आर के भारद्वाज की कहानी : केयर टेकर

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  प्रातः कालीन भ्रमण मेरा शौक है, सुबह की हवाखोरी से मुझे दिन भर ताजगी, स्‍फूर्ति मिल जाती है, सुबह के दौरान मैं कई अपने जैसे लोगों को भी ...

bhawna navarang 9 

प्रातः कालीन भ्रमण मेरा शौक है, सुबह की हवाखोरी से मुझे दिन भर ताजगी, स्‍फूर्ति मिल जाती है, सुबह के दौरान मैं कई अपने जैसे लोगों को भी देखता हूं। कोई दौड़ लगा रहा होता, तो कुछ अपने झुण्‍ड के साथ राजनैतिक चर्चा करते हैं, प्रायः महिलायें तो विगत दिन उन्‍होंने क्‍या किया इसकी चर्चा करती मिल जाती हैं। बाबा रामदेव ने जो अपना आंदोलन योग के लिये चलाया है उससे कितनी सामाजिक जाग्रति आई है यह बखूबी सुबह सैर के दौरान देखने को मिल जाता है, अनुलोम विलोम, कपाल भाति, प्रणव जाप करते लोग मिल जायेगें, हैरत तो तब होती है जब बुजुर्ग व्‍यक्‍ति भी योग करते देखने को मिल जाते हैं इस योग से उन्‍हें कितना फायदा होता होगा यह तो वही बता सकते हैं जो इसे करते हैं, बहरहाल लोग अपने स्‍वास्‍थ्‍य के प्रति जागरूक हुए हैं यह आशा जगाने वाली बात है।

जब से तीन नये प्रदेशों का गठन हुआ है तब से बहुत से लोग इधर से उधर हुए हैं कोई अपने मूल प्रदेश में गया तो किसी ने उसी में रहने का अपना विकल्‍प दिया । मैं भी इस शहर में नया नया आया हूँ हालांकि प्रदेश गठन से मेरे तबादले को कोई अर्थ नहीं हैं मै केन्‍द्रीय सरकार का कर्मचारी हूँ, और अपने परिवार को अभी मै यहां नहीं ला पाया हूँ। सरकारी गेस्‍ट हाउस में ठहरा हूँ। इस शहर की आबोहवा ने मुझे मोह लिया है, सोचता हूँ अगर यहीं कोई मकान या प्लाट मिल जाये तो बाकी उमर भी यही काटने का मेरा इरादा है।

तो बात चल रही थी सुबह के दौरान घूमने की, मैंने अपने दो तीन सहकर्मियों से यहाँ सुबह घूमने वाली सड़कों के बारे में जान लिया था । सुबह घूमते हुए मै काफी दूर तक निकल गया, यह कैन्‍ट का इलाका है, जहाँ काफी दूर जाकर कैंट का इलाका खत्‍म हो जाता हू, लेकिन खुली खुली जगह, सामने दूर दिखाई देती पहाड़ियाँ हरा भरा माहौल बरबस अपनी ओर खींच लेता है । पहले ही दिन उस सड़क पर मेरी नजर एक ऐसे मकान पर पड़ गई जो वास्‍तुकला का अद्‌भुत नमूना था बनाने वाले की कला दृष्‍टि निसंदेह आश्‍चर्यजनक थी। एक विशेष बात जिसने फिर मुझे आश्‍चर्य में डाल दिया वह था एक बुजुर्ग व्‍यक्‍ति की झोपड़ी जो उसी मकान के सामने एक आम के पेड़ के नीचे थी। उसी सड़क पर यों तो और भी बहुत सी कोठियाँ थी लेकिन उस इलाके की अगर कोई नायाब और खूबसूरत कोठी थी तो बस वही थी, लेकिन आश्‍चर्य तब और अधिक हुआ, जब उस गेट पर मैंने ताला पाया। अपने ही ख़्यालों में मैं सोचता जाता था कि शायद इस मकान का मालिक कोई बहुत ही पैसे वाला व्‍यक्‍ति होगा जो शायद अपने परिवार के साथ विदेश में रह रहा होगा यहाँ वह कभी कभी आते होंगे। मेरी प्रतिदिन की सैर अब उसी कोठी के आसपास तक होने लगी। अगर यह कोठी मैं खरीद लूं तो कैसा रहेगा लेकिन मकान मालिक का तो कुछ पता नहीं था। शायद इस बूढ़े व्‍यक्‍ति से कुछ पता चल सके धीरे धीरे मैंने उस बूढ़े से दोस्‍ती करनी शुरू कर दी पहले मैंने ही उसे नमस्‍ते कर दी उसने नमस्‍ते ली उसके बाद न वह बोला न मै ही बात को आगे बढ़ा पाया ।

बरसात के दिन थे, उस दिन सुबह से ही काले काले बादलों ने अपना मकान बनाना शुरू कर दिया था, मैं फिर भी अपना छाता लेकर घूमने निकल ही गया । थोड़ी दूर चलने पर हल्‍की हल्‍की बूंदा बांदी शुरू हो गयी थी, कैन्‍ट का इलाका खत्‍म होते ही बारिश जोर से शुरू हो गयी, उस इलाके में ऐसा शेड आदि नहीं था जहाँ रूककर मैं बरसात रूकने का इंतजार करता, बूढ़े ने मुझे नमस्‍ते की और कहा,

'' आप यही बैठ जाइये, जगह तो कम हैं पर बरसात में भीगने से बच जायेगें''

मुझे आज अपना काम होता नजर आया ।

कितना स्‍वार्थी होता है आदमी, अपने हित के लिये कुछ भी करने को तैयार, तुलसीदास ने कहा भी तो हैं '' सुर नर मुनि सब की यह रीति, स्‍वार्थ लगें कर सब प्रीति'' आज रोज ही देखने में आ रहा है अपने स्‍वार्थ के लिये क्‍या क्‍या नहीं कर रहा है आदमी, सरकार को अपने हजार के लिये लाखों का नुकसान पहुंचा रहे है लोग, भाई-भाई कितना लड़ रहे हैं रिलायन्‍स के दो होनहार भाइयों का समझौता कराने के लिये सरकार तक को कूदना पड़ा है इनके बीच, पति पत्‍नी जरा से स्‍वार्थ के लिये अदालतों का दरवाजा खटखटा रहें है कितने ही किस्‍से हैं '' हरि अनंत हरि कथा अनंता'' वाली बात है।

बूढ़े ने मुझे बैठने के लिये अपनी चारपाई दी, कितना समझदार, खुद पायताने की तरफ बैठा मुझे सिरहाने की तरफ बैठाया। संसाधन कम थे, पर फिर भी पूरे घर का सामान व्‍यवस्‍थित था, लगा इस अकेले को भी साफ सफाई का कितना ध्‍यान है। बात को मैंने ही आगे बढाया...............

'' आप यहाँ अकेले रहते है?''

''हाँ''

''आप के बाल बच्‍चे वगैरह''

''....................''

शायद वह अपने बारे में बताने को तैयार नहीं था ।

''आप के लिये चाय वगैरह बना दूं’' बूढ़े ने मुझसे पूछा।

''नहीं अभी मैंने नहाना धोना है, उसके बाद ही कुछ ले पाता हूँ''

''आज तो इस मौसम की सबसे बडी बारिश है'' बूढ़े ने कहा

''हाँ बरसात के दिन है बारिश तो होगी ही, कम या ज्‍यादा यह तो इन्‍द्र भगवान ही बता सकते है''

''उसकी मरजी वो ही जाने''

''आप को तो बडी परेशानी होती होगी इस छोटे से मकान में''

''अब तो आदत सी पड़ गयी है।

''वैसे यह इलाका काफी अच्‍छा है, मुझे पूरे शहर में यह इलाका अच्‍छा लगा''

''हाँ , ये बात तो है''

बूढ़ा अपने बारे में ज्‍यादा बातें नहीं कर रहा था, मुझे थोड़ा आश्‍चर्य हुआ कि यह अकेली जान, क्‍या इसका मन नहीं करता लोगों से बातें करने का, अकेला दिन-रात कैसे कटती होगी इसकी। मैं अभी अपना स्‍वार्थ उसे बताना नहीं चाहता था।

अजीब है मानव मन भी, अन्‍दर चाहे कितना जहर भरा हो, जितना स्‍वार्थ हो, लेकिन सामने वाले पर हम अपने प्रभाव छोड़ने में कोई कसर नहीं उठाना चाहते। कुछ ऐसी ही स्‍थिति मेरी भी है न, मेरी नजरों में बूढ़ा एक साधारण आदमी है जिससे बातचीत का मेरा मकसद सिर्फ अपने स्‍वार्थ की प्रतिपूर्ति तक ही सीमित था। बरसात अब कम हो चली थी, मैंने बूढ़े से बिदा ली.....फिर मिलने का वायदा किया और वापस लौट आया ।

अब मेरी दिनचर्या दस पन्‍द्रह मिनट बूढ़े के पास रूकने की हो चली थी, अक्‍सर हम इधर उधर की बातें करते, लेकिन अभी तक न तो मैं अपनी बात उस तक कह सका था न ही उसके बारे में और अधिक जान सका था। लेकिन इतने दिनों में एक बात स्‍पष्‍ट थी कि बूढ़ा न सिर्फ पढ़ा लिखा था बल्‍कि उसके बाल केवल धूप में ही सफेद नहीं हुए थे बल्‍कि उसे जिन्‍दगी का तर्जुबा भी था, मै इतना तो जोर देकर कह सकता हूँ कि किसी बात ने उसे हिलाकर रखा हुआ था। मैं सिर्फ अब उसके बारे में जानने का इच्‍छुक था अब मेरी मकान या प्‍लाट खरीदने की इच्‍छा गौण हो चुकी थी, मुझे बात ही बात में पता चला कि बूढ़ा एक बाल बच्‍चेदार आदमी है लेकिन फिर वह यहाँ इस झोपड़ी में क्‍यों रहा रहा है ये प्रश्‍न आज भी अनुत्‍तरित था। समय गुजरता गया, मेरी और बूढ़े की अब अच्‍छी खासी जान पहचान हो चुकी थी और उसे में अपने बारे में सब कुछ बता चुका था, मेरी कोई बात अब उससे छिपी नहीं थी, लेकिन मैं अभी उसके बारे में शून्‍य था ।

एक दिन मैंने उससे कहा कि '' आप अपने बारे में कुछ बतायें''

वह टाल गया ।

बोला'' फिर कभी और अब मेरे बारे में जानकर करें भी क्‍या ? बुझते दीपक डूबते जहाज पर सिर्फ अफसोस ही तो कर सकते हैं और अफसोस करते करते मैं इतना थक चुका हूँ कि अब अफसोस शब्‍द सुनना भी नहीं चाहता।''

मैं हैरत में था कि इन बुजुर्गवार के साथ ऐसी कौन सी घटना घट गई कि जो अब यह अपने बारे में बात करते हुये हिचकता है। ज्‍यों ज्‍यों समय गुजरता गया त्‍यों त्‍यों मेरी दिलचस्‍पी उसमें बढ़ने लगी। एक दिन मैंने उसे बड़े अपनेपन से पूछ ही लिया कि मैं आपके बारे में जानना चाहता हूँ, उसने उस दिन भी टाल दिया कहा, फिर कभी.......अब तो जिन्‍दगी का कुछ ही समय बचा है, हो सकता है कि मेरी बात आप समझ जायें, फैसला जो भी हो?

कुछ दिनों के बाद फिर एक दिन वह अवसर आया, जब मैं फिर बूढ़े से मिलने गया, इधर उधर की बातों के बाद मैंने फिर उसके जख्‍म कुरेदने शुरू किये, कितना आनन्द आता है न किसी के जख्‍म कुरेदने में और उस पर हमारी हेठी यह कि हम कितने इंसाफ पसन्‍द हैं, दूसरों के लिये हमारे दिल में कितना दर्द हैं, लेकिन अपने बारे में हम जरूरी नहीं समझते क्‍योंकि जो अपने चेहरे पर हमने नकाब ओढा हुआ है अच्‍छे आदमी का, कही वह बेनकाब न हो जायें । मैं अपनी ही बात करता हूँ कि मैंने ही अपने बारे में उसे कितना बता दिया था।

उसने बताना शुरू किया '' मेरा नाम मुकेश मोहन पाण्‍डे हैं, कभी हमारे पूर्वज गढ़वाल में रहा करते थे वो किस गांव के थे कौन से गढ़वाल के थे मुझे नहीं मालूम यह मेरे जन्‍म से पहले की बात है, जब मेरे दादा परदादा गढ़वाल से पलायन कर इस शहर में आये थे । हम दो भाई और दो बहने थी, हमारे बाप ने अपनी पूरी मेहनत से हमें पढ़ाया लिखाया, बहनों की शादी की। जैसा कि आम होता है शादी के बाद हम भाई अलग अलग हो गये किसी से कोई शिकायत नहीं......भाई की नौकरी तबादले वाली थी इसलिये उसने दिल्‍ली शहर में अपना मकान बना लिया और अपने बच्‍चों के साथ वहीं रहने लगा। पिताजी जिस मकान में रहते थे भाई के अनुरोध पर हमने वह मकान और जमीन बेच दी मैंने उस पैसे से जो मुझे विरासत के मिले थे जमीन खरीद ली, मेरे दो बच्‍चे थे एक लड़का और एक लड़की, लड़का बड़ा था, धीरे धीरे वह बड़ी क्‍लास में पहुंच गया पढ़ने में कुशाग्र था उसकी इच्‍छा एक डाक्‍टर बनने की थी, लेकिन मेरे पास इतने पैसे नहीं थे कि उसे डाक्‍टरी करा पाता, उधर उसकी माँ ने कहा बच्‍चे कि जिन्‍दगी का सवाल है आप किसी भी तरह से इसे डाकटरी पढ़ा दें, मैं असमंजस में था, परेशान था कि कैसे? किस तरह से इसकी डाक्‍टरी की पढ़ाई कराऊं? रात दिन परेशान रहने लगा, उधर लड़के की जिद थी कि मैंने डाकटरी ही पढ़नी है, अजब से भंवर में फंसा था मैं। । फिर मैंने एक दिन सोचा कि आखिर मेरा सब कुछ इनका तो ही है क्‍यों न जमीन बेच दूं लेकिन उसके पैसे उस समय बहुत ही कम मिल रहे थे यानि खाल के चक्कर में ढोल से भी जाने वाली बात थी । लिहाजा मुझे अपना इरादा बदलना पड़ा, फिर अपने सहकर्मियों के सुझाव पर मैंने अपने जी0पी0एफ0 से पैसे निकलवाने की सोची, कुछ मेरे पास विरासत के पैसे थे कुल मिलाकर उसकी पढ़ाई का खर्चा तो निकल सकता था, लेकिन हास्‍टल अन्‍य खर्चों में आगे परेशानी आने वाली थी। पत्‍नी न एक ही जिद पकड़ी थी, कि चाहे जैसे हो उसे डाक्‍टर बनाना ही है। मैंने अपनी जमा पूंजी से उसकी फीस आदि भर दी, इस हिदायत के साथ कि चाहे भूखा रहना पड़े, लेकिन और खर्चों के लिये मुझसे कुछ नहीं मांगोगे, किसी तरह खींच तान कर मैंने उसे डाक्‍टरी पढ़ा दी वह गोल्‍ड मेडल लेकर पास हुआ और दिल्‍ली के अस्‍पताल में नौकरी कर ली, इस बात का ताना वह अक्‍सर मुझे दिया करता कि फीस अलावा आपने कुछ नहीं दिया । जिस समय वह डाकटरी पढ़ रहा था मैंने काफी पहले अपने भवन निर्माण अग्रिम के लिये जा ऋण आवेदन किया हुआ था उसकी मंजूरी आ गई करीब 6 लाख के रू0 के करीब मुझे मिलने थे बाकी मैंने बैंक से ऋण ले लिया और अपनी पसन्‍द का एक मकान बनवा दिया । मेरा सारा वेतन कटौतियों में चला जाता था, बडी मुश्‍किल से घर का खर्च चल रहा था, पैसे की तंगी के चक्कर में अब मेरे और पत्‍नी की बीच अक्‍सर किच किच होने लगी थी, अपनी जगह वह भी सही थी और मै भी । इस बात का पता जब लड़के को लगा तो उसने मां का पक्ष लिया और कहा''.....आपको मैं पैसे भेज दिया करूंगा आप खर्चे से परेशान न हों'', पत्‍नी भी अक्‍सर मुझे ताना देने लगी......''अगर मेरा लड़का पैसे नहीं भेजता तो आपने तो कटोरा पकड़ा देना था। मैं अक्‍सर चुप रहने लगा, मेरे सिर पर कर्जे का एक भारी बोझ था, लड़का कहता जब पैसे नहीं थे तो इतना बडा मकान बनवाने की क्‍या जरूरत थी? सभी लोगों को आपने परेशान कर रखा है। अब पत्‍नी अक्‍सर उसके पास दिल्‍ली जाकर रहने लगी दोनों माँ बेटों में अक्‍सर मेरे ही बारे में बातें होती, एक तरह से अब मुझे अलग कर दिया गया था। फिर एक दिन मेरे पास एक संदेशा आया कि '' विकास ने अपनी पसंद की लड़की से कोर्ट मैरिज कर ली, अर्न्‍तजातीय विवाह था। मुझे क्‍या आपत्‍ति होनी थी, मैंने भी हालात देखकर समझौता कर लिया। बहू ने हमारे परिवार के बारे में सब कुछ जान लिया था, उसकी नजरों में मैं एक खलनायक था, जब भी वह घर आती अक्‍सर मेरी ओर उसकी उपेक्षा की दृष्‍टि होती, मैं समझ नहीं पा रहा था कि मेरे से गल्‍ती कहाँ हुई, पत्‍नी अपने बेटे बहू के साथ खुश थी, पैसों का रोना अब वह मुझसे नहीं करती थी। समय गुजरता गया मैं अपने ही घर में एक अजनबी हो गया, एक दिन फिर वह लावा फूटा, जिसको बहुत पहले फूट जाना चाहिये था। आखिर कोई कब तक सब्र करता, मै अपने अकेलेपन से परेशान था और बाकी लोग मुझसे। उस दिन कुछ ऐसा हुआ कि बहु के कुछ करीबी रिश्तेदार घर पर आ गये मैं अपने कमरे में था, न मुझे किसी ने बुलवाया न मै ही गया, मैंने अपने हाथों से अपने घर में तरह तरह के फूल पौधे लगा रखे थे अब वह ही मेरे जीने का सहारा थे, उन्‍हें मैं बड़े जतन से पालता था, बहू के रिस्‍तेदारों के बच्‍चों ने वहीं पर अपना क्रिकेट खेलना शुरू कर दिया, काफी उधम चौकडी मचा रखी थी बच्‍चों के अभिभावक उन्‍हें रोक नही रहे थे पूरे घर में उन्‍होंने गन्‍दगी का साम्राज्‍य फैला दिया, मैंने बात बढ़ने के डर से कुछ नहीं कहा, फिर अपनी क्रिकेट की गेंद से उन्‍होंने सामने के सारे शीशे तोड़ दिये, मैंने एक दो बार उन्‍हें रोकने की कोशिश की, लेकिन बहु ने मुझे कुछ ऐसी नजरों से देखा कि मानों मैंने कोई बहुत बड़ा गुनाह किया हो, फिर खेलते खेलते उन्‍होंने फूल पौधे तोड़ने शुरू कर दिये, अब मुझसे रहा नहीं गया मैंने बच्‍चों को जोर से डांट दिया और उनका खेल रूकवा दिया । बच्‍चे अपने अभिभावकों के पास जाकर बैठ गये एक तल्‍खी सी वातावरण में छा गई, कुछ देर बाद वह चले गये।

अब बाकि के सब लोग मेरे पीछे पड़ गये, पत्‍नी और लड़का तो ज्‍यादा नहीं बोले लेकिन बहु ने मेरी वो कलास ली कि मुझे भी गुस्‍सा आ गया, काफी लानत मलामत हुई, हैरत मुझे इस बात की थी कि मेरी पत्‍नी और बेटा भी सारा दोष मेरा ही निकाल रहे थे, काफी रात देर तक वाक युद्ध होता रहा। आखिर मैंने फैसला किया '' लो सम्‍भालो अपना घर'' और मै घर से बाहर आ गया, मुझे किसी ने रोकने की कोशिश नहीं की । मैं घर छोड़कर बाहर आ गया, सारी रात मैं सड़कों पर घूमता रहा, लेकिन मुझे बुलाने कोई नहीं आया। मैं अपने घर से काफी दूर निकल गया था, सुबह करीब आठ बजे जब मैं वापस घर पहुंचा यह सोचकर कि चलो अब मामला ठण्‍डा हो गया होगा, तो गेट पर ताला लगा था, सब लोग चले गये थे, मैंने इधर उधर नजर डाली शायद मेरे लिये कोई संदेश हो, लेकिन मुझे कुछ नहीं मिला.....उसके बाद दिन गुजरे......महीने गुजरे.......साल गुजरे.......वो लोग अक्‍सर आते हैं लेकिन न मुझे किसी ने बुलाया, न मेरी कोई खबर ही ली.....इतना कहकर बूढ़ा चुप हो गया।

मैंने पूछा'' इस सारे मामले में आपकी बेटी ने कुछ नहीं कहा''

बूढ़ा बोला '' वो बेचारी क्‍या कहती, वह तो जन्‍म से ही गूंगी और बहरी थी''

''और फिर उस मकान का क्‍या हुआ? वह अब किसके पास है?

बूढ़ा बोला '' वह जो सामने मकान देख रहे हैं? जिस पर ताला लगा है वह ही है वह मकान....और मैं उसका केयर टेकर...

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RK Bhardwaj

151/1 Teachers’ Colony, Govind Garg,

Dehradun (Uttarakhand)

E mail:  rkantbhardwaj@gmail.com

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(चित्र – भावना नवरंग की कलाकृति)

नाम

 आलेख ,1, कविता ,1, कहानी ,1, व्यंग्य ,1,14 सितम्बर,7,14 september,6,15 अगस्त,4,2 अक्टूबर अक्तूबर,1,अंजनी श्रीवास्तव,1,अंजली काजल,1,अंजली देशपांडे,1,अंबिकादत्त व्यास,1,अखिलेश कुमार भारती,1,अखिलेश सोनी,1,अग्रसेन,1,अजय अरूण,1,अजय वर्मा,1,अजित वडनेरकर,1,अजीत प्रियदर्शी,1,अजीत भारती,1,अनंत वडघणे,1,अनन्त आलोक,1,अनमोल विचार,1,अनामिका,3,अनामी शरण बबल,1,अनिमेष कुमार गुप्ता,1,अनिल कुमार पारा,1,अनिल जनविजय,1,अनुज कुमार आचार्य,5,अनुज कुमार आचार्य बैजनाथ,1,अनुज खरे,1,अनुपम मिश्र,1,अनूप शुक्ल,14,अपर्णा शर्मा,6,अभिमन्यु,1,अभिषेक ओझा,1,अभिषेक कुमार अम्बर,1,अभिषेक मिश्र,1,अमरपाल सिंह आयुष्कर,2,अमरलाल हिंगोराणी,1,अमित शर्मा,3,अमित शुक्ल,1,अमिय बिन्दु,1,अमृता प्रीतम,1,अरविन्द कुमार खेड़े,5,अरूण देव,1,अरूण माहेश्वरी,1,अर्चना चतुर्वेदी,1,अर्चना वर्मा,2,अर्जुन सिंह नेगी,1,अविनाश त्रिपाठी,1,अशोक गौतम,3,अशोक जैन पोरवाल,14,अशोक शुक्ल,1,अश्विनी कुमार आलोक,1,आई बी अरोड़ा,1,आकांक्षा यादव,1,आचार्य बलवन्त,1,आचार्य शिवपूजन सहाय,1,आजादी,3,आत्मकथा,1,आदित्य प्रचंडिया,1,आनंद टहलरामाणी,1,आनन्द किरण,3,आर. के. 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तौंसवी,1,फ्लेनरी ऑक्नर,1,बंग महिला,1,बंसी खूबचंदाणी,1,बकर पुराण,1,बजरंग बिहारी तिवारी,1,बरसाने लाल चतुर्वेदी,1,बलबीर दत्त,1,बलराज सिंह सिद्धू,1,बलूची,1,बसंत त्रिपाठी,2,बातचीत,2,बाल उपन्यास,6,बाल कथा,356,बाल कलम,26,बाल दिवस,4,बालकथा,80,बालकृष्ण भट्ट,1,बालगीत,20,बृज मोहन,2,बृजेन्द्र श्रीवास्तव उत्कर्ष,1,बेढब बनारसी,1,बैचलर्स किचन,1,बॉब डिलेन,1,भरत त्रिवेदी,1,भागवत रावत,1,भारत कालरा,1,भारत भूषण अग्रवाल,1,भारत यायावर,2,भावना राय,1,भावना शुक्ल,5,भीष्म साहनी,1,भूतनाथ,1,भूपेन्द्र कुमार दवे,1,मंजरी शुक्ला,2,मंजीत ठाकुर,1,मंजूर एहतेशाम,1,मंतव्य,1,मथुरा प्रसाद नवीन,1,मदन सोनी,1,मधु त्रिवेदी,2,मधु संधु,1,मधुर नज्मी,1,मधुरा प्रसाद नवीन,1,मधुरिमा प्रसाद,1,मधुरेश,1,मनीष कुमार सिंह,4,मनोज कुमार,6,मनोज कुमार झा,5,मनोज कुमार पांडेय,1,मनोज कुमार श्रीवास्तव,2,मनोज दास,1,ममता सिंह,2,मयंक चतुर्वेदी,1,महापर्व छठ,1,महाभारत,2,महावीर प्रसाद द्विवेदी,1,महाशिवरात्रि,1,महेंद्र भटनागर,3,महेन्द्र देवांगन माटी,1,महेश कटारे,1,महेश कुमार गोंड हीवेट,2,महेश सिंह,2,महेश हीवेट,1,मानसून,1,मार्कण्डेय,1,मिलन चौरसिया 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रचनाकार: आर के भारद्वाज की कहानी : केयर टेकर
आर के भारद्वाज की कहानी : केयर टेकर
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