डॉ. हीरालाल प्रजापति की 10 ग़ज़लें

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            ग़ज़ल -1 आख़िरी क्या  सोचकर पहला  लिखा ।। उनका इक्का  किसलिए दहला लिखा ।। जिसको जग कहता थका न वाटिका , तुमने खाली उसको इक गमला ल...

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            ग़ज़ल -1
आख़िरी क्या  सोचकर पहला  लिखा ।।
उनका इक्का  किसलिए दहला लिखा ।।

जिसको जग कहता थका न वाटिका ,
तुमने खाली उसको इक गमला लिखा ।।

पाक था उजला था इकदम साफ था ,
फिर भी तुमने उसको धुर मैला लिखा ।।

वाँ सभी लोगों के सिर बिन बाल थे ,
तुमने कुछ को ही मगर टकला लिखा ।।

अपना घर हरिद्वार काशी द्वारका ,
ग़ैर का मंदिर तलक चकला लिखा ।।

तुमने रिश्वत के लिए तारीख़ में ,
झूठे को हरिचंद का पुतला लिखा ।।

झूठ है या आधा सच है सूर को ,
तुमने काना गूंगे को हकला लिखा ।।

घर से भागा वो तुम्हारे जुल्म से ,
तुमने मर्ज़ी से उसे निकला लिखा ।।

मुंसिफाना और मुनासिब अपने सब ,
दूसरों का हर कदम घपला लिखा ।।

जब समझ न आई उसकी बात तो ,
तुमने दानिशमंद को पगला लिखा ।।

  

           ग़ज़ल -२
वो सीमोज़र वो जवाहर वो पाक लगते हैं ।।
हम उनके आगे लोह संग ख़ाक लगते हैं ।। 

वो अमलतास वो कचनार वो बरगद पीपल ,
हम तो महुआ, बबूल, बेर, ढाक लगते  हैं ।।

वो बहुत बढ़िया, बहुत अच्छे, बहुत  ख़ास दिखें ,
हम बुरे तो नहीं बस ठीक-ठाक लगते हैं ।।

वो महकते हुए संदल गुलाब के पौडर ,
हम उड़ती धुल ओ' कंडे की राख लगते हैं ।।

वो लिरा-पौंड वो दीनार वो डालर गिन्नी ,
हम तो फूटी हुई कौड़ी की आँख लगते हैं ।।

हम नहीं एक टन से एक मासा कम लेकिन ,
उनके  आगे तो तोला या छटाँक लगते हैं ।।

इक वही हमको समझते हैं पोला सरकंडा ,
बाक़ी दुनिया को हम भरी सलाख लगते हैं ।।

कृष्ण छिगुनी पे उठा लेते हैं गोवर्धन को ,
राम के आगे कहाँ पर पिनाक लगते हैं ।।

इतना उजला है उनका रंग इतना उजला है ,
हंस बगुले भी उनके आगे काक लगते हैं ।।

जितने लगते हैं हसीं भोले ख़ुशी के दम में ,
उससे खफगी में बहुत खौफनाक लगते हैं ।।
        

 
                ग़ज़ल -3
तेरे होते निर्जन भी कब निर्जन होता है ।।
सन्नाटों में भी भौंरों सा गुंजन होता है ।।

तू न दिखे तो सच आँखें औचित्यहीन  लगतीं ।।
तो जो मिले मन मरुथल वृन्दावन होता है ।।

तेरे सँग ही अपना जी भर लंच-डिनर होता ,
बिन तेरे केवल पीना या अनशन होता है ।।

तू राँझे को हीर सरीखा कैस को लैला सा ।।
मैं अंधे के हाथ में जैसे दर्पन होता है ।।

तू संतान नहीं मानव की कहीं से लगती है ,
तुझसी रचना का पितु अलख निरंजन होता है ।।

छूना भी तुझको यथार्थ में दिवा स्वप्न अपना ,
किन्तु स्वप्न में नित्यालिंगन चुम्बन होता है ।।

यों खग जी सकता है बिन पंखों के पर कब तक,
उड़ने वाले को चलना कब शोभन होता है ।।
                    

              ग़ज़ल -4
पहले थे नर्मोनर्म गुल अब केक्टस हुए ।।
आँखों का जो अंजन थे लाल मिर्च जस हुए ।।

पहले थे सुलभ सस्ते बीड़ी जर्दा तम्बाकु ,
अब कीमती सिगारो अफ़ीमो चरस हुए ।।

पहले थे उनके दूध में हम जाफ़रान से,
आज इक क़रीह भिनभिनाती सी मगस हुए ।।

सब कुछ था हममें खूबसूरती के सिवाय ,
हम नींव में गड़े वो चमकते कलस हुए ।।

जब से मिली है उनको इक हसीं की मोहब्बत ,
सूखे थे सुपाड़ी से वो गन्ना सरस हुए ।।

जीते जी पड़ोसी भी जिन्हें जान न सके ,
मरने के बाद उनके ज़माने में जस हुए ।।

करने को उनकी धूप को कुछ और चमकदार ,
पूनम के सब चराग़ अमा के तमस हुए ।।

चुभवा लीं सुइयाँ हँसके जगह से हिले बगैर ,
इक गुदगुदी के नाम से झट टस  से मस हुए ।।

                       
करीह=घिनौनी ,मगस =मक्खी 

 


                     ग़ज़ल -5
मुझको बँगले न हवेली न किसी घर की तलाश ।।
सर छुपाने को फ़क़त फूस के छप्पर की तलाश ।।

जिसके हर घर में बगीचा हो एक हो आँगन ,
गाँव जैसा हो मुझे वैसे इक शहर की तलाश ।।

न मिठाई न मेवे फल न दवाई-दारू ,
पेट की भूख जो मारे है उस ज़हर की तलाश ।।

न तेंदुआ न चीता; बाघ न कोई बिल्ली,
मुझको गब्बर ओ' ज़बर शेर-ए-बब्बर की तलाश ।।

न सुबह शाम का सूरज न सितारे ढूँढूँ ,
मुझको हर रात को चौदहवीं के क़मर की तलाश ।।

जिसने तकलीफ़ो ग़म न झेले न रोया हो कभी,
सारी दुनिया में मुझे ऐसे इक बशर की तलाश ।।

जिनको हममें ख़राबियाँ और ऐब दिखते हैं ,
हमको उनमें है इक अच्छाई इक हुनर की तलाश ।।

अब गुनाहों के खात्मे को मुझको लगता है,
इस ज़माने को है पुरताब पयम्बर की तलाश ।।

                     
[ क़मर=चाँद; बशर=आदमी; पयम्बर=अवतार ]
     
                   ग़ज़ल-6  
सर को उठा न ऐसे नुमूदार होइए ।।
करके गुनाह कुछ तो शर्मसार होइए ।।

बेकार सी न बनके क़ब्र घेरिये जगह ,
होना  है तो फिर ताज सी मजार होइए ।।

हालात ज़रुरत के मुताबिक़ कभी-कभी ,
रखकर कलम को जेब में तलवार होइए ।।

अड़ जाए एन वक़्त पे या फिर पटक ही दे ,
घोड़े पर इस तरह से मत सवार होइए ।।

दो के अगर न चार बनाने का हुनर हो ,
मरियेगा भूख से न कर्ज़दार होइए ।।

कब तक नदी के सूखने की राह तकेंगे,
न पुल न नाव तैरकर ही पार होइए ।।
                   
[ नुमुदार=आविर्भूत/प्रकट/व्यक्त ]

               ग़ज़ल-7
जो पाले नेवले उसको न काले साँप दो भाई ।।
हो जिसके हाथ में पत्थर उसे मत काँच दो भाई ।।

न ऐसे नाक भौं अपनी सिकोड़ो आँख न मींचो,
जो  दिखता हो कोई नंगा उसे बस ढाँप दो भाई ।।

जिन्हें नज्ला-ओ-सर्दी है ये उनको ही मुफ़ीद होगी,
जो गर्मी में सुलगते हैं उन्हें मत आँच दो भाई ।।

अगर करना हो सदक़ा तो वसीयत में दमे आख़िर ,
किसी को अपने गुर्दे और किसी को आँख दो भाई ।।

जला है दूध से इतना कि अब तो एहतियातन वो,
न पिता फूँके बिन चाहे बरफ सा छाँछ   दो भाई ।।

जो करते हैं ज़बरदस्ती हैं दहशतगर्द दंगाई ,
कलम कर उनके सर खम्भों पे लट्टू टाँग दो भाई ।।

न शाए' हो सका जो वो मेरा इस आख़िरी दम में,
क़ुरासा  मत पढ़ो दीवान लाकर बाँच दो भाई ।।

                 
[शाए'=प्रकाशित ;क़ुरासा=पवित्र ग्रन्थ/कुरान ;दीवान=ग़ज़ल संग्रह ] 

               ग़ज़ल-8
पानी में रह के बैर मगरमच्छ से लिया ।।
जीना था कई साल मगर सिर्फ़ कुछ जिया ।।

दुनिया में सबकी बात अदब से सुनी मगर,
जो दिल को ठीक-ठाक लगा बस वही किया ।।

अपना समझ के जब भी आँख मूंदकर यकीं,
जिसपे  किया उसी ने बराबर दग़ा किया ।।

नाक़ामयाब हो गए कितने ही रफ़ूगर ,
चिथड़ों को मेरे उनके सिए न गया सिया ।।

टिंडों का काम हमने घिया से भी चलाया,
ग़र नीम न मिली तो करेला ही खा लिया ।।

गंदा है फिर भी पानी है पीले यूँ थार में,
प्यासों ने वक़्त-वक़्त पे पेशाब तक पिया ।।
                
[ घिया=लौकी ;थार =एक मरुस्थल ]
 
            ग़ज़ल-9
अपनी मेहनत का उचित फल जब नहीं मिलता ।।
बीज शोषित में तभी विद्रोह का पड़ता ।।

या तो पक जाता है या फिर रोग से वरना,
शाख  से पत्ता हरा यूँ ही नहीं झड़ता ।।

कुछ न कुछ टकराव के हालात होते हैं ,
हर किसी से कोई यों ही तो नहीं लड़ता ।।

भीम के भी हाथ से दीवार में कीला,
बिन हथौड़े के गड़ाए से नहीं गड़ता ।।

जो खरा होता है लोहा भी तो बरसों तक,
रात दिन पानी में रहकर भी नहीं सड़ता ।।

एक सुर पर्वत को नाटा कहते रहने से ,
बौने टीलों का कभी भी क़द नहीं बढता ।।
                

              ग़ज़ल-10
बहरे को ज्यों सितार की झंकार व्यर्थ है ।।
अंधे पिया के सामने श्रृंगार व्यर्थ है ।।

यौवन में ब्रह्मचर्य बड़ी बात है माना ,
शादी का ढलती उम्र में विचार व्यर्थ है ।।

जपता जो ब्रह्म सत्य,ब्रह्म सत्य की माला ,
उसके लिए घर बार क्या संसार व्यर्थ है ।।

जो पक चुका हो आँच में उस घट को गलाने,
पानी में डुबो रखना लगातार व्यर्थ है ।।

जब तक न पिटेगी रहेगी चुप्पचाप ही ,
ढोलक पे उँगलियों की फेर-फार व्यर्थ है ।।

औलाद के लिए या किसी भी लिहाज से ,
कुंती के साथ पान्डु का अभिसार व्यर्थ है ।।
             

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                    [  डॉ. हीरालाल प्रजापति ]

drhiralalprajapati@gmail.com
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नाम

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तौंसवी,1,फ्लेनरी ऑक्नर,1,बंग महिला,1,बंसी खूबचंदाणी,1,बकर पुराण,1,बजरंग बिहारी तिवारी,1,बरसाने लाल चतुर्वेदी,1,बलबीर दत्त,1,बलराज सिंह सिद्धू,1,बलूची,1,बसंत त्रिपाठी,2,बातचीत,2,बाल उपन्यास,6,बाल कथा,356,बाल कलम,26,बाल दिवस,4,बालकथा,80,बालकृष्ण भट्ट,1,बालगीत,20,बृज मोहन,2,बृजेन्द्र श्रीवास्तव उत्कर्ष,1,बेढब बनारसी,1,बैचलर्स किचन,1,बॉब डिलेन,1,भरत त्रिवेदी,1,भागवत रावत,1,भारत कालरा,1,भारत भूषण अग्रवाल,1,भारत यायावर,2,भावना राय,1,भावना शुक्ल,5,भीष्म साहनी,1,भूतनाथ,1,भूपेन्द्र कुमार दवे,1,मंजरी शुक्ला,2,मंजीत ठाकुर,1,मंजूर एहतेशाम,1,मंतव्य,1,मथुरा प्रसाद नवीन,1,मदन सोनी,1,मधु त्रिवेदी,2,मधु संधु,1,मधुर नज्मी,1,मधुरा प्रसाद नवीन,1,मधुरिमा प्रसाद,1,मधुरेश,1,मनीष कुमार सिंह,4,मनोज कुमार,6,मनोज कुमार झा,5,मनोज कुमार पांडेय,1,मनोज कुमार श्रीवास्तव,2,मनोज दास,1,ममता सिंह,2,मयंक चतुर्वेदी,1,महापर्व छठ,1,महाभारत,2,महावीर प्रसाद द्विवेदी,1,महाशिवरात्रि,1,महेंद्र भटनागर,3,महेन्द्र देवांगन माटी,1,महेश कटारे,1,महेश कुमार गोंड हीवेट,2,महेश सिंह,2,महेश हीवेट,1,मानसून,1,मार्कण्डेय,1,मिलन चौरसिया मिलन,1,मिलान कुन्देरा,1,मिशेल फूको,8,मिश्रीमल जैन तरंगित,1,मीनू पामर,2,मुकेश वर्मा,1,मुक्तिबोध,1,मुर्दहिया,1,मृदुला गर्ग,1,मेराज फैज़ाबादी,1,मैक्सिम गोर्की,1,मैथिली शरण गुप्त,1,मोतीलाल जोतवाणी,1,मोहन कल्पना,1,मोहन वर्मा,1,यशवंत कोठारी,8,यशोधरा विरोदय,2,यात्रा संस्मरण,31,योग,3,योग दिवस,3,योगासन,2,योगेन्द्र प्रताप मौर्य,1,योगेश अग्रवाल,2,रक्षा बंधन,1,रच,1,रचना समय,72,रजनीश कांत,2,रत्ना राय,1,रमेश उपाध्याय,1,रमेश राज,26,रमेशराज,8,रवि रतलामी,2,रवींद्र नाथ ठाकुर,1,रवीन्द्र अग्निहोत्री,4,रवीन्द्र नाथ त्यागी,1,रवीन्द्र संगीत,1,रवीन्द्र सहाय वर्मा,1,रसोई,1,रांगेय राघव,1,राकेश अचल,3,राकेश दुबे,1,राकेश बिहारी,1,राकेश भ्रमर,5,राकेश मिश्र,2,राजकुमार कुम्भज,1,राजन कुमार,2,राजशेखर चौबे,6,राजीव रंजन उपाध्याय,11,राजेन्द्र कुमार,1,राजेन्द्र विजय,1,राजेश कुमार,1,राजेश गोसाईं,2,राजेश जोशी,1,राधा कृष्ण,1,राधाकृष्ण,1,राधेश्याम द्विवेदी,5,राम कृष्ण खुराना,6,राम शिव मूर्ति यादव,1,रामचंद्र शुक्ल,1,रामचन्द्र शुक्ल,1,रामचरन गुप्त,5,रामवृक्ष सिंह,10,रावण,1,राहुल कुमार,1,राहुल सिंह,1,रिंकी मिश्रा,1,रिचर्ड 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रचनाकार: डॉ. हीरालाल प्रजापति की 10 ग़ज़लें
डॉ. हीरालाल प्रजापति की 10 ग़ज़लें
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