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मंजरी शुक्ल की बाल कहानी – फूलों का नगर

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गु रु वशिष्ठ के यहाँ बहुत से राजकुमार शिक्षा प्राप्त करने के लिए दूर-दूर से आते थे और गुरुकुल मे रहा करते थे। गुरूजी सभी शिष्यों को समान र...

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गुरु वशिष्ठ के यहाँ बहुत से राजकुमार शिक्षा प्राप्त करने के लिए दूर-दूर से आते थे और गुरुकुल मे रहा करते थे। गुरूजी सभी शिष्यों को समान रूप से प्रेम करते थे,और उनमें किसी तरह का कोई भेदभाव नहीं करते थे। यूं तो सभी उनकी बहुत सेवा करते थे पर अमृत और शांतनु दिन रात की परवाह किये बगैर आश्रम का कार्य किया करते। जब उनकी शिक्षा पूरी हो गई और आश्रम छोड़ने का समय आया तो गुरूजी ने उन दोनों को बुलाकर कहा-"मैं तुम दोनों से बहुत प्रसन्न हूं,इसलिए तुम्हें दो बातें बता रहा हूँ-"अगर तुम इन पर अमल करोगे,तो तुम्हारे राज्य में सदा सम्पन्नता और खुशहाली रहेगी "दोनों राजकुमार एक साथ बोले-"हम आपकी आज्ञा अवश्य मानेंगे। गुरूजी मुस्कुराकर बोले-"तुम दोनों जहा तक हो युद्ध टालने की कोशिश करना और अहिंसा का मार्ग अपनाना और सदा प्रकृति की रक्षा करना। " दोनों राजकुमारों ने सहर्ष हामी भर दी और अपने अपने राज्य की ओर चल पड़े। शांतनु ने कुछ दिन तक तो गुरूजी की आज्ञा का पालन किया परन्तु राजा बनते ही उसने शिकार पर जाना शुरू कर दिया। हरे भरे वृक्षों को कटवाकर उसने कई नगर बसवाए। धीरे धीरे उसके राज्य में गिने चुने पेड़ ही बाकी रह गए। जिसकी वजह से पर्यावरण असंतुलित हो गया,और बारिश ना के बराबर होने लगी और आए दिन सूखा पड़ने लगा। वहीं दूसरी और अमृत को अपना वचन याद था। उसने राजा बनते ही शिकार पर पूर्णत: प्रतिबन्ध लगा दिया और जगह जगह पेड़ लगवाने शुरू कर दिए। वह जब भी कोई खाली जमीं पड़ी देखता तो वहां पर फूलों के बीज बिखरवा देता और कुछ ही दिनों बाद वहां रंग बिरंगे सुंदर फूल उग जाते। प्रजा भी अपने राजा को पूरा सहयोग करती और बच्चे से लेकर बूढ़े - कोई भी फूलों को नहीं तोड़ता था।

फूलों पर रंग बिरंगी तितलिया मंडराया करती और लोग ठगे से इस मनोरम दृश्य को देखने लगते। अमृत एक दिन दरबार मै बैठा हुआ अपनी प्रजा के बारे में बात कर रहा थे तभी एक दूत दौड़ता हुआ आया और बोला –“-"महाराज,राजा शांतनु ने हमारे राज्य पर आक्रमण करने की योजना बनाई है और वह अपनी विशाल सेना सहित युद्ध करने के लिए दो दिन में आ जायेगा। " यह सुनकर अमृत परेशान होता हुआ बोला-"युद्ध होने से तो हजारों सैनिक मारे जायंगे और मासूम प्रजा भी बर्बाद हो जाएगी। " इस पर महामंत्री विनम्र शब्दों मे बोला-"परन्तु महाराज,अगर हम युद्ध नहीं करेंगे तो वह हम सबको बंदी बना लेगा। " यह सुनकर अमृत के मुख पर चिंता की लकीरें उभर आई और वह बिना कुछ कहे अपने कक्ष में चला गया। बिना कुछ खाए पिए वह सारी रात और सारा दिन सोचता रहा की युद्ध को कैसे टाला जाएं। सुबह की पहली किरण के साथ ही वह उठकर बगीचे में चले गए। रंग बिरंगे फूलों से लदे हुए वृक्षों को देखकर अचानक उनके मन में एक विचार आया और उन्होंने तुरंत महामंत्री को बुलाकर अपनी योजना समझा दी। महामंत्री का चेहरा भी अमृत के साथ ख़ुशी से खिल उठा। इसके बाद राजा आराम से सोने चला गया। शाम के समय राजा शांतनु ने राज्य की सीमा में अपने हजारों सैनिकों के साथ प्रवेश किया और नगर की खूबसूरती देखकर वह अचंभित रह गया। चारों तरफ हरे भरे पेड़ हवा के साथ साथ झूम रहे थे। मोगरा,बेला और चमेली की कलिया चटख रही थी और चारों और भीनी भीनी सुगंध आ रही थी। मालती के गुच्छे लता के सहारे दीवारों पर चढ़े हुए बहुत ही सुन्दर लग रहे थे। उसे कुछ पलों के लिए ऐसा लगा मानो वह किसी फूलों के जादुई संसार में आ गया हो। तभी उसके सेनापति ने कहा -"महाराज,अब हमें आक्रमण करना चाहिए। " "हाँ - हाँ क्यों नहीं कहता हुआ शांतनु आगे की और बढ़ा। जैसे ही सैनिकों ने तलवारें म्यान से निकली और प्रजा को मारने के लिए आगे बढ़े , लाखों मधु मक्खियों ने उन पर धावा बोल दिया। अब उनकी तलवारें भी किसी काम की नहीं रही। मधु मक्खियों ने पूरी सेना को काट काट कर लहू लुहान कर दिया। वे जान बचने के लिए वापस भागे। इसी बीच शांतनु को भी मधु मक्खियों ने चेहरे पर काट लिया और उसका मुंह सूजकर गुब्बारे की तरह हो गया। अचानक उसका संतुलन बिगड़ गया और वह घोड़े से नीचे गिर पड़ा। उसका सर किसी नुकीली वस्तु से टकराया और वह बेहोश हो गया। जब उसको होश आया तो वह अमृत के राजमहल में था और अमृत उसके माथे पर प्यार से हाथ फेर रहा था। उसकी आँखों की कोरो से आंसू बह निकले। वह रुंधे गले से बोला-"मैं तुम्हें जान से मारने आया था और तुम्हीं ने मेरी जान बचाई है। " अमृत उसके आँसूं पोछते हुए बोला -"मैंने हमेशा गुरूजी की सीख पर अमल किया है। अहिंसा ही मेरा धर्म है। " यह सुनकर शांतनु शर्मिंदा होते हुए बोला -"पर जब तुम्हें पता था की मै तुम पर आक्रमण करने वाला हूं तो तुम अपनी सेना लेकर मुझसे युद्ध करने क्यों नहीं आये ? " इस पर अमृत मुस्कुराता हुआ बोला-" मेरी मधु मक्खियों की सेना गई तो थी तुमसे लड़ने और देखो उन्होंने मेरे वर्षों पुराने मित्र को एक बार फिर मुझसे मिला दिया। " अमृत ने शांतनु के चेहरे पर अचरज के भाव देखकर कहा-"तुमने देखा की मेरे राज्य में हर कदम पर वृक्ष फूलों से लदे हुए है और उनमें सैकड़ों मधु मक्खियों ने अपने छत्ते बनाये हुए है। जब तुम्हारी सेना आई तो मेरे सैनिकों ने गुलेलों से छत्तों पर पत्थर मारे और छिप गए। और गुस्से में वे सारी मधु मक्खियाँ तुम लोगों पर टूट पड़ी।" शांतनु अमृत की दूरदर्शिता और सूझबूझ देखकर हैरान रह गया और बोला -"मुझे माफ कर दो और अब मैं चलता हूँ। " यह सुनकर अमृत बड़े प्यार से बोला-"मैं तुम्हें खाली हाथ नहीं जाने दूंगा क्योंकि मैं तुम्हारे राज्य की सारी स्थिति जानता हूँ , तुम जितना चाहे उतना धन ले जा सकते हो और कई बोरों में फूलों के बीज भी हैं उन्हें तुम मिटटी में दबवा देना ताकि जब मैं तुम्हारे यहाँ आऊं तो तुम्हारे राज्य को खूब हरा भरा पाऊ। " शांतनु अमृत का प्यार देखकर ख़ुशी के मारे रो पड़ा और बोला-"मैं भी अपने राज्य को तुम्हारे जैसा ही "फूलों का नगर" बनाऊंगा। " और दोनों मित्र खिलखिलाकर जोर से हंस पड़े।

 

डॉ. मंजरी शुक्ल

श्री समीर शुक्ल

सहायक प्रबंधक

इंडियन आयल कारपोरेशन

गोरखपुर ट्रेडिंग कंपनी

गोलघर

गोरखपुर

२७३००१

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रचनाकार: मंजरी शुक्ल की बाल कहानी – फूलों का नगर
मंजरी शुक्ल की बाल कहानी – फूलों का नगर
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