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सुनील संवेदी की कविता - कुत्ता

कुत्‍ता

मनुष्‍य-

मानवता, आदर्श, दया, कर्तव्‍य

प्रेम, स्‍नेह और करूणा के तालाबों से लाई गई

मिट्टी को मिलाकर

ठीक प्रकार गूंथ कर

बनाया गया बुत, मनुष्‍य।


परंतु-

बिडंबना देखिए,

तालाब रहे, उक्‍त संस्‍कार रहे

और मनुष्‍य, कहां रहा!

मैंने देखा है जो-

शायद देखा हो तुमने भी!

क्रोध, हिंसा, दुष्‍कृत्‍य पाप

रूपी चार टांगें।


अमानवीयता का लम्‍बा मुंह।

खून खराबे की लम्‍बी पूंछ।

कर्तव्‍यों की चपटी नाक।


और भी बहुत कुछ

मैंने देखा है जो

शायद देखा हो तुमने भी!

मनुष्‍य के भीतर ... कुत्‍तत्‍व।


और...

वफादारी एवं कर्तव्‍यों के

कीर्तिमान-दर-कीर्तिमान

स्‍थापित करते - करते

इतिहास रचने लगा कुत्‍ता।


पूंछ गायब देखी

गोल मुंह देखा

छोटे कान देखे

चार टांगों में से

दो का प्रयोग

हाथों की तरह करते देखा।


मैंने देखा है जो

शायद देखा हो तुमने भी!

कुत्‍ते के भीतर ..... मनुष्‍यत्‍व

बताना अपने विचार, अपनी राय

क्‍या आ गया समय

नाम व काम बदल देने का!


सुनील संवेदी

उपसंपादक, हिंदी दैनिक ‘जनमोर्चा' बरेली, यूपी

email-

bhaisamvedi@gmail.com

suneelsamvedi@redifmail.com

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