राजु सीपी का आलेख : भैरव प्रसाद गुप्त के उपन्यासों में दाम्पत्य जीवन

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* समाज की सर्वाधिक महत्वपूर्ण इकाई परिवार होती है। पारिवारिक जीवन के विश्लेषण से समाज के स्वरूप की स्पष्ट झाँकी मिल सकती है*१। व्यक्ति ...

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*समाज की सर्वाधिक महत्वपूर्ण इकाई परिवार होती है। पारिवारिक जीवन के विश्लेषण से समाज के स्वरूप की स्पष्ट झाँकी मिल सकती है*१। व्यक्ति और समाज के सांस्कृतिक, सामाजिक, औद्योगिक विकास के लिए परिवार महत्वपूर्ण कार्य करता है। व्यक्ति की अस्तित्व की रक्षा और उसके विकास के समस्त सोपान परिवार से ही प्रारंभ होता है। परिवार से संस्कार संवर्धन, यौन सम्बधों की पूर्ति, संतानोत्पत्ति, जीविका, शिक्षा, प्रेम, वाल्सल्य, सामाजिक एवं व्यावसायिक ज्ञान आदि लाभ होते हैं। भारतीय परिवार प्राचीन काल में संपन्न और समृद्ध थे। वहाँ सुख और शांति मिलती थी। लेकिन परिस्थितियों में आये परिवर्तन के साथ-साथ भारतीय समाज के पारिवारिक जीवन में भी परिवर्तन आया है। औद्योगीकरण, भौतिकवादी प्रवृत्ति, नई शिक्षा पद्धति, संस्कारहीनता, आर्थिक विषमता, राजनीतिक चेतना, आपसी ईर्ष्या आदि के कारण परिवार टूटने लगे हैं।

परिवार में दाम्पत्य जीवन का महत्वपूर्ण स्थान है। दाम्पत्य जीवन की आधार शिला पति-पत्नी है। इसमें दोनों का स्थान रथ के बुलंद पहिए की तरह है। इनके सहयोग और आपसी प्रेम भाव से ही परिवार की उन्नति होती है। दोनों जब अपना सर्वस्व एक दूसरे केलिए समर्पित करते हैं तब दाम्पत्य जीवन एवं परिवार समृद्ध बनते हैं।

भारतीय समाज में पत्नी पति को देवता मानकर पूजती थी और पति उसे सम्मान देता था। इसी का उल्लेख गुप्तजी के उपन्यास अक्षरों के आगे मास्टरजी उपन्यास में किया गया है। *मेरी माताजी रात में बारह-बारह बजे तक भोजन के लिए पिताजी की प्रतीक्षा करती थी, जब पिताजी आ जाते तो उनके हाथ पाँव धुलवाकर, उनके लिए पीढी रखती। पिताजी पीढी पर बैठ जाते तो, माताजी थाली में भोजन परोसकर उनके सामने रखती*२।

परिवार में पति-पत्नी का अपना-अपना एक विशेष स्थान होता है। जहाँ पति परिवार के संचालन के लिए अर्थ की तलाश में करता है तो पत्नी वही तकलीफ संचित अर्थ के आधार पर परिवार की गतिविधियों को सुचारु रूप में निर्वाह करती है। पति-पत्नी का पारिवारिक संचालन में कभी-कभी क्षेत्र परिवर्तन होने से परिवार की गति में स्वभावतः रुकावट उत्पन्न हो जाती है। गृहणी ही जानती है कि परिवार के दैनिक जीवन के कार्यक्रम क्या-क्या होते हैं, उसे किस तरह सफलता से पूर्ण कर सकते हैं। यदि पत्नी का काम जैसे रसोई संभालने का काम पति को करना पडे तो वह परिवार दो-चार दिनों में अस्त-व्यस्त स्थिति पर पहुँच जाएगा। इसी बात को संकेत देते हुए गुप्तजी के नौजवान उपन्यास के भरत की माताजी इन शब्दों में कहते हुए दिखाई देती है *मैं एक पढी-लिखी नहीं हूँ, ना समझ और गंवार हूँ, यही सही है। मैं लक्चर नहीं दे सकती, पर पंचायत नहीं कर सकती, उपदेश नहीं दे सकती, यह भी सही है। लेकिन दो दिन के लिए मैं कहीं चली जाऊँ तब देखिए कि आप यह घर कैसे चलाते हैं*३।

भारतीय समाज में दाम्पत्य जीवन जन्म-जन्मातर का संबन्ध है। यह एक दिन में खत्म होने वाला संबन्ध नहीं है। इस संबन्ध में कभी-कभी पति-पत्नी के बीच छोटी-मोटी बातों को लेकर झगडा होना स्वाभाविक है। इन झगडों के कारण क्या है, इसे जानकर आपस में समझदारी से सुलझाना है। इसका उल्लेख गुप्तजी ने अपने उपन्यास सती मैया का चौरा में मन्ने के माध्यम से किया है। मन्ने अपनी पत्नी महशर से कहता है *और सच पूछो तो मुहब्बत नाम ही समझदारी का है, एक दूसरे के जज़्बों की समझ के बिना मुहब्बत खुद एक तकलीफ देह चीज़ साबित हो सकती है*४। इस प्रकार का एक संदर्भ गुप्तजी के नौजवान उपन्यास में भी देखने को मिलता है। भरत अपने माता-पिता के दाम्पत्य जीवन के संबन्ध में कहता है *इस तरह पिताजी और माताजी का अपना-अपना जीने का अलग-अलग ढंग था। ऊपर से लगता था कि उनके बीच कहीं भी कोई सामंजस्य नहीं था। मुझे लगता था कि इन्हें एक दूसरे की बडी ही गहरी समझ है और उनके बीच जो आपसी संबन्ध बना हुआ है, उसका आधार उनकी यह समझी ही है*५।

अगर दाम्पत्य जीवन में पति-पत्नी के बीच कुछ गलतियाँ हो गयीं तो एक दूसरे से माँफी माँगने में उन्हें तनिक भी शरम न आना चाहिए। गुप्तजी के सती मैया का चौरा उपन्यास के मन्ने और महशर के दाम्पत्य जीवन में झगडा होने के बाद मन्ने अपनी गलती समझकर पत्नी से कहता है *मुझे माफ कर दो महशर! यह मेरी गलती है। मैं माफी के काबिल हूँ। यकीन मानो मुझे बेहद अफसोस है*६।

दाम्पत्य जीवन में पति-पत्नी के बीच के संबन्ध में उनके बच्चों का भी प्रमुख स्थान है। बच्चों के कारण दाम्पत्य जीवन में पति-पत्नी का संबन्ध और भी मज़बूत होता है। पति-पत्नी अपनी आपसी झगडों में होश होकर बच्चों के प्रति उदासीनता का व्यवहार करने लगते हैं। जिसे बच्चों पर बुरा प्रभाव पडता है। सती मैया का चौरा उपन्यास में मन्ने और महशर के झगडे के बीच में रोती उनकी बच्ची शम्मू का गला घोटने तक मन्ने आ जाता है। बाद में उनको इस बात पर पश्चाताप होता है और अपनी बच्ची से कहता है *माफ कर मेरी बच्ची! तेरा बाप पागल हो गया था, अन्धा हो गया था! अब उसे होश आ गया है, उसकी आँखें खुल गयी हैं। अब वह तुझे कभी न भूलेगा, तुझे बहुत प्यार करेगा*७।

किन्तु आधुनिक भारतीय समाज के दाम्पत्य जीवन में भी परिवर्तन आया है। दाम्पत्य जीवन में स्नेह, विश्वास, समर्पण की भावना कम होती जा रही है। पति-पत्नी एक दूसरे से दूर जा रहे हैं। दाम्पत्य जीवन को विघटित करने वाले कई कारणों में से सन्देह का स्थान प्रमुख है। जब पति-पत्नी के बीच सन्देह आरंभ होता है तब पति-पत्नी एक दूसरे से धीरे धीरे अलग होने लगते हैं। पति-पत्नी के बीच आत्मीयता, सहनशीलता, समझौता आदि सभी को सन्देह रूपी चिनगारी जलाकर भस्म कर देती है। उसके बाद दाम्पत्य जीवन को पति-पत्नी जीते नहीं ढोते हैं। गुप्तजी के अन्तिम अध्याय उपन्यास में शकुंतला पितृ-मातृ विहीन लडकी है। उसके मामा और मामी निसन्तान है। जब वे शकुंतला को पाला-पोसा करके बडी बनाती है तब शकुंतला और मामा के प्रति मामी के मन में सन्देह उत्पन्न होती है। शकुंतला कहती है-*मैं वहाँ से हटकर अपने कमरे की ओर जाने लगी तो पीछे से मामीजी की गरज सुनायी पडी, इतने भोले मत बनो। अब इस छोकरी को ही लेकर तुम रहो, मैं कल अपनी मायके चली जाऊँगी*८।

पति-पत्नी के बीच तीसरे के आगमन के कारण दाम्पत्य जीवन में विघटन होना स्वाभाविक है। जैसे पत्नी की बहन, पति के भाई आदि। गुप्तजी ने अपने उपन्यास सती मैया का चौरा में मन्ने और महशर के दाम्पत्य जीवन में महशर की बहन आयशा के आने में विघटन की स्थिति पैदा होती है। महशर अपने पति से कहती है *जिस तरह तुमने मेरा कलेजा भूना है, उसी तरह तुम्हारा भी न भूना तो बन्दी का नाम महशर नहीं। अब यह आग सारी ज़िन्दगी बुझने की नहीं । इसी में जलकर मुझे राख होना है और इसी में जलाकर तुम्हें भी राख बनाना है*९।

एक जीनियस की प्रेम कथा उपन्यास में दाम्पत्य जीवन का विघटित रूप इतना विकराल रूप धारण कर लेती है कि कुसुम अपने साथ किये गये धोखे से इतनी भावुक हो जाती है कि वह अपने पति राजेश को खून कर देती है। वह कहती है *आज क्यों नहीं बोल रहे पति देव? तो क्या आपकी खामोशी को मैं आपका इकरार समझूँ? लेकिन आज खुले आम भी इकरार कर लें तो आप को कौन सज़ा दे सकता है? क्या आफ दोस्त आप को सज़ा दे सकते हैं? क्या कोई वकील आपको सज़ा दे सकता है? क्या कोई कचहरी आप को सज़ा दे सकती है? नहीं। क्योंकि आप उनके नहीं एक लडकी के मुजरिम है। जिसकी ओर लडनेवाला कोई नहीं है। मैं समझ लिया था पति देव, अच्छी तरह समझ लिया था और इसलिए रमन भैया का घर छोडते समय ही मैं ने तय कर लिया था कि और कोई न दे मैं अपने मुजरिम को अपने हाथों से सजा दूँगी*१०।

इस प्रकार वर्तमान समाज में परिवार के दम्पतियों के बीच हो रहे यह विघटन की प्रक्रिया भारतीय पारिवारिक व्यवस्था के लिए बडी खतरनाक है। आज समाज में परिवार का क्षेत्र सीमित हो रहा है। लेकिन भारतीय संस्कृति में परिवार विहीन समाज पनप नहीं सकेगा। भारतीय संस्कृति में आदर्श, संस्कार और ऊँचे मूल्य होने से परिवार संस्था नष्ट नहीं होगी। फिर भी उसको बनाये रखने के लिए कोशिश करनी होगी।

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राजु़सी़पी, शोधार्थी, एम़एस़ विश्वविद्यालय, तिरुनेलवेली।

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संदर्भ

रामदरश मिश्र के कथा-साहित्य में ग्रामीण जीवन पृष्ठ सं ५०

अक्षरों के आगे मास्टरजी पृष्ठ सं २०

नौजवान पृष्ठ सं १७

सती मैया का चौरा पृष्ठ सं ३१४

नौजवान पृष्ठ सं १८

सती मैया का चौरा पृष्ठ सं २८०

सती मैया का चौरा पृष्ठ सं ३१४

अन्तिम अध्याय पृष्ठ सं १८३

सती मैया का चौरा पृष्ठ सं ३१५

एक जीनियस की प्रेम कथा पृष्ठ सं १३२

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मिलन,1,मिलान कुन्देरा,1,मिशेल फूको,8,मिश्रीमल जैन तरंगित,1,मीनू पामर,2,मुकेश वर्मा,1,मुक्तिबोध,1,मुर्दहिया,1,मृदुला गर्ग,1,मेराज फैज़ाबादी,1,मैक्सिम गोर्की,1,मैथिली शरण गुप्त,1,मोतीलाल जोतवाणी,1,मोहन कल्पना,1,मोहन वर्मा,1,यशवंत कोठारी,8,यशोधरा विरोदय,2,यात्रा संस्मरण,31,योग,3,योग दिवस,3,योगासन,2,योगेन्द्र प्रताप मौर्य,1,योगेश अग्रवाल,2,रक्षा बंधन,1,रच,1,रचना समय,72,रजनीश कांत,2,रत्ना राय,1,रमेश उपाध्याय,1,रमेश राज,26,रमेशराज,8,रवि रतलामी,2,रवींद्र नाथ ठाकुर,1,रवीन्द्र अग्निहोत्री,4,रवीन्द्र नाथ त्यागी,1,रवीन्द्र संगीत,1,रवीन्द्र सहाय वर्मा,1,रसोई,1,रांगेय राघव,1,राकेश अचल,3,राकेश दुबे,1,राकेश बिहारी,1,राकेश भ्रमर,5,राकेश मिश्र,2,राजकुमार कुम्भज,1,राजन कुमार,2,राजशेखर चौबे,6,राजीव रंजन उपाध्याय,11,राजेन्द्र कुमार,1,राजेन्द्र विजय,1,राजेश कुमार,1,राजेश गोसाईं,2,राजेश जोशी,1,राधा कृष्ण,1,राधाकृष्ण,1,राधेश्याम द्विवेदी,5,राम कृष्ण खुराना,6,राम शिव मूर्ति यादव,1,रामचंद्र शुक्ल,1,रामचन्द्र शुक्ल,1,रामचरन गुप्त,5,रामवृक्ष सिंह,10,रावण,1,राहुल कुमार,1,राहुल सिंह,1,रिंकी मिश्रा,1,रिचर्ड 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रचनाकार: राजु सीपी का आलेख : भैरव प्रसाद गुप्त के उपन्यासों में दाम्पत्य जीवन
राजु सीपी का आलेख : भैरव प्रसाद गुप्त के उपन्यासों में दाम्पत्य जीवन
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