रचनाकार.ऑर्ग की विशाल लाइब्रेरी में मनपसंद रचनाकार अथवा रचनाएँ खोजें -
 नाका में प्रकाशनार्थ  रचनाएं इस पते पर ईमेल करें : rachanakar@gmail.com अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें.

गंगा प्रसाद शर्मा 'गुणशेखर' की कविताएँ - बाँध मेरे गाँव का पानी शहर गया

          DSCN4503 (Custom)   

      बाँध मेरे गाँव का पानी शहर गया

      अंगद के पाँव सा वहीं पर ठहर गया

 

      हर जवाँ योजना परधान के हरम में

      इस तरह विकास हर गाँव गया

 

      नरेगा करेगा तो पेट भर जाएगा

      बाप के साथ-साथ बेटा नहर गया

 

      जो मजूर लापता है चार-पाँच रोज से

      पुलिस ने कहा डूब के मर गया

 

      आज भी काम-काज ठप्प रहा संसद में

      क्या कहें किससे कहें कहाँ-कहाँ कहर गया

----
         

माँ सहज विश्वास है


माँ सहज विश्वास है
नवल जीवन आस है
मलय पवन-सी सदा
इक सरस अहसास  है
दूब-सी पावन दुआ
नवल जीवन आस है
चाँदनी है चाँद की
फूल की सुवास है
कुछ अलग लगे मगर 
न आम है न खास है
छाँह-सी साथ-साथ 
दूर है न पास है
मंज़िले मकसूद तक
ममत्व की उजास है
भरे हुए मन के  
दर्द की निकास है 
रसभरी है कभी
आम की मिठास है
मँ बसी रोम-रोम
साँस साँस साँस है

---

चाचा तुम्‍हें नमन!!

खून पसीने के गारे से भरी नींव सारी थी जिसने,

नए देश के नए भवन की नई नींव डाली थी जिसने।

बापू के सपनों के तारे उस चमकीले ध्रुव को,

बड़े मान से हृदय बसाया ‘चाचा‘ कहकर जग ने

गंगा लहर-लहर गाती है कजरी, गीत, भजन।

पंडित नेहरू तुम्‍हें नमन है, चाचा तुम्‍हें नमन!

 

तुम गौरव थे भारत माँ के, हुए सपूत निराले,

दुर्दिन के बादल सब छाँटे, पथ के शूल निकाले।

सूरज बनकर चमके दिन में, बने चाँद रजनी में,

और, धरा पर फूल बिछाकर चुपके गए बिदा ले।

भरे सुगंधित मलय पवन को मोहक मधुर छुवन।

पुलक-पुलक फसलें हरसातीं, लहराते तन-मन॥

 

तुम बच्‍चों के प्‍यारे ‘चाचा‘ बच्‍चे तुम्‍हें दुलारे ।

हर संकट में उन्‍हें दौड़े, जब-जब तुम्‍हें पुकारे।

उन गुलाब- से शिशुओं को तुम दिल से सदा लगाए,

काँटे, फूल बनाए सारे फिर फूलों से हारें

उसी हार से आज तुम्‍हारा करके अभिनन्‍दन।

चरण चूम, आशीष शीश धर, कर लें शिशु वंदन॥

 

गीत, ग़ज़ल है नाम तुम्‍हारा देह तुम्‍हारी छंद

मधुर मंद मुस्‍कान तुम्‍हारी मंगलमयी प्रबंध।

झरने जैसी धवल मनोहर वाणी के उद्‌गाता-

‘गीता‘ है सब ग्रंथ तुम्‍हारे भाषण ललित निबंध।

जिनको गोद खिलाया तुमने वही महान सुवन।

आग लगाकर ताप रहे हैं तेरा चन्‍दन-वन॥

--

       डॉ.गंगा प्रसाद शर्मा 'गुणशेखर'      

4 टिप्पणियाँ

  1. बेनामी9:03 pm

    [आज भी काम-काज ठप्प रहा संसद में / क्या कहें किससे कहें कहाँ-कहाँ कहर गया]
    अच्छी कविता।
    कवि के तीन अलग अलग रुप!

    जवाब देंहटाएं
  2. बहुत सुन्दर! बेहतरीन!

    जवाब देंहटाएं
  3. respected and learned readers pls.see the following correction and then read the poems.
    हर जवाँ योजना परधान के हरम में
    इस तरह से विकास हर गाँव-घर गया
    माँ बसी रोम-रोम
    साँस साँस साँस है
    हर संकट में उनके दौड़े, जब-जब तुम्‍हें पुकारे
    भरे सुगंधित मलय पवन की मोहक मधुर छुवन।

    urs
    Dr.G.P.Sharma'Gunshekhar'

    जवाब देंहटाएं
  4. tum gaurav the....................

    pranam guruvar

    or ap hamare gaurav ho

    जवाब देंहटाएं

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.