प्रमोद भार्गव का आलेख - चुनावी वायदों की घूस

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    पांच राज्यों के निर्वाचन लोक-पर्व में लोक-लुभावन वायदों का सिलसिला कुछ ज्यादा ही तेज हो गया है। हमारी राजनीति के लगभग सभी दलों के कर्...




    पांच राज्यों के निर्वाचन लोक-पर्व में लोक-लुभावन वायदों का सिलसिला कुछ ज्यादा ही तेज हो गया है। हमारी राजनीति के लगभग सभी दलों के कर्णधार महाभारत के दानवीर कर्ण की भूमिका में आ गए हैं। मतदाता को ललचाने वाले ये अतिवादी वायदे क्या घूस के दायरे में नहीं आते ? और यदि आते हैं तो क्या ये आदर्श आचार संहिता का उल्लंघन नहीं हैं ? क्योंकि अब राजनीतिक दलों के घोषणा-पत्रों में नए कानून बनाकर नीतिगत फैसले लिए जाने की बजाए, मतदाता को व्यक्तिगत लाभ पहुंचाने की कवायद की जा रही है। मुस्लिमों को चुनाव के ठीक पहले पिछड़ों के कोटे में 4.5 फीसदी का कोटा आरक्षित करने से लेकर, उसे और बढ़ाने की घोषणाएं आखिरकार मतदाता को ललचाने का ही तो उपक्रम है। इसी तर्ज पर छात्रों को लैपटॉप और छोटी जोत के किसानों को मुफ्त नलकूप लगाए जाने के वादे किए जा रहे हैं। इससे जाहिर होता है राजनेता सत्ता हथियाने के लिए अधीर हैं। उनका धीरज और विवेक जवाब दे चुका है। इन हालातों का निर्माण इसलिए हुआ है क्योंकि राजनीति को जनसेवा की बजाए जायज-नाजायज और लूट-खसोट के गोरखधंधों का हिस्सा मान लिया गया है। हैरानी इस बात पर है कि अप्रत्यक्ष रूप से व्यक्तिगत घूस का पर्याय बने इन वादों का नोटिस चुनाव आयोग भी नहीं ले रहा ?

    उत्तर-प्रदेश में मुस्लिमों का प्रभावी वोट बैंक हैं। इस वोट बैंक को हथियाने के लिए आरक्षण का हथियार चुनावी समर में छोड़ दिया गया है। कांग्रेस चूंकि केंद्र की सत्ता में है, इसलिए उसने दो दशक से भी ज्यादा लंबे समय से उत्तर-प्रदेश में सत्ता में बाहर बने रहने के बहिष्कार की बहाली के लिए चुनावी दाल में आरक्षण का तड़का लगा दिया है। इस प्रयोग के लिए उसने पिछड़ा वर्ग के लिए निर्धारित 27 फीसदी आरक्षण में से साढ़े चार फीसद अल्पसंख्यकों के लिए तय करने का निर्णय निर्वाचन-घोषणा के ठीक पहले लिया है। चुनाव आयोग ने भले ही सतर्कता की मुनादी पीटते हुए इसके अमल पर अगले छह माहों के लिए रोक लगा दी हो, लेकिन मतदाता को लाभ पहंचाने वाले इस फैसले का असर तो चुनाव पर पड़ना तय है। मुस्लिम आरक्षण का नीतिगत फैसला लेने के बावजूद कांग्रेस यहीं नहीं रूकी, बल्कि आदर्श आचार संहिता को ठेंगा दिखाते हुए एक कदम और आगे बढ़ गई। केंद्रीय कानून मंत्री सलमान खुर्शीद ने अपनी पत्नी श्रीमती लुईस के चुनाव प्रचार में चुनावी मंच से बेहिचक ऐलान कर दिया कि यदि उत्तर-प्रदेश में कांग्रेस की सरकार बनती है तो वे इस आरक्षण को बढ़ाकर 9 प्रतिशत कर देंगे। अब देखना यह दिलचस्प होगा कि कांग्रेस को इस लोक-लुभावन वायदे का फायदा कितना मिलता है ?

    कांग्रेस द्वारा मुस्लिमों को ललचाने की यह कवायद उत्तर-प्रदेश में अन्य राजनीतिक दलों के लिए गले की हड्डी साबित हो रही है। मुलायम सिंह यादव के लिए तो कांग्रेस की यह चाल वजूद का संकट लेकर उभरी है। क्योंकि उनके वोट बैंक का मजबूत आधार तो मुस्लिम व पिछड़े वर्ग के वोटों का गठजोड़ ही है। लिहाजा मुस्लिम कहीं खिसक न जाएं इस लिहाज से मुलायम सिंह को घोषणा करनी पड़ी कि अल्पसंख्यकों के लिए आरक्षण की यह सीमा बहुत कम है, यदि हम सत्ता में आते हैं तो इसे 18 फीसदी किया जाएगा। तय है, यह अफलातूनी वादा उस कहावत को चरितार्थ करता है कि न नौ मन तेल होगा और न ही राधा नाचेगी। यहां यह भी रेखांकित करना जरूरी है कि 50 फीसदी से ज्यादा आरक्षण देने पर सर्वोच्च न्यायालय का प्रतिबंध लगा हुआ है। संविधान में संशोधन किए बिना अल्पसंख्यकों का और कोटा बढ़ाया जाना नमुमकिन है ? फिर भी हमारे देश के कर्णधार घोषणावीर बने हुए हैं।

    सवाल यहां यह भी उठता है कि यहां कोई भी राजनीतिक दल मुस्लिमों के सामाजिक व शैक्षिक उद्धार की बात नहीं कर रहा है। जबकि आरक्षण लाभ की सुविधा के साथ यह भी जोड़ने की जरूरत है कि अपनी आबादी पर नियंत्रण के लिए परिवार नियोजन जैसे राष्ट्रीय कार्यक्रम में योगदान करें। अपने बच्चों को मदरसा शिक्षा से बाहर लाकर शिक्षा की मुख्यधारा से जोड़ें ? क्योंकि किसी भी जाति का व्यापक व बहुउद्देशीय विकास परंपरागत जड़ताओं को तोड़े बिना संभव नहीं है ? इसे हम इस परिप्रेक्ष्य में भी देख सकते हैं कि हरिजन-आदिवासियों को तो आजादी के बाद से ही आरक्षण का लाभ हासिल है, तब क्या इन जातियों का समग्र विकास हो पाया ?

    वायदे और घोषणाएं इस चुनाव में मुस्लिम आरक्षण पर केंद्रित भले ही हों, लेकिन मतदाता को प्रलोभन देने के लिए अन्य टोटके भी आजमाए जा रहे हैं। मसलन, मुलायम सिंह की राजनीतिक विरासत को संभालने के लिए आगे बढ़ रहे उनके पुत्र अखिलेश यादव ने युवा मतदाताओं को ललचाने के लिए मुफ्त में लैपटॉप बांटने का वादा किया है। इसी तर्ज पर पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री अमरेन्द्र सिंह ने भी 10 वीं और 11 वीं कक्षाओं के सभी छात्र-छात्राओं को भी मुफ्त में लैपटॉप देने का भरोसा जताया है। यहां सोचने की जरूरत है कि क्या लैपटॉप हाथ में टांगने भर से बेरोजगारी दूर हो जाएगी ? कंप्यूटर-दक्षता की महत्ता भी तभी कारकर है जब सरकारी व निजी क्षेत्रों में लगातार नए रोजगार-सृजन के उपाय किए जाएं। वे सरकारें नए रोजगार के अवसर कैसे पैदा कर पाएंगी जो मौजूदा सरकारी कर्मचारियों की सेवा-निवृत्ति की उम्र बढ़ाने में लगी हैं ? इनकी उम्र घटाकर अथवा गोपनीय चारित्रावली (सी आर) खराब होने पर अनिवार्य सेवा-निवृत्ति देने पर ही मौजूदा-परिप्रेक्ष्य में नए रोजगार सृजित किए जा सकते हैं ?

    डींगें हांकने की इस कड़ी में पंजाब में सत्तारूढ़ शिरोमणी अकाली दल तो आसमान से तारे तोड़ लाने की बात कर रहा है। हालांकि यह दल फिर से पंजाब में सत्ता बहाल रख पाता है और वाकई तारों को जमीन पर उतार लाने में कामयाब होता है तो न केवल पंजाब का किसान खुशहाल होगा, बल्कि कृषि उपज में बढ़ोत्तरी भी दर्ज की जाएगी। अकाली दल ने किसानों को ललचाने के लिए वादा किया है कि पांच एकड़ तक का मालिकाना हक रखने वाले किसानों को एक साल के भीतर और इससे अधिक कृषि-भूमि के मालिक किसानों को दो साल के भीतर मुफ्त में नलकूप लगवाए जाएंगे। साथ ही फसल बीमा योजना, कृषि विपणन व सिंचाई की उम्दा सुविधाएं भी हासिल कराने का भरोसा अकाली दल ने जताया है। इसके अलावा गरीब किसानों के कृषि ऋण माफ करने, उन्हें 4 रूपए प्रति किलो आटा तथा 20 रूपए प्रति किलो दाल देने की सुविधा निरंतर जारी रखने का भी वादा किया गया है। यही नहीं पंजाब के दलित किसानों को घरेलू उपयोग के लिए 200 यूनिट बिजली प्रति परिवार मुफ्त देने का वादा भी किया गया है। ध्यान रहे पंजाब में दलित किसान 30 प्रतिशत हैं। इसी सरकार के उप मुख्यमंत्री सुखबीर सिंह बादल ने दलित कन्याओं को दी जाने वाली शगुन राशि को 15 हजार से बढ़ाकर 35 हजार करने और 11 वीं तथा 12 वीं के विद्यार्थियों को मुफ्त लैपटॉप देने का वचन दिया है।

   यह अच्छी बात है कि ऐसे काम हों, जिनसे आम-आदमी को राहत मिले। किंतु जब इन्हीं दलों को पूरे पांच साल काम करने का मौका मिलता है, उस दौरान ये इन वादों पर अमल क्यों नहीं करते ? वायदों का पिटारा ऐन चुनाव के वक्त ही खोलना क्या इस बात का परिचायक नहीं है कि यह लालच अथवा कवायद मतदाता को घूस देने की कोशिश करके अपना उल्लू सीधा करना भर है। इन वायदों का ऐलान करते वक्त दलों को यह भी ख्याल रखने की जरूरत है कि राज्य की जो आर्थिक हैसियत है, उसके आय के जो स्रोत हैं, उनकी बिना पर क्या वे इन वादों को पूरा कर पाएंगे अथवा राजकोष को चूना लागाएंगे ? ज्यादातर राज्यों के खजाने खाली हैं बावजूद वे, अति महत्वाकांक्षी योजनाओं के सब्जबाग दिखाकर एक प्रकार से मतदादा के साथ छल कर रहे हैं।

प्रमोद भार्गव
शब्दार्थ 49,श्रीराम कॉलोनी
शिवपुरी (म.प्र.) पिन 473-551

COMMENTS

BLOGGER: 2
  1. सीआर खराब करने से भ्रष्टाचार और बढ़ेगा. लोग जबरदस्ती खराब करेंगे फिर सुधरवाने के लिए कुछ न कुछ करना पड़ेगा.
    मुसलमानों को जनसँख्या के आधार पर देने का बाण चला ही दिया है. थोड़े दिनों बाद हर जाति को फिर उप जाति को.
    रक्तबीज बनायेंगे.

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  2. बेनामी9:34 pm

    bartman paripecho per apke katakch sargarvit hote he. jitendra.bhargava.

    जवाब देंहटाएं
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रचनाकार: प्रमोद भार्गव का आलेख - चुनावी वायदों की घूस
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