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गंगाधर ढोके की कविताएँ

नेम प्‍लेट

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पेड़ सिर्फ

पेड़ नहीं होते

वे होते है घर की

नेम प्‍लेट

उन दिनों

गांव में नहीं हुआ करते थे

बिजली दफ्‍तर, डाकघर

तब नीम से ही पहुंचा

जा सकता था

ठीक-ठीक

पते पर

बच्‍चे

खेल-खेल में

बता देते पता

नीम वाले घर में

रहते हैं-

गंगाधर ।

 

मेरा सोचना

मेरा चलना

पैरों की चहल कदमी है

जैसे बोलना शब्‍दों को

हवा में उछालना

दूसरे सोचते हैं

सोचता हूँ मैं भी

इसलिए

चलना

बोलना

और

सोचना प्रतिक्रिया नहीं है

क्रिया है

मेरा चीखना भी

 

तुम्‍हारे जाने के बाद

लग जाने के बाद

बचा रहता है

कजरौटे में

अंजन

सूखने के बाद

रेत में बची रहती है

थोड़ी-थोड़ी

नदी

घोंसले में

शेष रह ही जाते हैं

पक्षियों के

पंख

तुम्‍हारे जाने के बाद

बची है मुझमें

स्‍मृति की दूब

जैसे बंजारे

खुली जमीन में

छोड़ जाते हैं

बसाहट के

चिह्‌न ।

 

वे

उनके मुँह

उनके होने के

साथ-साथ

होते हैं

किसी बड़े मुँह के

जबड़े

उनके हाथ

उनके होने के

साथ'-साथ

होते हैं खूंखार

पंजे

उनकी कलम !

कलम कहाँ होती है ?

चाबुक होती है

गरीब की पीठ पर

वे सिर्फ

‘वे' नहीं होते

दरवाजे होते हैं

ऊपर तक जाने के

 

घर-बेघर

जिस जमीन पर

मैं बनाता हूँ घर

चिड़िया बनाती है

घोंसला शीशम; पर

चिड़ियाँ

भर देती है

चह-चह से

शीशम का

एकान्‍त

घर की चौखट से

यदा-कदा सुनायी देती है

दरवाजे की च्‌रर-मर्‌र

घर के बाहर

शीशम का पेड़

नहीं है अपनी

जगह पर ।

(शीशम; एक वृक्ष जिसकी चौखट बनायी जाती है)

दुःख-सुख

पांव-पांव

आया दुख

और फैल गया

पूरे घर पर

लौट आया बेटा

जैसे गाने के मुखड़े पर

लौट आता है

अन्‍तरे के बाद

पार्श्‍व गायक

हालाँकि

दुःख नहीं होते

संगीत की तरह

बेटी शामिल हुई

लय बनकर

दुःख

जोड़ते हैं

देह से देह को

रिश्‍तों की मिठास से

एक दिन भर देते हैं

मन की खटास को

 

पहाड़

बीचों-बीच

सड़क के बैठे

भैंसे की तरह

होते नहीं वे

टस-से-मस

थककर लौट जाते हैं

न जाने कितने तो

मेघ

वे खुश होते हैं तो

हँसी की तरह

खिलखिला उठते हैं

झरनें

सुख जाती है नदी

उनके होने से

दुखी

बाहर से पिता की तरह

जितने कड़क होते हैं

पहाड़

अन्‍दर से होते हैं

उतने ही

नरम ।

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परिचय

नाम - डा0 गंगाधर ढोके

जन्‍म- 28 जून-1967 ग्राम गायखुरी

जिला छिन्‍दवाड़ा मध्‍यप्रदेश

शिक्षा- एम0ए0, पीएच.डी हिन्‍दी साहित्‍य

प्रकाशन- नया ज्ञानादेय एवं कथादेश में

ई मेल& ganga744@rediffmail.com

1 टिप्पणियाँ

  1. भाव संपन्नर चनाएं पढ़वाने हेतु आभार।
    सद्भावी -डॉ० डंडा लखनवी

    जवाब देंहटाएं

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