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यशवन्त कोठारी का व्यंग्य – सेमिनारों का शिकंजा

yashwant kothari new

र्षों से हिन्दी व्यंग्य के जंगल में अरण्यरोदन कर रहा हूं, किसी ने घास तक नहीं डाली, कुछ पुस्तकें व रचनाएं अंग्रजी में क्या छपीं, सेमिनारों में बुलाया जाने लगा हूं। सेमिनारों के आकार-प्रकार, क्रिया-कलाप इतने विविध और आश्चर्य में डालने वाले होते है कीं इन पर अलग से एक सेमिनार आयोजित की जा सकती है। सेमिनार आयोजन-विशेषज्ञों के अनुसार सेमिनार प्रांतीय, राष्ट्रीय व अन्तर्राष्ट्रीय होते है। कुछ मोहल्ले स्तर के लोग मिलकर एक समिति बना लेते हैं, उसका पंजीकरण करा कर किसी सरकारी खजाने से अनुदान प्राप्त करके सेमिनार का आयोजन कर लेते हैं। सेमिनारों में आना-जाना, खाना-पीना सब निःशुल्क उपलब्ध होता है। विशेषज्ञों की हालत ये है कि हवाई जहाज का किराया देकर आप किसी भी विषय पर किसी भी विचारधारा का पोषण करने वाला भाषण दिलवा सकते हैं।

इन सेमिनारों में नियमित जाने वाले पाठक जानते हैं कि सेमिनारों की कुल उपलब्धियां दो होती हैं-एक रोटी और दूसरा थैला। रोटी यानि लंच, ब्रेकफास्ट, डिनर और थैला यानि किट या बैग। किट या बैग में कुछ एव्स्ट्रेक्ट, कुछ छपी पत्रिकाएं और पेन व डायरी तथा खाने के निःशुल्क कूपन। कई बार किट का बैग इतना सुन्दर होता है कि इसे प्राप्त करने के लिए हाथापाई, जूतम पैजार तथा कालर पकड़ने के राष्ट्रीय कार्यक्रम भी सम्पन्न होते हैं। सेमिनारों में एक पंजीकरण कार्यक्रम होता है, जिसके बाद किट प्राप्त होता है। अधिकतर झगड़े इसी पंजीकरण शुल्क को लेकर होते है, खैर थैला प्राप्त कर लेने के बाद सेमिनार के डेलीगेट रोटी की और ध्यान देते हैं और वे सेमिनार के विषयों के प्रति न्याय करने के बजाय लंच, डिनर, काफी, ब्रेकफास्ट के साथ न्याय करते हैं। अधिकतर सेमिनारों के विषय घिसे-पिटे होते हैं। मगर आयोजन की भव्यता सुन्दर से सुन्दरतम होती है। उद्घाटनकर्ता मंत्री या मुख्य मंत्री या राज्यपाल होते हैं। अक्सर एक ही आयोजनकर्ता कई विषयों पर सेमिनारों का आयोजन कर लेते हैं। मार्च में पर्यावरण, और अगले किसी माह में प्रशासन में भ्रष्टाचार।

ये सफल आयोजनकर्ता महंगे कार्ड छपवाते हैं। पंच सितारा सुविधाएं देते हैं और बजट का एक बड़ा हिस्सा डकार जाते हैं।

एक स्थायी आयोजक को मैं जानता हूं, स्वयं सेवानिवृत्त है, एक संस्था खोले रखी है और साहित्य से लगाकर विज्ञान, स्वास्थ्य, प्रौढ़ शिक्षा, महिला-बच्चों आदि सभी विषयों पर सेमिनारों का आयोजन करते रहते हैं। सफल आयोजक हैं वे।

अन्तर्राष्ट्रीय सेमिनारों में उम्दा अंग्रेजी, सूट-बूट, टाई आवश्यक होती है। विदेश जाने का सबसे आसान रास्ता सेमिनार है। राष्ट्रीय सेमिनारों का स्तर अंतर्राष्ट्रीय सेमिनारों से कम माना जाता है। प्रांतीय सेमिनारों में जाने वाले भी प्रांतीय ही होते हैं।

आखिर सेमिनारों से क्या हासिल होता है। मैंने इस पर चिन्तन किया है और चिन्तन के परिणाम श्रीमान् की सेवा में पेश कर रहा हूं।

मेरी निजी राय में सेमिनारों में सरकारी धन को पानी की तरह बहाया जाता है। उपलब्धि के रूप में एक रिपोर्ट प्रकाशित की जाती है जो पिछली रिपार्ट की नकल होती है। कभी कदा कोई मौलिक बात उभरकर आती है तो वह आयोजकों तथा सरकारी नीतियों के अनुरूप नहीं होती।

सेमिनारों में महिलाओं का योगदान भी महत्त्वपूर्ण है। अक्सर आपने देखा होगा कि सेमिनारों में दीप प्रज्वलन हेतु मुख्य अतिथि को मोमबत्ती महिलाएं ही प्रस्तुत करती हैं। इसी प्रकार भोजन, रजिस्ट्रेशन, स्वागत आदि के कार्यों को भी महिलाएं सम्पन्न करती हैं।

जिस प्रकार स्थायी आयोजक होते हैं, ठीक उसी प्रकार स्थायी प्रतिनिधि वहां पहुंच ही जाते हैं। एक काल्पनिक विषय पर सार संक्षेप तैयार कर आयोजन सचिव को भेजना, उससे दूरभाष पर बात करके अपना निमंत्रण मंगवाना, इधर-उधर से किराये का जुगाड़ करना और सेमिनार में पहुंच कर भोजन, आवास का आनन्द उठाना।

सेमिनार चर्चा में स्मारिका का वर्णन न होना, स्मारिका और सेमिनार दोनों का अपमान है। इन स्मारिकाओं में विज्ञापनों के अलावा कुछ नहीं होता है। मगर विज्ञापनों के कारण ही सेमिनारों की सुन्दरता में चार चांद लगते हैं।

सेमिनारों का मौसम दिवाली से शुरू हो जाता है जो होली तक चलता है। होली के अंतिम सप्ताह तक सेमिनारों की भरमार रहती है। कई बार श्रोताओं और दर्शकों की कमी पड़ जाती है। कुकरमुत्ते की तरह इस दौरान शहर में संस्थाएं छा जाती हैं और चारों तरफ सेमिनारों की बहार छा जाती है।

सेमिनारों का एक और उपयोग है-मेल-जोल। किसी आयोजक के लड़की की शादी है या लड़के का आशीर्वाद समारोह वो एक सेमिनार करके भीड़ इकट्ठी कर लेता है और लगे हाथ लिफाफे भी प्राप्त कर लेता है। सेमिनारों में रात्रि-चर्या, सोमरस-पान आदि का भी ध्यान रखा जाता है।

सेमिनारों में सांस्कृतिक कार्यक्रम भी होते हैं जो कभी-कभी पॉप, कैबरे तथा अश्लीलता तक पहुंच जाते हैं।

सेमिनारों का आयोजन एक राष्ट्रीय कार्यक्रम बन गया है। विज्ञान, टेक्नोलोजी की सेमिनार तक शो-व्यापार बन जाती है। व्यापारियों की सेमिनारों का तो कहना ही क्या। सब कुछ सेमिनार मय। फोकट का चन्दन, घिस मेरे नन्दन। तू मुझे बुला मैं तुझे बुलाउं। तुम मुझे प्रथम श्रेणी का यात्रा व्यय दो मैं तुम्हें हवाई जहाज का किराया दिलाउंगा। एक विस्तार व्याख्यान भी करवा दूंगा । बस मुझे किसी सेशन का अध्यक्ष बनवा दो। यह है सेमिनारों का अर्ध सत्य। और पूर्ण सत्य, बस जाने दीजिए भगवन्। कहीं मेरे आका लोग नाराज हो गये तो मुझे सेमिनारों में बुलाना बन्द कर देंगे। फिर मुझे अपने कस्बे में ही रह कर अध्यापन की तरफ ध्यान देना पड़ेगा । अन्यथा सेमिनारों की व्यस्तता का बहाना करके अध्यापन से बचा रहता हूं। टेलीफोन बज रहा है शायद किसी आयोजक का है, सोचता हूं सेमिनार में चला जाऊं। मुफ्त का खाना-पीना, घुमना-फिरना, विस्तार व्याख्यान । प्रथम श्रेणी का यात्रा व्यय, नयन सुख और क्या चाहिए। आइये, सेमिनार में चलें । सेमिनारों के शिकंजे से कौन बचा है।

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यशवन्त कोठारी 86, लक्ष्मीनगर ब्रह्मपुरी बाहर, जयपुर 302002फोन 2670596

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