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प्रमोद कुमार सतीश की कविता - भरोसा नहीं...

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है हवस इतनी पी लूं समन्दर मगर
प्यास बुझ पाएगी ये भरोसा नहीं


यूं तो हर बात उसकी मरहम लगे
घाव भर पाएगी ये भरोसा नहीं


महफिलों में दीदार हो जाएगा
बात हो पाएगी ये भरोसा नहीं


रास्तों पर मिलेंगे वो अक्सर हमें
आँख मिल पाएगी ये भरोसा नहीं


घर में जितनी थी यादें मिटा दीं मगर
दिल से मिट पाएंगी ये भरोसा नहीं


उसको पाने की चाहत तो जन्मों से है
पर वो मिल पाएगी ये भरोसा नहीं


उसकी खातिर इबादत तो कर ली मगर
पूरी हो पाएगी ये भरोसा नहीं

2 टिप्पणियाँ

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