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गोवर्धन यादव की कविताएँ - जब मैंने पहली बार तुम्हें देखा था

गोवर्धन यादव goverdhan yadav

बेचैनी ने दुलराया

जब मैंने पहली बार
तुम्हें देखा था
दिल में मीठा दर्द दबाये
दिल में मीठा दर्द दबाये

नित देखा करता था स़पने
न जाने कितनी ही बार
बेचैनी ने दुलराया था
धडकनें हुई कई बार तेज
अभी तक नहीं जान पाया था

लगी दिल की बढ़ती रही सांसें
बर्फ़ सी जमती रहीं स्वप्न मेरे सजाने
आयी हो तो,द्वार पर क्यों खड़ी रह गईं

 


जिन्दगी भी मुस्कुरा देगी

प्रीत के गीत मुझे दे दो
तो मैं उम्र भर गाता रहूँ
प्रीत ही मुझे दे दो तो
मैं जिन्दगी भर संवारता रहूँ

जब मैं तुम्हारी सरहद में आया था
याद करूं तो कुछ याद न आया था
एक अजब खामोशी व खुमारी थी
जो मुझ पर अब तक छाये है

खामोशी के राज मुझे दे दो
कि मैं चैन की बंसी बजाता रहूँ
गीत नये-नये गाता रहूँ
गीत नये-नये गुनगुनाता रहूँ
तुम तभी से अपने हो
जब चांद तारे भी न थे
ये जमीं आसमान भी न थे
तुम तभी से साथ हमारे थे

गीतों के बदले जिन्दगी भी मांग लोगी
तो मुझे तनिक भी गम न रहेगा
क्योंकि मुझे मालूम है कि
गीतों के बहाने नयी जिन्दगी लेकर
तुम द्वार मेरे जरुर आओगी

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8

शेरशाह सूरी के घोड़े
मेरी स्मृति में
अब भी दौड़ते हैं
शेरशाह सूरी के घोड़े


घोड़ों के पीठ पर जांबाज सवार
जांबाज की पीठ पर कसा चमढे का थैला
चमड़े के थैलों में भरी ढेर सारी चिठ्ठियां
जमीन पर सरपट दौड़ते ये घोड़े


जंगल-पहाड-बीहड़ों को लांघते
नदी-तालाब-नालों को फ़लांगते
जा पहुँचते हैं उस गाँव में
जहाँ एक प्रेमिका,न जाने कबसे
बैठी है एक पत्र के इंतजार में
पत्र पाते ही खिल जाता है
उसका मुर्झाया चेहरा


बहने लगती है एक नदी
हरहरा कर उसकी देह में
घोड़ों को वापस लौटता देख
पूछती है मुमताज
अपनी प्रिय सहेली से
सखी- ये घोड़े फ़िर कब लौटेंगे ?

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गोवर्धन यादव

103, कावेरी नगर, छिन्दवाडा (म.प्र.) 480001

2 टिप्पणियाँ

  1. लगी दिल की बढ़ती रही सांसें
    बर्फ़ सी जमती रहीं स्वप्न मेरे सजाने
    आयी हो तो,द्वार पर क्यों खड़ी रह गईं
    अच्छी रचनाएँ..
    आभार.

    जवाब देंहटाएं
  2. गोवर्धन यादव1:53 pm

    आपको मेरी रचना अच्छी लगी. धन्यवाद.

    जवाब देंहटाएं

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