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हीरालाल प्रजापति की कविताएँ व ग़ज़लें

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ग़ज़ल 21 क्या मिलेगा रात दिन सब छोड़ कर पढ़के वहाँ II माँजते बर्तन जहाँ एम. ए. किये लड़के यहाँ II   जेब हैं फुलपेंट में उनके कई किस काम के ...

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ग़ज़ल 21

क्या मिलेगा रात दिन सब छोड़ कर पढ़के वहाँ II

माँजते बर्तन जहाँ एम. ए. किये लड़के यहाँ II

 

जेब हैं फुलपेंट में उनके कई किस काम के ,

जब टटोलोगे तो पाओगे वही कड़के यहाँ II

 

ढूँढती फिरती हैं नज़रें इक अदद वैकेन्सी ,

उनका दिल तक कर हसीनाओं को न धड़के यहाँ II

 

कुछ तो छूने के लिए बेताब हैं ऊँचाइयाँ ,

अपने गड्ढों से निकलने लाशों पे चढ़के यहाँ II

 

कुछ कुसूर उनका नहीं जो दिन चढ़े तक सोयें वो ,

रात भर जगते हैं तो कैसे उठें तड़के यहाँ II

 

उनका सपना है कि गलियाँ गाँव की समतल रहें ,

जबकि गड्ढों से अटी हैं शहरों की सड़कें यहाँ II

 

पहले थर्राते थे दरवाज़ो शज़र तूफाँ से सच ,

खिड़कियाँ क्या अब तो पत्ता तक नहीं खड़के यहाँ II 

 

               

कविताएँ 

(1) अगर तुझे कवि बनना है

कविता के लिए विषय ढूंढना /

निशानी नहीं है/ 

कवि होने की/

कविता तो परिभाषित है/ 

कवि कर्म रूप में /

फिर क्यों इतनी परवाह विषय की /

प्रेरणाओं के तत्वों की /

कविता लिखने का संकल्प मात्र /

कविता को जन देगा /

तू लिख .....और सुन.......

गोल पत्थर को छील काट कर /

फ़ुटबाल बना देना /

लम्बोतरे को 

डंडा या खम्भा /

या टेढ़े मेढ़े को 

सांप बना देना /

मौलिक नहीं नक़ल होगा /

गोले में गेंद की कल्पना 

बालक भी कर लेगा /

कवि तो सुना है ब्रह्मा होता है /

अरे ओ शिल्पकार 

मज़ा तो तब है 

जब तेरे सधे हुए हाथ /

तेरी छैनी हथौड़ी /

सुकृत विकृत पत्थर को/ 

जो उससे दूर दूर तक न झलके 

वैसा रूपाकार दें /

और तराशते समय निकलीं 

एक एक छिल्पी /

एक एक किरच /

ये भी निरूपित हों /

जैसे 

घूरे से बिजली /

गंदगी से खाद /

सृजन तो ये है /

तू ऐसा ही कवि बनना ,

बुनना उधेड़ मत करना I


(2) दूसरों के लिए

बार बार 

संपादक /प्रकाशक की 

''सखेद वापस'' की टिप्पणी 

सहित लौटी 

रस छंद अलंकार 

कथ्य और 

सार्थक उद्देश्य से आप्लावित

जैसा कि आप मानते हैं 

और मैं आप पर बड़ा विश्वास रखता हूँ 

आपकी अनन्य अद्भुत और 

नितांत मौलिक काव्य कृति 

हफ़्तों महीनों या वर्षों की 

कड़ी मेहनत से 

बड़े अरमानो से जिसे आपने 

तैयार किया था 

जब 

रद्दी कागजों का 

एक पुलिंदा मात्र बनकर रह जाती है 

दिलो जान से कवि होकर भी आप 

कवि की संज्ञा प्राप्ति से वंचित रह जाते हैं 

तब 

यदि उसे जला नहीं डालते निराश होकर 

तो 

आप उसे 

यूं ही दे  देते हैं 

किसी नामी गिरामी कवि या गीतकार को 

अथवा बेच देते हैं 

चाँद रुपयों में 

बिना नाम के 

अगले ही दिनों वह मचा देती है खलबली 

साहित्य जगत में 

ध्वस्त कर देती है 

बिक्री के सब कीर्तिमान 

पूर दिया जाता है उस खरीदार को 

पुरस्कारों और नकदी से 

वह हो जाता है 

रातों रात ध्रुव  तारा 

आप ज़िन्दगी भर कविताएँ लिखते हैं 

उसके नाम से 

अपनी आजीविका के लिए 

बेचते हैं 

लिखते हैं 

बेचते हैं 

पर उम्र भर 

कवि नहीं कहला पाते 

खरीदार कवि बन जाते हैं I 

 

(3) ढांपने वाला डिज़ाइन बनाओ

कविता कहानी उपन्यास या नाटक 

जो चाहे उठाओ 

अभी भी शेष है 

साहित्य की तमाम विधाओं में 

आना वह नई बात 

जिसे पढने के लिए 

चाट डालता है बहुत कुछ अखाद्य भी 

बहुत दिनों का कोई भूखा जैसे 

बहुत कुछ अपठनीय भी 

न चाहकर भी पढ़ डालती है 

नई पुस्तकाभाव में 

एक पुस्तक प्रेमिका 

सचमुच

लेखक और कवि कुछ नहीं सिवाय दर्जी के 

सभ्य-आधुनिक-आकर्षक शब्दों में 

फैशन डिज़ाइनर के 

जो सिला तो करते हैं 

तन ढांपने को 

वस्त्र 

देखने में जो होते हैं 

बहुत आकर्षक और भिन्न 

सभी 

आतंरिक या बाह्य परिधान 

किन्तु सिलते तो आखिर कपडा ही हैं 

वह सूती खादी रेशम या टेरिकाट  चाहे जो हो 

वही हुक वही काज वही बटन 

वही जिप वही इलास्टिक 

(जैसे पञ्च तत्वों से निर्मित अष्टावक्री या

सुडौल काया किन्तु महत्वपूर्ण आत्मा )

साहित्यकार रूपी लेडीज़ टेलर 

गीतों के ब्लाउज 

कविता के पेटीकोट 

छंदों की मीडियां

मुक्तक  के टाप

उपन्यास की साड़ियाँ 

लघु कथाओं की चड्डीयाँ

भले ही 

अपनी बुद्धिमत्ता को प्रमाणित करते हुए 

बाजारवाद के हिसाब से 

मांगानुसार सिल रहा है 

किन्तु वह कपडे को बदनाम कर रहा है 

क्योंकि उसका डिज़ाइन 

ढाँकने की बजाय 

नंगा कर रहा है I 

 

 

(4) चित्रकला जीविका के लिए

दृष्टि

कहीं भी 

फेंकिए डालिए या लगाइए 

जैसा यहाँ ये दृश्य है 

लगभग सभी कैनवास 

जितनी भी होती हैं 

एक दो तीन चार या दस 

बल्कि ऊपर और नीचे भी 

सभी दिशाओं के 

रंगे पुते गुदे पड़े हैं 

लगभग लगभग ऐसे ही परिदृश्यों से 

तूलिका रंग और कैनवास 

ऐसे दृश्यों की 

बारंबारता के 

कदापि नहीं हैं गुनाहगार 

बल्कि है तो वह चित्रकार 

जो 

कला के लिए नहीं 

मनोरंजन के लिए नहीं 

जीवन के लिए नहीं 

पलायन के लिए नहीं 

आत्म साक्षात्कार के लिए नहीं

सेवा के लिए नहीं 

बल्कि अपनी कला को 

प्रदर्शित करता है आजीविका के लिए 

बखूबी ये जानकर कि

कला बेची नहीं जाती 

बेचता है भरण पोषण के लिए 

हाथ कंगन को आरसी क्या 

बाजारवाद के इस युग में 

वही तो खरीदा जायेगा 

जिसे हम खरीदने के लिए 

देखते हुए 

यह भी देखते हैं 

कि कोई यह देखते हुए 

हमें देखता तो नहीं 

यानि वह चित्र जो 

खंडित करता है 

हमारे ब्रह्मचर्य को 

और जब सपरिवार भूखा चित्रकार 

ऐसे तथाकथित चित्र  प्रेमियों को 

अपनी चित्रकला  

बेचता है ऊंचे दामों में 

तब हो जाता है गुनाहगार ....

खरीदार 

जब सच्चे चित्रकार भूखे मरते हैं 

आवरण युक्त चित्र पड़े पड़े सड़ते हैं 

नंगे धड़ा धड़ बिकते हैं 

तब होता है गुनाहगार ....

समाज 

 

 

(5) दृष्टव्य बंधन

जो तुम चले जाते हो

तो 

ये बहुत बुरा लगता है 

कि 

मुझे बिलकुल बुरा नहीं लगता 

मैं चाहता हूँ 

मुझे सबसे अच्छा लगे 

जब तुम मेरे पास रहो 

क्योंकि 

हम बंधे हैं उस बंधन में 

चाहे किसी परिस्थितिवश 

जब तक दृष्टव्य है यह बंधन 

सर्वमान्य है जिसमें यह 

कि एक पल का बिछोह 

या क्षण भर की ओझलता

कष्टकारी होती है 

रुद्नोत्पादी होती है 

सख्त कमी की तरह खलती है 

कुछ करो कि 

मैं तुम्हारे बिना 

अपना अस्तित्व नकारुं 

तुम्हे तड़प तड़प कर 

गली गली कूंचा कूंचा पुकारूं 

जैसे नकारता पुकारता था 

इस बुरा न लगने की परिस्थिति से पहले 

क्या हो चुका है हमें

तुम भी बहुत कम मिलते हो 

मुझे भी इंतजार नहीं रहता 

तुम जाने को कहते हो 

मैं रोकता नहीं हूँ 

तुम्हे भी अच्छा लगता है  

मुझे भी अच्छा लगता है 

हमें एक दूसरे से 

जुदा होते हुए 

सिर्फ बुरा लगना चाहिए

सिर्फ बुरा ही लगना चाहिए I 

 

 

(6) मौत का वक़्त

जब हम हँस रहे हों 

किन्तु 

फूहड़ कामेडी देखकर 

अथवा 

भद्दा चुटकुला सुनकर नहीं 

बल्कि हम खुश हों 

संतुष्ट  हों यह जानकर 

अथवा समझकर 

भले ही वह झूठ हो कि 

हमने पूरे कर लिए हैं वे कर्तव्य 

निभा डाली हैं वे सारी जिम्मेदारियां 

जो हमारी अपने बड़े बूढों के प्रति थीं 

बच्चों के प्रति थीं 

देश दुनिया समाज के प्रति थीं 

और जब हम अपना सम्पूर्ण दोहन करा चुके हों 

हमारे रहने न रहने से 

किसी को कोई फर्क पड़ना शेष न रह गया हो 

हमारी उपयोगिता समाप्त हो चुकी हो 

यद्यपि हम अभी उम्र में जवान हों 

पूर्णतः स्वस्थ हों और हों निस्संदेह दीर्घायु 

आगे जीना सिर्फ सुखोपभोग के लिए रह गया हो शेष 

तथापि एन इसी वक़्त 

किसी डूबते को बचाते हुए 

किसी के द्वारा किसी को चलाई गई गोली 

धोखे से अपने सीने में घुस जाते हुए 

या सांप से डस लिए जाने से 

या हृदयाघात से 

और नहीं तो 

स्वयं ही फंदे पर झूल जाकर 

अपने जीवन का अंत हो जाना 

अपनी मृत्यु का सौन्दर्यीकरण होगा 

मैं यह बिलकुल नहीं कहता कि 

हमारी मृत्यु को लोग 

महात्मा गांधी का क़त्ल समझें 

या रानी लक्ष्मीबाई की आत्मह्त्या या 

भगत सिंह,  खुदीराम, चन्द्र शेखर आज़ाद की 

कुर्बानी समझ कर 

कारुणिक चीत्कार  अथवा मूक रुदन करें 

किन्तु अवश्यम्भावी 

विशेषतः तवील वक़्त से चली आ रही 

घोषित असाध्य बीमारी 

जो अपने तीमारदारों को भी 

हमारी शीघ्र मुक्ति (मृत्यु) कामना को 

मजबूर करती है 

ऐसी मृत्यु 

चाहे कार्यरत प्रधानमंत्री 

राष्ट्रपति या जनप्रिय अभिनेता अभिनेत्री 

या अन्य किसी अच्छे -बुरे व्यक्ति की हो 

मृत्यु का वीभत्स नज़ारा है 

कितु चाहने से क्या होता है कि

मौत हो तो अनायास हो 

कटी टांग का घोडा गोली खाकर ही कीर्ति को प्राप्त होता है I 

 

 

(7) कसाई का बकरा बनना चाहता हूँ

झुण्ड में बकरियों के 

नौजवान इक बकरा 

गोपिकाओं में सचमुच 

कृष्ण सा दिखाई दे

जबकि भरे यौवन में 

तरसता अकेला हूँ 

किन्तु कसम बकरे की 

लोभ नहीं मैथुन का 

मेरी नज़र में तो बस 

उसका कसाई के घर 

काटने से पहले तक 

पुत्र सा पाला जाना है 

मरने से पहले उसको हर 

वो ख़ुशी मयस्सर है

जो कि गरीब इन्सां को 

ख्वाब में भी दुष्कर है 

दो जून की रोटी को 

दिन रात काम करता है 

फिर भी इतना मिलता है 

पेट नहीं भरता है 

और अगर मरता है 

खाली पेट मरता है 

बकरा बेफिक्र 

भरे पेट कटा करता है 

अपने गोश्त से कितने 

पेट भरा करता है 

हम तो न पाल पाते हैं

और न पले  जाते हैं 

क्यों वयस्क ( बालिग )होते हैं 

बेरोजगार दुनिया में 

सिर्फ़ पेट की चिंता में ही प्राण खोते हैं 

बकरे नहीं मरा करते 

वे तो कुर्बान होते हैं 

जो कुर्बान होते हैं 

वे महान होते हैं 

मुझको बकरा बनना है 

जन्म अगर हो अगला I 

 

 

(8) हत्या का आवेदन

उनसे 

मुझसे 

मठे से 

नमक के घोल अथवा तेजाब से

किन्तु गुस्से से नहीं

महज भावावेश में भी नहीं 

और हताश होकर तो कदापि नहीं 

बल्कि प्रेम से 

चेतना की परिपूर्णता में 

और स्वेच्छा तथा आत्म विश्वास के समंदर में 

मेरी सब तमन्नाओं की

मूसला और झकड़ा

दोनों जड़ें

अंतिम स्नान चाहती हैं 

जो कभी मेरे खून पसीने से 

गहरा - छितरा रही थीं 

मानस की उर्वरता को जकड रही थीं 

आज बेताब हैं उखड़ने को 

मुझसे उन्हें 

अपनी अमूर्तता चिर स्थाई लगती है 

जबकि वे सजीव होना चाहती हैं 

बंगला ,गाड़ी ,नौकर-चाकर ,

सुरा-सुंदरी ,डालर -पौंड आदि आदि रूपों में 

वे समझ चुकी हैं मुझपे अब सूखा मच रहा है 

बूँद बूँद से मै उनकी प्यास नहीं बुझा सकूंगा 

तडपा तडपा कर मार दूँगा 

अतः वे दूरदर्शी तमन्नाएँ 

किसी योग्य 

ऊगते सूरज ,

या पानी भरे मेघ के यहाँ जन्मना चाहती हैं 

बड़ी ज़ल्दबाज़ी है उन्हें 

वे सोचती हैं 

कल मरना ही है तो आज अभी क्यों नहीं ?

वे आत्मा की तरह अमर हैं 

और पुनर्जन्म में उनका पूर्ण विश्वास है 

अतः मेरे यहाँ से मरकर 

कहीं और अवतार लेने की तमन्ना से 

मुझको सविनय 

अपनी हत्या कर डालने का 

आवेदन पत्र लिख रही हैं I

 

 

(9) सोचो

अपनी ही रचना है भाग्य 

आश्चर्य !

अपने ही स्रजन को तुम बुरा कहते हो 

न पा सके उसे जिसे चाहते थे तुम 

मगर क्यों ?

क्या तुम खुद न थे इसका एकमेव कारण ?

देखो झूठ बोलना घोर पाप है 

तुम्हीं कहा करते थे ;अक्सर 

गाहे बगाहे , जब तब 

जहाँ चाह  वहां राह

तुम्हारी भटकन 

तुमसे न सही या शायद तुमसे भी 

भले तुम न कहो 

चीख-चीख कर करती है ये चुगली 

कि तुम 

चल रहे थे जिस राह पर 

सिर्फ क़दम थे तुम्हारे वहां 

भटक रहा था किसी और राह पे 

किसी और को तलाशता तुम्हारा मन

जिसे तुम कहते थे मंजिल

थी वो औरों की दी हुई विवशता 

सलाह थी बिन मांगी 

वो हाथी का दिखाने वाला दांत थी 

ईख तो तुम आज तक भी न ढूंढ सके 

चबाने वाले दांत किस काम के ?

परखो .....तुम खुद के प्रति अपनी ईमानदारी 

वरना काटने को तो पत्थर भी काट दिए हैं रस्सियों ने

तुम सब कुछ नहीं पा सकते बिना परिश्रम के ;

भाग्य  भी ...ये मैं नहीं लोग कहते हैं 

एकनिष्ट भक्त कि अनन्य भक्ति से ही 

प्रकट करता है दानव के सम्मुख 

भगवान को 

विवश करता है मनचाहा वर देने को I

           

 

(10) कैसा बसंत ? (विरह गीत )

जब पास नहीं हैं कन्त,अरे कैसा बसंत ?

हिरदै में विरह जीवंत ,अरे कैसा बसंत ?

देके पहली रात ही सदमा ,

ऐसे निकले घर से बलमा ,

हो गए साधू संत ,अरे कैसा बसंत ?

खुद को उनसे पूरा जोड़ा ,

इक पल उनका ध्यान न छोड़ा ,

सिल ही रहे भगवंत ,अरे कैसा बसंत ?

होंठ सिले चेहरा उतरा ,

मन में ऐसा फैला पसरा ,

दुःख दर्द असीम अनंत ,अरे कैसा बसंत ?

फूलों कि नहीं इक डाल जहाँ ,

काँटों से भरे जंजाल जहाँ ,

औ' चलना वही हो पंथ ,अरे कैसा बसंत ?

इक दो घर बस हँसते गाते ,

दस बीस सिसकते चिल्लाते ,

घर घर जो नहीं आनंद ,अरे कैसा बसंत ?

--

   

हिंदी की दुर्दशा

 

अंग्रेजी  ने  हिंदी की  चिंदी  चिंदी  कर  डाली है II

अपने  ही घर से  रुखसत बेचारी  होने  वाली है II

अंग्रेजी का ज़हर देश में  नित्य फैलता जाता  है ,

मृतभाषा की इक मिसाल अब हिन्दी होने वाली है II

हिन्दी सी वैज्ञानिक भाषा दुनिया में न होगी पर ,

यह भाषा जाहिल गंवार लोगों की होने वाली है II

अपने ही घर में जब दूजे हुक्मरान बन आते हैं ,

समझ लीजिये घर वालों की छुट्टी होने वाली है II

पढ़ालिखा वो नहीं जो हिन्दी में लिखता बतियाता है ,

पढ़े लिखों की  भारत में अंग्रेजी बोली चाली है II

हिन्दी शिक्षक अंग्रेजी में हिन्दी को समझाते हैं 

लगता है अब रोमन लिपि हिन्दी की होने वाली है II

____________________________________

 

फिर चुनाव आये

           

फिर चुनाव  सर आ बैठे  पहुंचेंगे अब  दर  दर  नेता II

भीख वोट की झुक झुक मांगेगे आकर घर घर नेता II

ये गूलर के फूल फकत मिलते हैं मतलब की खातिर 

फिर  मशाल  ले  ढूंढोगे आयेंगे  नहीं  नज़र नेता II

एक  वोट की खातिर  सौ सौ  झूठ सत्य सा बोलेंगे 

कितने ही  कसमें वादे  ये  करेंगे सर छूकर नेता II

बात जीत की छोडो बस मतदान ही तो हो जाने दो 

जिनके  पैर  पखारेंगे  कल  मारें गे ठोकर  नेता II

किसे वास्ता है जनहित से किसे देश की चिंता है ,

धन और नाम कमायें कैसे करते यही फिकर नेता II

संस्कार आदत स्वभाव कैसे वर्षों के छूटेंगे ,

एन  केन  बन  जाएँ  डाकू कातिल भी रहबर नेता II

सोच रहा हूँ किसको अपने मत का दान करूंगा मैं ,

मेरी  नज़रों  में  नालायक  नाकाबिल है  हर नेता II

_____________________________________

           [ डॉ. हीरालाल प्रजापति ]

टिप्पणियाँ

ब्लॉगर: 6
  1. बेनामी9:30 am

    Bahut hi sunder rachanaye. Badhaiya
    Shankar Lal

    जवाब देंहटाएं
  2. आपने कहा है की हिन्दी की चिंदी यह कोई सम्मानीय बात या विचार नहीं है । आज हिन्दी बहतर दिशा और दशा में है, हमें केवल इतना ही करना है की हमारे आपके बच्चों को हिन्दी के साथ जोड़े रखें, आप क्यों दुश्चिंता करते हैं कि हिन्दी बर्बाद हो रही है । जाहिलों की भाषा हो रही है । जाहिल भी हमारे देश की जनता हैं और संख्या भी बहुत हैं अगर वह इस भाषा को अपनाते हैं तो हमें शर्म आनी चाहिए, आपको दृढ़ होकर अपने से और परिवेश से हिन्दी की लड़ाई लड़नी होगी । यूं रोने से काम न चलेगा । हिन्दी की किसी भी हालत में दुर्दशा नहीं हुई है ।

    डॉ. मोहसिन ख़ान
    सहा.प्रा. हिन्दी
    जे.एस.एम. महाविद्यालय,
    अलीबाग (महाराष्ट्र)

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. Pratikriya ka dhnyawad, ise vyangya rachna k roop me lein. vastav me hindi bahut lokpriya ho rahi hai aur iska bhavishya bahut ujjawal hai. Hindi k prati aapke samman bhaw ko naman... aur iske ujjawal bhavishya k prati aise hi aashanvit bane rahein. Hindi Bhashiyo/sahityiko ki hoslaafjai ka shukriya.

      हटाएं
  3. बेनामी4:14 pm

    श्री हीरालाल प्रजापति जी,
    प्रणाम!
    बहुत ही सुन्दर तथा भावनात्मक रचनाएँ आपने प्रस्तुत की हैं। इससे हम जैसे अनुभवहीन बच्चें काफी कुछ सीखेंगे।
    आपका हार्दिक धन्यवाद!

    जवाब देंहटाएं
  4. बेनामी4:17 pm

    श्री हीरालाल प्रजापति जी,
    प्रणाम!
    बहुत ही सुन्दर तथा भावनात्मक रचनाएँ आपने प्रस्तुत की हैं। इससे हम जैसे अनुभवहीन बच्चें काफी कुछ सीखेंगे।
    आपका हार्दिक धन्यवाद!

    जवाब देंहटाएं
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जोशी,1,सी.बी.श्रीवास्तव विदग्ध,1,सीताराम गुप्ता,1,सीताराम साहू,1,सीमा असीम सक्सेना,1,सीमा शाहजी,1,सुगन आहूजा,1,सुचिंता कुमारी,1,सुधा गुप्ता अमृता,1,सुधा गोयल नवीन,1,सुधेंदु पटेल,1,सुनीता काम्बोज,1,सुनील जाधव,1,सुभाष चंदर,1,सुभाष चन्द्र कुशवाहा,1,सुभाष नीरव,1,सुभाष लखोटिया,1,सुमन,1,सुमन गौड़,1,सुरभि बेहेरा,1,सुरेन्द्र चौधरी,1,सुरेन्द्र वर्मा,62,सुरेश चन्द्र,1,सुरेश चन्द्र दास,1,सुविचार,1,सुशांत सुप्रिय,4,सुशील कुमार शर्मा,24,सुशील यादव,6,सुशील शर्मा,16,सुषमा गुप्ता,20,सुषमा श्रीवास्तव,2,सूरज प्रकाश,1,सूर्य बाला,1,सूर्यकांत मिश्रा,14,सूर्यकुमार पांडेय,2,सेल्फी,1,सौमित्र,1,सौरभ मालवीय,4,स्नेहमयी चौधरी,1,स्वच्छ भारत,1,स्वतंत्रता दिवस,3,स्वराज सेनानी,1,हबीब तनवीर,1,हरि भटनागर,6,हरि हिमथाणी,1,हरिकांत जेठवाणी,1,हरिवंश राय बच्चन,1,हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन,4,हरिशंकर परसाई,23,हरीश कुमार,1,हरीश गोयल,1,हरीश नवल,1,हरीश भादानी,1,हरीश सम्यक,2,हरे प्रकाश उपाध्याय,1,हाइकु,5,हाइगा,1,हास-परिहास,38,हास्य,59,हास्य-व्यंग्य,78,हिंदी दिवस विशेष,9,हुस्न तबस्सुम 'निहाँ',1,biography,1,dohe,3,hindi 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रचनाकार: हीरालाल प्रजापति की कविताएँ व ग़ज़लें
हीरालाल प्रजापति की कविताएँ व ग़ज़लें
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