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सूर्यकांत नागर की कहानी - सपने

न्दा ने तीसरी बार पानी पीया। वैसे रात में उठकर पानी पीने की उसकी आदत नहीं है। थककर चूर हो जाने के बाद उसे होश ही नहीं रहता कि सुबह कब हुई। पर जाने क्यों आज उसका हलक सूख रहा है। देह पसीने से बार-बार लथपथ हो आती है। जब रात को पार्टी होती है तब तो इतनी थक जाती है कि सुबह आवाज देकर खुद मिसेज माथुर उसे जगाती हैं। यदि मनोज-रश्मि को स्कूल जाने की जल्दी न हो तो शायद गिसेज माथुर कह गई उसे जल्दी न जगाये। मनोज-रश्मि अब. बड़े हो गये हैं, इसलिए उन्हें तैयार करने की परेशानी तो नहीं रही, पर नन्दा को उनके लिए नाश्ता तो तैयार करना ही पड़ता है। रोज-रोज टोस्ट-अण्डा देने के लिए बच्चे मम्मी से उतना नहीं उलझते जितना नन्दा से उलझते हैं। पर वह भी क्या करे! मेम साब का आदेश है कि बच्चों को कम से कम दो अण्डे रोज खिलाया करे-चाहे उबले हुए हों या आमलेट की शक्ल में।

पानी पीकर नन्दा फिर लेट गयी। बहुत कोशिश की कि आँख लग जाये। मगर नींद ने तो जैसे शर्त बद ली थी। एकदम बैरन हो गयी। आने का नाम ही नहीं लिया।.. .बहुत दिनों बाद वह आज घर गयी थी। पहले अक्सर जाती थी। छुट्टी लेकर दोपहर में माँ-बापू और भाई-बहन से मिल आती थी। पर घर जाना अब उसे अच्छा नहीं लगता।. दम घुटता है उसका वहाँ। पहले की तुलना में हालात बेहतर हैं, फिर भी परम्परागत वातावरण में उसका मन काँप जाता है। आज घर जाकर जो आहट उसके कानों तक पहुँची, उसे सुन चेहरे का रंग ही बदल गया। जल्दी ही लौट आयी। लौटने के बाद भी सहज न हो सकी। किसी काम में मन नहीं लगा। शाम सब्जी में नमक तेज हो जाने के कारण उसे माथुर साहब की हल्की-सी डाँट भी खानी पड़ी। पर क्या करती! भरसक कोशिश के बाव- जूद अपने को सम्भाल नहीं पा रही है। रात ठीक से खाना भी नहीं खाया गया। जानती है, नींद न आने का कारण खाली पेट नहीं मस्तिष्क है, जिसमें झंझावात उठा है। मस्तिष्क जिस पर से पिछले नौ-दस वर्षों में काफी कोहरा छँट चुका है।

जो आहट आज सुनकर आयी, उसका आशय यही था कि अपनी ही जाति के बाबू के बेटे बाल्या से उसके ब्याह की बात पक्की कर दी गयी है। नन्दा, बाबू और उसके बेटे बाल्या दोनों को जानती है। बाबू उसके बापू के साथ ही समुद्र में मछली पकड़ने का धंधा करता है। बाल्या साइकिल रिक्शे से बच्चों को स्कूल पहुँचाने का काम करता है। माँ-बाप के साथ बांदरा में समुद्र किनारे की झोपड़-पट्टी में रहता है। बाल्या की माँ, नन्दा की माँ की तरह ही दो-चार घरों में कपड़े-भांडे करती है। नन्दा इसी माहौल में पैदा हुई है, पर पिछले दस वर्षों से यह माहौल उससे क्रमश: छूटता जा रहा है। नौ वर्ष की थी तभी माँ ने उसे माथुर साहब के यहाँ नौकरी पर लगा दिया था। घर का छोटा-मोटा काम करना और मनोज बाबा को सम्भालना। तब. से यहीं है। खाती-सोती भी यहीं है। माथुर और मिसेज माथुर भले लोग हैं। इसलिए नन्दा मजे में है। इस घर की सदस्य-सी हो गयी है। हँसमुख स्वभाव, काम के प्रति लगन और ईमान- दारी ने उसे सबकी लाड़ली बना दिया है। घर भर के लिए वह एक अनिवार्यता हो गयी है। मनोज-रश्मि भी उसके साथ अच्छा बर्ताव करते हैं। रश्मि से तो वह ऐसे बतियाती है, जैसे नौकरानी नहीं सहेली हो। चूँकि खाने-पीने को भी अच्छा मिलता है, इसलिए देह भी अच्छी-खासी निकल आयी है। कुदरत ने चेहरा-मोहरा भी खूब दिया है। रश्मि बेबी के अच्छे-खासे कपड़े उसे पहनने को मिल जाते हैं। रश्मि के पास कपड़ों का कोई टोटा नहीं। कई पोशाकें तो ऐसी हैं जो उसने मुश्किल से दो-चार बार पहनी होती हैं। मन से उतरते ही वे नन्दा के पास पहुँच. जाती हैं! वैसे दीपावली पर मिसेज माथुर नन्दा के लिए दो जोड़े कपड़े अलग से सिलाती हैं। अब नन्दा साड़ी पहनना तो भूल ही गयी है। मिडी-मेक्सी और सलवार-  कुरती ही उसकी पोशाक हो गयी है। साफ-सुथरा और सलीके से रहना उसे अच्छा लगता है। यहाँ आयी थी तब तीसरी पास थी। बाद में माथुर साहब ने उसे पढ़ने की सुविधा भी दे दी। दोपहर के समय पास के सरकारी स्कूल में चली जाती थी। इस वर्ष दसवीं का इम्तहान देने की तैयारी कर रही है। अनजाने में रश्मि उसका आदर्श बन गयी है। उसकी भावी योजनाओं को वह बड़े ध्यानपूर्वक सुनती है।

नन्दा ने करवट बदली। उसे सहसा समझ नहीं आ रहा कि इस उम्र में जब ब्याह की बात सुनकर गुदगुदी होनी चाहिए, मन में फुलझडियाँ छूटनी चाहिए, पैर जमीन पर नहीं टिकने चाहिए तब मन में अजीब-सी उदासी क्यों उतर आयी है। जैसे सब कुछ उससे छूट रहा है। उसके रहते मिसेज माथुर हर तरह से निश्चिन्त हैं। पहली तारीख को श्रीमती माथुर अच्छी-खासी रकम नन्दा के हाथ पर रख देती हैं। स्वीपर, चौकीदार, धोबी तथा दूध और अखबार वाले को भुगतान करने का काम नन्दा का है। इनमें से जो भी आता है, नन्दा को ही पूछता है। अपने छोटे से कमरे में नन्दा पैसे, हिसाब और रसीदें इतने व्यवस्थित ढंग से रखती है कि मिसेज माथुर को कभी पलटकर पूछना नहीं पड़ता। नन्दा दूध वाले और धोबी से हिसाब को लेकर जिरह भी कर लेती है। मिसेज माथुर के पास इतना समय ही नहीं है कि वह इन झंझटों में पड़े। रश्मि-मनोज के साथ वी० सी० आर० पर फिल्में देखना नन्दा का खास शौक है। जब कुमार दम्पत्ति काम पर गये होते हैं और बच्चे स्कूल, तब ट्रांजिस्टर आँन कर या कैसेट लगाकर किचन में काम करना उसकी आदत बन चुकी है। फुरसत होने पर अकेली कई बार वह देशी-विदेशी संगीत पर थिरकी भी है, जैसे रश्मि बेबी देर रात तक थिरकती रहती है। नन्दा माँ-बापू के घर को भी अपने वेतन से बदलने में लगी रहती है। पहले उसने फर्श पक्का करवाया और फिर घर को सजाया-सँवारा। प्रेशर-कुकर और गैस भी लाकर रुख दी। माँ को मजबूर करती रहती है कि वह इन चीजों को उपयोग मैं लाया करे। कहीं से किस्तों पर पुराना स्याह-सफेद टी० वी० भी ले आयी है। ऐसे में पान की पीक फैलाये और काजल आँजे वह बाल्या! फिर उसकी वह झुग्गी जिसके आसपास दिन-रात मच्छर भिनभिनाते रहते हैं। उसे  घिन आ गयी। आँखें सिकुड़ गयीं। हृदय की धड़कन तेज हो गयी।

लगा, कोई सपना टूट गया है। वह तो हवा में उड़ रही थी। किसी ने उसके. अदृश्य स्वप्न-महल पर पत्थर फेंक दिया है और उसकी किरचें उड़कर उसे अन्दर तक आहत कर गयी हैं। देह ही नहीं, मन भी लहूलुहान हो आया है। इससे पहले न तो उसने कभी शादी के बारे में सोचा था, न पुराने माहौल में लौटने का उसे ध्यान आया था। मन के किसी कोने में कहीं कुछ था तो आधुनिक सेज थी, चीकट हो आयी गोदडी नहीं। पर आज बात सामने आयी तो लगा जैसे किसी ने उसे सोते से जगा दिया है। ठहरे जल में कंकड़ी फेंक दी है। वह तो भूल ही गयी थी कि उसका मूल क्या है, कहाँ है? अचेतन में शायद कोई और ही विचार जन्म ले रहा था। पलकों कौ बन्द कर नींद को कैद करने की कोशिश आखिर सफल हुई। कुछ देर के लिए झपकी लग गयी। रह-रहकर भयावने दृश्य दिखायी देने लगे। कभी लगता, वह एक अंधी खोह में गिर गयी है और सहायता 'के लिए की गयी उसकी चीख-ढ़ुकार कोई सुन नहीं रहा है। कभी लगता मकड़जाल में मक्खी की भाँति फँस गयी है और भन्-भन् कर मुक्ति के लिए फड़फड़ा रही है। कभी लगता, काले-कलूटे मछुआरे ने जाल फेंककर उसे पानी के बाहर खींच लिया है और प्राण-वायु के लिए वह बुरी तरह तड़प रही है। सहसा हल्की-सी चीख उसके मुख से निकली। तभी घड़ी ने छ: बजाये। घबराकर वह उठ बैठी। महसूस किया कि सारा शरीर टूट रहा है। सिर और आँखें भारी हो गयी हैं। देह शिथिल पड़ गयी है, मानो किसी ने पूरा रक्त निचोड़ त्रिया हो। पर उठना तो था ही। मनोज-रश्मि के लिए नाश्ता और साहब के लिए बेड-टी तैयार करनी थी। वह जुट गयी। दिन भर जुटी रही। हूर दिन जुटी रही। मिसेज माथुर ने अनुभव किया कि अब नन्दा में काम के प्रति वैसा उत्साह नहीं रह गया है। प्राय: गुमसुम-सी रहती है। खोई-खोई। कई बार उन्होंने कुरेदना भी चाहा, मगर नन्दा हाँ-हूँ करके रह गयी। रश्मि से भी अब वह अधिक बातें नहीं करती। प्राय: एकटक उसकी आँखों में झाँकती रहती। अन्दर ही अन्दर रिसती बेबसी पर कई बार उसे खीझ हो आती। कभी-कभी विद्रोह का भाव मन मैं आता, पर साहस जवाब दे जाता। मन मसोसकर रह जाती।

इस बीच नन्दा घर नहीं आयी। दो-एक अवसर आये भी, पर वह टाल गयी। माँ-बापू आये थे पिछले दिनों, मिसेज माथुर को यह बताने कि उन्होंने नन्दा की शादी तय कर दी है। देव उठते ही उसकी शादी है। आप लोग आना। उन्होंने नन्दा को छुट्टी देने के लिए भी आग्रह किया। 'कल आकर हम लोग नन्दा को ले जायेंगे।' नन्दा के बापू ने कहा। मिसेज माथुर को लगा, आकर ले जाने का तो बहाना है, शायद इशारा तो हिसाब कर देने की ओर है। अन्यथा नन्दा तो अकेली भी घर जा सकती है। मगर मिसेज माथुर ने बुरा नहीं माना। जानती हैं, घर में शादी है। पैसों की जरूरत तो पड़ेगी ही।

'शादी के बाद भी नन्दा काम करेगी ?' मिसेज माथुर ने पूछा। 'एक तो बांदरा काफी दूर है। फिर बाल्या भी अपनी होने वाली बहूसे नौकरी कराना नहीं चाहता।' नन्दा की माँ ने जवाब दिया। मिसेज माथुर क्या कहतीं। एक ठंडी साँस भरकर रह गयीं।

माता-पिता के जाने के बाद नन्दा और भी उदास हो गयी। दिन यूं ही निकल गया। शाम को लौटते में मिसेज माथुर एक सुन्दर-सी साड़ी लेती आयीं। सोचा, बहुत सेवा की है लड़की ने। कल नयी साड़ी ओढाकर विदा करूँगी।

अगली शाम माँ-बापू लिवाने आ गये। मिसेज माथुर ने हिसाब के अलावा सौ रुपये नन्दा के हाथ पर धर दिये। फिर टीका निकालकर साड़ी ओढा दी। ऐसा करते समय उनके हाथ और नाक दोनों काँप रहे थे। डबडबाई आँखों से नन्दा ने उनके पैर छुए। फिर वह रश्मि की ओर मुड़ी। वहाँ भी एक सागर उमड़ने' को तैयार था। नन्दा बिलख पड़ी। रश्मि से लिपट गयी। अब तो आँसुओं पर काबू पाना उसके बस में नहीं रहा। लिपटकर फूट-फूटकर रोती रही। बड़ी मुश्किल से उसे अलग किया जा सका। माँ-बापू फटी-फटी आँखों से यह सब देखते रहे थे।. उन्हें क्या पता था कि वे नन्दा को रश्मि से नहीं उसके सपने से दूर करने की कोशिश कर रहे थे।

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साभार - कहानी संग्रह बिना चेहरे का पेट - कहानीकार - सूर्यकांत नागर , प्रकाशक दिशा प्रकाशन, दिल्ली -35.

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