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सुरेन्द्र कुमार पटेल की दो लघुकथाएँ

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  1. *रिश्ता* पैसेन्जर- कम- एक्सप्रेस गाड़ी के जनरल बोगी में सब्जी बेचने वाली महिला पैरों को लगभग छाती तक चिपकाकर सामने की सीट पर पड़ी थी ।धो...

 
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*रिश्ता*

पैसेन्जर- कम- एक्सप्रेस गाड़ी के जनरल बोगी में सब्जी बेचने वाली महिला पैरों को
लगभग छाती तक चिपकाकर सामने की सीट पर पड़ी थी ।धोती को यूँ लपेट लिया था
जैसे वह कोई गठरी हो ।उसके सिर पर तीन आदमी ऊँघ रहे थे और चौथा आदमी
अधफटा, मैला -कुचैला कमीज पहने घुटने की तरफ बैठा था ।

अभी दो-तीन स्टेशनों से वह उस महिला को जगाने का वाग्प्रयास करने लगा है
।अभी जब ट्रेन ने पिछला स्टेशन छोड़ा है ,उसका यह प्रयास और तेज हो गया है


"अरे उठ ना रे ।स्टेशन तो आएं वाला है ।जानती है , मिनट भर भी गाड़ी नहीं रुकती ।"

कहकर उसने उसके घुटनों को पकड़कर हिला दिया ।महिला ने पैरों को खोलकर उसकी
गोद में पटक दिए और फिर करवट बदल कर खर्राटा भरने लगी ।अभी गाड़ी धीमा
होना ही चाहती थी कि उस आदमी ने उसके पाँव को टटोला और अंगूठे के ऊपर जोर
की चिकोटी काट दी ।

महिला गुर्राई ," सोने क्यों नहीं देते ? "

"स्टेशन आ गया ।जल्दी उठ ।गाड़ी चल दी तो उतर ना पाएगी ।" कहकर वह आदमी धम्म से खड़ा
हो गया और फिर धीरे-धीरे गेट की तरफ सरक गया ।

महिला ने कपड़े- लत्ते
सम्हाले । फिर सीट के नीचे और यत्र-तत्र पड़े सब्जी कार्टूनों को गेट की तरफ
सरकाने लगी ।जब गाड़ी ठहर गयी तो वह जल्दी से नीचे उतर गयी ।आदमी ने
कार्टूनों को एक-एक कर नीचे फेंका और पूछा ,
"सब हैं न ? "
"हाँ-हाँ ,सब हैं । और तुम सो मत जाना ।उतर जाना ।"
" हाँ ,उतर जाऊँगा ।मेरी फिकर करती है ! अपने जैसा समझ ली है ससुरी ।"
बुदबुदाता अपनी सीट पर आ गया। उन दोनों के बीच का प्रेम से सना वह सहयोग देखकर
सामने बैठे आदमी के मन में रिश्तों की कुलबुलाहट पैदा हो गई ।पहले तो
समझा पत्नी होगी ।पर जब वह महिला पिछले स्टेशन पर उतर गई तो उसका वह
विश्वास टूट गया ।तो फिर बहन होगी या कोई खास --वह कयास लगा रहा था ।
"बहन है ? " उसने पूछा ।
"काहे को बहन बाबूजी ।सिर का बोझ है ससुरी ।कहारिन ।चार स्टेशन से जगाए
पड़ता है तब कहीं जग पाती है ।...थक जाती है बेचारी ।"
फिर अपने आप ही -थोड़ा गम्भीर होकर उस सब्जी वाले ने कहा,
" हाँ बहन ही समझो बाबूजी
।आठ-दस साल से खरीदी -बेची का धंधा साथ करती है ।मुझे कुछ कम दिखता है
,वो सब्जी देख के खरीद लेती है ।मैं कार्टून बाँध लेता हूँ ।ट्रेन में
साथ में लाद-उतार लेते हैं ।हिसाब- किताब भी ठीक कर लेती है । घरवाला
दरुहा है ।बेचारी किसी तरह अपना पेट पाल रही है ।पराए जात की है पर कोई
दुराव नहीं मानती ।" उसने अपने संबंधों की व्याख्या खुलकर कर दी ।फिर भी
न जाने क्यों सामने बैठे आदमी के भीतर का पिशाच रिश्ता ढूँढ़ रहा था --उन
दोनों के बीच
वैसी प्रगाढ़ता उतने भर के लिए थोड़े ही होगी !
-0-


2.
*सत्तर के पार*

सत्तर के पार का एक बूढ़ा गाल पिचक गए हैं सो बात रह रहकर झरती है।बाल
सफेदी से भी झक सफेद हैं ।हर रोज की तरह उस रोज भी वह मेरे दरवाजे पर आकर
ठिठक गया ।वह जब भी प्रात:भ्रमण के लिए निकलता है ,मुझे पूछता है ।मैं
बैठने को कहता हूँ वह 'फिर कभी 'कहकर चला जाता है ।उस रोज वह दरवाजे पर
खड़ा
कई मिनटों तक बतियाता रहा । बहुत आग्रह करने पर कुर्सी मंगाकर बाहर ही बैठ
गया ।उसकी आदत है या उम्र का तकाजा ।वह जिस बात को पूछ चुका होता है
,दो मिनट बाद उसी प्रश्न को फिर दोहराता है। थोड़ा कम सुनता है इसलिए जरा
ऊँची आवाज में बात करता है ।लोग उसे सनकी कहते हैं ।जबसे मुझे मालूम हुआ
है, मैं भी उसकी बातों में कम ही रुचि लेता हूँ ।

उस रोज वह सीधा-सपाट
बतिया रहा था ।बिना किसी प्रश्न को दोहराए और कुछ धीमी आवाज में भी ।मुझे
आश्चर्य हुआ लोग इसे सनकी क्यों कहते हैं ? मुझसे न रहा गया तो मैंने पूछा,
"दादाजी ,एक बात कहूँ , बुरा तो न मानेंगे ? "

"तुम्हारी बात का बुरा न मानूँगा बेटा ।तुम बैठने को कहते हो यही क्या कम
है ।बाकी लोग तो मुझे सनकी समझते हैं ।पागल कहते हैं ।अब सत्तर पार हो
चुका । फिर सबके शरीर का अपना दम होता है ।परिवार का झंझावत भी खूब झेला
सो बुढ़ापा समय के कुछ पहले घेर लिया ।अब तुम्हीं बताओ ऐसे में बुद्धि
कमजोर तो हो जाएगी न? मुझे लोग कहते हैं ,इसका दुख नहीं ।पर एक दिन मेरे
बेटे का एक मित्र घर आया ।सोचा बोल-बताकर मन हल्का कर लूँ ।मैं किसी काम
से उठा ही था कि मेरा बेटा अपने मित्र से कह रहा था -
' इनकी बात का बुरा मत
मानना ,थोड़ा सनकी हैं ।' अब तुम्हीं बताओ बेटा तुम्हें कोई सनकी कहे तो
बुरा लगेगा न? आखिर मैं किससे बात करूँ ? कहाँ जाऊँ ? कोई मिल गया तो
दिल खोल कर बोल लेता हूँ तो सनकी हूँ क्या ? पर तब से मुझे सचमुच की सनक
सवार हो गई है ।मोहल्ले के सब जानने लगे हैं कि मैं सनकी हूँ ।...अरे हाँ
तुम कुछ पूछना चाह रहे थे पूछो-पूछो ।"

मेरा प्रश्न हलक में अटक कर रह गया ।बिना प्रश्न किए ही उत्तर मिल चुका
था ।'कुछ नहीं दादाजी '
कहकर मैंने टालने की कोशिश की । वह बूढ़ा कह उठा ," लगता है तुम भी मुझे
सनकी समझने लगे हो ।" मैं विस्फारित नेत्रों से उसे देखता रहा और वह
मुस्कुराकर चला गया ।
-0-

सुरेन्द्र कुमार पटेल
वार्ड क्रमांक -4 ,
ब्योहारी जिला -शहडोल
मध्यप्रदेश 484774
मो.09893563284
ईमेल:
surendrasanju.02@gmail.com

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रचनाकार: सुरेन्द्र कुमार पटेल की दो लघुकथाएँ
सुरेन्द्र कुमार पटेल की दो लघुकथाएँ
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