूँ चैती, मेरे लौटने तक सारी जिम्मेदारियाँ ठीक तरीके से निभायोगी।”

चैती बोलती थी “तुम चले आओ, खुद संभालो अपने घर की बगिया को, और तुम्हारे अपने बच्चे को।”

“बच्चा तो तुम्हारे पेट के अंदर है, कैसे मैं संभालुंगा उसको ? उसका ध्यान कैसे रखा जाता है ? तुम जानती हो चैती, तुम अच्छे से खायोगी, तभी हमारा बच्चा स्वस्थ रहेगा।”

“मैं कुछ भी नहीं जानती। तुम लौटकर जल्दी घर आओ, तो” चैती जिद्द करने लगती है।

“यह कैसे संभव होगा ? देख रही हो ना काम, और तीन महीने के लिये बढ़ गया है। ऐसे बुला देने से क्या मैं आ पाऊँगा ?”

तीन महीने के लिये गया था सन्यासी। और तीन महीना बढ गया। चैती सोच रही थी बच्चा पैदा होते समय सन्यासी यहाँ पहुंच पायेगा या नहीं। सन्यासी को गये हुए तीन महीने गुजर कर चौथा महीना भी लग गया था, बच्चा पेट में आठ महीने का हो गया था। फिर भी सन्यासी नहीं लौटा। कुछ दिन पहले सन्यासी ने सिस्टर स्नेहलता को फोन करके कह दिया था इसलिये सिस्टर ने चैती को मिशन अस्पताल में दिखाकर दवाई व्यवस्था करवा दी थी। डाक्टरानी बोली थी “बच्चा ठीक है, लेकिन खाना-पीना ठीक से करना होगा।”

कैसे अच्छा खा पायेगी चैती ? सन्यासी के जाने के बाद उसके खाने-पीने का कोई ठिकाना नहीं था। मन होने से खा लेती, नहीं तो भूखी सो जाती। सवेरे-सवेरे अपने बचे हुये काम निपटाकर, वह पहले चली जाती थी मिशन के बगीचे की तरफ। वहाँ माली के साथ मिलकर एकाध घंटा काम करती थी। कभी गोबर डालती थी, कभी पौधों की जड़ों को कुरेदती थी। बूढ़ा माली उसको ऐसा करने से मना करता था। “तुम घर चली जाओ, ऐसी हालत में तुम्हारा झुक-झुककर काम करना ठीक नहीं है। मास्टर बाबू भी तो आपके साथ में नहीं हैं।” चैती बोलती थी “जानते हो, वे मुझे कहकर गये थे कि बगीचा और बच्चे का पूरा-पूरा ध्यान रखना।”

बूढ़ा हँसता है, बड़े ही अच्छे इँसान है मास्टर बाबू ! इसलिये अपने बच्चे की बात भूलकर पैड़-पौधोंं के बारे में सोच रहे हैं।

“नहीं नहीं, काका, वे तो पेड़-पौधों और बच्चे, दोनों की बात कहकर गये हैं। फोन में सिस्टर से भी कहा था, इसलिये तो सिस्टर मुझे डाक्टर के पास भी ले गयी थी।”

“बेटी,एक बात कहूंगा, मास्टर बाबू तो पास में नहीं है। अपनी माँ या सासू माँ को क्यों नहीं बुला लाती ? या तो मुझे कहते, तो आपको अपने गांव में छोड़कर आ जाता।”

गांव की बात, सास-ससुर की बात आ जाने से, चैती को चारों तरफ अंधेरा ही अंधेरा दिखने लगता था। वह माली को बता भी नहीं पा रही थी, कि सन्यासी के अलावा उसका इस दुनिया में और कोई नहीं है। उसको और, नहीं उसके माँ-बाप, नहीं उसके सास-ससुर, अपनाने के लिये आगे आयेंगे। मन होने पर भी यह संभव नहीं है।

चैती ने मिशन में सिर्फ माली के साथ ही जान-पहचान बढ़ा पायी थी। इसलिये वह अपने मन की बात उसे बोल देती थी। मगर उसे अपने अतीत के बारे में बताने में संकोच लग रहा था।

उसको बहुत डर लग रहा था। वह अपने पेट के अंदर बच्चे के हिलने-डुलने का अनुभव करने लगी थी। वह समझ पा रही थी कि उसका बच्चा कुछ ही दिन बाद बाहर का उजाला, हवा-पानी छूने के लिये, अब तैयार था। वह डर जाती थी कि बच्चे को अगर पैदा देते ही वह मर गयी, तो उस बच्चे का क्या होगा ?

सन्यासी की चुप्पी इस समय सबसे ज्यादा उसको खाये जा रही थी। तीन महीने का कहकर छः महीने रहने की योजना बना दी थी उसने. उसके दिमाग में क्या थोडी सी अक्ल नहीं है ? जो उसे इस बात का ध्यान नहीं है कि उसका बच्चा चैती के पेट में पल रहा है। क्या उसे मालूम नहीं है कि इमानुअल साहिब और मैरिना मैम साहिब अब मिशन में नहीं है ?

क्षण भर के लिये उसके मन में संदेह पैदा हुआ कि कहीं वह वहां की सुंदर-सुंदर लड़कियों के चक्कर में तो नहीं पड़ गया। उन सुंदरियों के साथ खडे होकर कितने फोटो खींचवाये थे सन्यासी ने ! कितना गोरा चिट्ठा शरीर, काले भरे भरे बाल, गुलाबी होंठ, पतली-पतली आँखे थी उन सुंदरियों की ! फिर उसके मन से संदेह की भावना चली गयी थी। नहीं, उसका सन्यासी तो ऐसा नहीं है। उसने चैती को बांसुरी बजाकर वश में कर लिया था, तो वह सबको बांसुरी बजाकर वश में कर लेगा ? उस पागल ने अपने काम में व्यस्त रहकर भूला दिया होगा अपने घर-बार को।

मन को हजार बार समझाने से भी उसे रोना आ जाता था. बड़ा ही असहाय लग रहा था। अपने छोटे से क्वार्टर में अकेली बैठकर बहुत देर तक रोती रहती थी चैती। गांव के जंगल, पहाड़, झरना, नाला रह-रहकर उसे याद आ जाते थे। पेट में बच्चा है, इसलिये आस-पडोस वाले सब्जी,खीर, पीठा दे जाते थे। और एकाध घंटा वहां उसे आश्वासन दे जाते थे, चिंता मत करो, हम लोग हैं ना, जरुरत पड़ने से सिर्फ आवाज दे देना, हम लोग चले आयेंगे।” फिर कभी-कभी कहते थे कि गांव से किसी रिश्तेदार को बुला क्यों नहीं देते ?

गाँव का नाम सुनते ही, चैती का मन बहुत उदास हो जाता था। गाँव में उसके दादीजी, माँ-बाप, भाई-बहिन, फूफा-फूफी, चाचा-चाची, अड़ोस-पडोस सब कोई था। मगर ईसावेला की ? ईसावेला सतनामी के लिये तो केवल क्रिस्टोफर सतनामी ही है। पर अभी क्रिस्टोफर सतनामी परदेश में है। भूल गया है उसको। इड़ीताल से नाराज हो गयी थी चैती।

भोपाल शहर बड़ा ही अपरिचित लग रहा था। वह शहर मानो जंगल से भी भयंकर हो। उसको सन्यासी पर बार-बार गुस्सा आ रहा था। उसको अकेले लड़ने के लिये छोडकर कैसे चला गया वह ?

बंद कमरे में वह अपने आप से बात करते-करते वह छटपटा जाती थी। मिशन में उनके जाति के लोग कोई भी नहीं थे। सब कोई पढ़े-लिखे थे, उन लोगों के साथ उठने-बैठने में संकोच हो रहा था चैती को। वे लोग चैती को भी नहीं गिनते थे। चैती उन लोगों से मिल-जुल नहीं पाती थी। सन्यासी जाने के बाद यह और एक अलग से व्यवधान बढ़ गया था। छुपकर गांव चले जाने का मन हो रहा था उसका। अपनी बेटी को फिर एक बार अपना नहीं लेंगे वे लोग ? बेटी की यह हालत देखकर माँ-बाप का जीवन पसीज नहीं जायेगा ? मगर वह हिम्मत नहीं जुटा पाती थी, भाईयों के बारे में सोचकर। शायद उसे मार-काट कर फेंक देंगे।

उस दिन मिशन के बगीचे में माली को देखकर चैती ने कहा था “काका, बड़ा ही डर लग रहा है। मन भारी भारी हो रहा है। मास्टर बाबू, ठीक है? कैसे कोई फोन नहीं आ रहा है, कुछ खबर भी नहीं है।”

यही बात तो उस दिन सिस्टर भी बोल रही थी। मैने उनको तुम्हारे बारे में बताया था। सिस्टर को भी कुछ पता नहीं है इस बारे में। मास्टर बाबू का फोन आजकल नहीं आ रहा है। आँफिस में सभी लोग यही बात कर रहे थे कि मास्टर बाबू की चिट्ठी क्यों नहीं आ रही है ? उनको तो तीन महीने में वापस आ जाना था। तुम चिंता मत करो, वह शायद लौटने वाले होंगे, इसलिये शायद खत नहीं लिख रहे होंगे।”

जब वे दोनो बातचीत कर रहे थे तभी इग्नेस साहब बगीचे के अंतिम छोर पर स्थित ‘मदर मैरी’ के सामने कुछ प्रार्थना कर रहे थे। माली कह रहा था “अभी इग्नेस साहिब इसी रास्ते से होकर लौटेंगे, तब तुम अपने दुःख की बात उनके सामने रखना। उनको पूछना कि तुम्हारा पति, मिशन स्कूल का मास्टर, चार महीने पहले जापान देश को गया था, वापस क्यों नही लौटा ? उसकी कोई खोज-खबर क्यों नहीं हुई ?”

इगनेस साहब एक अच्छा आदमी है, मगर इमानुअल साहब के जैसा नहीं है। बगीचा में आकर कौनसे पेड़ को कैसे संभालना है, समझाते थे। कभी-कभी तो वह खुद भी बगीचे में काम करने लगते थे। इग्नेस साहिब मदर मैरी के सामने प्रार्थना करके लौट गये थे उसी रास्ते से। मगर चैती कुछ भी बोल नहीं पायी। माली ने कहा “बेटी, ऐसे तुम्हारे हतोत्साहित होने से कैसे चलेगा ? मुझे ही कुछ करना पड़ेगा। देखता हूँ क्या कर पाता हुँ ?”

कितनी ही बार चैती ने सिस्टर स्नेहलता से कहा था, “दीदी, मैरीना मैम साहब के साथ थोड़ी बात करवा देते।”

सिस्टर कहती थी “मेरे पास उनका नया फोन नंबर नहीं है। ऐसा सुनी हूँ कि वह अभी आस्ट्रेलिया में नहीं है।”

जैसे किसी चक्रव्यूह में फंस गयी हो चैती,निकलने के लिये उसमें से कोई रास्ता नहीं था। अपनी तकदीर को कोसती थी वह।

मगर उसके भाग्य में क्या लिखा है, कौन जानता है ? धीरे-धीरे सब कोई सन्यासी को भूल जायेंगे। इसके बाद ? अभी मिशन अस्पताल जाने से डाक्टर व सिस्टर अच्छा बर्ताव नहीं करते हैं। कोई हँसकर भी नहीं पूछता है कि तुम्हारी तबीयत कैसी है ? मास्टर बाबू कैसे हैं ? मगर कुछ दिन पहले तो पूछते थे।

एक दिन वह माली के साथ मिशन अफिस में गयी थी, सन्यासी की खोज-खबर लेने के लिये। उल्टा आँफिस के लोग उससे पूछने लगे “तीन महीने के लिये सतनामी बाबू गये थे। क्यों नहीं लौटे अब तक ? आपको कुछ बताये है क्या ? उनका कुछ अता-पता है ? कभी फोन आया था क्या ? हमको बिना बताये, अपना ‘एक्सटेंशन’ करा लेने से समस्या खडी हो सकती है।” ऐसे कितने सारे आरोप सुनकर आयी थी वह।

माली ने उसका पक्ष लेते हुये कहा था “मास्टर बाबू को मिशन वालों ने बाहर भेजा है। उनके हित-अहित के बारे में सोचना तो मिशन का ही काम है। मास्टर बाबू को कुछ भी होने से मिशन का ही तो उत्तर दायित्व है।” पहले, सभी लोग चुप हो गये, माली की बात सुनकर। अंत में बड़े बाबू ने अपने चश्मा को नाक के उपर खिसका कर बोले थे “तुम चुप रहो, पुरंदर। तुझे क्या समस्या है ? तुम अपना काम देखो। सभी बातों में अपना सिर खपाने के लिये कौन कह रहा है ?”

माली बड़े बाबू की बात सुनकर चुप हो गया। बडे-बाबू कह रहे थे “मिशन ने उनको नहीं भेजा है। सिर्फ उनकी छुट्टी मंजूर की थी। मैरीना मेम साहब ने भेजा था उनको। जाओ, उनसे बात करो।”

रुंआसी हो गयी थी चैती। कहने लगी “मैरीना मैमसाहब से थोड़ी मेरी बात करवा नहीं देते ?”

“उनका नंबर हमारे पास नहीं है। वह तो बेल्जियम में अपने भतीजे के साथ रहती है।”

चारों तरफ केवल अंधेरा ही अंधेरा दिखाई दे रहा था। जैसे कि वह अनाथ हो गयी हो।

दादाजी की बहुत याद आने लगी। दादाजी, आप अपनी पोती को भूल गये ? क्यों मुझे इड़ीताल सिखाया था ? जिसकी वजह से मेरा सन्यासी खो गया है।

“हे !, कौन है तुम मेरे पेट में ?, क्यों आये हो ? अगर तू नहीं रहता, तो मैं मरने के लिये गाँंव चली जाती।”

माली को बहुत दया आ गयी। बोलने लगा

“चलो, मंत्री के पास जायेंगे और इस बारे में गुहार लगायेंगे।”

“किस मंत्री के पास ?”

“तुम्हारा आदिवासी हरिजन मंत्री है न कोई, तुम्हारा बिरादरी वाला”

“मैं नहीं जाऊँगी। क्यों जाऊँगी ? इसी मिशन में वह पढ़ा था। मिशन तो मानो उसका घर हो। यहीं पर उसने शादी भी की। अपने घर के बच्चे को कैसे भूल जाते है, ये लोग ?”

अंत में एक दिन चैती इगनेस साहिब को मिलने गयी। पहले जैसा डर अब नहीं था, मन में। जिसका घर-परिवार बिखर गया हो, आखिर कर वह क्या करेगी ?

“साहिब, मेरे पति को कितने समुंदर पार भेजे हो ? वह अभी तक लौटकर नहीं आया। उसका कुछ भी अता-पता नहीं। मैं अभी क्या करूँगी ?”

पहले इगनेस साहब चुप हो गये, जैसे क्या जवाब देंगे? समझ नहीं पा रहे थे। बाद में बोले “हाँ, मेरे कान में यह बात पड़ी थी। हम उसकी छानबीन कर रहे हैं। जैसे ही कुछ खबर मिलेगी, बतादूँगा। बाकी प्रभु यीशु की मर्जी।”

“ऐसे मत कहिये, मेरा सन्यासी और क्या नहीं आयेगा ?”

“नहीं, नहीं, ऐसी बात नहीं है। हम लोग कोशिश कर रहे हैं। शायद विसा में कुछ गड़बड़ी हुई होगी। तुम अभी जाओ, कुछ होने से आपको खबर करेंगे।”

“कहाँ चला गया, कहाँ गुम हो गया, मेरा सन्यासी ?” बोलते-बोलते ही रो पड़ी थी चैती, “मेरा कोई नहीं है उसको छोडकर ? मैं कहाँ जाऊँगी ?”

“धीरज रखो, ऐसे होने से चलेगा क्या ? वी डान्ट नो वेदर ही इज अलाइव आँर .... ” अंग्रेजी में बोलते-बोलते इगनेस साहब चुप हो गये। अच्छा हुआ हिन्दी में नहीं बोले थे, अगर बोलते तो चैती की क्या हालत होती ?

यद्यपि अंग्रेजी उसको समझ में नहीं आती थी, परन्तु उसने अंदाज कर लिया था कि जो हो रहा है, वह अच्छा नहीं हो रहा है। उस दिन चैती बहुत बीमार पड़ गयी। शाम को प्रसव-पीड़ा शुरु हो गयी थी। शरीर के सब तार टूट से गये थे. जैसे कि शरीर के अंदर आंधी-तूफान चल रहे हो। पास-पडोस की सहायता से उसे मिशन अस्पताल में भर्ती कराया गया था। अधमरी अवस्था में लेटे हुये वह सुन रही थी - बांसुरी के सुर। जैसे कि वह उदंती के उस पार भाग कर चले जाना चाहती हो। कोई बोला आपको बेटा हुआ है ? उदंती में अभी पानी भर गया है। पत्थर भी नहीं दिख रहे थे। कूँदते-फाँदते उस पार जाने के लिये चाहते हुये भी वह और नहीं जा पायेगी। फिर भी बांसुरी के स्वर पत्थरों को चीरते हुये, नदी को पार करते हुये, सुनाई पड़ रहे थे। पानी कम होने से सन्यासी जरुर आयेगा।

१५

प्रारंभ से ही पता नहीं क्यों मन कह रहा था कि आज का दिन ठीक से नहीं कटेगा। वास्तव में, सुबह-सुबह उसकी नींद टूट गयी, एक बिलाव के रोने की आवाज से। ऐसे लग रहा था जैसे कि एक नवजात शिशु रो रहा हो।

उस तरफ से झूमरी जोर से गाली दे रही थी, “हरामजादा, तुझे और कहीं जगह नहीं मिली, सवेरे-सवेरे मेरा कपाल फोड़ने के लिये यहाँ आकर म्याऊं-म्याऊं करने लगा ?” कुछ समय तक छत के उपर म्याऊं-म्याऊं करने के बाद वह बिलाव चला गया। और परबा को नींद नहीं आई। लेकिन इतने अंधेरे में उठकर वह क्या करेगी ? नींद नहीं आने से भी खटिया में इधर-उधर करवटें बदल रही थी। इसी समय, उनके दरवाजे पर किसी के खटखटाने की आवाज सुनाई दी।

इतना सवेरे-सवेरे कौन ग्राहक आ पहुंचा है ? यह मतवाल और गंजेडी लोग सोने-बैठने भी नहीं देंगे ? झूमरी गाली देते देते, गुछ देर बाद सोकर खर्राटा मारना शुरु कर दी। परबा को डर लग रहा था फिर भी उसने धीरे-धीरे दरवाजा खोल दिया।

“तू ?” आश्चर्य चकित होकर पूछने लगी।

‘इतने अंधेरे में ? क्या हो गया ?”

“चल, अंदर चल।” बोलते-बोलते वह अंदर जाने के लिए रास्ता छोड़ दी थी, “क्या हो गया जो इतने अंधेरे में तू यहाँ आगयी ? कोई कुछ बोल दिया क्या ? मेरी बहिन !”

कुंद थर्रा रही थी। इसकी ह्मदय की धड़कने बढ़ गयी थी। वह हाँफने लगी थी। परबा घडे में से एक गिलास पानी लाकर पकड़ा दी थी, कुंद को।

“ले, पी, पहले पी ले।”

मना करते करते पूरे गिलास का पानी, सवेरे-सवेरे पी गयी थी कुंद। बस्ती के नीचे की तरफ से ऊपर की तरफ, कितना दूर था जो ? इतने में ही पसीने से पूरी तरह तरबतर हो गयी थी।

परबा उसको पुचकार रही थी। पता नहीं, क्या ऐसी विपदा आ गयी उस पर ? वह बिलाव भी तो सवेरे-सवेरे शिशु की भांति रो रहा था।

कुछ समय चुपचाप बैठने के बात कुंद बोली थी “दीदी, तुम्हारा भाई आया था मेरे पास। रात भर वह मेरी खोली में था। अभी-अभी चला गया। जैसे ही वह चला गया, मैं भागते हुये तुम्हारे पास आ गयी।”

अभी थर्राने की बारी जैसे परबा की थी। खूब जोर-जोर से कांपने लगा था उसका शरीर। “क्या बोल रही हो, कुंद तुम ? सच बोल रही हो।”

“तुमको मैं झूठ बोलूंगी ? क्या तुम मुझ पर विश्वास नहीं करती हो ?”

“नहीं, नहीं, बहिन विश्वास क्यों नहीं करुंगी? मैं तो अपने कानों पर भी विश्वास नहीं कर पा रही हूँ। सच्ची में, मेरा भाई, मेरा वकील भाई, ना ?”

“और कौन होगा ? वकील ही तो था।”

“तुमने मेरे बारे में उसको कुछ बताया क्या ?”

“नहीं, नहीं। आंख छूकर बोल रही हूँ मैने कुछ भी नहीं बताया। तुमने तो पहले से मना कर दिया था। फिर कैसे बताती ?”

“फिर... किसलिये यहां आया था मेरा भाई ? उसको खबर कैसी मिली ? बिना शादी किये तुम उसके साथ सो भी गयी रात भर ?”

कुंद घबरा गयी। इतने सारे प्रश्न एक साथ पूछ रही थी परबा, उसको। रात भर वे दोनों सोये नहीं थे। इस बात की क्या परबा वि·ाास करेगी ? इधर-उधर की कितनी सारी बातों में ही बीत गयी थी पूरी रात। पठान लड़के के साथ परबा की भागने की कोशिश वाली बात भी हुयी थी। रोते बिलखते रात बिता दी थी दोनों ने। कोई क्यों वि·ाास करेगा ?

कुंद बोली थी “तू, दीदी, ऐसा क्यों बोल रही है ? मैं तुम्हारे भाई के साथ क्या धंधा करुंगी ?”

“धंधा नहीं, बहिन, तुम मेरी भाभी हो या नहीं, बताओ ? हम लोगों की क्या शादी और क्या विदाई ? हम तो हर रात एक नया पति बनाते हैं। हमारा क्या घर-संसार ? तुम रह क्यों गयी ? नहीं, भाग जाती मेरे भाई के साथ।”

“भाग गयी होती, लेकिन तुम्हारा भाई बोला कि कुछ दिन और रुक जा, इसके बाद मैं तुम्हें ले जाऊंगा। एक बडा काम बाकी है, उसको पहले खत्म कर लेने दो। उसके बाद मैं तुम्हें यहाँ से उठाकर ले जाऊँगा। तुम मेरे साथ-साथ रहकर बंदूक चलाना सिखोगी।”

“क्यों ? तुमको लेकर क्या वह घर-संसार बसाना नहीं चाहता है ?” तुम क्यों बंदूक उठाओगी ? अंतरा सतनामी का नाम डुबायोगी क्या ? तुम हमारी जाति-बिरादरी की हो या नहीं ? तुम मेरे भाई के साथ घर करोगी। मेरे बाप, मेरी माँ को दो वक्त का खाना परोसोगी, रे ! सही में, आखिरी समय में दोनों को थोडा-बहुत सुख मिलना चाहिये।”

“मैं और कैसे गांव जाऊंगी ? क्या कहूंगी सबको ? कहाँ थी इतना दिन तक ? तू ही बता, शरम से मैं मर नहीं जाऊंगी ?”

“क्या और करेंगे, बहिन ? तू बता तो, मेरा भाई कैसे तुम्हारा पता पा गया ? किसने खबर दी उसको ? जिसने भी खबर दी, उसको तो मेरे बारे में भी पता होगा ?”

“कहाँ से खबर पाया ? मुझे नहीं बताया। लेकिन इतना कहा था “मैं रामचन्द्र हूँ, तेरा यहाँ से उद्धार करुंगा। लेकिन छुपते-छुपाते हुये नहीं, रावण को मारने के बाद ही।”

परबा को डर लगने लगा था। उसके भाई को जिसने कुंद की खबर दी, उसने परबा के बारे में नहीं बताया होगा ? यह बात अलग थी कि, परबा उसकी खोली में से बहुत ही कम बाहर निकलती थी। हफ्ता भर के लिए दाल-चावल खरीदकर अपने पास रख लेती थी। एक दिन का खाना दो दिन चलाती थी।

झूमरी का अलग चूल्हा होने के बाद से परबा का खाना-पीना, पकाने का और कोई झमेला नहीं रहता था। एक हरी मिर्च, एक छोटा-सा प्याज मिल जानेसे भात के साथ खा लेती थी। गांव में रहते समय, कहां कभी ठाट-बाट के साथ पेट भर खाना खाती थी, जो यहां खायेगी ? लेकिन गांव में रहते समय आँखों में थे भरपूर सुनहरे सपने। यहाँ आकर उसको अपना जीवन बहुत ही लंबा लगता है, बहुत ही लंबा। शादी की बात तो वह पूरी तरह से भूल चुकी थी। केवल पेट के लिये जुगाड करना ही उसके लिये सब कुछ था। उसके लिये भी उसे हाथ पैर नहीं हिलाना पड़ता था। उम्र ढल जाने के बाद क्या होगा, पता नहीं ? सोचने से अंधेरा ही अंधेरा दिखने लगता था।

कुंद को उसका भाई छुड़वाने आया था। सुनकर ईष्र्या के बदले बहुत ही खुश हुई थी परबा। जैसे भी हो, लड़की का जीवन सुधर जायेगा। आज नहीं तो कल, दोनों अपना घर-संसार बसायेंगे, खायेंगे, पीयेंगे, रहेंगे।

परबा बोली थी “कुंद, तुम मेरे भाई से शादी रचायोगी ? जो भी कमाओगी, उसमें से कुछ मेरे माँ-बाप के लिये खर्च करोगी।”

“हाँ, दीदी, हाँ। तू क्या सोच रही है मैं उनको दुःखी करुँगी ?”

“कुंद, सुन। तुम किसी को भी नहीं बताओगी कि मैं यहाँ रहती हूँ। मेरी तो किस्मत फूटी है। यहाँ से चले जाने से भी कौन मुझसे शादी करेगा ? बेकार में माँ-बाप के गले में बंधी रहूँगी। तुम्हारे घर-संसार में व्यर्थ का बोझ क्यों बनूँगी ? तू मेरी कसम खा, कि किसी को भी कुछ नहीं बताओगी।” परबा कुंद के हाथ को लेकर अपने सिर पर रख दी।

बोली “तू जा मेरी बहिन, तू ठीक से रह।”

कुंद चुपचाप बैठी रही। कुंद के जाने के बाद, परबा का मन खिन्न हो गया था। पहले जैसा झूमरी के साथ मेलमिलाप नहीं हो पाता था। लगभग दो महीने हो गये थे एक दूसरे के साथ बात-चीत किये हुये। अपने-अपने ग्राहक, अपने-अपने सुख-दुख को अपने साथ लेकर अपनी-अपनी कमाई कर रहे थे। यहाँ तक कि, कोई किसी के चूल्हे में से थोड़ी सी आग भी नहीं माँगते थे।

झूमरी को बड़ा अहंकार था अपने रंग-रूप को लेकर। इस शहर में उसके दीवाने बहुत थे, फिर भी वह कभी परबा को घृणा की दृष्टि से नहीं देखती थी। परबा को याद आ गयी थी उस दिन की वह घटना। पता नहीं कहीं से झूमरी का एक ग्राहक आने वाला था। झूमरी बोली थी “परबा, तुम कुछ देर के लिये कुन्द के घर नहीं चली जाती।”

“क्या हो गया ? मैं तो तुम्हारे धंधे में कोई बाधा नहीं पहुंचाती हूँ, बाहर बैठी रहती हूँ।”

“तुम बुरा मत मानना,परबा, तुमको घर के बाहर बैठे देख लेने से ग्राहक मेरी कीमत कम कर देते हैं।”

परबा के गाल पर जैसे कि किसी ने जोर से तमाचा मार दिया हो। इतना दिनों तक झूमरी के मन में मेरे प्रति इतनी हीन भावना भरी हुई थी। छिः छिः। आज तक परबा उसको अपनी सगी दीदी मानती थी। इतने दिनों तक, इतना प्यार से फिर उसे अपने पास गोदी में बैठा कर क्यों रखी हुयी थी झूमरी ? औह, दया। दया से ? अभी इसका धंधा ठीक-ठाक चलने लगा, तो दया शब्द जैसे गायब हो गया हो ?

परबा रोते हुये कुंद के सामने ये सब बातें बताई। कुंद बोली “तुम बेकार में रो रही हो। तुम्हारा जब भी मन हो, यहाँ चले आना। देखना एक दिन झूमरी को उसका घमंड निगल जायेगा।”

उसी दिन से परबा और झूमरी के बीच बातों-बातों में अनबन होती रहती थी। परबा का खाना-पीना, परबा का दरी-बिछौना से लेकर उसका हँसना-रोना जैसे कि सब खराब, जान बुझकर ताना मारती थी झूमरी। आखिरी में एक दिन परदा हटाकर बीच में दीवार खींच ली दोनों ने। दीवार बनाने वाले मिस्त्री को झूमरी बोल रही थी- और कुछ दिन बाद वह यह घर छोड़ देगी। उस तरफ की नेपाली बस्ती में पक्का घर किराये पर ले लेगी।

उस बस्ती में तरह-तरह के घर हैं। नेपाली और बंगालियों के लिये अलग खोली। उनके शरीर के रंग साफ, भरे-भरे गाल। अच्छा-खासा दो पैसा कमा लेते हैं। उनके ग्राहक पचीस-पचास वाले नहीं। उनमें से कुछ तो गाड़ी में बैठकर साहिब लोगों के घर बुलाने पर जाते हैं। उनकी खोली में फ्रिज, टी.वी, स्टील की अलमारी आदि होते हैं। एक तरफ रहते थे कुछ हिंदी भाषी। वह लोग भी परबा जैसों से अच्छा रहते थे। यद्यपि नेपालियों की तरह, पहनने ओढ़ने के ताम-झाम वाले कपड़े उनके पास नहीं थे।

परबा जैसी लड़कियाँ दिन का चूल्हा जलाने के लिये धंधा करती थी, पचीस या पचास रुपये में। परबा की अवस्था तो बहुत ही खराब। जो भी आता है, कहता है “साली, ऐसे लाश की तरह क्यों पड़ी रहती है बे ? साला , सब पैसा बेकार हो गया !”

कुंद तो भाई के साथ चली जायेगी, खूब अकेली हो जायेगी परबा। अपनी होकर, अपनी बिरादरी से कुंद ही तो थी एकमात्र। जो भले-बुरे समय में काम आती थी। लेकिन, कुंद को चले जाना चाहिये। इस नरक में रहकर क्यों व्यर्थ में दुःख पायेगी ?

कुंद के घर से आने के बाद, अपना काम निपटाकर एक कटोरी पखाल खाकर परबा निकल गयी थी बाजार की तरफ। न झूमरी, न कुंद, कोई नहीं था उसके साथ में। प्लास्टिक डिब्बों के अंदर खूब सुंदर दिख रहा था वह चांदी का फूल। इसको वह कुंद के लिये खरीदेगी, अपनी भाभी के लिये। शादी के समय बालों में सजायेगी इस फूल को।

बाजार से लौटकर, परबा सीधी कुंद के घर गयी थी। थोड़ा सा पखाल खाकर, कुंद उस समय लेटी हुई थी। परबा बोली “देखो, देखो, मैं तुम्हारे लिये एक चीज लायी हूँ। देखो, तो कैसा लग रहा है ? तुम्हारी शादी में तो मैं नहीं आ पाऊँगी। इसलिये अभी से दे रही हूँ।” प्लास्टिक डिब्बा को परबा पकड़ा दी थी कुंद को।

शरम के मारे कुंद का चेहरा लाल पड़ गया था। जैसे कि ससुराल से कोई आकर शादी की बात पक्की कर रहा हो। बोली “अभी रुको न, तुम्हारे भाई को तो पहले आने दो। तुम अभी से इसे क्यों दे रही हो ?”

दोनों ने लाल चाय पी। सुख-दुख की बातें की, चार बजे तक। परबा बोली “मैं जा रही हूँ। हमारी तरफ पानी केवल दस मिनट के लिये ही आता है। जल्दी जाकर मुझे पानी भरना होगा।”

कुंद के घर से आकर परबा लाईन में लग गयी। खाना बनाने के लिये और पीने के लिये पानी लाकर घर में रखी। पानी रखने के बाद, बिछौना सजा दी थी। कंघी की, मुंह पर साबुन लगाकर रगड़-रगड़ कर साफ की। कपडे बदल कर ब्लाउज के साथ मिलती-जुलती एक अच्छी साड़ी पहन ली। चेहरे पर पाउडर,आंखों में काजल लगायी थी। एक सुन्दर सी बिन्दी लगा दी, अपने दोनों भौंवों के बीच में।

उसको लग रहा था, ये सब नहीं लगाने से शायद उसका चेहरा ज्यादा सुंदर दिखता। लेकिन ये सब तो लगाना ही होगा। अभी परबा बैठी रहेगी घर के बाहर। वह खुद एक बाजार है, इंतजार करेगी अपने ग्राहकों का।

दुर्भाग्य से उस दिन कोई नहीं आया, परबा के घर। परबा इधर-उधर ताकने लगी। गली के आखिर छोर पर आकर खडा हो गयी। कोई कुली, मजदूर भी उसके भाग्य में नहीं था. सवेरे-सवेरे आज बिलाव रो रहा था, इसलिये शायद दिन ऐसे ही खाली-खाली कट जायेगा, सोचकर वापिस आ गयी थी परबा। इस बीच तीन-तीन ग्राहकों को निपटा चुकी थी झूमरी। अच्छा खासा पैसा कमा ली थी शायद, इसलिये अपना चूल्हा जलाकर मछली भून रही थी। भूनी हुई मछली की बास से परबा के पेट में से सोयी हुई भूख जाग उठी थी।

उस समय नौ बज रहा होगा। ठंड का महीना था, इसलिये रातें लंबी लग रही थी। झूमरी शायद पखाल और भूनी हुई मछली खाकर सोने जा रही थी, इसलिये उसकी तरफ से कोई आवाज नहीं आ रही थी। परबा कपड़े बदल कर पखाल खाने जा रही थी, ठीक उसी समय काला होकर एक लंबा सा आदमी, उसके छोटे से दरवाजे से झाँक कर पूछने लगा “क्या तुम अकेली हो ?”

“हाँ,” परबा का मन खुश हो गया था।

कुंद के लिये पूरे एक सौ दस रुपये का चांदी का फूल खरीदने के बाद, उसके पास कुछ भी पैसा बचा हुआ नहीं था। यह आदमी, जो भी चालीस-पचास रुपया देगा, उसमें उसका दो दिन का खर्च निकल जायेगा। परबा पखाल से भरी कटोरी को ढककर एक कोने में रख दी।

बोली “रुक, एक अच्छा साड़ी पहन लेती हूँ।”

“तुम्हारी साड़ी किसको देखनी है ? मैं तो इसको भी अभी खोल दूंगा।” अश्लील हँसी हंसते हुये उस आदमी ने कहा।

परबा के वजन से दो-ढाई गुणा ज्यादा वजन वाला वह आदमी, अपने भारी-भरकम शरीर को लेकर हँसते हुये आकर बैठ गया था खटिया के उपर।

खटिया में से केंच की एक आवाज निकली। खटिया टरटराने लगा था। उस आदमी की आँखे खून जैसी लाल, होठ के उपर थोडा सा ·ोत कुष्ठ जैस दाग, नाक पकौडी की भाँति चौड़ी, थी। परबा खुद इतनी सुंदर नहीं थी। परबा ग्राहकों के भेष की तरफ भी ध्यान नहीं देती थी। फिर भी पता नहीं, क्यों यह आदमी उसको अच्छा नही लग रहा था ?

उस आदमी को इस बस्ती में पहली बार देखी थी परबा। पता नहीं, इस शहर का है, भी या नहीं। किसी की खोली में जाते हुये उसको पहले कभी नहीं देखी थी परबा। उस आदमी ने पूछा “तुम्हारा नाम झूमरी ?”

परबा तो पहले गूँगी-सी हो गयी। उसके बाद बोली “वह उस तरफ रहती है।”

“फिर तुम कौन हो ?”

परबा ने कोई उतर नहीं दिया

“हां, हां। तुम झूमरी हो या मूतरी हो, मेरा उससे क्या लेना-देना ?”

आ, आ, बोलकर परबा को खींच लिया था उस आदमी ने। अचानक बाज की तरह झपट कर परबा के उपर चढ़ गया। बीस रुपये का एक नोट हिलाते हुये बोला।

“ये तुम्हारे गाल के लिये हैं।” कहते-कहते झट से काट दिया, परबा के गाल को।

“ऊइई माँ” झनझनाकर परबा चिल्ला उठी।

“दर्द हुआ ?” बड़े प्यार से उस आदमी ने पूछा।

बीस का नोट परबा के हाथ में ठुँसकर बोला “अब कान की बारी। अच्छा बता तो, तुम्हारे शरीर के सभी अंगों का नाम ?”

परबा चुप थी।

“तुम्हारे सभी अंगों के लिये अलग-अलग पैसा दूँगा, समझी।”

उस आदमी ने फिर एक बीस का नोट निकाला।

“ले,ये तुम्हारे कान के लिये।” बोलते-बोलते कान की बाली को चबाकर पकड लिया था। ऐसा लग रहा था जैसे कि परबा की जान ही चली जायेगी। उस आदमी को धकेलकर वह भाग भी नहीं पा रही थी। दर्द से वह तड़प रही थी। यह आदमी है या कोई राक्षस ? आदमी के वेश में कोई राक्षस नहीं आ गया तो। नहीं तो,आधी रात में क्यों आता ?

“अभी नाक की बारी।”

“छोड़, मुझे जाने दो ।”

“ऊहुँ, तुझको मेरा प्यार अच्छा नहीं लग रहा है ?” फिर बीस का नोट निकाला उस आदमी ने।

जोर-जोर से रोने लगी परबा। उस तरफ से एक लाठी लेकर दौड़ी आयी थी झूमरी।

“कौन ? कौन ? ये हरामजादा ! साला, आ जा, आज हो जाये एक-एक हाथ। देखते है या तो तू रहेगा, या फिर मैं। साला मतवाल, गंजेडी कहीं का, निकल भाग यहां से। क्या सोचकर रखा है रे ? होटल में नहीं चला गया, एक प्लेट खसी मांस खाने के लिये। यहां क्यों आ मर रहा था ? साले राक्षस, कच्चा मांस खाने आया था ?”

हड़बड़ाकर, आधी नंगी अवस्था में वह आदमी उठ गया। झूमरी का रणचंडी रूप देखकर डर गया। कमीज को हाथ में लेकर बाहर जाते-जाते बोला

“ये साली कौन है, बे ?”

“तेरी माँ” बोलकर झूमरी ने खूब जोर से लाठी मारी उसके पीठ पर।

वह आदमी, एक आवारा कुत्ते की भाँति काँ-काँ कर अंधेरे में गायब हो गया।

परबा कृतज्ञता की दृष्टि से देखने लगी झूमरी को। लेकिन झूमरी लाठी फेंककर चली गई अपनी खोली के अंदर।

खटिया में सोकर काफी देर तक बक-बक करने लगी। छिः! छिः!, रुपया कमाने के लिये किसी को भी बुला लोगे ? लगता है जरा भी बुद्धि भगवान ने नहीं दी।

झूमरी के जितनी गाली देने से भी परबा को कुछ खराब नहीं लग रहा था, वरन् इसको लग रहा था कि वह अभी भी अकेली नहीं है। कुंद चले जान से भी झूमरी तो है।

१६

पूरा गाँव थम सा गया था। किसी के मुंह से कोई भी आवाज नहीं निकल रही थी। कोई भी घर से बाहर निकलकर नहीं बोल रहा है चलो, देख आते हैं। जैसा कि किसी ‘कोकुआभय’ का सन्नाटा सा छा गया हो पूरे गांव में।

उस समय तक गांव वाले पूरे साल भर का काम धन्धा खत्म कर चुके थे। सुनहरे धान के गुच्छों से कभी भरे हुये थे आंगन आज खाली होकर सुनहरी धूप से भरे हुये थे।

अभी-अभी ही लौटी थी माँ लक्ष्मी, पूरे मार्गशीष महीने व्यस्त रहने के बाद। दिन सब छोटे और रात सब लंबी होती जा रही थी। शाम को जल्दी-जल्दी खाना खाकर, लोग रजाई गुदडी ओढ़कर सो जा रहे थे। खेतिहर किसान खुश थे कि अगले साल के लिये फसल इकट्ठी हो गयी। भूमिहीन किसान भी खुश थे कि इधर-उधर से, अगले एक महीना के लिये उनका भी जुगाड हो गया था।

अभी और, हाथों में किसी भी प्रकार का काम नहीं था। खेतों में भी कोई काम नहीं था, सारे खेत किसी बूढ़े की दाढ़ी की भाँति राख के रंग जैसे मलिन दीख रहे थे। हाथों में कोई काम नहीं था, इसलिये मुट्ठियों से खेल रहे थे ताश के पत्ते। देखते-देखते सुबह, देखते-देखते सांझ बीतते जाते थे। गांव के मार्ग में जगह-जगह आग जलाकर लोग, बैठे बैठे इधर-उधर की बातें, हँसी-मजाक कर रहे थे।

प्रधान के आंगन से गुड़ बनाने की खुशबु आ रही थी। राह जाते हर राहगीर को प्रधान बूढ़ा बुलाकर हाथ में गुड़ का एक ढ़ेला दे देता था। केंवट बस्ती में गुडवाली लपसी बनायी जा रही थी। इधर बसंत ऋतु आने का रास्ता ढूंढ रही थी।

सवेरे-सवेरे कोहरा अपनी सफेद चादर से ढ़क देता था। पता नहीं चलता था कि पहाड़ है या जंगल। पास में से गुजरता हुआ आदमी, लग रहा था ऐसे जैसे कि स्वर्ग से उतर कर आ रहा हो। धुप तो ऐसे लग रही थी जैसे किसी ने पीले रंग के पानी का छिड़काव कर दिया हो। पेड़, पौधें, पहाड़, पर्वत अपनी-अपनी चद्दर फेंककर मुंह दिखाने लगे थे। किसी ने नूरी शा के दुकान की दीवार पर, क्लब को खंभे पर, सरपंच के ट्रेक्टर पर पोस्टर चिपका दिये थे। डर-सा लग रहा था, जैसे कि ‘कल्कि’ अवतार दौड़े आ रहे हो। इतनी लम्बी तलवार, अपना घोड़ा भगाते हुये, साथ में आँधी-तूफान, चक्रवात सब लेकर। ‘मलिका’ में लिखा गया है ऐसे दुर्दिन, बुरे दिनों की बातें। नक्सल, नक्सल। घेर लेंगे चारों तरफ से। पीछे-पीछे आयेगी पुलिस की फौज। उदंती नदी के किनारे में यह छोटा अगम्य गांव के पास के जंगल में से यह क्या सुनाई पड़ रहा है ? बंदूको के गोलियों की आवाज। ध्यान से सुनने से सुनाई देती है। जंगल की नीरव आवाज। उस नीरवता में छुपा हुआ था एक आतंक। सब आकाश की तरफ देख रहे थे। कहीं कोई लाल सा एक बादल तो नहीं छाने लगा था ?

ऐसा ही कुछ लिखा हुआ था नूरी शा के दुकान में चिपकाये हुये पोस्टर पर। गाँव के चौकीदार भागा-भागा गया था थाने में। पुलिस बाबू की एक मोटर-साईकिल तत्काल दिखायी पड़ी थी गांव में। खिड़की-दरवाजा बंद करके आधे लोग, सांझ ढ़लने से पहले ही घरों में छुप जाते थे। फिर भी रात होती थी और दिन आता था। खेतों में कुछ भी काम नहीं थे। आंखों से नींद उड़ जा रही थी। पहले जैसे ताश के पत्ते नहीं जमते थे। सट्टे का खेल भी नहीं होता था।

गाँव की लड़कियों के कंठ से गीत नहीं निकलते थे। दोपहर के बाद रात। रात के बाद सुबह। इसके बाद दिन। इसके बाद अगला दिन। कल्कि का अवतार तो हुआ नहीं। पुलिस बाबू का भी और दर्शन नहीं हुआ।

धूल-धूसरित होकर बच्चे भी भागे-भागे फिर रहे थे। ‘नक्सल’ ‘नक्सल’ पता नहीं था, वह हाथी है या घोड़ा ? नया-आविर्भाव, नया-खेल। लेकिन, बूढ़े-बुजुर्ग समझ पा रहे थे। वे लोग कुछ अंदाज भी कर ले रहे थे। नक्सल उनके लिये नया नाम नहीं था। लेकिन उनके गांव में नक्सल का यह पहला आक्रमण था।

कलंदर किसान के दारु की दुकान में गांव के लोग पांव रखना भी भूल गये थे। सामने थी ‘पुषपुनी’ त्यौहार। इसलिये, दो जरीकेन में दारु भरकर ले आया था कलंदर। लेकिन, यह क्या ? आधी रात को कोई आकर ऐसा कागज चिपका कर चला गया, कि सब लोग डर के मारे अपने-अपने घर के अंदर दुबक कर बैठे रह गये।

किसका वि·ाास करेगा और किसका नहीं करेगा, कलंदर ? कोई कह रहा था नक्सल गरीबों का पक्ष लेते हैं। भात खाने को देते हैं, सुख देते हैं, जमीन देते हैं, जंगल देते हैं। तो फिर यह फोरेस्ट-गार्ड अपनी लाल-लाल सुर्ख आँखों से ‘नक्सल-पुराण’ सुनाकर क्यों चला गया ?

“पूछो, साले, इन नक्सलियों को, उनका मालिक कौन है ? धनी महाजन से लूटा हुआ माल कहाँ जाता है ? अगर वे लोग भगवान है तो तुम लोग भूख से क्यों तड़प रहे हो ? पूछो, तो, पूछो, उन लड़कियों को, नक्सल में शामिल होकर कितनी सती बनी हुयी हैं ? क्या जंगल के अंदर उनको चूस-चूसकर नहीं खा रहे है सारे मर्द ?”

कलंदर जैसे कि भंवरधारा में घूमता ही जा रहा था। ये दुनिया ऐसी ही है। जितना दिन तक पेट, मुंह, और शरीर रहेगा, पाप भी रहेगा।

पुषपुनी का त्यौहार नजदीक था। कलंदर ने खुली रखी थी अपनी दारु की दुकान। बिना दारु के पुषपुनी, त्यौहार जैसा लगता भी कैसे ? वह इसी इंतजार में था। सर्दी कम होती जा रही थी। पैसे वालों ने पुषपुनी के लिये तरह-तरह के स्वादिष्ट व्यंजन बना लिये थे। बच्चें गुलाबी धूप में झूनझूना बांधकर ‘छेर-छेरा’ माँगने निकल पडे थे।

सारे भूखे पेट, भूख भूल गये थे। किसिंडा में चल रहा था ओपेरा। रातभर ओपेरा देखकर लौटने वाले लोग, अपनी स्वप्निल आँखों से फिल्मी धुन पर नाचने वाली, युवती के बारे में सोच रहे थे। ठीक, इसी समय में ही, कोई खबर लेकर आया था। चौकीदार अस्त-व्यस्त होकर दौड़ा चला था किसिंडा। छेर-छेरा मांगने वाले बच्चें गाना भूल गये थे। स्वादिष्ट व्यंजन और मिठाईयों की खुशबू उड़ गयी थी गांव के रास्तो में से। नाचने वाली युवतियां भी हट गयी थी स्वप्निल आँखों से। मतलब, जाहिर था कि कहीं नक्सल गाँव में घुस गये ?

उसी समय कोई भाग-भाग कर हाँफते-हाँफते खबर दी कि जंगल में एक लाश पड़ी है। हाँफते-हाँफते उसके मुंह से कोई आवाज नहीं निकल पा रही थी। जैसे कि वह अभी-अभी कल्कि अवतार को देख कर आ रहा हो। पुलिस की जीप जंगल की तरफ धूल उडाते हुये जा रही थी। पुलिस की गाडी देखकर, गांव के लोग फटाफट घर के अंदर घुस कर दरवाजा बंद कर दिये थे।

सरसी का मन, पता नहीं क्यों, बड़ा बैचेन हो रहा था। उसका बेटा सन्यासी तो जंगल में घूमता रहता है। वहां बांसुरी बजाता रहता है। पत्थरों पर चित्र बनाता रहता है। अंतरा बोल रहा था कल्कि को आने दो। जितने पापी, अन्यायी है, वे सब मरेंगे। और बचे रहेंगे केवल गिने-चुने अच्छे लोग। सतयुग आयेगा।

दो घंटे के बाद, जंगल से जीप लौटी। दो घंटे तक बंदूक धारी पुलिस जंगल छप्पा-छप्पा छानकर खोजबीन कर रही थी। अंत में जीप लौट आयी थी गांव को। गांव के चौपाल में धूल उड़ाते हुये, ब्रोक लगाकर रोक दी जीप को। तुरंत कई पुलिस वाले जीप से नीचे उतरे। दो सिपाहीयों ने जीप में लदी हुई लाश को निकालकर ऐसे फैंका, जैसे शिकार कर लाये हुये किसी एक जंगली सुअर को या साँभर हिरण को। ड्राइवर हाँर्न पर हाँर्न बजा रहा था। धीरे-धीरे गाँव वालों ने एक-एक करके अपने बंद दरवाजे खोलना शुरु किये। डर-डरकर धीरे-धीरे कदम बढाते हुये अपने-अपने बरामदे से नीचे उतर कर आये थे वे लोग। वे पुलिस वालों से दूर-दूर रह रहे थे, उन्होने देखा कि एक लाश औंधे मुंह पडी हुयी थी। लाश का मुँह खुला था। शरीर धूल से भरा हुआ था। लाल बनियान, खून के धब्बों से सन गया था।

पुलिस वाला चिल्ला चिल्लाकर, कह रहा था “इसको पहचानो। ये तुम्हारे गांव का लडका है या नहीं ? किसका बेटा है ?”

देखने वालों का शरीर काँप रहा था। मगर कोई सामने आकर उत्तर नहीं दे पा रहे थे। किसी ने भागकर अंतरा को इस बात की खबर दी।

“जल्दी जल्दी चलो अंतरा, अपने बेटे को देखने के लिये।”

“कौन ? मेरा बेटा डाँक्टर लौटकर आ गया क्या ? कहाँ है वह ?”

“तुम पहले चलो तो, जंगल से लाये है तुम्हारे बेटा को।”

आंगन में बरतन साफ कर रही थी सरसी। “क्या बोल रहा है ?” कहकर बाहर की तरफ चली आयी। “जंगल से मेरे बेटे को लाये है क्या ? कहाँ है मेरा सन्यासी ?” कहकर सरसी उस आदमी के पीछे-पीछे भाग रही थी। अंतरा उनसे काफी पीछे था। लाठी पकड़कर धीरे-धीरे चल रहा था। और सरसी पागल की तरह दौड़े जा रही थी आगे-आगे।

“मेरा सन्यासी, मेरा सन्यासी ” पुकारे जा रही थी सरसी। “इतने दिनों तक तुम जंगल में छुप कर बैठे थे मेरे बेटे।”

गाँव की चौपाल में एक पुलिस गाडी खडी थी- सरसी ने देखा। लोगों ने गाड़ी को घेर रखा था। सरसी को देखते ही भीड़ ने दो भाग होकर रास्ता दे दिया। उसने देखा धूल से सनी हुई एक लाश को। देखते ही वह जड़वत हो गयी।

मां की ओर नहीं, देख रहा था आकाश की ओर, खुला हुआ मुंह और फटी फटी सी आँखे लेकर सरसी का वकील। सीने में जमे हुये खून के धब्बे काले पड़ गये थे। पूरा शरीर धूल से सना था। उसका बेटा, बड़ा ही जिद्दी। उदण्ड स्वभाव का था उसका वकील। किसने इसकी नृशंस हत्या की ? उसके पास ऐसा क्या था ? जो उसको मार दिया।

उसके शरीर की धूल झाडते-झाड़ते सरसी फफक-फफक कर रो पडी थी “मेरे वकील, मेरे वकील, रे! ” इतने दिनों के बाद सरसी ने अपने चार बच्चों में से एक का मुंह देखी। हल्की-हल्की मूँछे व दाढ़ी निकल आयी थी। कितना बड़ा हो गया था उसका बेटा। “मेरा वकील, मेरा वकील” कहकर उसने उसे अपने छाती से चिपका दिया। अंतरा तो मानों पत्थर बन गया हो। जैसे कि वकील कह रहा हो, “तुमने तो मुझे कभी प्यार नहीं किया मेरे बाप, मेरे लिये और कभी दुख मत करना।” बुदबुदाते हुये अंतरा कहने लगा “कैसे दुख नहीं होगा, मेरे बेटे!” वास्तव में हमेशा-हमेशा के लिये उसका बेटा उसे छोडकर चला गया उससे रुठकर बहुत दूर।

पुलिस अंतरा से पूछने लगा

“ये तुम्हारा लड़का है ?”

“जी।”

“तुम्हारा बेटा नक्सल में शामिल हुआ था ?”

अंतरा चुप रहा।

पुलिस धमकी भरे स्वर में कहने लगी “साला, फोरेस्ट गार्ड को मारने के लिये आया था तेरा बेटा। चलो, तुम गाड़ी में बैठो।”

धूल उड़ाते चली गयी पुलिस की गाड़ी, वकील की लाश को साथ लेते हुये। अंतरा को भी साथ लेकर। गांव की चौपाल में बैठी थी सरसी। एक दम गुमसुम। आँखों में आँसू नहीं। गाँव की चौपाल में सन्नाटा छा गया था। लोग अपने-अपने घर चले गये थे। अंदर से सभी ने दरवाजे बंद कर दिये थे। ड़र का माहौल छा गया था गाँव में। थम सा गया था गाँव।

(समाप्त)

टिप्पणियाँ

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  1. पक्षीवास मैं पूरा पढ़ चुकी हूँ। निश्चित ही यह एक बेहतरीन उपन्यास है। सरोजिनी साहू जी की भाषा में जो सतत प्रवाह है वह उपन्यास को कहीं भी बोझिल या उबाऊ महसूस नहीं होने देता। यह उपन्यास एक बार में अपने को पूरा पढ़वा लेता है।
    बेहद मार्मिक कथा ! समाज में व्याप्त भ्रष्टाचार , शोषण और राजनीति के शिकार भोले भाले ग्रामीणों की व्यथा कथा बड़ी बारीकी से बुनी गई है और पाठक के मन को द्रवित किए बिना नहीं रहती।
    शुभकामनाएँ

    इला प्रसाद

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  2. चन्द्रभान राही,कथाकार,136,शिरडीपुरम,कोलार रोड भोपाल मप्र

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रचनाकार: सरोजिनी साहू का उपन्यास : पक्षी-वास (अंतिम किश्त)
सरोजिनी साहू का उपन्यास : पक्षी-वास (अंतिम किश्त)
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रचनाकार
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