शिवेन्द्र प्रताप त्रिपाठी का आलेख - घराना - भारतीय संगीत का पर्यायवाची

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डॉ . शिवेन्द्र प्रताप त्रिपाठी घराना - भारतीय संगीत का पर्यायवाची भारतीय शिक्षा पद्धति में 'गुरू' का स्थान सर्वोपरि माना गया ह...

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डॉ. शिवेन्द्र प्रताप त्रिपाठी

घराना - भारतीय संगीत का पर्यायवाची

भारतीय शिक्षा पद्धति में 'गुरू' का स्थान सर्वोपरि माना गया है यथा-

गुरूर्ब्रह्मा, गुरूर्विष्णुः गुरूर्देवो महेश्वरः। गुरूर्साक्षात् परब्रह्म तस्मै श्री गुरूवे नमः।।

गुरू ब्रह्मा अर्थात् सर्जक, विष्णु अर्थात् पालक एवं शिव अर्थात् दुर्गुणों के संहारक हैं। ऐसे गुरू जो साक्षात परब्रह्म स्वरूप हैं, उन्हें नमन है। अतः गुरू का स्थान देवताओं के समतुल्य और कहीं-कहीं पर उनसे भी ऊपर माना गया है।

संगीत में घराना शब्द का विशेष स्थान है। घरानों का महत्व केवल संगीत में ही नहीं, बल्कि हमारे दैनिक जीवन में भी है। घराना का शाब्दिक अर्थ है - परम्परा, कुटुम्ब, वंश-परम्परा, परिवार, वर्ग, सम्प्रदाय आदि। हिन्दुस्तानी संगीत एवं घराना एक-दूसरे के पर्यायवाची हैं। घराना रीति या शैली का ही दूसरा नाम है। घराना शब्द संगीत जगत में इतना अधिक प्रचलित है कि जन-साधारण भी इससे अपरिचित नहीं है, क्योंकि अधिकतर संगीतकार किसी न किसी घराने से सम्बन्धित हैं। घराने हमारी संस्कृति और परम्पराओं को सुदृढ़ रखने, विकास धारा को आगे बढ़ाने, अनुशासन, संयम एवं पूर्वजों के प्रति श्रद्धा रखने की शिक्षा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। घरानों के कारण ही प्राचीन भारतीय संगीत का स्वरूप सुरक्षित है। घरानों की गुरू-शिष्य परम्परा के द्वारा ही संगीत के प्राचीन रूप, सिद्धान्तों एवं रचनाओं को जीवित रखते हुए नये प्रयोगों को भी स्थान मिला है। जिससे प्राचीन सिद्धांत एवं रचनायें आज भी उतनी ही नयी एवं समसामयिक हैं। जन्म-मृत्यु के बंधन में बंधे गुरू एवं कलाकार तो नहीं रहे लेकिन संगीत जन्म-मृत्यु के बंधनों से परे है। गुरू-शिष्य-परम्परा के रूप में यह कला आज भी जीवित है और वर्षों से यह क्रम अनवरत जारी है। घराने का निर्माण गुरू तथा शिष्य दोनों के संयोग से होता है। गुरू अपनी कला के किसी विशेष अंग पर विशेषता प्राप्त कर लेता है जिससे कि अन्य अंगों की अपेक्षा वह विशेष अंग उसकी कला में अद्भुत दिखाई पड़ता है। वही विशेषता वह अपने शिष्यों को भी सिखाता है। 'वंशो द्विविधा जन्मना विद्यया च'। अर्थात् वंश या कुल दो प्रकार से चलता है - एक जन्म से और दूसरा विद्या से। जैसे एक परिवार में जन्में सभी व्यक्ति एक परिवार या घराना के होते हैं, उसी प्रकार एक गुरू के सभी शिष्य एक परिवार या घराना के होते हैं। भारतीय संगीत में घराना के लिये सम्प्रदाय शब्द का भी प्रयोग होता है। सम्प्रदाय शब्द संस्कृत भाषा के 'सम्' और 'प्रदाय' शब्दों के योग से बना है। सम्प्रदाय का अर्थ होता है-किसी वस्तु को विधिवत् व विशिष्टतापूर्वक देने की प्रक्रिया। सुसम्प्रदायो गीतज्ञैर्गीयते गायनाग्रणीः - गायन के लक्षण बतलाते हुए पं. शारंगदेव ने 'सुसम्प्रदाय' शब्द का उल्लेख किया है। जिसका अर्थ होता है 'उत्तम गुरू परंपरा से शिक्षा पाया हुआ'।

मुख्यतः घराने का आरम्भ खयाल गायकी के साथ हुआ है। ध्रुपद गायकी में बानी शब्द का प्रयोग मिलता है। गायन की तरह वादन और नृत्य में भी घराने होते हैं। इन घरानों का नामकरण प्रायः इनकी उत्पत्ति के स्थान के नाम पर होता है। सर्वप्रथम ज्ञात घराना लखनऊ का 'कव्वाल बच्चों का घराना' है जो कव्वाली गाने वाले बच्चों का था। घराने का मुखिया खलीफा या उस्ताद कहलाता था। घराना एक पारिवारिक परम्परा है जिसमें कला पुत्र को पिता द्वारा विरासत में दी जाती है। बाद में सुयोग्य पुत्र के अभाव में घरानों को आगे बढ़ाने के लिए इसमें दामाद, भतीजे, भान्जे आदि भी सम्मिलित किये जाने लगे। लेकिन प्रथम अधिकार पुत्र तत्पश्चात् निकटतम रक्त-सम्बन्धी को ही मिलता था और इसी क्रम में इन्हें आगे बढ़ाया जाता था। विशेष परिस्थितियों में ही किसी प्रतिभाशाली कलाकार को प्रोत्साहित किया जाता था। घराने को व्यक्तिगत सम्पत्ति की तरह प्रयोग किया जाता था। कालान्तर में घरानों की स्थापना व्यक्तिगत पहचान, शैलीगत विशिष्टता आदि को दर्शाने के लिए भी होती रही है। इस तरह के घराने व्यक्ति विशेष के नाम से जाने जाते थे। लेकिन ऐसे घराने इनके संस्थापकों के साथ ही समाप्त हो गये। इन घरानों को घरानों के स्थान पर एक प्रतिभाशाली कलाकार की सौन्दर्य दृष्टि कहना उचित है, क्योंकि किसी घराने की मान्यता पाने के लिए तीन पीढ़ियों तक परम्परा का निर्वहन आवश्यक है। अधिकतर घराने उत्तर प्रदेश एवं मध्य प्रदेश में ही पनपे हैं।

घरानों का प्रचलन उत्तर भारत तथा दक्षिण भारत दोनों में समान रूप में पाया जाता है। उत्तर भारत में इसे 'घराना' तथा दक्षिण भारत में इसे 'सम्प्रदाय' कहते हैं। 'सम्प्रदाय' शब्द हमारी संगीत परम्परा के लिए नया नहीं है। कला तथा साहित्य के विभिन्न क्षेत्रों में भी विभिन्न सम्प्रदाय पाये जाते हैं। इन्हें पाश्चात्य देशों में 'स्कूल्स' (Schools) कहा जाता है। भारत में यही 'मत' या 'वाद' के नाम से भी प्रचलित हैं। प्राचीन काल में संगीत में शिवमत, ब्रह्ममत तथा भरतमत जैसे विभिन्न सम्प्रदाय थे। ये वे घराने थे जिनकी संगीत तथा नाट्य के संबंध में विशिष्ट एवं स्वतंत्र मान्यताएँ थीं। शास्त्र तथा कला के सूक्ष्म अंगों का ग्रहण तब तक नहीं होता जब तक किसी योग्य आचार्य से विधिवत् शिक्षा न ली जाये। कला या शास्त्र की सफलता में गुरू एवं शिष्य दोनों का बराबर योगदान होता है। आचार्य भरत के अनुसार शिष्य निष्पादन भी आचार्य का एक गुण बताया गया है और अच्छे शिष्य ही गुरू-परम्परा को वास्तविक रूप में सुरक्षित रखने में समर्थ होते हैं। विद्यादान करने वाले समर्पित गुरू और प्रतिभाशाली शिष्य तैयार होने पर ही सम्प्रदाय या घराने का विकास होता है।

तबला वादन के क्षेत्र में बाज शब्द विशेष रूप से प्रचलित है। बाज से तात्पर्य किसी भी वाद्य की वादन शैली से है, जिसमें उस वाद्य की वादन शैली में प्रयुक्त तकनीकियों का समावेश होता है। तबला वाद्य की वादन शैली के अर्थ में लोकभाषा का 'बाज' शब्द संगीतज्ञों में प्रचलित है, जिसकी व्युत्पत्ति 'वाद्य' शब्द से हुई है। बजाए जाने वाले उपकरण के अतिरिक्त उसे बजाने की प्रक्रिया को भी संस्कृत भाषा में 'वाद्य' कहा जाता है। अतः 'वाद्य' शब्द से 'बाज' शब्द की व्युत्पत्ति इस प्रकार हुई है- वाद्य-बाद्य-बाज्य-बाज। तबले के बाज से तात्पर्य तबले को बजाने की प्रक्रिया, वादन शैली, तबले पर हाथ रखने का ढंग एवं उँगलियों से तबले में प्रयुक्त होने वाले वर्णों के निकास से होता है। वर्णों का निकास और शब्द-समूहों का विशेष रूप से प्रयोग करना ही घराने की पहचान है।

गुरू-शिष्य परम्परा : भारत में गुरू का स्थान सदैव से सर्वोच्च और परमादरणीय रहा है। उसे देवताओं और माता-पिता से भी ऊँचा स्थान दिया गया है, क्योंकि वह ज्ञान का प्रकाश प्रदान करते हैं। प्राचीन काल में श्रेष्ठ ऋषि गुरू होते थे जो जीवन, दर्शन, साहित्य, संगीत, कला, आध्यात्म, प्रशासन, युद्धकला आदि ज्ञान के सभी विधाओं में निष्णात होते थे। शिष्य, भले ही वह राजपरिवार का सदस्य हो, गुरू के आश्रम में रहकर उनकी सेवा करके ज्ञान का अर्जन करता था। शिष्य गुरूकुल में वषरें साधना करके ज्ञान के विभिन्न विधाओं में पारंगत होकर अपने परिवार में वापस आकर उस ज्ञान का अपने जीवन में प्रयोग करता था। चूँकि शिष्य एक ही गुरू के पास रहकर सम्पूर्ण ज्ञानार्जन करता था, इसलिए इसे एक परम्परा का नाम दिया गया। इस तरह ज्ञान का विस्तार पीढ़ी दर पीढ़ी होता गया। आज भी इस परम्परा को गुरू-शिष्य परम्परा के नाम से जाना जाता है और संगीत के क्षेत्र में अत्यधिक प्रचलित है। गुरू-शिष्य परम्परा के संदर्भ में विश्वविख्यात तबला वादक पद्मविभूषण पं. किशन महाराज का कथन था कि- प्राचीनकाल से चली आ रही यही परम्परा आज भी श्रेष्ठ है। नादब्रह्म की शिक्षा के लिए आज जिन तौर-तरीकों का उपयोग किया जा रहा है, उनके परिणामों से भला कौन अनभिज्ञ है? संगीत एक दैवीय वरदान है और वरदान को पाने के लिए आपको कठिन तपस्या तो करनी ही पड़ेगी। जयपुर के बीनकार घराने के ग्यारहवीं-बारहवीं पीढ़ी के अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त कलाकार तथा रूद्र वीणा और खण्डार शैली के एकमात्र प्रतिनिधि उस्ताद असद अली खाँ के अनुसार- ''भारतीय शास्त्रीय संगीत को बचाए रखने का सिर्फ और सिर्फ एक ही रास्ता है गुरू-शिष्य परम्परा।''

एक आदर्श गुरू के गुणः एक आदर्श गुरू के लक्षण इस प्रकार हैं- स्मृति, मति, मेधा, उहा (विवेकयुक्त, तर्कयुक्त) एवं अपोह (संकल्प)। एक गुरू को आस्तिक, शास्त्रज्ञ, सात्विक, सुसंस्कृत, मर्यादित, दानी, सहृदय, अनुशासित, संयमी एवं उदार होना चाहिए।

एक आदर्श शिष्य के गुणः एक आदर्श शिष्य के लक्षण इस प्रकार हैं- मेधा, स्मृति, श्लाघना (प्रशंसनीय), राग, संघर्ष, एवं उत्साह। एक शिष्य को जिज्ञासु, परिश्रमी, संयमी, लगनशील, एकाग्रचित्त, स्वस्थ, विनम्र, गुरू के प्रति समर्पित एवं उत्तरदायी, गुरू का आदर करने वाला होना चाहिए।

भरतनाट्यम् नृत्यांगना पद्मश्री सरोजा वैद्यनाथन के अनुसार शास्त्रों में पाँच प्रकार की शिक्षण प्रणालियाँ (तंत्र) बताई गई हैं-

1. मत्स्य तंत्र : जिस प्रकार मछली केवल अपनी दृष्टि के द्वारा अपने अण्डों को सेती है, उसी प्रकार इस तंत्र के अंतर्गत, गुरू भी अपने व्यवहार एवं हाव-भाव के द्वारा शिष्य में अपनी सम्पूर्ण विद्या को प्रवाहित करता है और उसे स्वयं अपनी मेहनत द्वारा निखरने का अवसर देता है।

2. कूर्म तंत्र : जिस प्रकार कछुआ अपने अण्डों को जमीन पर स्वतः विकसित होने के लिए छोड़ देता है और पानी में रह कर भी उनके विषय में सोचता रहता है, उसी प्रकार इस तंत्र के अंतर्गत, गुरू अपने शिष्य को विद्या के सभी पक्षों पर शिक्षित करता है और एक दूरी बनाये रखता है। लेकिन वह शिष्य को बराबर यह अनुभूति कराता रहता है कि शिष्य उसके लिए बहुत महत्वपूर्ण है।

3. भ्रमर तंत्र : जिस प्रकार भँवरा एक कीड़े को लगातार डंक मारने जैसा व्यवहार करता है, लेकिन इस दौरान लगातार स्पर्श करने की प्रक्रिया में वह कीड़ा स्वयं एक भँवरा में परिवर्तित हो जाता है, उसी प्रकार इस तंत्र के अंतर्गत, गुरू अपने शिष्य पर लगातार अपनी दृष्टि रखकर शिष्य को सोचने, सीखने, ज्ञान प्राप्त करके अपनी सामर्थ्य और गुणों का विकास करने योग्य बनाता है।

4. मार्जार तंत्र : जिस प्रकार बिल्ली अपने बच्चों को बड़ा होने तक अपने पास रखकर अपने सारे गुण उसे देती है, उसी प्रकार इस तंत्र के अंतर्गत, गुरू अपने शिष्य को अपने पास रखकर अपना पूरा ज्ञान उसे देकर परिपक्व होने पर उसे विकसित होने के लिए छोड़ देता है।

5. मर्कट तंत्र : जिस प्रकार वानर अपने बच्चे को अपनी छाती से चिपकाये रहता है और उसे जब और जितनी आवश्यकता होती है उसे दूध पिलाती है, उसी प्रकार इस तंत्र के अंर्तगत, गुरू अपने शिष्य को अपने पास जब और जितनी आवश्यकता होती है शिक्षा प्रदान करता है।

संगीत शिक्षा के क्षेत्र में गुरू एवं शिष्य के भावनात्मक एवं क्रियात्मक मिलन को ही परम लक्ष्य माना गया है। संगीत सदैव से ही गुरूमुख से ग्रहण की जाने वाली विद्या रही है। कला सौन्दर्य का आविष्कार करती है और इसी के किसी विशिष्ट अंग पर अधिकार पाने के लिए घरानों का जन्म हुआ है। अनुकरण घराने का मूल तत्व अर्थात् आधार है। घराना और स्वतंत्र व्यक्तित्व दो परस्पर विरोधी तत्व हैं। शिष्य द्वारा गुरू से शिक्षा प्राप्त करने के उपरान्त अपनी कल्पना-शक्ति, भावाभिव्यक्ति की क्षमता, बुद्धि व कला-कौशल से अपनी शैली को सुन्दर, सरस व आकर्षक बनाने का प्रयत्न करने से ही घराना प्रतिष्ठा प्राप्त करता है। आधुनिक संदर्भ में घरानों की उपयोगिता के प्रश्न महत्वपूर्ण हैं। परिस्थितियाँ बदल चुकी हैं, एक शिष्य को विभिन्न गुरूओं को देखने, सुनने तथा उनके गुणों को आत्मसात् करने की प्रचुर सुविधाएँ उपलब्ध हैं। अपनी रूचि, रूझान तथा क्षमता के अनुसार वह अपनी शैली का चयन खुद कर सकता है। आज सीना-ब-सीना तालीम के स्थान पर सामुदायिक शिक्षा का प्रचलन है।

परन्तु सत्यता यही है कि संगीत एक गुरूमुखी विद्या है तथा गुरू के द्वारा ही जीवन में ज्ञान रूपी प्रकाश का आगमन हो सकता है। गुरू ही परम ज्ञान द्वारा परमेश्वर तक पहुँचने का माध्यम है - “ ‘Gu’ means dark and ‘Ru’ means light, the ‘Guru’ being the one who leads from darkness to light. Guru is a teacher of life or a spiritual mentor who leads the shishya from ignorance to wisdom and enlightenment. ‘Kul’ refers to the home of the Guru where, the disciple resides until the rigorous learning process is complete. Different Gharanas are like different flowers. Each flower has its own fragrance & excellence.”

संदर्भ-

· संगीतरत्नाकर - पं. शारंगदेव

· तालकोश - प्रो. गिरिशचन्द्र श्रीवास्तव

· अंतर्नाद : सुर और साज़ - पं. विजयशंकर मिश्र

· BHARATANATYAM - An In-depth Study - Smt. Saroja Vaidyanathan

· Understanding Indian Music - Babu Rao Joshi

· तबले का उद्गम, विकास और वादन शैलियाँ - डॉ.(श्रीमती) योगमाया शुक्ला

· भातखण्डे संगीत संस्थान, लखनऊ में पं. विद्याधर व्यास का व्याख्यान

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डॉ. शिवेन्द्र प्रताप त्रिपाठी

डॉ. शिवेन्द्र प्रताप त्रिपाठी का जन्म वाराणसी में हुआ। तबले की प्रारम्भिक शिक्षा अपने पिता स्व. राजेन्द्र तिवारी से प्राप्त करने के पश्चात् डॉ. शिवेन्द्र गुरू-शिष्य परम्परा के अन्तर्गत बनारस घराने के तबला विद्वान पं. छोटेलाल मिश्रजी से विधिवत् एवं दीर्घकालीन तबला वादन की शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं। संगीत एवं मंच कला संकाय, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय (वाराणसी) से स्नातकोत्तर परीक्षा में स्वर्ण पदक तथा पं. ओंकारनाथ ठाकुर स्मृति सम्मान प्राप्त कर चुके शिवेन्द्र को विश्वविद्यालय अनुदान आयोग से जूनियर रिसर्च फैलोशिप भी मिला है। इन्होंने यू.जी.सी. की प्रवक्ता पात्रता परीक्षा भी उत्तीर्ण की है। इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय (खैरागढ़) से प्रो. (डॉ.) प्रकाश महाडिक तथा पं. छोटेलाल मिश्र के मार्गदर्शन में तबले के बनारस बाज पर शोध कार्य कर चुके शिवेन्द्र की कई रचनायें विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं। एक अन्य शोध कार्य हेतु संस्कृति मत्रालय से जूनियर फैलोशिप प्राप्त डॉ. शिवेन्द्र का बनारस बाज पर एक शोधपूर्ण लेख भी 'भारतीय संगीत के नये आयाम' पुस्तक में प्रकाशित हो चुका है। इनकी एक पुस्तक भी कनिष्क पब्लिशर्स, नईदिल्ली से प्रकाशित हुई है - तबला विशारद। डॉ. शिवेन्द्र आई.सी.सी.आर. के आर्टिस्ट पैनल से भी तबला वादक के रूप में जुड़े हैं। गाँधी हिन्दुस्तानी साहित्य सभा, राजघाट, नईदिल्ली द्वारा संचालित नवोदित कलाकार समिति की ओर से 'संगीत साधक' की उपाधि से सम्मानित डॉ. शिवेन्द्र प्रताप त्रिपाठी देश के विभिन्न मंचों पर तबला वादन कर चुके हैं। सम्प्रति संगीत एवं नृत्य विभाग, कुरूक्षेत्र विश्वविद्यालय, कुरूक्षेत्र में सहायक प्राध्यापक-तबला पद पर कार्यरत हैं।

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डॉ. शिवेन्द्र प्रताप त्रिपाठी

सहायक प्राध्यापक-तबला,

संगीत एवं नृत्य विभाग,

कुरूक्षेत्र विश्वविद्यालय,

कुरूक्षेत्र-136119

मोबाइल - 07206674092

-मेलः shivendra.tripathi@hotmail.com

नाम

 आलेख ,1, कविता ,1, कहानी ,1, व्यंग्य ,1,14 सितम्बर,7,14 september,6,15 अगस्त,4,2 अक्टूबर अक्तूबर,1,अंजनी श्रीवास्तव,1,अंजली काजल,1,अंजली देशपांडे,1,अंबिकादत्त व्यास,1,अखिलेश कुमार भारती,1,अखिलेश सोनी,1,अग्रसेन,1,अजय अरूण,1,अजय वर्मा,1,अजित वडनेरकर,1,अजीत प्रियदर्शी,1,अजीत भारती,1,अनंत वडघणे,1,अनन्त आलोक,1,अनमोल विचार,1,अनामिका,3,अनामी शरण बबल,1,अनिमेष कुमार गुप्ता,1,अनिल कुमार पारा,1,अनिल जनविजय,1,अनुज कुमार आचार्य,5,अनुज कुमार आचार्य बैजनाथ,1,अनुज खरे,1,अनुपम मिश्र,1,अनूप शुक्ल,14,अपर्णा शर्मा,6,अभिमन्यु,1,अभिषेक ओझा,1,अभिषेक कुमार अम्बर,1,अभिषेक मिश्र,1,अमरपाल सिंह आयुष्कर,2,अमरलाल हिंगोराणी,1,अमित शर्मा,3,अमित शुक्ल,1,अमिय बिन्दु,1,अमृता प्रीतम,1,अरविन्द कुमार खेड़े,5,अरूण देव,1,अरूण माहेश्वरी,1,अर्चना चतुर्वेदी,1,अर्चना वर्मा,2,अर्जुन सिंह नेगी,1,अविनाश त्रिपाठी,1,अशोक गौतम,3,अशोक जैन पोरवाल,14,अशोक शुक्ल,1,अश्विनी कुमार आलोक,1,आई बी अरोड़ा,1,आकांक्षा यादव,1,आचार्य बलवन्त,1,आचार्य शिवपूजन सहाय,1,आजादी,3,आत्मकथा,1,आदित्य प्रचंडिया,1,आनंद टहलरामाणी,1,आनन्द किरण,3,आर. के. 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श्रीवास्तव,1,गंगाप्रसाद शर्मा गुणशेखर,1,ग़ज़लें,550,गजानंद प्रसाद देवांगन,2,गजेन्द्र नामदेव,1,गणि राजेन्द्र विजय,1,गणेश चतुर्थी,1,गणेश सिंह,4,गांधी जयंती,1,गिरधारी राम,4,गीत,3,गीता दुबे,1,गीता सिंह,1,गुंजन शर्मा,1,गुडविन मसीह,2,गुनो सामताणी,1,गुरदयाल सिंह,1,गोरख प्रभाकर काकडे,1,गोवर्धन यादव,1,गोविन्द वल्लभ पंत,1,गोविन्द सेन,5,चंद्रकला त्रिपाठी,1,चंद्रलेखा,1,चतुष्पदी,1,चन्द्रकिशोर जायसवाल,1,चन्द्रकुमार जैन,6,चाँद पत्रिका,1,चिकित्सा शिविर,1,चुटकुला,71,ज़कीया ज़ुबैरी,1,जगदीप सिंह दाँगी,1,जयचन्द प्रजापति कक्कूजी,2,जयश्री जाजू,4,जयश्री राय,1,जया जादवानी,1,जवाहरलाल कौल,1,जसबीर चावला,1,जावेद अनीस,8,जीवंत प्रसारण,141,जीवनी,1,जीशान हैदर जैदी,1,जुगलबंदी,5,जुनैद अंसारी,1,जैक लंडन,1,ज्ञान चतुर्वेदी,2,ज्योति अग्रवाल,1,टेकचंद,1,ठाकुर प्रसाद सिंह,1,तकनीक,32,तक्षक,1,तनूजा चौधरी,1,तरुण भटनागर,1,तरूण कु सोनी तन्वीर,1,ताराशंकर बंद्योपाध्याय,1,तीर्थ चांदवाणी,1,तुलसीराम,1,तेजेन्द्र शर्मा,2,तेवर,1,तेवरी,8,त्रिलोचन,8,दामोदर दत्त दीक्षित,1,दिनेश बैस,6,दिलबाग सिंह विर्क,1,दिलीप भाटिया,1,दिविक रमेश,1,दीपक 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तौंसवी,1,फ्लेनरी ऑक्नर,1,बंग महिला,1,बंसी खूबचंदाणी,1,बकर पुराण,1,बजरंग बिहारी तिवारी,1,बरसाने लाल चतुर्वेदी,1,बलबीर दत्त,1,बलराज सिंह सिद्धू,1,बलूची,1,बसंत त्रिपाठी,2,बातचीत,2,बाल उपन्यास,6,बाल कथा,356,बाल कलम,26,बाल दिवस,4,बालकथा,80,बालकृष्ण भट्ट,1,बालगीत,20,बृज मोहन,2,बृजेन्द्र श्रीवास्तव उत्कर्ष,1,बेढब बनारसी,1,बैचलर्स किचन,1,बॉब डिलेन,1,भरत त्रिवेदी,1,भागवत रावत,1,भारत कालरा,1,भारत भूषण अग्रवाल,1,भारत यायावर,2,भावना राय,1,भावना शुक्ल,5,भीष्म साहनी,1,भूतनाथ,1,भूपेन्द्र कुमार दवे,1,मंजरी शुक्ला,2,मंजीत ठाकुर,1,मंजूर एहतेशाम,1,मंतव्य,1,मथुरा प्रसाद नवीन,1,मदन सोनी,1,मधु त्रिवेदी,2,मधु संधु,1,मधुर नज्मी,1,मधुरा प्रसाद नवीन,1,मधुरिमा प्रसाद,1,मधुरेश,1,मनीष कुमार सिंह,4,मनोज कुमार,6,मनोज कुमार झा,5,मनोज कुमार पांडेय,1,मनोज कुमार श्रीवास्तव,2,मनोज दास,1,ममता सिंह,2,मयंक चतुर्वेदी,1,महापर्व छठ,1,महाभारत,2,महावीर प्रसाद द्विवेदी,1,महाशिवरात्रि,1,महेंद्र भटनागर,3,महेन्द्र देवांगन माटी,1,महेश कटारे,1,महेश कुमार गोंड हीवेट,2,महेश सिंह,2,महेश हीवेट,1,मानसून,1,मार्कण्डेय,1,मिलन चौरसिया 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रचनाकार: शिवेन्द्र प्रताप त्रिपाठी का आलेख - घराना - भारतीय संगीत का पर्यायवाची
शिवेन्द्र प्रताप त्रिपाठी का आलेख - घराना - भारतीय संगीत का पर्यायवाची
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