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आदमखोर (कहानी संकलन) संपादक - डॉ. दिनेश पाठक शशि - सरला अग्रवाल की कहानी : यह भी सच है

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कहानी संग्रह आदमखोर (दहेज विषयक कहानियाँ) संपादक डॉ0 दिनेश पाठक ‘शशि’ संस्करण : 2011 मूल्य : 150 प्रकाशन : जाह्नवी प्रकाशन विवेक व...

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कहानी संग्रह

आदमखोर

(दहेज विषयक कहानियाँ)

संपादक

डॉ0 दिनेश पाठक ‘शशि’

संस्करण : 2011

मूल्य : 150

प्रकाशन : जाह्नवी प्रकाशन

विवेक विहार,

शाहदरा दिल्ली-32

शब्द संयोजन : सागर कम्प्यूटर्स, मथुरा

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यह भी सच है

डॉ. सरला अग्रवाल

 

घर के पास ही रहने वाली एक दर्जिन के सिलाई कौशल की प्रशंसा से प्रभावित होकर मैंने अपने कुछ ब्लाउज उसे सिलने के लिए दिये।

इसके कई लाभ मुझे नजर आये। एक तो जिस प्रसिद्धि के शिखर पर पहुँचे सुविख्यात दर्जी से मैं अभी तक ब्लाउज सिलवाती आई थी उसके नखरे बेहद बढ़ गये थे, दूसरे वह अब महीने भर से कम की तारीख देता ही न था। तीसरे उसके सिलाई के रेट अब आकाश को छूने लगे थे, चौथे हमारे घर से उसकी दुकान की दूरी इतनी अधिक थी कि हर बार उधर जाने के लिए हमें विशेष रूप से योजना बनानी पड़ती फिर भी यह बड़े ही सौभाग्य की बात होती यदि अपनी दी हुई तिथि पर वह कपड़े तैयार करके दे देता........सदैव ही कोई न कोई बहाना लगा कर वह हमारे कई चक्कर लगवा देता।

इसी कारण मेरा मन अब आस-पास ही अच्छा दर्जी खोजने का होने लगा। वैसे तो आजकल सभी अच्छे दर्जियों के पास काम का ढ़ेर लगा रहता है......। जमाना रैडीमेड वस्त्रों का आ गया है..... वह सस्ते भी पड़ते हैं, पर जिन्हें अच्छी फिटिंग के वस्त्र पहनने की आदत हो जाये उनके लिए अपना सही नाप देकर दर्जी से वस्त्र सिलवाना एक विवशता सी बन जाती है। इसी कारण अच्छे दर्जी ग्राहक को अपने समक्ष कुछ भी नहीं समझते। जल्दी सिल कर देने की बात पर तो वह ऐसे बिदक पड़ते हैं, जैसे कोई भैंस लाल कपड़ा देखकर।

पर अनिता का भी यही हाल था......वह भी कम व्यस्त नहीं थी। उसके कमरे में चारों ओर भाँति-भाँति के सुन्दर और कीमती वस्त्रों का ढ़ेर लगा था। बड़ी कठिनाई से वह ब्लाउज एक सप्ताह पश्चात् सिलकर देने के लिए तैयार हुई। अगले शुक्रवार को कपड़े देने की बात तय हुई।

शुक्रवार को उसके यहाँ जाने पर विदित हुआ कि वह किसी विवाह के सिलसिले में शहर से बाहर गई हुई है.....मन खिन्न हो गया......फिर वही ढाक के तीन पात! धोबी, दर्जी, नाई और प्रेस वाले कभी अपनी इन ‘वादा खिलाफी’ की हरकतों से बाज़ नहीं आ सकते!

तीन-चार दिन के पश्चात् मैं फिर अनीता के यहाँ पहुँची। अनीता की नम्रता, कर्मठता, सुव्यवस्था एवं कार्य को देखकर मैं काफी प्रभावित थी। उसके पति नगर के किसी खादी भण्डार में छोटा-मोटा कार्य करते थे। अनिता ने अपने श्रम से ही वह दो मंजिली इमारत बनाई थी, जिसके नीचे के हिस्से में वह स्वयं रहते थे। ऊपर के हिस्से को किराये पर उठा दिया था। इसमें एक सीनियर पद पर कार्यरत किसी बैंक के अफसर रहते थे।

घर काफी सुन्दर बना हुआ था। उसमें फर्श संगमरमर के थे और अन्य फिटिंग्स भी स्तरीय थीं। घर में सोफा सैट, डाइनिंग-टेबिल, टी.वी. बढ़िया बैड़, कूलर आदि आधुनिक सुविधाएँ अनिता के श्रम और अभिरुचि की परिचायक थीं। उसके दो बच्चे थे, एक लड़का और एक लड़की, जो संभवतः छठी और नौंवी कक्षा में पढ़ रहे थे। तब भी अनिता अपनी आयु से काफी कम लगती। वह खूब बातूनी और हँसमुख होने के कारण ही सबसे दोस्ती कर लेती।

उसका घर हमारे घर से काफी पास होने के कारण अब कपड़े सिलवाने में जाने-आने की समस्या का समाधान हो गया.....सुबह या शाम किसी भी समय पैदल घूमने के लिए जाते या आते समय यह कार्य उसी में सम्मिलित किया जा सकता था। कपड़ों की फिटिंग वह बहुत अच्छी देती थी, साथ ही उसके हाथ में गजब की सफाई भी थी। अतः संध्या समय अपने घूमने का चक्र पूर्ण करके मैं उसके यहाँ पहुँची। वह सिलाई मशीन पर बड़ी तन्मयता के साथ कार्यरत थी। मुझे देखकर उसने मशीन चलानी बन्द कर दी और बड़े व्यथित से स्वर में कहा, ‘‘मैं क्या करुँ, आपके ब्लाउज तो अभी तक भी नहीं आये। जिस लड़की को मैंने वह तुरपन करने के लिए दिये थे, उसका पति के साथ झगड़ा हो गया है, और वह पीहर चली गई है, अचानक ही.....।

‘‘झगड़ा किस बात का हुआ?’’ मुझसे पूछे बिना नहीं रहा गया। मेरा ध्यान उसी बात पर जा टिका था, कथाकार जो ठहरी।

‘‘वैसे तो उसकी नई-नई शादी हुई है, वह भी लव मैरिज.....पर सुना है कि दहेज का मामला है......पति दहेज लाने के लिए उस पर दबाव डालता है, और मारपीट भी करता है।’’

‘‘लव मैरिज और दहेज!’’ मैं चौंक पड़ी। मैंने उससे पूछा,’’ अनीता, क्या सचमुच ही यह बात सही है? आजकल रोज ही समाचार पत्रों में इस प्रकार की बातें पढ़ने में आ रही है, वैसे तो। क्या हर घर में दहेज के लिए महिलाओं को इतना प्रताड़ित किया जाता है? या इसके बीच कुछ अन्य समस्याऐं और कारण भी समाये हैं?’’

‘‘अब इस बात का क्या मालूम आन्टी, मुझे तो उसकी भाभी ने ही यह सब बताया था।’’ अनीता ने बात को टालना चाहा।

मुझे भी देर हो रही थी....उसे दो ब्लाउजों का कपड़ा और सिलने के लिए

देकर मैं घर वापस आ गई।

एक सप्ताह के पश्चात् उसके दिये हुए समय पर मैं फिर उसके यहाँ कपड़े लेने पहुँची। मन में बराबर उस तुरपन वाली लड़की के विषय में जानने की उत्सुकता बनी हुई थी।

मैंने उससे उस तुरपन करने वाली लड़की के विषय में जानकारी लेनी चाही.....मुझे याद हो आया था कि मैं उस लड़की से मिल चुकी हूँ। जब मैं पहली बार ही अनीता के घर गई थी तब एक सुन्दर प्यारी सी बालिका कुछ कपड़े उसे सौंप कर नये कपड़े ले रही थी। वही वह लड़की थी ‘शुभा’.....कमसिन सी सलवार सूट पहने.....आँखों में चमक, पर उसका मुख उस समय कान्तिहीन था, मानो किसी द्विविधा में फँसी हो।

अनिता ने इस बार मुझे उसकी पूरी कहानी सुनाई। कहानी ऐसी विचित्र थी, कि उसे सुनकर मेरे रोंगटे खड़े हो गये। कानों पर विश्वास ही न होता था कि सचमुच आज की दुनिया में ऐसा भी हो सकता है......और वह लड़की ‘शुभा’ जो इतनी मासूम, भोली-भाली सी दिखाई देती थी, वह इतनी घाघ भी हो सकती है।

काफी समय से शुभा की अभय से दोस्ती थी, और अब यह दोस्ती घनिष्ठता में बदल चुकी थी......पहले-पहले दोनों एक बार एक पार्क में मिले थे...शुभा तब मैट्रिक की परीक्षा प्राइवेट ही दे रही थी...अभय बी.ए. पास करके नौकरी ढूँढ़ रहा था......दोनों ने दोस्ती के कारण एक साथ ही टाइपिंग स्कूल में टाइपिंग सीखी.....घनिष्ठता और बढ़ चली....अभय शुभा के घर भी जाने-आने लगा। दोनों ही एक दूसरे के सान्निध्य के लिए लालायित रहते।

अभय गाँव का रहने वाला था। उसके माता-पिता का देहान्त कई वर्ष पूर्व हो चुका था। उसे उसकी दादी ने बड़े कष्ट से पाल-पोस कर बड़ा किया और शहर के एक सस्ते छात्रवास में रख उसकी पढ़ाई करवाई तभी किशोरावस्था में यौवन में पदार्पण करते ही उसकी शुभा से भेंट हो गई.....

टाइपिंग का कोर्स पूर्ण करते ही शुभा को एक छोटे प्राइवेट कार्यालय में टाइपिस्ट का कार्य मिल गया। वेतन कम होने पर भी पिता ने उसे वहाँ रखवा दिया ताकि अभ्यास बना रहे, किन्तु अभय को प्रयास करने पर भी कोई नौकरी नहीं मिल पाई.....। इस चक्कर में वह अत्यन्त दुखी और तनावग्रस्त रहता। कभी-कभी छोटे-मोटे कार्य करके जीविका चलाता। उसने दो ट्यूशन दसवी कक्षा की ले लीं।

शुभा के पिता शमशेर ने उसे काफी ढ़ाढ़स बँधाया, और नौकरी दिलवाने का वादा किया। जब शुभा मैट्रिक में पढ़ रही थी तब ही से अभय उसे पढ़ाने उसके घर आने लगा था....शमशेर ने नौकरी दिलवाने के लिए अभय से पचास हजार रुपयों का इन्तजाम करने के लिए कहा.....ताकि वह उसे दुबई या आबूधाबी भेज सके।

नौकरी पाने के लिए अभय ने दादी से जिक्र किया तो उस बेचारी ने पुरखों की छोड़ी जमीन बेच कर जैसे-तैसे उसे रुपये दे दिये, खुद दूसरों के खेतों में काम करके गुजारा करने लगी। इस बीच शमशेर ने अभय और शुभा का विवाह भी सादे ढंग से कर दिया। शुभा के माता-पिता का भी प्रेम-विवाह ही हुआ था अतः वह प्रेम के महत्व को समझते थे। शुभा की माँ ब्राह्मण तथा पिता मुसलमान थे.....पिता का यह दूसरा विवाह था......पहली पत्नी से उसके दो पुत्र थे, जो अलग ही रहते थे। ‘‘शुभा’’ इसी पत्नी से थी।

अभी उनका विवाह हुए छः सात माह ही गुजरे थे.... अभय बार-बार शमशेर से नौकरी दिलाने के लिए अनुरोध करता रहा....पर शमशेर उससे और रुपये माँग रहा था......शुभा से उसे पता लग चुका था कि अभय को गाँव की जमीन बेचने पर डेढ़ लाख रुपये मिले थे, जिसमें से कुछ अभी शेष थी।

जब शुभा नहीं मानी तो उसके इसरार पर ना चाहते हुए भी अभय को उसके पिता को बीस हजार रुपये और देने पड़े, पर अब वह अब्बू से नौकरी शीघ्र लगाने की खूब जिद करने लगा, ताकि वह अपने वैवाहिक जीवन को सुखमय बना सके, उसे अपना बेकार रहना अब बेहद खल रहा था। पास की रकम भी सब समाप्त प्रायः ही थी।

जब शुभा सुबह-सुबह तैयार होकर अपने कार्यालय जाती तो उसे जाते देखकर उसके सीने में बरछी सी चलतीं। उसे अपने जीवन की व्यर्थता का भान तीव्रता के साथ होता। काश! उसे कहीं भी ढंग की नौकरी मिली होती तो वह यों शुभा को नौकरी पर क्यों जाने देता? शर्म से वह अपना मुख दूसरी ओर कर लेता या उस समय घर से बाहर चला जाता। मन ही मन अपनी लाचारी और बेकारी पर हर समय रोता बिसूरता।

इसी बीच एक दिन शुभा जब दोपहर के समय अपने अब्बू-अम्मी से मिलने मायके गई तो वह वहाँ से शाम तक भी वापस नहीं लौटी। अभय दिन छिपने तक उसकी प्रतीक्षा करता रहा....उसने शुभा के मायके में फोन किया तो पता लगा कि वह अपने अब्बू के साथ कहीं गई हुई है। अभी वह अपने ससुराल जाकर शुभा को लाने की बात सोच ही रहा था कि उसके घर पुलिस आ गई। वे उसे पकड़ कर अपने साथ थाने में गये और बन्द कर दिया। अभय रोता गिड़गिड़ाता,

चिल्ला-चिल्ला कर उनसे अकारण ही इस प्रकार उसे बिना कसूर पकड़ने का कारण पूछने लगा।

उनमें से एक पुलिस काँस्टेबिल ने बताया तेरी पत्नी शुभा ने आज थाने में आकर रपट लिखवाई है कि उसका पति अभय उसे दहेज लाने के लिए बराबर तंग करता रहा है। वह खुद तो कोई कामधाम करता नहीं है, उसे ही कमाकर लाने के लिए बाध्य करता है।

दूसरा बोला-‘‘कल रात को तो तूने उसके साथ खूब मारपीट की....उसके सारे कपड़े फाड़ डाले..... उसका पूरा बदन नीला और सूजन से भरा था.....हमने खुद देखा है, अपनी आँखों से......पीहर से एक लाख रुपए लाने का दबाव डालता रहा था न? अब तुझे हम बताते है बच्चू कि मारपीट क्या होती है! हरामजादे। साले! अब कैसा मासूम बन रहा है, मक्कार कहीं का’’, वे गरजे थे।

यह बात सुनकर अभय विस्मय चकित रह गया। यह सब क्या हो रहा है, यह उसकी समझ से परे था।

‘‘नहीं, नहीं, यह सब एकदम ही झूठ है, बेबुनियाद है। ऐसा तो कुछ भी नहीं हुआ। मेरा तो शुभा के साथ कभी कोई झगड़ा नहीं हुआ, हम दोनों बहुत प्यार से रहते है, वह ऐसी रपट लिखा ही नहीं सकती।’’ वह रो-रोकर अपनी सफाई पेश करता रहा, पर उन लोगों ने उसकी एक नहीं सुनी, उसे वे बराबर मारते-पीटते और हजारों गालियाँ देते, उसका जुर्म कबूल करवाने की कोशिश करने लगे। उसी शहर में रहने वाली उसकी बहिन और जीजा को भी इन लोगों ने शुभा को मारने-पीटने में शामिल बताया गया।

‘‘मुझसे तो शमशेर जी ने खुद अरब देशों में मेरी नौकरी लगवाने के लिए मुझ से ही एक लाख रुपए माँगे थे..... पचास हजार रुपये मैंने उन्हें पहले दिये थे और बीस हजार अभी दो-तीन महीने पहले ही देकर चुका हूँ। इस पर भी खुश नहीं हैं, अभी एक लाख रुपए और माँग रहे है..... अब तो खुद उन्होंने ही मेरे नाम से एक संस्था से लोन दिलवाने की व्यवस्था की है....उसके लिए मुझसे एक फार्म पर साइन भी करवाये हैं। आप कह रहे हैं कि मैंने उनसे रुपये माँगे....रुपयों के लिए अपनी बीवी से मारपीट की.....। यह तो हो ही नहीं सकता.....मेरी शुभा कभी मेरे खिलाफ बोल ही नहीं सकती।’’ वह रोता-गिड़गिड़ाता रहा।

मन ही मन वे बेहद हैरान था कि अचानक शुभा का व्यवहार उसकी ओर इतना कटु क्यों कर हो गया.....क्या सचमुच ही शुभा ने उसके खिलाफ थाने में रिपोर्ट लिखवाई होगी? उसे विश्वास नहीं हो रहा था। वह तो आरंभ से ही शुभा पर जी जान से फिदा रहा था, उसके लिए आसमान के तारे भी तोड़ कर ला सकता था। शुभा भी तो उससे प्रेम करती है, फिर?

दो दिन हो गये, उसे पुलिस कस्टडी में, पर शुभा उससे अभी तक एक बार भी मिलने नहीं आई..... यह उसके मन को कचोट रहा था। यह कैसा षडयन्त्र रचा जा रहा है, उसके विरुद्ध? कौन रच रहा है और क्यों रच रहा है? वह बहुत हैरान था, पर दिमाग पर बार-बार जोर देने पर भी उसकी समझ में कुछ नहीं आया। अब वह क्या करे? कैसे अपनी शुभा से मिले? एक बार, केवल एक बार! वह कई बार थाने से फोन कर चुका था, पर शुभा ने उससे एक बार भी बात नहीं की थी।

इसी बीच अगले दिन दोपहर को शुभा अपने घर जाकर अपना दहेज का सारा सामान, कपड़े-लत्ते, जेवर, बर्तन-भांडे तथा टी.वी वगैरहा थ्री व्हीलर में रखकर अपने मायके ले गई। अभय के घर के पास-पड़ौसियों ने उसे इस प्रकार सामान ले जाते देखा तो प्यार से समझाना चाहा था कि ‘‘यह क्या नादानी कर रही हो....क्यों अपनी सोने की सी गृहस्थी तुम स्वयं ही लुटाने पर तुली हो......’’ पर उसने उनकी एक न सुनी।

अब्बू शमशेर के कहने में आकर शुभा अपना अच्छा-बुरा सोचना भूल गई। उसी दिन दोपहर को वह अपने भाई के यहाँ गई तो उसकी भाभी ने उसे काफी समझाया......पर वह उससे भी लड़ पड़ी....’’ अरे अब्बू जो कुछ मेरे लिए कर रहे हैं, वह क्या सब गलत है? तुम हमारे बीच में मत बोलो..... सारी जिन्दगी मैं ऐसे ही इस गृहस्थी के लिए कमाती-पिसती रहूँगी क्या? मेरे अरमान दम तोड़ते रहेंगे? और यह मुस्तंडा यूँ ही बेकार घूमता रहेगा?’’

‘‘पर उसने तेरे साथ मारपीट कब की थी? उसका झूठा नाम क्यों लगा रही है? दहेज का सामान खुद जाकर निकाल लाई उसके पीछे से.... और उस पर दावा कर रही है कि दहेज का सामान उसने दबा रक्खा है.....अपनी बहिन को दे दिया है, क्यों? तेरे पास डुप्लीकेट चाबियाँ जो है घर की? वह बेचारा तो जेल में है, तेरी मेहरबानी से। तू उसके घर से कुछ भी सामान निकाल कर ला सकती है।

साल भर से उसे नौकरी दिलवाने के झूठे नारे देकर क्यों भरमाया जा रहा है? वह खुद जो कोशिशें करता उससे भी गया? जो रुपया उसने अभी तक तेरे नाम पर अब्बू को दिया है, उसी से कुछ बिजनेस कर लेता, अब उससे भी गया और तू?’’

‘‘तुम्हें मतलब? ‘‘शुभा चीखीं थी।

‘‘क्यों मतलब कैसे नहीं। हमारी भी तो बदनामी हो रही है। अखबारों में रेाज तेरी खबरें छप रही हैं, तूने पढ़ी नहीं? सारी दूनिया हमारे खानदान पर थू....थू कर रही है......लड़की को देने की जगह उसके मर्द से रुपया ऐंठ रहे हैं अब्बा। यह अच्छी बात है? हमने सुना है कि ‘लोन’ का एक लाख रुपया भी वह उस कंपनी से लेकर खुद ही डकार लेंगे और लोन के कागजातों को आवश्यकता होने पर कोर्ट में साक्ष्य के रुप में इस्तेमाल करेंगे......कि उसे रुपयों की आवश्यकता थी तभी तो ‘लोन’ के लिए एप्लाई कर रखा था.....शुभा पर भी मार-पीट करके अभय बाप से रुपया माँग कर लाने का दबाव बनाये हुए था।

‘‘शुभा संभल! वे गाँव के एक सीधे-साधे निष्छल लड़के को अपनी हविस का मोहरा बना रहे हैं। दरोगा से साँठ-गाँठ करके......उस पर झूठा मुकदमा बनवाया है तेरे अब्बू ने.....। अरे, तेरा दिमाग खराब हुआ है लड़की, इतना चाहने वाला पति मिला है......तुझ पर दिलोजान से फिदा है.....। इसी रुपये को बैंक में लगा कर हर महीने ब्याज ले सकती थी....। तू सोच रही है कि अब्बू यह रुपया कभी तेरे नाम कर देंगे? मुँह धोकर आ..... वह यह रुपया तुझे हर्गिज नहीं देने वाले....।’’ देख लेना अपने इन कारनामों के लिए तू जिन्दगी भर पछतायेगी। सारी जिन्दगी अब्बू ऐसे ही छक्के पंजों से अपना निर्वाह करते आये हैं।

इस पर शुभा और भाभी में खूब झगड़ा हुआ। अब मुकदमा चलेगा तब पता लगेगा कि क्या होता है। पर होगा भी क्या? सुना है बहुत ही जालिम है शुभा का बाप..... अभय को तो वह पुलिस कस्ट्डी में ही पिटवा-पिटवा कर अधमरा करवा देगा। कई साल तक मुकदमा घिसटेगा...... जब तक मुकदमा चलेगा तब तक तो इसकी कहीं और शादी नहीं हो सकती..... अभी शुभा की कमाई और अभय के रुपये से ऐश करेगा..... बाद में कहीं नाते पर बिठा देगा इसे, किसी बिगड़ैल अमीर विलासी बूढ़े खूसट के साथ..... ढेर सारा रुपया लेकर।

अनिता की बातें सुनकर मैं अवाक् रह गई।

‘‘अरे मैं तो सुनती और पढ़ती आई हूँ कि दहेज लेने के लिए ससुराल वाले बहू पर खूब अत्याचार करते हैं। सास, ससुर, पति और देवर मिलकर पहले उसे मायके से रुपया लेकर आने के लिए बाह्लय करते हैं, फिर रुपया न लाने पर जला डालते हैं..... और बेटे की दूसरी शादी कर देते हैं। खूब रुपया और दहेज लेकर! पर यहाँ तो उल्टी गंगा प्रवाहित हो रही है।’’ मेरा मन कटुता से भर उठा था।

‘‘आन्टी, सरकार ने महिलाओं को दहेज की त्रासदी से बचाने के लिए कानून तो अच्छा बनाया है, पर कुछ लोग दुनिया में ऐसे भी होते है, जो इसका भी उल्टा लाभ उठाने की कोशिश में लड़के वालों को व्यर्थ में ही फँसा देते हैं।’’

तो क्या हम महिलायें इसे इतने वर्षों तक समाज द्वारा उन पर हुए जुल्मों की प्रतिक्रिया स्वरुप बदला लेना समझ कर खुश होएं?’’ मैंने उससे पूछा।

‘‘नहीं, पर आन्टी हर क्रिया की प्रतिक्रिया तो होती ही है, चाहे कैसी भी क्यों न हो अब महिलाओं की सहनशक्ति और धैर्य का प्याला भी भर चुका है।’’ वह बोली।

‘‘तुम तो इसे सही समझती हो?’’

‘‘नहीं, यह बात नहीं है...... मैं तो जो हो रहा है, केवल उसी पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर रही हूँ..... क्या सही है और क्या गलत, इसे तो हम सभी जानते समझते हैं।’’ ’’’

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‘‘आस्था’’

5-बी-20, तलवण्डी,

कोटा-324005 (राज)

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अग्रवाल,1,शबनम शर्मा,7,शब्द संधान,17,शम्भूनाथ,1,शरद कोकास,2,शशांक मिश्र भारती,8,शशिकांत सिंह,12,शहीद भगतसिंह,1,शामिख़ फ़राज़,1,शारदा नरेन्द्र मेहता,1,शालिनी तिवारी,8,शालिनी मुखरैया,6,शिक्षक दिवस,6,शिवकुमार कश्यप,1,शिवप्रसाद कमल,1,शिवरात्रि,1,शिवेन्‍द्र प्रताप त्रिपाठी,1,शीला नरेन्द्र त्रिवेदी,1,शुभम श्री,1,शुभ्रता मिश्रा,1,शेखर मलिक,1,शेषनाथ प्रसाद,1,शैलेन्द्र सरस्वती,3,शैलेश त्रिपाठी,2,शौचालय,1,श्याम गुप्त,3,श्याम सखा श्याम,1,श्याम सुशील,2,श्रीनाथ सिंह,6,श्रीमती तारा सिंह,2,श्रीमद्भगवद्गीता,1,श्रृंगी,1,श्वेता अरोड़ा,1,संजय दुबे,4,संजय सक्सेना,1,संजीव,1,संजीव ठाकुर,2,संद मदर टेरेसा,1,संदीप तोमर,1,संपादकीय,3,संस्मरण,712,संस्मरण लेखन पुरस्कार 2018,128,सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन,1,सतीश कुमार त्रिपाठी,2,सपना महेश,1,सपना मांगलिक,1,समीक्षा,801,सरिता पन्थी,1,सविता मिश्रा,1,साइबर अपराध,1,साइबर क्राइम,1,साक्षात्कार,18,सागर यादव जख्मी,1,सार्थक देवांगन,2,सालिम मियाँ,1,साहित्य समाचार,89,साहित्यम्,6,साहित्यिक गतिविधियाँ,209,साहित्यिक बगिया,1,सिंहासन बत्तीसी,1,सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी,1,सी.बी.श्रीवास्तव विदग्ध,1,सीताराम गुप्ता,1,सीताराम साहू,1,सीमा असीम सक्सेना,1,सीमा शाहजी,1,सुगन आहूजा,1,सुचिंता कुमारी,1,सुधा गुप्ता अमृता,1,सुधा गोयल नवीन,1,सुधेंदु पटेल,1,सुनीता काम्बोज,1,सुनील जाधव,1,सुभाष चंदर,1,सुभाष चन्द्र कुशवाहा,1,सुभाष नीरव,1,सुभाष लखोटिया,1,सुमन,1,सुमन गौड़,1,सुरभि बेहेरा,1,सुरेन्द्र चौधरी,1,सुरेन्द्र वर्मा,62,सुरेश चन्द्र,1,सुरेश चन्द्र दास,1,सुविचार,1,सुशांत सुप्रिय,4,सुशील कुमार शर्मा,24,सुशील यादव,6,सुशील शर्मा,16,सुषमा गुप्ता,20,सुषमा श्रीवास्तव,2,सूरज प्रकाश,1,सूर्य बाला,1,सूर्यकांत मिश्रा,14,सूर्यकुमार पांडेय,2,सेल्फी,1,सौमित्र,1,सौरभ मालवीय,4,स्नेहमयी चौधरी,1,स्वच्छ भारत,1,स्वतंत्रता दिवस,3,स्वराज सेनानी,1,हबीब तनवीर,1,हरि भटनागर,6,हरि हिमथाणी,1,हरिकांत जेठवाणी,1,हरिवंश राय बच्चन,1,हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन,4,हरिशंकर परसाई,23,हरीश कुमार,1,हरीश गोयल,1,हरीश नवल,1,हरीश भादानी,1,हरीश सम्यक,2,हरे प्रकाश उपाध्याय,1,हाइकु,5,हाइगा,1,हास-परिहास,38,हास्य,59,हास्य-व्यंग्य,77,हिंदी दिवस विशेष,9,हुस्न तबस्सुम 'निहाँ',1,biography,1,dohe,3,hindi 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रचनाकार: आदमखोर (कहानी संकलन) संपादक - डॉ. दिनेश पाठक शशि - सरला अग्रवाल की कहानी : यह भी सच है
आदमखोर (कहानी संकलन) संपादक - डॉ. दिनेश पाठक शशि - सरला अग्रवाल की कहानी : यह भी सच है
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