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सुरेन्‍द्र कुमार पटेल की लघुकथा - होनी

होनी

‘बाबूजी ,कुछ रुपयों की मदद कर दो । बहू को सात माह का गर्भ है । कसाई पीलिया उसके प्राण लेना चाहता है ।' मंगल ने अपने रइर्स रिश्‍तेदार से याचना की ।

‘तुम्‍हारा बेटा कुछ इंतजाम नहीं किया ? ' रिश्‍तेदार ने सवाल किया ।

‘इंतजाम में ही परदेश गया है । कुछ रुपए भेजा भी था । उसे क्‍या मालूम था ये आफत आ जाएगी ।'

‘तो उसके भेजे रुपए कहां चट कर दिए । '

‘एक पाई नहीं उजाड़ा बाबूजी ।सब बहू के दवा -दारू में लग गए ।'

‘मुझसे हजार रुपए से अघिक की मदद न होगी। मेरे भी दिन इस समय अच्‍छे नहीं चल रहे हैं ।'

‘लेकिन मैं आपके पास बड़ी उम्‍मीद लेकर आया था । पाई -पाई चुका दूंगा बाबूजी । फिर मेरे जान-पहचान , नात रिश्‍तेदारों में आप -सा सबल कोइर् और नहीं है ।'

रइर्स रिश्‍तेदार ने पांच-पांच सौ रुपए के दो नोट थमाए और चुपचाप अपने दूसरे कामों में लग गया ।यह उसका मौन उत्‍तर था जिसे मंगल ने भी समझ लिया था ।

अगले दो दिन बाद मंगल के घर दिवंगत के नाम पर इकटठी हुई साड़ियों में उसकी दी साड़ी सबसे मंहगी थी ।उसे मंगल को सौंपते हुए उस रईस रिश्‍तेदार ने मंगल को सीने से लगा लिया और कहा , ‘मंगल , होनी को कौन रोक सकता है ?'

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सुरेन्‍द्र कुमार पटेल

वार्ड क्रमांक -4,

ब्‍योहारी जिला - शहडोल म0प्र0

484774

ईमेल surendrasanju.02@gmail.com

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